Posted by: amitabhtri | November 17, 2006

पहल

  इधर काफी दिनों से ब्लाग की दुनिया से गायब रहा और लम्बे समय से कोई लेख भी नहीं लिख सका. इसके कई कारण रहे परन्तु उनमें से एक यह भी था कि तकनीकी कमियों के कारण नारद के कुछ दिन तक काम न करने के कारण लेख पर टिप्पणियाँ प्राप्त नहीं होती थीं इस कारण अधिक उत्साह भी नहीं रहता था. इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मैं टिप्पणियों के लोभ में लिखता हूँ परन्तु उससे द्विपक्षीय वार्तलाप होता है और हमें पता चलता रहता है कि हमारे विचार किस स्तर के हैं और उनमें सुधार की कितनी सम्भावनायें हैं.    

              ब्लाग की दुनिया से मेरा सर्वप्रथम परिचय मेरे मित्र भाई शशि कुमार सिंह ने कराया और उसके उपरान्त मुझे इसमें आनन्द आने लगा. आरम्भिक दौर में स्वान्त: सुखाय ही यह करता रहा, परन्तु कुछ ही महीनों में भाई शशि के साथ बातचीत में विचार आया कि यूनीकोड की इस सुविधा को क्यों न एक वरदान के रूप में प्रयोग किया जाये. वास्तव में तो इण्टरनेट पश्चिमी आविष्कार है और यह वैश्वीकरण में अन्तर्निहित बाजारमूलक शक्तियों का प्रचार का सबसे बड़ा हथियार है फिर भी हमें भूलना नहीं चाहिये कि अपने शासन को भारत में शाश्वत बनाने के लिये लार्ड मैकाले द्वारा थोपी गई अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने ही राजा राममोहन राय, अरविन्द घोष, स्वामी विवेकानन्द और सुभाषचन्द्र बोष जैसे यशस्वी देश भक्तों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया जिन्होंने सामयिक साम्राज्यवादी शक्तियों को उनकी ही भाषा में ही न केवल उत्तर दिया वरन् हिन्दू पुनर्जागरण की पताका फहराकर हिन्दुत्व की पुनर्स्थापना की.         

         आज एक बार फिर सेमेटिक धर्मों से प्रेरित शक्तियाँ जेहाद और वैश्वीकरण के स्वरूप में विश्व की विविधता नष्ट कर उसका एकसमानीकरण करना चाहती हैं, इस प्रकृति विरोधी एकसमानीकरण प्रवृत्ति का उत्तर क्या हो सकता है तो भारत की विविधतावादी संस्कृति. विविधतावादी इसलिये नहीं कि यहाँ भारतवंशी धर्मों की स्वीकार्यता है वरन् विविधतावादी इसलिये कि इस संस्कृति में चर-अचर जगत को परमात्मा की अभिव्यक्ति मानकर कण-कण में एक ही आत्मा के दर्शन किये जाते हैं, इसी कारण जो हमारी उपासना पद्धति से मोक्ष प्राप्त नहीं करना चाहता उसके भी व्यक्तित्व का सम्मान होता है, उसे भी जीने का पूरा अधिकार होता है क्योंकि उसके भीतर भी वही प्रकाश है जो हमारे अन्दर है.                     

    दुर्भाग्यवश एक ओर बन्दूक के जोर से तो दूसरी ओर बाजारमूलक शक्तियों के जोर से विश्व को एकसमान बनाने का प्रयास हो रहा है. जेहाद जहाँ लोगों को भयभीत कर उनकी आस्था को डाँवाडोल कर रहा है तो बाजारी शक्तियाँ हमारी भाषा, संस्कार और मूल्यों को नष्ट करने पर आमादा हैं. मुनाफे को परम लक्ष्य मानकर, शारीरिक सुख को सबसे बड़ा सुख मानकर तथा सफलता को अच्छाई पर प्राथमिकता देकर एक नई संस्क़ति का सृजन किया जा रहा है जहाँ आत्मीयता, प्रेम, संस्कार और मूल्य पैसे या मुनाफे के तराजू में तोले जा रहे हैं.               मैंने आप लोगों के समक्ष कोई नई बात नहीं बताई है, मैं नया केवल इतना बताने जा रहा हूँ कि हमने इस वैश्वीकरण की आँधी को रोकने का मार्ग निकाल लिया है और उस दिशा में पहल भी आरम्भ कर दी है.   वैश्वीकरण और जिहाद की यह आँधी रोकने का एकमेव मार्ग है अपना आधार पुष्ट किया जाये. अधिक से अधिक लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़ने के लिये लोकशिक्षण से जन-जागरण की तकनीक अपनाई जाये.                        

         जैसा कि मैंने आरम्भ में कुछ महापुरूषों का नाम लिया था उसी प्रकार हम इण्टरनेट की तकनीक के सहारे अपनी भाषा और संस्कृति को भ्रष्ट होने से बचा सकते हैं. बाजारमूलक शक्तियाँ एक विचित्र प्रकार की भाषा का समावेश पत्रकारिता में कर रही हैं. वे उत्तेजना और कण्डोम संस्कृति को प्रोत्साहन देकर अपनी पत्र, पत्रिकाओं , इलेक्ट्रानिक माध्यमों और फिल्मों के लिये बाजार बनाना चाहती हैं. इस विचार को रोकने का सशक्त माध्यम भाषाई समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा स्वप्रेरित भाव से साहित्य सृजन या रचनात्मक कार्य में लगे लोगों को प्रोत्साहित करते हुये उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर एक संगठित स्वरूप देना है.                     

 हमने इस दिशा में एक सार्थक पहल 11व 12 नवम्बर 2006 को नई दिल्ली स्थित संकटमोचन आश्रम रामकृष्णपुरम् से-6 में की जब भाषाई समाचार पत्रों के देश भर के 85 सम्पादक एक मंच पर एकत्र आये और दो दिन तक देश के ज्वलन्त विषयों पर परस्पर विचार-विनमय हुआ तथा राष्ट्रीय सन्दर्भ में भाषाई समाचार पत्रों का आकलन किया गया. इस कार्यक्रम में लिट्टी चोखा वाले भाई शशि कुमार सिंह का बड़ा सहयोग रहा, इसके साथ ही जागरण डाट काम के समाचार सम्पादक अर्जुन देशप्रेमी ने अपने सम्बोधन में जिस प्रकार नई तकनीक को व्यावहारिक भाषा में समझाकर उसके उपयोग को अत्यन्त सरल सिद्ध कर दिया उससे प्रतिभागियों का उत्साह सातवें आसमान पर था.   

           यह पहल अब रूकने वाली नहीं है इस कल्पना को साकार स्वरूप देने के लिये हर उस व्यक्ति से सहयोग अपेक्षित है जो अपनी अगली पीढ़ी को संस्कार, भाषा, मूल्य और धर्म की वही विरासत देना चाहता है जिसमें हम पले-बढ़े हैं. बाजारमूलक शक्तियाँ भारत के प्रचार माध्यम पर अपनी पूँजी का शिकंजा कस कर उसे मुनाफे का बाजार बनाना चाहती हैं जहाँ सेक्स, उत्तेजना, कामुकता, यौनसुख को चर्चा का विषय माना जायेगा. क्रिकेट, फिल्म देश की अभिव्यक्ति मानी जायेगी. किसानों की आत्महत्या, मजदूर की पसीने की कमाई, संयुक्त परिवार का संस्कार न तो देखने को मिलेगा और न सुनने को .

         इससे पहले कि वैश्वीकरण की आँधी हमारी साहित्यिक और रचनात्मक सोच को भ्रष्ट कर हमें बाजारमूलक बना दे हमें समय रहते चेत कर अपनी बिखरी हुई शक्ति को सहेजना होगा. भाषाई समाचार पत्रों, आंचलिक रचनाधर्मियों, साहित्यकारों को एकत्र लाना होगा ताकि अपनी संस्कृति को परिवार से बाजार बनने से रोका जा सके.

Responses

बहुत दिनो बाद आपने लिखा है, देख कर खुशी हुई.
यह बहाना अच्छा नहीं है की नारद के बन्द होने से टिप्पणीयाँ मिलनी बन्द हो गई थी. वैसे भी आपके चिट्ठे पर एक-आध टिप्पणी ही आती रही है. साम्प्रदायिक कहलवाने का खतरा कौन उठाए?
आपने जो लिखा है की,”बाजारी शक्तियाँ हमारी भाषा, संस्कार और मूल्यों को नष्ट करने पर आमादा हैं.” इससे सहमत नहीं हुआ जा सकता. ध्यान देने से आप पाएंगे की यह एक दम उलटा हो रहा है.

बेगाणी जी मैं आपसे मिला तो नहीं हूँ परन्तु आपकी मेधा और जिज्ञासा से आपके प्रति मेरे मन में काफी सम्मान है. जहाँ तक साम्प्रदायिक कहलाने का भय है तो इसे मैं अपने लिये एक स्नेहपूर्ण उलाहना ही मानकर चल रहा हूँ. मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मुझे साम्प्रदायिक दिखने में कोई भय नहीं है. वास्तव में इन दिनों कुछ ऐसा व्यस्त हुआ कि लिख नहीं पाया. वैसे बाजारी शक्तियों द्वारा भाषा और संस्कार पर आपके प्रतिवाद का विस्तृत आधार चाहता हूँ यदि इस सम्बन्ध में अपने विचार को और अधिक स्पष्ट करें तो कृपा होगी.

दुबारा लिखने पर मुबारकबाद - बहुत दिनों बाद आपका लेख पढने को मिला बहुत ही जान्दार लेख है। उम्मीद है अब लिखना जारी रखेंगे।

अरे भाई, लिख़ो लगातार लिख़ो| हम सब पढने के लिए तो है ही|
रही बात टिप्पणियों की, भई, इसके लिए परेशान ना हो, ब्लॉगिंग तो दिल की भडास है, दिल की आवाज है, इसके लिए आपको किसी की टिप्पणियों की दरकार नही होनी चाहिए|

लिखो और मस्त रहो|

दमदार लेख ।

त्रिपाठी जी
बहुत दिनों के बाद लिखा पर बहुत सुन्दर लेख लिखा आपने, बधाई।
आजकल जिस तरह अपने आप “सेक्यूलर” या “सूडो सेक्यूलर” कहलाने का फ़ैशन चला है, उसमें आपको अपने आपको साम्प्रदायिक कहलाने में कोई भय नहीं है पढ कर आपके प्रति सम्मान बढ़ गया है।

अमिताभजी
नमस्कार
आपने बहुत ही विचारोत्तेक लेख लिखा है। बधाई।

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