हम आतंकवाद से नहीं बजरंग दल से लडेंगे
Posted by amitabhtri on October 12, 2008
हम आतंकवाद से नहीं बजरंग दल से लडेंगे
अमिताभ त्रिपाठी
भारत के प्रधानमंत्री द्वारा डा मनमोहन सिंह द्वारा प्रस्तावित राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक को लेकर विवाद सा उठता दिख रहा है। राष्ट्रीय एकता परिषद के एजेण्डे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच वाद विवाद का जो दौर चल रहा है उसमें विपक्ष की ओर से भारतीय जनता पार्टी के नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो प्रश्न उठाया है वह अत्यंत सटीक है। नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में आतंकवाद को एजेण्डे में शामिल न करने पर आश्चर्य व्यक्त किया है। वहीं सत्तारूढ यूपीए के घटकों राष्ट्रीय जनता दल और लोकजनशक्ति ने बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में उठाने की बात की है। इन दोनों ही पक्षों को सुनने के बाद एक बात अत्यंत ही आश्चर्यजनक लगती है कि आखिर राष्ट्रीय एकता परिषद के बैठक बुलाने की आवश्यकता क्यों आन पडी और इसके पीछे असली मंतव्य क्या है?
इस सम्बन्ध में यदि उडीसा के मामले को लेकर पिछले दिनों कैबिनेट की हुई बैठक का सन्दर्भ लिया जाये तो बात कुछ हद तक स्पष्ट हो जाती है। कैबिनेट की बैठक के बारे में जोर शोर से प्रचारित किया गया कि इस बैठक में हिन्दूवादी संगठन बजरंग दल पर प्रतिबन्ध लगाने के सम्बन्ध में कोई अन्तिम निर्णय हो सकता है। कैबिनेट की उस बैठक में इस विषय पर चर्चा भी हुई और कानून मंत्री तथा गृहमंत्री की ओर से बैठक में उपस्थित सदस्यों को बताया गया कि बजरंग दल के विरुद्ध इस बात के पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं कि उस पर प्रतिबन्ध को न्यायालय में न्यायसंगत ठहराया जा सके। अब राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक से पूर्व हिन्दूवादी संगठनों पर प्रतिबन्ध की माँग और देश भर में हो रही इस्लामी आतंकवाद की घटनाओं को चर्चा से परे रखना कुछ विशेष मानसिकता की ओर संकेत करता है।
पिछले अनेक वर्षों से देश में इस्लामी आतंकवाद ताण्डव मचा रहा है और भारत में 2004 के बाद से जितनी भी आतंकवाद की घटनायें या बडे बम विस्फोट हुए हैं उनमें भारत के देशी मुसलमानों का हाथ रहा है और फिर वह सिमी हो या फिर नवनिर्मित इंडियन मुजाहिदीन। आज देश में मुसलमानों की युवा पीढी का एक ऐसा वर्ग निर्मित हो गया जो कुरान और अल्लाह का हवाला देकर निर्दोष हिन्दुओं को मूर्ति पूजा करने की सजा दे रहा है और इस विस्फोटों को अल्लाह के लिये किया जाने वाला जेहाद बता रहा है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि भारत सरकार और देश के राजनीतिक दलों की इस आधार पर समीक्षा की जाये कि वे इस नयी उभरती समस्या के समाधान के लिये कितने उद्यत हैं। दुर्भाग्यवश जब हम इस सम्बन्ध में सोचते हैं तो हमें अत्यंत निराशा का सामना करना पडता है। आतंकवाद की इस पूरी समस्या से लड्ने के लिये एक समन्वित रणनीति अपनाने के स्थान पर इसे वोट बैंक के तराजू में तोला जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में देश में आतंकवादियों की रणनीति और प्रेरणा दोनों में अंतर आया है। अभी कुछ वर्षों पूर्व तक हमारे राजनेता, पत्रकार और सुरक्षा विशेषज्ञ इस बात की दुहाई देते नहीं थकते थे कि भारत के मुसलमान अत्यंत सहिष्णु हैं और सूफी परम्परा के हैं इस कारण विश्व भर में जेहाद के नाम पर चल रहे इस्लामवादी आन्दोलन का प्रभाव भारत के मुसलमानों पर नहीं पडेगा और भारत निश्चय ही मध्य पूर्व में इजरायल के विरुद्ध चल रहे आतंकवाद या इंतिफादा से पूरी तरह असम्पर्कित रहेगा। यही कारण है कि भारत का बौद्धिक समाज और राजनीतिक नेतृत्व 11 सितम्बर को अमेरिका पर हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमण के बाद भी इस अपेक्षा में बैठा रहा कि भारत में मुसलमानों के साथ होने वाले व्यवहार, सेक्युलरिज्म के प्रति उनकी समझ और लोकतन्त्र में उनकी आस्था और नरमपंथी इस्लाम की उनकी परम्परा के चलते इस वैश्विक जेहादी आन्दोलन के प्रति उनका झुकाव नहीं होगा।
इसी भावना के चलते 2004 से पहले तक भारत में होने वाले आतंकवादी आक्रमणों के लिये पडोसी पाकिस्तान के कुछ इस्लामी आतंकवादी संगठनों और खुफिया एजेंसी आईएसाआई को दोषी ठहराया जाता था और यह बात तथ्यात्मक भी थी कि सीमा पार से लोग आतंकवादी घटनाओं के लिये भारत आते थे और उन्हें स्थानीय स्तर पर कुछ सहयोग मिलता था परंतु योजना से क्रियान्वयन तक सभी कुछ सीमा पार के तत्वों का होता था। परंतु अचानक 2004 के बाद भारत में सीमा पार के इस आतंकवाद ने इस्लामी आतंकवाद का स्वरूप ग्रहण कर लिया और भारत स्थित अनेक इस्लामी संगठनों ने पिछले अनेक वर्षों से चल रहे इस्लामी आन्दोलन को आतंकवाद में परिवर्तित कर दिया और सिमी तथा इंडियन मुजाहिदीन जैसे संगठन खुलकर आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने लगे।
आज देश के समक्ष यह अत्यंत बडी चुनौती है कि इस समस्या के मूल को समझकर उसका समाधान तलाशा जाये। इस लेखक ने अपने अनेक पिछले आलेखों में इस बात का उल्लेख किया है कि विश्व स्तर पर जेहाद के नाम पर एक इस्लामवादी आन्दोलन चलाया जा रहा है जिसकी प्रेरणा समस्त विश्व में समय समय पर जेहाद के सन्दर्भ में इस्लाम की व्याख्या करते हुए विश्व पर इस्लामी सर्वोच्चता स्थापित करने के लिये संचालित हुए आन्दोलनों से ली गयी है। भारत में ऐसे इस्लामी आन्दोलनों के प्रयास 18वीं शताब्दी से ही होते रहे हैं। इसी प्रकार मध्य पूर्व और अरब देशों में 18वीं शताब्दी में वहाबी आन्दोलन , फिर बीसवीं शताब्दी में मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन जिसकी नींव सैयद कुत्ब ने रखी और उनकी भाई मुहम्मद कुत्ब ने उस परम्परा को आगे बढाते हुए उस विचारधारा को आगे बढाया और उसी परम्परा का आखिरी नाम फिलीस्तीन का अब्दुल्ला अज़्ज़ाम है जिसकी प्रेरणा से आज अल कायदा और ओसामा बिन लादेन का विश्वव्यापी जेहादी इस्लामी आतंकवादी आन्दोलन चल रहा है।
भारत में इस सन्दर्भ में जेहाद का अध्ययन करने का कभी प्रयास नहीं हुआ। जिस समय ओसामा बिन लादेन ने इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट की स्थापना कर ईसाइयों और यहूदियों फिर हिन्दुओं के विरुद्ध जेहाद की घोषणा भी नहीं की थी उससे बहुत पहले भारत के इस्लामी संगठन सिमी ने 1986 में भारत को मुक्त कराकर इसे इस्लामी राष्ट्र का स्वरूप देने का संकल्प करते हुए सम्मेलन आयोजित किया था। आज यही संकल्प वैश्विक जेहाद के साथ जुड गया है जो विश्व स्तर पर शरियत और कुरान पर आधारित नयी विश्व व्यवस्था की स्थापना करना चाहता है। आज भारत में इस बात पर चर्चा करने का प्रयास ही नहीं हो रहा है कि अल कायदा और ओसामा बिन लादेन के विचारों से प्रभावित होने वाले मुस्लिम युवकों को इस विचारधारा से अलग थलग कैसे किया जाये। इंडियन मुजाहिदीन के मीडिया प्रकोष्ठ के लोगों के सामने आने के बाद यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि भारत में मुसलमानों का एक वर्ग तेजी से जेहाद के विचारों से प्रभावित हो रहा है। आज अत्यंत दुर्भाग्य का विषय है कि जिस प्रकार यह विचार तेजी से मुस्लिम युवकों में फैल रहा है और बडे सम्पन्न युवक जेहाद के नाम पर अपने ही देश के लोगों का खून बहाने को अपना धर्म मान बैठे हैं तो ऐसे में आश्चर्य नहीं कि आने वाले दिनों में हमें मध्यपूर्व के देशों और अफगानिस्तान और पडोसी पाकिस्तान की भाँति मानव बम के जरिये होते विस्फोट देखने को मिलें।
आज जब समस्त विश्व में इस बात पर विचार हो रहा है कि जेहाद के इस वैश्विक आन्दोलन को सभ्य समाज और वर्तमान विश्व व्यवस्था के विरुद्ध एक युद्ध माना जाये और इस सम्बन्ध में विभिन्न देशों में इस बात के प्रयास हो रहे हैं कि जेहाद के इस आन्दोलन से सामान्य शांतिप्रिय मुस्लिम समुदाय को किस प्रकार अलग थलग रखते हुए जेहाद की इस विचारधारा को वैचारिक स्तर पर परास्त किया जाये और इस सम्बन्ध में मुस्लिम समुदाय को उत्तरदायी बनाने के भी प्रयास हो रहे हैं तो वहीं भारत में अब भी इस समस्या को वोट बैंक की राजनीति से जोड्कर इसके समाधान के किसी भी प्रयास को अवरुद्ध किया जा रहा है।
इस सम्बन्ध में सबसे बडा उदाहरण पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में जामिया नगर में बाटला हाउस में आतंकवादियों के साथ हुई पुलिस की मुठभेड के बाद उसे फर्जी सिद्ध करने को और अपने ही साथी पुलिसकर्मी को मरवा देने के आरोप दिल्ली पुलिस पर लगे। यह आरोप देश की प्रमुख सेक्युलर कही जाने वाली पार्टियों ने लगाये और इस मुठभेड की न्यायिक जाँच की माँग तक कर डाली।
यही नहीं तो देश का ध्यान इस्लामी आतंकवाद की समस्या से हटाने के गैर जिम्मेदाराना और दूरगामी स्तर पर खतरनाक परिणामों से परिपूर्ण प्रयास के अंतर्गत देश में हिन्दू आतंकवाद का एक समानांतर आभास विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है और राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक उसी आभास को वास्तविक स्वरूप देने का सुनियोजित प्रयास है। इस्लामी आतंकवाद के समानांतर हिन्दू आतंकवाद और सिमी के समानांतर बजरंग दल का आभासी दृष्टिकोण कितना खोखला है इसका पता इसी बात से चलता है कि अब तक हिन्दू आतंकवाद जैसी किसी अवधारणा को सिद्ध करने के लिये कोई कानूनी साक्ष्य सरकार के पास नहीं है और न ही बजरंग दल को प्रतिबन्धित करने के लिये ही प्रमाण हैं। फिर यह प्रयास क्यो? केवल मुस्लिम वोट बैंक को संतुष्ट रखने का प्रयास और देशवासियों का ध्यान इस्लामी आतंकवाद से हटाने के लिये।
परंतु यह दृष्टिकोण कितना घातक है इसका पता हमें बाद में चलेगा। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार घाटी से हिन्दुओं को योजनाबद्ध ढंग से भगाने के इस्लामी एजेंडे को लम्बे समय तक कुछ गुमराह नौजवानों का उग्रवाद कहा जाता रहा। आज उसी प्रकार भारत में इस्लामी आतंकवाद को 1992 में बाबरी ढाँचा के ध्वँस से उपजा मान कर प्रचारित किया जा रहा है। भारत के राजनीतिक दल और बौद्धिक समाज के लोग जिस प्रकार इस्लामी आतंकवाद का समाधान करने और जेहाद की वैश्विक विचारधारा से देश के मुसलमानों को जुड्ने से रोकने के लिये कोई ठोस रणनीति अपनाने के स्थान पर मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा को प्रोत्साहन दे रहे हैं, आतंकवादियों के मानवाधिकार के नाम पर पुलिस को कटघरे में खडा कर रहे हैं, आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराने के लिये तर्क देर रहे हैं उससे जेहाद के आधार पर चल रहे इस इस्लामवादी आन्दोलन को और सहारा ही मिलेगा और यह सशक्त हो जायेगा।
जिस प्रकार राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में आतंकवाद के विषय को एजेण्डे में नहीं लिया गया है और कर्नाटक और उडीसा की घटनाओं का आश्रय लेकर बजरंग दल को निशाने पर लिया जा रहा है उससे तो यही लगता है कि इस्लामी आतंकवाद से लड्ना सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। आज देश के समक्ष जिस प्रकार इस्लामी आतंकवाद एक चुनौती बन कर खडा है ऐसे में क्या बजरंग दल पर प्रतिबन्ध लगाने से इस समस्या का समाधान हो जायेगा और देश में जेहाद की विचारधारा से प्रभावित हो रहे मुस्लिम युवक जेहाद करना छोड देंगे। ऐसा बिलकुल भी नहीं है और यह बात कांग्रेस भी जानती है और उसके सहयोगी दल भी जानते हैं फिर भी देश में एक खतरनाक खेल खेला जा रहा है देश में मानव बमों की फैक्ट्री तैयार होने का अवसर दिया जा रहा है और प्रतीक्षा की जा रही है कि कब भारत इजरायल, अफगानिस्तान, इराक और पाकिस्तान बन जाये?
comman man said
main yahi kahoonga ki aap log in sabhi cheejon ko jan saamanya tak pahunchayen
Alok Pandey said
बहुत सुदर अमिताभ जी बहुत सुंदर। इन छदम सेकुलर लोगों को मुस्लमान देशभक्त और हिन्दू राष्ट्रद्रोही नजर आ रहे हैं। इतने सारे लोग मुस्लमान पकड़े जा रहे है स्वयं काग्रेसी शासित राज्यों में मगर फिर भी इनकी आंख नहीं खुल रही हे। उफ रे ये वोट बैंक । अमर सिंह मोहन चंद शर्मा की कुर्बानियों को भी धतता बता रहे हैं। घिन आती है इन जैसे लोगों से
gautam kashyap said
sir mujhe aap ke lekh achhe lage. aap bakai badhai ke patra hain. aap ka prayash sarahniya hai. main bhi aapki prerna se is bisaya par kuchh likhunga