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	<title>हिंदू जागरण</title>
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	<description>हिंदू चेतना का स्वर</description>
	<pubDate>Sun, 04 May 2008 11:35:02 +0000</pubDate>
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		<title>सरबजीत एक मोहरा तो नहीं</title>
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		<pubDate>Sun, 04 May 2008 11:35:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>amitabhtri</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[पाकिस्तान की जेल में पिछ्ले 18 वर्षों से बन्द भारतीय मूल के व्यक्ति सरबजीत को जब पहली बार पाकिस्तान सरकार की ओर से फांसी देने की बात की गयी तभी ऐसा प्रतीत होने लगा कि यह किसी गहरी साजिश का आरम्भ है। फिर जिस प्रकार से सरबजीत की फांसी टाली जाती रही और पाकिस्तान के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">पाकिस्तान की जेल में पिछ्ले 18 वर्षों से बन्द भारतीय मूल के व्यक्ति सरबजीत को जब पहली बार पाकिस्तान सरकार की ओर से फांसी देने की बात की गयी तभी ऐसा प्रतीत होने लगा कि यह किसी गहरी साजिश का आरम्भ है। फिर जिस प्रकार से सरबजीत की फांसी टाली जाती रही और पाकिस्तान के एक पूर्व मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी ने मानवता के नाम पर इस विषय में रूचि दिखाई उससे यह विषय अधिक उलझता ही प्रतीत हुआ।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">सरबजीत के परिवार को जिस प्रकार पाकिस्तान की सरकार ने पहले वीजा देने में आनाकानी की और फिर कुछ देर के लिये सरबजीत को मिलने की अनुमति दी वह भी इस विषय को चर्चा में लाने में काफी सफल रहा। पहली बार जब सरबजीत को फांसी की तिथि निर्धारित हो गयी तो कुछ हल्कों में खुसफुसाहट होने लगी कि इस मामले में पाकिस्तान सरकार मोलतोल के विचार में है और भारत सरकार की ओर से सफाई आई कि सरबजीत के बदले में किसी पाकिस्तानी कैदी को नहीं छोडा जायेगा। ऐसा ही बयान सरबजीत की पुत्री की ओर से भी आया और उसने स्पष्ट कहा कि वह कभी नहीं चाहेगी कि उसके पिता के बदले किसी आतंकवादी को छोडा जाये।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">आज उन परिस्थितियों में कुछ अंतर आ गया है। पाकिस्तान सरकार ने सरबजीत की फांसी पर अगला निर्णय आने तक रोक लगा दी है। अब ऐसी आशा की जा रही है कि सरबजीत को संभवतः पाकिस्तान सरकार रिहा कर देगी। यह सम्भावना काफी हर्ष की बात है परंतु जिस प्रकार पाकिस्तान से वापस आने के बाद सरबजीत की बहन दलजीत कौर ने कहा है कि भारत सरकार को पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध मजबूत बनाने की दिशा में कदम उठाते हुए संसद पर आक्रमण के दोषी मोहम्मद अफजल को भी रिहा कर देना चाहिये। सरबजीत की बहन ने पाकिस्तान के मानवाधिकार संगठन के किसी व्यक्ति को भी उद्धृत किया है कि </span><span><span style="font-family:Times New Roman;">“</span></span><span style="font-family:Mangal;"> जो दूसरों को झुकाना चाहते हैं उन्हें स्वयं भी झुकना पडता है</span><span><span style="font-family:Times New Roman;">”</span></span><span style="font-family:Mangal;">। संकेत स्पष्ट है कि भारत सरकार से अपेक्षा की जा रही है कि वह मोहम्मद अफजल को रिहा कर दे। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">पाकिस्तान की ओर से जिस प्रकार बिना किसी भूमिका के सरबजीत को पहले फांसी घोषित करना और फिर पाकिस्तान के ही एक पूर्व मंत्री का इस मामले में हस्तक्षेप करना और उनके हस्तक्षेप से सरबजीत की फांसी को टालते जाना किसी मैच फिक्सिंग की तरह लग रहा था। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">वास्तव में पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा जिन परिस्थितियों में सरबजीत को फांसी देने का निर्णय किया गया था उस समय पर ध्यान देना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह समय वह था जब पाकिस्तान में मुशर्रफ़ विरोधी दल चुनाव जीत चुके थे और मुशर्रफ़ के सामने अपने अस्तित्व का संकट था। जनसम्पर्क और मीडिया में चर्चा में रहकर अपने विरोधियों को चित करने की कुशलता मुशर्रफ़ से अधिक किसी में नहीं है। हाशिये पर जा रहे मुशर्रफ ने एक दाँव फिर खेला और पाकिस्तान में अपने ऊपर अमेरिका परस्त होने और मुजाहिदीनों के प्रति कडा रूख अपनाने के आरोपों को हटाने के लिये मुशर्रफ़ ने सरबजीत को अपना मोहरा बनाया है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">यह बात और स्पष्ट रूप से समझने के लिये हमें पाकिस्तान में अमेरिका के समर्थन से चल रही आतंकवाद के विरुद्ध लडाई को भी निकट से देखना होगा। वास्तव में पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने अपने देश में पश्चिमोत्तर प्रांत और वजीरिस्तान में स्थानीय कबायलियों द्वारा सेना के विरुद्ध चल रही लडाई को जीतने के नाम पर फूट डालो और राज करो की नीति पर काम किया है और आतंकवादियों को नस्ल के आधार पर बांट दिया है। आज पाकिस्तान की सेना वजीरिस्तान और पश्चिमोत्तर प्रांत में पश्तून आतंकवादियों से दोस्ती कर रही है और उसके निशाने पर केवल अरब नस्ल के अल कायदा के लडाके हैं। यही कारण है कि 2007 में पाकिस्तान सरकार ने वजीरिस्तान में कबायलियों से<span>  </span>समझौता कर लिया था कि सरकार न तो उन पर खुफिया आधार पर नजर रखेगी और न ही सेना उन पर कोई कार्रवाई करेगी लेकिन इसके बदले में ये लडाके सेना पर आक्रमण नहीं करेंगे। ऐसा समझौता करने के पीछे पाकिस्तान की सोच यह थी कि सेना के पश्तून सैनिक कभी भी पश्तून विद्रोहियों को नहीं मारेंगे और यदि पंजाबी सैनिकों को इस मोर्चे पर लगाया जाता है तो सेना में पंजाबी और पश्तूनी लाबी में तनाव और टकराव बढ सकता था। इसी कारण पाकिस्तान ने रणनीति अपनाई कि अरब नस्ल के आतंकवादियों को निशाना बनाया जाये जिससे अमेरिका भी प्रसन्न रहे और देश में रह रहे विद्रोहियों से सेना को युद्ध न करना पडे। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">इसी नीति के सन्दर्भ में यदि मुशर्रफ की उस शतरंज की चाल को समझने का प्रयास किया जाये जिसमें सरबजीत को एक मोहरा बनाया गया है तो स्थिति स्पष्ट हो जायेगी। आज यदि पाकिस्तान सरबजीत के बदले जैशे मोहम्मद के आतंकवादी मोहम्मद अफजल को छुडाने में सफल हो जाता है तो इसका श्रेय पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को जायेगा और देश के कट्टरपंथियों के बीच वे अपनी छवि सुधार सकेंगे। परवेज मुशर्रफ राजनीति के एक मंजे हुए खिलाडी हैं और उन्हें पता है कि दो ध्रुवों पर टिकी यह सरकार अधिक दिनों तक नहीं चल सकेगी और ऐसे में उनका दाँव मुल्ला मिलिट्री गठबन्धन पर ही निर्भर करेगा। इस दाँव के सफल होने के लिये जरूरी है कि वे सेना को खुश रखें और सेना की खुशी इसी में है कि पाकिस्तान में भारत विरोधी जिहादी गुट सशक्त और सक्रिय रहें। जिस प्रकार पाकिस्तान ने 2000 में कन्धार विमान के अपहरण में सक्रिय भूमिका निभाकर मसूद अजहर को छुड्वाया था जिसने बाद में जैशे मोहम्मद की स्थापना की और उसी संगठन ने 13 दिसम्बर 2001 को भारत की संसद पर आक्रमण किया और उसी आक्रमण में दोषी सिद्ध किये गये आतंकवादी को पाकिस्तान एक बार फिर पिछ्ले दरवाजे से रिहा कराना चाहता है।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">सरबजीत की बहन द्वारा मोहम्मद अफजल की रिहाई के लिये भारत सरकार से की जा रही सिफारिश से स्पष्ट है कि पाकिस्तान में अधिकारियों ने दलजीत कौर को ऐसे किसी फार्मूले के बारे में कोई संकेत अवश्य दिया है। अब देखना यह है कि भारत सरकार इसे किस रूप में लेती है। वैसे भारत सरकार मोहम्मद अफजल की फांसी को ठण्डॆ बस्ते में डालकर अपना मंतव्य स्पष्ट कर चुकी है।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">पाकिस्तान के इस नये दाँव से एक प्रश्न यह भी उठता है कि पाकिस्तान में नयी सरकार आने के बाद क्या भारत विरोधी आतंकवाद में कमी आयेगी। ऐसा बिलकुल भी नहीं लगता। जिस प्रकार इसी लेख में ऊपर कहा गया है कि पाकिस्तान अब आतंकवादियों को नस्ल और देशी विदेशी आधार पर देख रहा है। इस कारण नयी सरकार ने अपने देश के आतंकवादियों या पश्चिमोत्तर और वजीरिस्तान में सक्रिय आतंकवादियों से बातचीत करने का निर्णय लिया है। इसका सीधा परिणाम आतंकवादी संगठनों को पुनः शक्तिशाली होने के रूप में सामने आयेगा। 2007 में कबायली क्षेत्रों में आतंकवादियों से पाकिस्तान सरकार के किये गये समझौते का परिणाम यह हुआ कि यहाँ अल कायदा के शीर्ष नेतृत्व को शरण दी गयी जिसने अपने संगठन को नये सिरे से संगठित कर लिया है और नयी पीढी का नेतृत्व भी तैयार कर लिया है जिसके सहारे आने वाले वर्षों में वह पूरी दुनिया में तबाही मचाने में सक्षम हैं। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">पाकिस्तान भले ही आतंकवादियों को नस्ल या भौगोलिक सीमाओं में बाँधकर अपना पराया बताये परंतु उनका उद्देश्य सामान्य है और वह है कुरान और शरियत आधारित विश्व व्यवस्था की स्थापना। भारत के लिये ये संकेत किसी भी प्रकार शुभ नहीं है और जो लोग पाकिस्तान में नयी सरकार की स्थापना पर नये लोकतांत्रिक पाकिस्तान के निर्माण का स्वप्न देख रहे हैं उन्हें कल्पना लोक से वापस आकर<span>  </span>वास्तविक लोक में जीना चाहिये जहाँ पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद अब भी भारत के लिये सबसे बडी चुनौती है।<span>  </span><span> </span><span> </span></span></span></p>
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		<title>क्या भारत बदल रहा है?</title>
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		<pubDate>Sat, 03 May 2008 16:28:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>amitabhtri</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<category><![CDATA[क्रिकेट]]></category>

		<category><![CDATA[बाजारमूलक अर्थव्यवस]]></category>

		<category><![CDATA[वैश्वीकरण]]></category>

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		<description><![CDATA[कल सायंकाल जब टेलीविजन सेट खोलकर समाचार देखने का प्रयास किया तो देखा कि भारत का मशहूर रेसमर खली तीन वर्षों के बाद अपने देश वापस आ रहा है। खली को देखने के लिये एयरपोर्ट पर उसके प्रशंसकों की भीड उमड रही थी और टेलीविजन चैनल उस रोमांच का सीधा प्रसारण कर रहे थे। टेलीविजन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">कल सायंकाल जब टेलीविजन सेट खोलकर समाचार देखने का प्रयास किया तो देखा कि भारत का मशहूर रेसमर खली तीन वर्षों के बाद अपने देश वापस आ रहा है। खली को देखने के लिये एयरपोर्ट पर उसके प्रशंसकों की भीड उमड रही थी और टेलीविजन चैनल उस रोमांच का सीधा प्रसारण कर रहे थे। टेलीविजन के इस प्रसारण को लेकर कुछ लोगों की अलग- अलग राय हो सकती है कि यह टीआरपी का चक्कर रहा होगा आदि आदि पर यहाँ मैं इस विषय पर बिलकुल चर्चा नहीं करना चाहता कि टेलीविजन चैनलों का खली की वापसी दिखाना गलत था या सही। मैं यहाँ उस रूझान की ओर पाठकों का ध्यान खींचना चाहता हूँ जो पिछ्ले कुछ वर्षों से भारत में देखने को मिल रहा हैं। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">इससे पूर्व भारत के एकदिवसीय और टी- 20 टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी के नेतृत्व में जब भारत ने पहला टी-20 विश्व कप जीत था तो उसकी अगवानी में भी भारी भीड मुम्बई में उमडी। यही नजारा एक बार फिर जूनियर क्रिकेट टीम के विश्व कप जीतने और भारत द्वारा आस्ट्रेलिया को एकदिवसीय श्रृंखला में हराने पर हुआ। दोनों ही अवसरों पर भारत के लोग खिलाडियों के स्वागत में उमड पडे और यह वेग असाधारण लगा। आखिर यह घटनायें क्या संकेत देती हैं। यदि यह बात केवल क्रिकेट तक सीमित होती तो शायद यह मानने का कारण था कि भारतवासियों में क्रिकेट को लेकर जुनून है। लेकिन जब यही स्वागत कुश्ती के नायक लिये भी हो रहा है तो इस रूझान पर गौर करना ही होगा। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">पिछ्ले कुछ महीनों से जब खली को भारत में टीवी चैनलों ने घर घर तक पहुँचाया तो भी आश्चर्य हुआ कि क्या टीवी चैनल के पास खबरों का अकाल हो गया। ऐसा नहीं है। वास्तव में अब भारत बदल रहा है और यह बदलाव पूरे भारत में एक साथ हो रहा है। यह बदलाव है भारतवासियों की आकांक्षा का बदलाव। अब भारतवासी एक ऐसे भारत को देखना चाहते हैं जो दुनिया में अपना रूतबा रखता हो और जिसमें सुपर पावर या महाशक्ति बनने की शक्ति हो। यही कारण है कि अब क्रिकेट में खेल के मैदान में आस्ट्रेलिया के खिलाडियों को स्लेजिंग का जवाब स्लेजिंग से देने वाले खिलाडियों को जनता सर माथे पर बैठाती है। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने जब टी-20 के नये संस्करण में ढला हुआ आईपीएल का फार्मूला लोगों के सामने परोसा तो उत्सुकता इसी बात को लेकर नहीं थी कि इस खेल के नये संस्करण से मनोरंजन होगा वरन इसके पीछे यह भाव भी सन्निहित था कि अब क्रिकेट जैसे खेल का गुरुत्व केन्द्र भारत में आ गया और जिस खेल पर कभी गोरी चमडी वालों को आधिपत्य हुआ करता था वे ही लोग आज भारतीय क्रिकेट बोर्ड के इशारों पर नाच रहे हैं। क्योंकि आज दर्शक और उससे होने वाली विज्ञापन की आय भारत पर निर्भर है।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">इसलिये खली हो या क्रिकेट ये तो प्रतीक मात्र हैं जो देश के जनमानस की उस आकांक्षा को प्रकट करते हैं जो भारत को एक महाशक्ति के रूप में देखना चाहती है। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">भारत में यह आकांक्षा तो सदियों से रही है पर उसका स्वाभिमानी स्वरूप वैश्वीकरण और उन्मुक्त अर्थव्यवस्था के बाद आया है। आज सूचना तंत्रों के व्याप के बीच भारत के हर स्तर के व्यक्ति को पता चल चुका है अमेरिका में नासा में उच्च पदों पर बैठे लोग भी भारतीय मूल के हैं और वहाँ इंजीनियर, डाक्टर और आईटी के लोग भारतीय मूल के हैं और अमेरिका के अर्थव्यवस्था का अधिकाँश भारत पर निर्भर है। आज विदेशों में बैठे भारतीय अपने लिये सम्मान और बराबरी चाहते हैं। सूचनाओं के व्याप से पूरे भारत में ऐसी सूचनायें पहुँचती हैं और इन उपलब्धियों से प्रत्येक भारतीय अपने आप को जोड्ता है। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">नयी बाजारमूलक अर्थव्यवस्था के अनेक दोष हमारे सामने आ रहे हैं परंतु इसने हमारे लिये अनेक ऐसे द्वार भी खोले हैं जो भारत के बदलते स्वरूप को दर्शाता है। मध्य वर्ग की बढ्ती ताकत ने राष्ट्रवाद की इस आकांक्षा को और सशक्त किया है। अपने सामान्य जीवन स्तर को लेकर असुरक्षा के भाव से मुक्त होकर वह विदेश नीति, विश्व में भारत के स्तर सहित अनेक विषयों पर अपनी राय और आकांक्षा रखने लगा है और यह राष्ट्रवाद का भाव भले ही मध्य वर्ग में सशक्त हुआ हो परंतु इस नये रूझान से पूरा देश आप्लावित है इसका प्रकटीकरण क्रिकेट में इसलिये हो रहा है कि आज समाज में ऐसे महापुरुष ही नहीं हैं जिन्हें भारतवासी अपना आदर्श बना सकें। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है और हम इसे स्वीकार करें या नहीं यह अपने अनुसार स्वाभाविक विकास करता ही है। उसी प्रकार भारत में भी बहुत सी चीजें बदल रही हैं। एक ओर वैश्वीकरण और उन्मुक्त अर्थव्यवस्था से सशक्त हुआ समाज भी है तो वहीं इससे बुरी तरह प्रभावित समाज भी है परंतु इन सबके मध्य भी भारत में राष्ट्रवाद की प्रखरता स्पष्ट दिखाई पड रही है। निश्चित रूप से इस भाव को सकारात्मक स्वरूप तभी मिलेगा जब विश्व स्तर पर हो रहे परिवर्तन के प्रति अपनी नजर रखते हुए हम इसकी निष्पक्ष समीक्षा करें और संक्रमणकालीन स्थिति में भी देश में पनप रहे उत्साह के वातावरण को बनाये रख सकें। समाज में हो रहे परिवर्तनों को कुछ अंशों में स्वीकार भी करना सीखें।</span></span></p>
<p> </p>
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		<title>आतंकवाद से कब लडेगा भारत</title>
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		<pubDate>Sat, 03 May 2008 11:40:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>amitabhtri</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[अमेरिका के राज्य विभाग की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार भारत उन देशों में है जो आतंकवाद से बुरी तरह प्रभावित हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत में जम्मू कश्मीर, उत्तर पूर्व और नक्सलवादियों द्वारा किये गये आतंकवादी आक्रमणों में वर्ष 2007 में कुल 2,300 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पडा है। 


 राज्य विभाग ने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">अमेरिका के राज्य विभाग की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार भारत उन देशों में है जो आतंकवाद से बुरी तरह प्रभावित हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत में जम्मू कश्मीर, उत्तर पूर्व और नक्सलवादियों द्वारा किये गये आतंकवादी आक्रमणों में वर्ष 2007 में कुल 2,300 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पडा है। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;"></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;"></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;"><span> </span>राज्य विभाग ने आतंकवाद से सम्बन्धित अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि जम्मू कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर आतंकवादी घटनाओं में कमी आयी है परंतु पकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन जैसे लश्कर-ए-तोएबा सहित अनेक आतंकवादी गुट अभी भी घाटी में आक्रमण करने की योजना बना रहे हैं।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तोएबा तथा अन्य कश्मीर केन्द्रित आतंकवादी संगठन क्षेत्रीय आक्रमण की योजना बना रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2007 में कश्मीर केन्द्रित आतंकवादी गुटों ने अफगानिस्तान में आक्रमणों को सहायता देनी जारी रखी और इन गुटों द्वारा प्रशिक्षित सदस्य अल-कायदा के अंतरराष्ट्रीय आक्रमणों की योजना में भी दिखते रहे।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार के आतंकवाद प्रतिरोध प्रयास कालातीत कानून व्यवस्था और बहुतायत में मामलों के न निपटने से न्यायपालिका पर बोझ के चलते प्रभावित हो रहे हैं।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">रिपोर्ट के अनुसार भारत में न्यायालय की व्यवस्था काफी धीमी और जटिल है और इसमें भ्रष्टाचार की सम्भावनायें हैं।भारत में बहुत से पुलिस दल का स्टाफ दयनीय है, उनमें प्रशिक्षण का अभाव है और उन्हें आतंकवाद से लड्ने के लिये पर्याप्त शस्त्र भी उपलब्ध नहीं कराये गये हैं।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">पिछ्ले वर्ष फरवरी में समझौता एक्सप्रेस में हुए विस्फ़ोट की चर्चा करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है यह अतिवादियों द्वारा हिन्दू और मुसलमान दोनों मे आक्रोश भरने के लिये किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार ऐसे आक्रमण जिसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही मारे जाते हैं उसका उद्देश्य अतिवादियों द्वारा हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के मध्य आक्रोश पैदा करना होता है।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">रिपोर्ट के अनुसार भारत के अधिकारियों का दावा है कि इन आक्रमणों का सम्बन्ध पाकिस्तान और बांग्लादेश स्थित आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तोएबा, जैशे मोहम्मद और हरकत उल जिहाद इस्लामी से है। रिपोर्ट के अनुसार इन गुटों का सम्बन्ध जम्मू कश्मीर में होने वाली आतंकवादी घटनाओं से भी है। आतंकवादी घटनाओं में मारे गये नागरिकों की संख्या पिछ्ले वर्ष के मुकाबले लगभग आधा है।</span></p>
<p> </p>
<p></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">रिपोर्ट  के अनुसार मई में भारत सरकार ने माना कि नियंत्रण रेखा के उस पार से घुसपैठ में कमी आयी है परंतु रिपोर्ट ने यह भी कहा है कि कुछ मामलों में आतंकवादियों ने घुसपैठ का अपना मार्ग बदल दिया है और वे बांग्लादेश और नेपाल के रास्ते भारत में प्रवेश कर रहे हैं।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">रिपोर्ट में भारत और पाकिस्तान के मध्य आतंकवाद विरोधी प्रणाली पर सहमति की बात भी की गयी है जहाँ दोनों देश एक दूसरे के मध्य समन्वय स्थापित कर आतंकवाद के सम्बन्ध में परस्पर सूचनाओं का आदान-प्रदान करेंगे।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">रिपोर्ट में भारत सरकार के रक्षा मंत्री के सार्वजनिक बयान की चर्चा करते हुए कहा गया है कि पाकिस्तान के नेताओं ने कश्मीरी आतंकवाद को सहयोग में कमी की है और इसके परिणामस्वरूप 2006 के मुकाबले 2007 में कश्मीर में हिंसक घटनाओं में 50 प्रतिशत की कमी आयी है।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">रिपोर्ट में भारत और अमेरिका के आतंकवाद के सम्बन्ध में संयुक्त कार्य बल की भी चर्चा की गयी है जो 2000 में स्थापित हुआ था और अब तक नौ बार बैठ चुका है।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">भारत ने इस संयुक्त कार्यबल में 15 अन्य देशों के साथ भाग लिया है और बहुपक्षीय कार्यबल में यूरोपीय संघ के साथ शामिल है। यह संगठन भारत , बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैण्ड, भूटान और नेपाल के मध्य आर्थिक सहयोग को प्रोत्साहन देता है।</span></p>
<p><span style="font-family:Mangal;"><span> </span>रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख भी किया गया है कि भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ अक्टूबर में आतंकवाद प्रतिरोध के सम्बन्ध में संयुक्त प्रणाली के अंतर्गत द्विपक्षीय बात की और आतंकवाद प्रतिरोध के सम्बन्ध में मंत्री स्तर की बैठक भी आयोजित की।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">अमेरिका के राज्य विभाग की आतंकवाद सम्बन्धी इस रिपोर्ट के अपने मायने हैं और इससे अनेक बातों की पुष्टि भी होती है। ऐसे अनेक तथ्य जो इस रिपोर्ट में दिये गये हैं उन तर्कों को प्रमाणित करते है जो तर्क समय समय पर आतंकवाद प्रतिरोधी नीति के सम्बन्ध में सरकार <span> </span>को दिये जाते हैं। अमेरिका की राज्य विभाग की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि भारत कि न्याय व्यवस्था नयी परिस्थितियों में उस स्तर की नहीं रह गयी है जहाँ से आतंकवादियों को तत्काल दण्डित किया जा सके या उन्हें जमानत जैसी सुविधायें तत्काल न मिल सकें। इसी के साथ पुलिस बल की ओर की जा रही उपेक्षा भी आतंकवाद प्रतिरोध की दिशा में बडी बाधा हैं। विशेषकर नक्सली आक्रमणों में पुलिस बल में इस दक्षता का अभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होता है। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">परंतु आतंकवाद से लड्ने में केवल यही बाधायें हैं क्या? इसके अतिरिक्त भी अनेक विषय हैं जिनकी चर्चा राज्य विभाग की इस रिपोर्ट में हो भी नहीं सकती थी क्योंकि वह भारत का आंतरिक मामला है और उस पर बोलने का अधिकार किसी बाहरी संस्था को है भी नहीं। परंतु आपसी तौर पर इस चर्चा से हम मुँह नहीं मोड सकते और वह है भारत सरकार का आतंकवाद को वोट बैंक की राजनीति से जोडकर देखना। इस सम्बन्ध में नवीनतम उदाहरण हमारे समक्ष 13 दिसम्बर 2001 को संसद पर हुए आक्रमण के दोषी अफजल गुरू का है। भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संसद पर आक्रमण के लिये दोषी पाये जाने पर अफजल गुरू को मृत्युदण्ड दिये जाने के बाद भी यह निर्णय अभी तक क्रियान्वित नहीं किया गया है और यही नहीं तो भारत सरकार की ओर से विषय को टाला जा रहा है। जबकि हमारे सामने 2000 का एक दुखद प्रसंग है जब एक खूँखार आतंकवादी को लम्बे समय तक जेल में रखने के कारण ही भारतीय विमान अपहरण काण्ड हुआ और मसूद अजहर को छोड्ना पडा और वहाँ से आतंकवाद ने नया आयाम ग्रहण किया। भारत सरकार जैश के ही एक और मृत्युदण्ड प्राप्त आतंकवादी अफजल गुरू को<span>  </span>राष्ट्रपति द्वारा क्षमायाचना के नाम पर जेल में रखकर आतंकवादियों को न केवल एक और कन्धार करने का आमंत्रण दे रही है वरन आतंकवादियों को सन्देश दे रही है कि वह उनके एक समुदाय विशेष के होने के कारण उनसे पूरी सहानुभूति रखती है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">भारत में आतंकवाद को सदैव वोट बैंक की राजनीति से जोड्कर देखा जाता है और इसी का परिणाम है कि पहले 1991 में नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी की सरकार के मुसलमानों के दबाव में आकर टाडा कानून वापस ले लिया और उसके बाद 2004 में सरकार में आते ही एक बार फिर कांग्रेस ने पोटा कानून वापस ले लिया। आज भारत में एक भी ऐसा कानून नहीं है जो आतंकवाद की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए और आतंकवादियों के विशेष चरित्र को देखते हुए उन्हें तत्काल और प्रभावी प्रकार से दण्डित करने के लिये प्रयोग में आ सके। आज सभी राजनीतिक दलों के नेता केवल भाजपा को छोड्कर इस बात पर सहमत दिखते हैं कि सामान्य आपराधिक कानूनों के सहारे आतंकवाद से निपटा जा सकता है। वास्तविकता तो यह है कि यह एक बहुत बडा झूठ है। हमारे सामने एक नवीनतम उदाहरण है कि किस प्रकार टाडा के विशेष न्यायालय में मुकदमा होते हुए भी मुम्बई बम काण्ड के अपराधियों को सजा मिलने में कुल 15 वर्ष लग गये और सजा मिलने के बाद भी एक के बाद एक अपराधी जमानत पर छूटते जा रहे हैं। आखिर जब हमारी न्याय व्यवस्था जटिल तकनीकी खामियों का शिकार हो गयी है जो आतंकवादियों को बच निकलने का रास्ता देती है तो फिर कडे और ऐसे कानूनों के आवश्यकता और भी तीव्र हो जाती है जो तत्काल जमानत या फिर आतंकवाद के मामले में जमानत के व्यवस्था को ही समाप्त कर दे। यह कोई नयी बात नहीं है। पश्चिम के अनेक देशों ने ऐसे कठोर कानून बना रखे हैं और इसके परिणामस्वरूप वे अपने यहाँ आतंकवादी घटनायें रोकने में सफल भी रहे हैं। परंतु भारत के सम्बन्ध में हम ऐसी अपेक्षा नहीं कर सकते।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">इसी प्रकार एक और आतंकवाद भारत में तेजी से पाँव पसार रहा है और वह है नक्सली आतंकवाद। इस विषय को भी भारत में पूरी तरह राजनीतिक ढंग से लिया गया है। केन्द्र सरकार पूरी तरह वामपंथियों के समर्थन पर निर्भर है और कांग्रेस इस गठबन्धन को आगे कई वर्षों तक जारी रखना चाहती है। जैसा कि कुछ दिनों पहले प्रसिद्ध राजनीतिक टीकाकार अमूल्य गांगुली ने टाइम्स आफ इण्डिया में लिखा था कि कांग्रेस 2010- 11 में राहुल गान्धी को प्रधानमंत्री बनाने की योजना पर कार्य कर रही है और इस योजना की पूर्ति के लिये कांग्रेस को वामपंथियों का सहयोग अत्यंत आवश्यक है। इस कारण कांग्रेस वर्तमान व्यवस्था को किसी भी प्रकार छेड्ना नहीं चाह्ती और इसलिये वामपंथी आतंकवाद की ओर से न केवल आंखे मूँदे हुए है वरन उसे राजनीतिक विचारधारा मानकर हरसम्भव उसका सहयोग कर रही है। जैसा उसने नेपाल में किया और माओवादियों के नेतृत्व को नेपाल में आने का अवसर दिया।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;"><span> </span>नेपाल में माओवादियों की विजय के बाद भारत सरकार के विदेश मंत्री और पश्चिम बंगाल से कांग्रेस के नेता प्रणव मुखर्जी ने इस विजय का स्वागत किया। अब ऐसे समाचार मिल रहे हैं कि मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी नेपाल में नयी सरकार के निर्माण को सुनिश्चित करने के लिये मध्यस्था की भूमिका एक बार फिर निभा रहे हैं। जिस प्रकास नेपाल के मामले में वामपंथी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं और कांग्रेस हरसम्भव उनका सहयोग कर रही है उससे साफ है कि अब अगले कदम के रूप में भारत के नक्सलियों और माओवादियों को मुख्यधारा में लाने के रूप में ऐसे कदम उठाये जायेंगे जो नक्सलियों या माओवादियों को अपनी शक्ति और प्रभाव बढाने में सहायक होंगे। निश्चय ही आने वाले समय में ऐसी कोई सम्भावना नहीं दिखती कि भारत सरकार आतंकवाद का प्रतिरोध करने के लिये तत्पर होगी। ऐसा सम्भव भी कैसे है जब सरकार का अस्तित्व उन तत्वों पर निर्भर है जो स्वयं आतंकवाद को प्रोत्साहन देते हैं। </span></span><span></span></p>
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		<title>माओवादियों की राह आसान नहीं</title>
		<link>http://amitabhtri.wordpress.com/2008/04/29/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%86%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%a8%e0%a4%b9/</link>
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		<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 18:11:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>amitabhtri</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<category><![CDATA[Add new tag]]></category>

		<category><![CDATA[अशोक सिंहल]]></category>

		<category><![CDATA[नेपाल]]></category>

		<category><![CDATA[माओवादी]]></category>

		<category><![CDATA[हिन्दू]]></category>

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		<description><![CDATA[अपने पिछ्ले लेख वामपंथी इस्लामवादी गठजोड में मैने आशंका व्यक्त की थी कि जिस प्रकार भारत में कुछ प्रमुख समाचार पत्र नेपाल में माओवादियों की विजय को लेकर भारत में एक बौद्धिक वातावरण बनाकर लोगों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं उससे यह आभास होता है कि यह एक सुनियोजित प्रयास है। इस [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">अपने पिछ्ले लेख वामपंथी इस्लामवादी गठजोड में मैने आशंका व्यक्त की थी कि जिस प्रकार भारत में कुछ प्रमुख समाचार पत्र नेपाल में माओवादियों की विजय को लेकर भारत में एक बौद्धिक वातावरण बनाकर लोगों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं उससे यह आभास होता है कि यह एक सुनियोजित प्रयास है। इस आशंका को बल तब और मिला जब अंग्रेजी के एक अग्रणी समाचार पत्र ने नेपाल में माओवादियों के नेता प्रचण्ड<span>  </span>का एक लम्बा साक्षात्कार दो दिनों की श्रृखला में प्रकाशित हुआ। इसी समाचार पत्र ने अपने सम्पादकीय और लेखों द्वारा देश के बौद्धिक और राजनेता वर्ग को समझाने का प्रयास किया था कि नेपाल में माओवादियों की विजय से भारत में नक्सलवादियों और माओवादियों को भी लोकतंत्र के मार्ग पर लाना सरल होगा और इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए नेपाल में माओवादियों की नयी सरकार का हरसम्भव सहयोग भारत को करना चाहिये। जिस प्रकार इस समाचार पत्र के संवाददाता ने प्रचण्ड के साथ पूरे साक्षात्कार में समस्त स्थितियों को स्पष्ट करने का प्रयास किया है उससे तो यह साक्षात्कार कम प्रचण्ड के लिये अपनी ओर से किया गया जनसम्पर्क का प्रयास अधिक लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस समाचार पत्र को या इसके कुछ लोगों को माओवादियों की छवि भारत में ठीक करने की बहुत शीघ्रता है। वैसे इस समाचार पत्र के प्रचण्ड से अच्छे सम्बन्ध काफी पहले से दिखते हैं क्योंकि इसी समाचार पत्र के इसी संवाददाता ने नेपाल में माओवादियों के आन्दोलन के समय भी 2006 में प्रचण्ड का साक्षात्कार लिया था जिसकी काफी चर्चा हुई थी। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">यह तथ्य इस कारण महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी आन्दोलनकारी या भूमिगत उग्रवादी का साक्षात्कार लेने का अर्थ उससे सहानुभूति रखना होता है परंतु भारत में एक ऐसी विचारधारा अवश्य है जो माओवाद और नक्सलवाद के प्रति सहानुभूति रखती है और उसे कानून व्यवस्था के स्तर से हल करने के स्थान पर आन्दोलन के रूप में देखने का आग्रह करती है। प्रचण्ड का साक्षात्कार लेने वाले समाचारपत्र ने अपनी सम्पादकीय और लेखों द्वारा छ्त्तीसगढ में सल्वा जुदूम अभियान को जमकर कोसा और अपने तर्क की पुष्टि में रा के एक पूर्व अधिकारी को भी उतार दिया। इन घटनाक्रमों को आपस में जोड्ने से ऐसा लगता है कि निश्चय ही यह पत्रकारिता से अधिक विचारधारा के प्रति निष्ठा है। क्योंकि यह तथ्य नहीं भूला जा सकता कि भारत में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय अब भी चरमपंथी वामपंथियों का गढ है और प्रचण्ड ने भी अपनी शिक्षा यहीं पूरी की थी तो निश्चय ही उस समय के कामरेड आज भी समाज में तो होंगे ही।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">माओवादियों का विषय उठाने के पीछे एक प्रमुख कारण यह भी है कि भारत के तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया में जहाँ नेपाल में माओवादियों की विजय का उल्लास मनाया जा रहा है या उसके पक्ष में देश में अनुकूल वातावरण बनाने का प्रयास किया जा रहा है तो वहीं माओवादियों के विरुद्ध नेपाल और भारत के हिन्दू संगठनों द्वारा नेपाल में राजा की शक्तियों को क्षीण न होने देने और माओवादियों के उत्पात को रोकने के संकल्प को स्थान ही नहीं दिया जा रहा है। समाचारों के प्रति यह चयनित रवैया हमारी इस धारणा को पुष्ट करता है कि भारत के मीडिया में भी अब भी वामपंथियों का वर्चस्व है जो नेपाल में माओवादियों की विजय में वामपंथ का उत्थान देख रहे हैं और ऐसा प्रदर्शित करना चाहते हैं कि मानों नेपाल में माओवादियों की विजय नेपाल की जनता का जनादेश है। नेपाल में माओवादियों की विजय को लेकर भारत में मीडिया ने पूरे तथ्य सामने नहीं आने दिये कि माओवादियों की विजय का एक बडा कारण यंग कम्युनिष्ट मूवमेंट नामक माओवदियों की व्यक्तिगत सेना के आतंक का भी रहा। इसके आतंक की स्वीकारोक्ति प्रचण्ड ने अपने साक्षात्कार में भी की है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">अभी पिछ्ले रविवार को उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जनपद में देवीपाटन नामक स्थान पर विश्व हिन्दू महासंघ नामक संगठन का तीन दिवसीय अधिवेशन समाप्त हुआ। इस सम्मेलन में विश्व हिन्दू महासंघ के नेपाल के प्रतिनिधि और भारत में विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं ने भाग लिया। विश्व हिन्दू महासंघ की स्थापना 1981 में नेपाल के दिवंगत राजा बीरेन्द्र ने की थी और यह संगठन तब से भारत और नेपाल के मध्य हिन्दुत्व के विषय पर परस्पर सहमति से कार्यरत है। इस अधिवेशन की समाप्ति पर प्रस्ताव पारित किया गया कि नेपाल में माओवादियों की विजय के उपरांत भी यह संगठन राजा को किनारे लगाकर माओवादियों के देश पर शासन के किसी भी प्रयास को सफल नहीं होने देगा। इस अधिवेशन में विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंहल ने कहा कि यदि माओवादियों को ऐसा करने की छूट दी गयी तो वे और शक्ति एकत्र कर लेंगे और फिर भारत में प्रवेश कर हिन्दू संस्कृति को सदा सर्वदा के लिये नष्ट कर देंगे। सिंहल ने कहा कि तराई क्षेत्र में सशस्त्र गुट बनाने वाले मधेशियों ने बडे पैमाने पर विश्व हिन्दू महासंघ और विश्व हिन्दू परिषद को समर्थन दिया है। यह अधिवेशन गोरखपुर के गोरक्षनाथ मन्दिर में आयिजित हुआ था जिसमें भारत और नेपाल के 200 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। नेपाल में राजशाही के पतन के बाद से विश्व हिन्दू महासंघ के अध्यक्ष भारत केशर सिम्हा ने भारत और काठमाण्डू के मध्य अनेक दौरे कर राजा के पक्ष में समर्थन जुटाने का प्रयास किया। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">इस अधिवेशन में राजा ज्ञानेन्द्र के विश्वासपात्र रायल नेपाल आर्मी के सेवानिवृत्त अधिकारी 72 वर्षीय हेम बहादुर कार्की को विश्व हिन्दू महासंघ का नया अध्यक्ष बनाया गया। कार्की ने कहा कि अब भी रायल आर्मी के सदस्य बडी मात्रा में राजा के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि इन अधिनायकवादियों और हिन्दू विरोधी शक्तियों के विरुद्ध युद्ध कर सकें। इस अधिवेशन में राजा ज्ञानेन्द्र को भी आना था परंतु नेपाल की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए वे नहीं आये परंतु इस अधिवेशन के लिये उन्होंने अपना सन्देश भेजा और कहा कि वे अधिवेशन के प्रस्तावों का पालन करेंगे। अधिवेशन में पूर्व अध्यक्ष सिम्हा ने नेपाल में माओवादियों की सहायता के लिये भारत सरकार की आलोचना की और कहा कि सात दलों का गठ्बन्धन भारत सरकार के सहयोग से ही सम्भव हो सका। इस अवसर पर विश्व हिन्दू महासंघ के भारत के अध्यक्ष योगी आदित्यनाथ ने कहा कि वे सदैव से माओवादियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की बात करते रहे हैं।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">इस अधिवेशन के सम्बन्ध में भारत में मीडिया में कोई बात न तो प्रकाशित हुई और न ही इसका कोई उल्लेख हुआ जबकि अधिवेशन की उपस्थिति और इसके प्रस्तावों के अपने निहितार्थ हैं। अधिवेशन में हुई चर्चा स्पष्ट रूप से संकेत देती है कि नेपाल में राजा के प्रति ऐसा वातावरण नहीं है जैसा माओवादी समस्त विश्व को प्रदर्शित कर रहे हैं। यदि माओवादी अब भी राजा को अपमानित करने या उन्हें देश से बाहर निकालने का यत्न करते हैं तो इसका उल्टा परिणाम होगा। यह बात माओवादियों को भी पता लग चुकी है और यही कारण है कि चुनाव से पहले बढ चढ कर बातें करने वाले माओवादी अब राजा के साथ किसी फार्मूले की तलाश में जुट गये हैं। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">भारत में मीडिया में बैठे वामपंथी विचारों के चिंतक और लेखक नेपाल में माओवादियों की विजय को भले ही स्थायी मानकर चल रहे हों परंतु भारत सरकार को अपने देश की सुरक्षा की दृष्टि से नेपाल में माओवादी उग्रवाद की समाप्ति और नेपाल में राजा की शक्ति के विकल्प पर विचार करना चाहिये।</span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">वैसे नेपाल में संवैधानिक सभा के पूरे परिणाम आने के बाद पूरी संविधान सभा में माओवादियों को बहुमत नहीं मिला है और उन्हें नेपाली कांग्रेस, यूएमएल और उपेन्द्र यादव की मधेशी जनाधिकार मोर्चा पर भी निर्भर होना पडेगा। उधर विश्व बाजार में तेल की बढ्ती कीमतों, मंहगाई के चलते भी माओवादी सरकार के सामने चुनौती है जिसके चलते उनका तेवर नरम पडा है पर उनकी बात पर भरोसा करना मुश्किल है विशेषकर तब जबकि अपने साक्षात्कार में प्रचण्ड ने भारत और ब्रिटेन जैसे लोकतंत्र को औपचारिक लोकतंत्र बताया है जो सभी वर्गों के लिये प्रतिनिधित्वकारी नहीं है और इस कारण माओवादी नेपाल में बहुदलीय व्यवस्था रखते हुए भी किसी अन्य विकल्प पर विचार करेंगे अर्थात पिछ्ले दरवाजे से अपना एजेण्डा लागू करने की सम्भावना दिखती है। दूसरा खतरनाक पक्ष है कि नेपाल की सेना में माओवादी लडाकों को समायोजित किया जायेगा और इसका आधार केवल प्रचण्ड का केवल यह आश्वासन होगा कि इन लडाकों को पेशेवर बना दिया जायेगा। यह कितना अस्पष्ट आधार है और इसका परिणाम कितना घातक है। जब नेपाल की सेना माओवादी विचार की होगी तो अपने पडोसी पर भारत कितना भरोसा कर सकता है कि वह कब चीन के हाथ का खिलोना न बन जाये। प्रचण्ड यह भी कह्ते हैं कि नेपाल की सेना का आकार भी कम किया जायेगा अर्थात नेपाल के सुरक्षा पूरी तरह माओवादियों के हाथ में होगी। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">पहले लोकतंत्र के बने स्वरूप में परिवर्तन फिर सेना में माओवादी लडाकों के भर्ती फिर सेना का स्वरूप छोटा किया जाना अर्थात अधिनायकवादी शासन की पूरी तैयारी। इसके अतिरिक्त प्रचण्ड ने इस बात की गारण्टी भी नहीं दी है कि वे भारत के माओवादियों या नक्सलियों को उनका रास्ता अपनाने की सलाह देंगे उनके अनुसार भारत में नक्सलियों और माओवादियों के लक्ष्य अलग है इसलिये यदि वे उनसे प्रेरित होकर बुलेट छोड्कर बैलेट के रास्ते पर आते हैं तो अच्छा है। इससे साफ जाहिर है कि नेपाल में माओवादियों को समर्थन का असर भारत में नक्सलियों या माओवादियों पर नहीं पड्ने वाला है लेकिन इस बात के पैरवी करने वालों को यह बात समझ में क्यों नहीं आती। कुलमिलाकर नेपाल में स्थिति अब भी साफ नहीं है और माओवादियों को भी अनेक चुनौतियों का सामना करना बाकी है ऐसे में भारत के पास अब भी अवसर है कि वह नेपाल में अपने हित पहचान ले और जो भूल पिछ्ले तीन चार वर्षों में की है उसे सुधार कर नेपाल में माओवादियों की शक्ति कम करने का प्रयास करे। भारत के सहयोग के बिना माओवादियों का नेपाल में शासन करना सम्भव नहीं है इसी कारण प्रचण्ड भारत सरकार को सन्देश दे रहे है कि वह अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों का उपयोग कर नेपाल माओवादियों को आतंकवादी सूची से हटवा दे। लेकिन भारत सरकार को ऐसा कोई कदम उठाने से पहले इसके हानि लाभ पर विचार कर लेना चाहिये।</span></span></p>
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		<title>सोनिया के निशाने पर हिन्दू नेता</title>
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		<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 14:21:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>amitabhtri</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<category><![CDATA[Add new tag]]></category>

		<category><![CDATA[सोनिया गान्धी]]></category>

		<category><![CDATA[हिन्दू]]></category>

		<category><![CDATA[हिन्दू नेता]]></category>

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		<description><![CDATA[न्यूयार्क। न्यूयार्क स्थित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विदेश ने न्यूयार्क राज्य के सर्वोच्च न्यायालय में तीन प्रमुख हिन्दू कार्यकर्ताओं नारायण कटारिया, अरीश साहनी और भरत बराई के विरुद्ध 100मिलियन डालर का मानहानि का दावा दायर किया है। इन कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाया है कि इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गान्धी द्वारा पिछ्ले वर्ष [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">न्यूयार्क। न्यूयार्क स्थित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विदेश ने न्यूयार्क राज्य के सर्वोच्च न्यायालय में तीन प्रमुख हिन्दू कार्यकर्ताओं नारायण कटारिया, अरीश साहनी और भरत बराई के विरुद्ध 100मिलियन डालर का मानहानि का दावा दायर किया है। इन कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाया है कि इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गान्धी द्वारा पिछ्ले वर्ष अक्टूबर में अमेरिका की यात्रा के समय अमेरिका के प्रमुख समाचार पत्र न्यूयार्क टाइम्स में पूरे एक पेज का विज्ञापन प्रकाशित कराया था और उसमें श्रीमती सोनिया गान्धी और उनके पुत्र राहुल गान्धी का कथित अपमान किया गया था।</span><span></span></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Verdana;"><span> </span></span><span style="font-size:10pt;font-family:Mangal;"></span></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">इस मामले के वादी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विदेश के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी डा. सुरेन्द्र मल्होत्रा ने अपनी शिकायत में न्यायालय के समक्ष कहा है कि पिछ्ले वर्ष 6 अक्टूबर को न्यूयार्क टाइम्स में श्रीमती सोनिया गान्धी और उनके पुत्र राहुल गान्धी के सम्बन्ध में विज्ञापन में गलत सूचनायें प्रकाशित की गयी थीं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने मुकदमे की पैरवी के लिये उसी कानूनी फर्म की सेवायें ली हैं जिसने टाइम पत्रिका</span><span style="font-family:Times New Roman;">  </span><span style="font-family:Mangal;">के विरुद्ध इजरायल के एरियल शेरोन का प्रतिनिधित्व किया था।</span><span style="font-family:Times New Roman;"><span> </span><span style="font-size:10pt;font-family:Verdana;"></span></span></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Verdana;"> </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">दूसरी ओर अपने मुकदमे की पैरवी के लिये नारायण कटारिया और अरीश साहनी ने कोर्नस्टॆन वीज वेक्स्लर एण्ड पोलार्ड को नियुक्त किया है जो कि अपनी कुशलता के लिये जानी जाती है। उधर इस मुकदमे में प्रतिवादी बनाये गये एक अन्य सदस्य भरत बराय ने दावा किया है कि वह किसी भी प्रकार से विज्ञापन का हिस्सा नहीं थे और स्वतंत्र रूप से इस मुकदमे के विरुद्ध पैरवी कर रहे हैं। </span></span><span style="font-size:10pt;font-family:Verdana;"><span> </span></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Verdana;"> </span><span style="font-size:10pt;font-family:Verdana;"></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">डा. भरत बराय ने इस मुकदमे में अपना नाम घसीटने के लिये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विदेश के विरुद्ध जवाब में मान हानि का दावा करने का निश्चय किया है। डा. भरत का कहना है कि उनका विज्ञापन से कुछ भी लेना देना नहीं है न तो उन्होंने इसका डिजाइन बनाया और न हि उन्होंने इसके लिये धन दिया और विज्ञापन में सम्पर्क के लिये जिनका नाम था उस सूची में भी उनका नाम नहीं था।</span></span><span style="font-size:10pt;font-family:Verdana;"> </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Verdana;"> </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Verdana;"> </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विदेश के इस फैसले के बाद अमेरिका में इस विषय पर ध्रुवीकरण तेज हो गया है। इन तीनों का समर्थन करने वाले हिन्दू नेता इस निर्णय पर सवाल उठा रहे है और उनका आरोप है कि जब यह विज्ञापन सार्वजनिक रूप से प्रकाशित हुआ था और लोगों के सामने यह काफी लम्बे समय तक आता रहा और विभिन्न मीडिया माध्यमों में बार बार प्रकाशित होता रहा तो फिर यह मुकदमा दायर करने के पीछे प्रमुख उद्देश्य क्या है। इन नेताओं का मानना है कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सोनिया गान्धी और सुरेन्द्र मल्होत्रा इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता प्रथम संविधान संशोधन के द्वारा प्रत्येक अमेरिकी नागरिक का अधिकार<span>  </span>है। कटारिया और साहनी भारतीय जनता पार्टी के ओवरसीज फ्रेण्ड्स के नेता भी हैं और इसके अतिरिक्त वे इण्डियन अमेरिकन इंटेलेक्चुअल फोरम भी चलाते हैं। इन लोगों ने पिछ्ले वर्ष गान्धी हेरिटेज फाउण्डेशन की स्थापना भी की थी जिसने सोनिया गान्धी के संयुक्त राष्ट्र संघ में सोनिया गान्धी के आगमन का विरोध किया था।</span><span></span></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">न्यूयार्क के एक प्रभावी हिन्दू नेता का मानना है</span><span style="font-family:Times New Roman;"><span> </span><span>“ </span></span><span style="font-family:Mangal;">कि यह मुकदमा केवल कुछ व्यक्तियों को निशाना बनाकर दायर नहीं किया गया है वरन इसके निशाने पर समस्त अनिवासी भारतीय हैं। उनके अनुसार इस मुकदमे के पीछे प्रमुख उद्देश्य अमेरिका में हिन्दू नेताओं की उत्साह भंग करना, उन्हें जबरन चुप कराना, आर्थिक दृष्टि से उन्हें दीवालिया बनाना, प्रताडित कर उन्हें झुकने के लिये विवश कर देना। इसके अतिरिक्त एक और प्रमुख उद्देश्य यह है कि भारत से बाहर सोनिया खानदान के विरुद्ध उठने वाली हर आवाज को सख्ती से कुचल देना यहाँ तक कि उन देशों में भी जहाँ के संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारण्टी दी गयी है</span><span><span style="font-family:Times New Roman;">’’|</span></span></span><span style="font-size:10pt;font-family:Verdana;"> </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Verdana;"> </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">अमेरिका के अधिकतर हिन्दू मानते हैं कि नारायण कटारिया और अरीश साहनी दशकों से हिन्दू हितों के लिये संघर्ष कर रहे हैं और वे ऐसे दबावों के आगे झुकने वाले नहीं हैं। नारायण कटारिया 78 वर्षीय एक सेवानिवृत्त</span></span><span style="font-size:10pt;font-family:Verdana;"> </span><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">व्यक्ति हैं और इस बात के लिये संकल्पबद्ध हैं कि वे इस मुकदमे को अंत तक लडेंगे भले ही इसके लिये उन्हें अपनी पेंशन के फण्ड से धन खर्च करना पडे। </span><span style="font-family:Verdana;"></span></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-family:Verdana;"><span style="font-size:small;"> </span></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">ऐसा प्रतीत होता है कि यह मुकदमा कटारिया सहित उन लोगों को नीचा दिखाने की योजना है हिन्दुओं के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं। पिछ्ले कुछ वर्षों मे नारायण कटारिया उत्तरी अमेरिका में एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिसने जिहाद जैसे विषय पर मुखर होकर हिन्दुओं की चिंतायें लोगों के समक्ष रखीं तथा<span>  </span>संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष सोनिया गान्धी के विरुद्ध प्रदर्शन करवाया और हिन्दू देवी देवताओं की नग्न चित्र बनाने वाले पेंटर मकबूल फिदा हुसैन की अनेक प्रदर्शनियों को रूकवाया। कटारिया और साहनी को ब्रिटेन, यूरोप, मध्य पूर्व और अफ्रीका के अनेक देशों से सहायता प्राप्त हो रही है। इन हिन्दू नेताओं के मित्रों ने इनके मुकदमे के लिये आर्थिक सहायता एकत्र करने हेतु एक समिति गठित की है तथा मुकदमा लडने के लिये भी एक समिति बनाई है। </span><span style="font-family:Verdana;"></span></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:10pt;font-family:Verdana;"> </span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p style="text-align:justify;margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">आप भी इस कार्य में अपना योगदान कर सकते हैं। इसके लिये अपना चेक इस पते पर </span><strong><span style="font-family:Times New Roman;">Narain Kataria, 41-67 Judge Street, Apt-5P, Elmhurst, New York 11373</span></strong><strong><span style="font-family:Mangal;"> </span></strong><strong><span><span style="font-family:Times New Roman;">‘Hindu support fund’ </span></span></strong><strong><span style="font-family:Mangal;">के </span></strong><strong><span style="font-weight:normal;font-family:Mangal;">नाम पर भेजें। प्राप्त धन का प्रबन्धन समुदाय के नेताओं द्वारा किया जायेगा और इसका अंकेक्षण भी स्वतत्र रूप से होगा।</span></strong><span><span style="font-family:Times New Roman;"> </span></span></span><span style="font-size:10pt;font-family:Verdana;"></span></p>
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		<title>हरभजन ने नाक कटाई</title>
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		<pubDate>Sat, 26 Apr 2008 11:42:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>amitabhtri</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[अब जबकि यह स्पष्ट हो गया है कि 25 अप्रैल को मोहाली में मुम्बई इण्डियन और किंग्स इलेवन के मध्य हुए मैच के उपरांत मुम्बई इण्डियन के कार्यवाहक कप्तान हरभजन सिंह ने किंग्स एलेवन की टीम के सदस्य और भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज और अपने सहयोगी श्रीकुमारन श्रीसंत को झापड मार दिया था [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">अब जबकि यह स्पष्ट हो गया है कि 25 अप्रैल को मोहाली में मुम्बई इण्डियन और किंग्स इलेवन के मध्य हुए मैच के उपरांत मुम्बई इण्डियन के कार्यवाहक कप्तान हरभजन सिंह ने किंग्स एलेवन की टीम के सदस्य और भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज और अपने सहयोगी श्रीकुमारन श्रीसंत को झापड मार दिया था तो हरभजन सिंह मुसीबत में फँसते नजर आ रहे हैं। कल तक इस विषय पर ना नुकुर करने वाली बीसीसीआई और किंग्स इलेवन फ्रेंचाइजी की स्वामिनी प्रीती जिंटा ने अब इस घटना को स्वीकार किया है और श्रीसंत की टीम ने औपचारिक शिकायत बीसीसीआई को भेजकर स्पष्ट किया है कि हरभजन सिंह ने यह हरकत बिना किसी उकसावे के की है और इसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। किंग्स इलेवन की शिकायत पर बीसीसीआई ने स्पष्ट किया है कि पूरे मामले की जाँच मैच रेफरी फारूख इंजीनियर करेंगे और मामले में दोषी पाये जाने पर हरभजन सिंह के विरुद्ध आईसीसी के नियमों के अंतर्गत कार्रवाई होगी। इस नियम के अंतर्गत हरभजन सिंह पर शेष मैचों के लिये प्रतिबन्ध लग सकता है। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">इस घटना से समस्त देश के क्रिकेट प्रेमी हतप्रभ हैं और कुछ ही महीने पहले एंड्र्यू सायमण्ड्स के साथ आस्ट्रेलिया दौरे में हुए विवाद के समय जिस हरभजन के साथ राष्ट्र की प्रतिष्ठा के नाम पर एकसाथ खडे थे वही क्रिकेट प्रेमी आज देश के विभिन्न हिस्सों में हरभजन सिह का पुतला फूँक रहे हैं।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">इस घटनाक्रम में सर्वाधिक रोचक और अपमानजनक तथ्य यह है कि जिस टूर्नामेंट में हरभजन सिंह ने यह हरकत की है उसमें अधिकाँश आस्ट्रेलियाई खिलाडी भी भाग ले रहे हैं जिन्होंने अभी कुछ महीने पूर्व ही हरभजन सिंह पर असभ्य आचरण का आरोप लगाते हुए उन्हें नस्लभेदी और जंगली घास फूस तक कह डाला था। आज आस्ट्रेलिया के ये खिलाडी निश्चय ही मन ही मन मुस्करा रहे होंगे कि हरभजन सिंह ने अपने आचरण से समस्त विश्व को सन्देश दे दिया है कि उन्हें अपने ऊपर नियंत्रण नहीं है और वे मैदान पर अपना आपा खो देते हैं। हरभजन सिंह ने इस बार अपने आचरण का निशाना अपनी ही टीम के एक सदस्य को बनाया जो टीम में उन्हें बडे भाई के समान देखते हैं। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">इस घटनाक्रम से क्रिकेट के नये तेवरों पर सवाल उठता है। आस्ट्रेलिया में अपने शानदार प्रदर्शन के बाद एकदिवसीय मैचों के लिये टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी ने बडे जोर शोर से दावा किया था कि आज क्रिकेट केवल मैदान का ही खेल नहीं रह गया है और इसमें स्लेजिंग भी हिस्सा हो गया है और उन्हें इस बात की खुशी है कि उनकी टीम में अनेक ऐसे खिलाडी हैं जो अपने जज्बात पर काबू रखते हुए दूसरी टीम के खिलाडियों को हर दृष्टि से जवाब देने में सक्षम हैं। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान के ऐसे विचारों को भारतीय क्रिकेट में नये युग की संज्ञा दी गयी और क्रिकेट प्रेमी भी इस बात पर फूले भी नहीं समाये कि अब भारतीय टीम भी गाली गलौज में गोरी चमडी को शिकस्त देने में सक्षम है परंतु शायद हम यह भूल गये कि शालीनता छोड्कर आक्रामक व्यवहार अपनाने के अपने लाभ हैं तो उससे हानि भी है। हरभजन सिंह की असभ्यता यही संकेत देती है कि वास्तव में भारत में क्रिकेट का तेवर बदल रहा है। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-size:small;"><span style="font-family:Mangal;">इस घटना से एक और आशंका को बल मिलता है कि अब क्रिकेट का स्वरूप बदल रहा है और यह यूरोप के फुटबाल की शक्ल लेता जा रहा है जहाँ हार के तनाव में खिलाडियों का आपा खोना आम बात है। आई पी एल को जिस प्रकार चालाकी से फुटबाल का यूरोपीय संस्करण बनाया जा रहा है उससे क्रिकेट की हत्या सुनिश्चित है। यहाँ तक कि प्रसिध्द क्रिकेट विश्लेषक और कमेंटेटर हर्ष भोगले ने भी एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र में अपने स्तम्भ में आई पी एल को एक स्वाभाविक विकास बताया और कहा कि परिवर्तन होना अवश्यंभावी होता है आप चाहें या नहीं। हर्ष भोगले की बात से सहमति रखते हुए भी ऐसा लगता है कि यह परिवर्तन उतना स्वाभाविक नहीं है जितना इसके पीछे बाजारी शक्तियों की पैतरेबाजी है। आज क्रिकेट बाजार का एक हिस्सा हो गया है जो दूसरे सन्दर्भ में ही की गयी पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान शोएब मलिक की इस टिप्पणी को न्यायसंगत ठहराता है कि आईपीएल एक बालीवुड का शो जैसा लगता है। </span><span></span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span><span style="font-size:small;font-family:Times New Roman;"> </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin:0;"><span style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:small;">हरभजन सिंह की हरकत तो एक संकेत मात्र है जो आने वाले दिनों में क्रिकेट में होने वाले परिवर्तन को इंगित करता है। अभी तो इसी प्रकार का उन्माद और जुनून यूरोप में फुटबाल क्लबों की भाँति आईपीएल की टीमों के समर्थकों में भी देखने को मिलेगा। कुल मिलाकर बाजार और पैसे की ताकत ने क्रिकेट के स्वभाव को बदलने का मन बना लिया है और अब खिलाडियों की प्रेरणा राष्ट्र ध्वज नहीं होकर उनपर लगने वाली बोली हुआ करेगी और अपनी ही टीम के खिलाडी एक दू