Posted by: amitabhtri | December 27, 2007

कंधामल की घटना से सबक

उड़ीसा राज्य एक बार फिर ऐसी घटनाओं के लिये चर्चा में है कि इस कारण चर्चा में रहना शायद वह पसन्द न करे। ईसाइयों के प्रमुख पर्व क्रिसमस के दिन उड़ीसा राज्य ईसाइयों और हिन्दुओं के मध्य साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार हो गया। उड़ीसा के कन्धामल जिले में पिछले अनेक वर्षों से धर्मान्तरण के विरूद्ध अभियान चला रहे हिन्दू सन्त लक्ष्मणानन्द सरस्वती के ऊपर कुछ लोगों ने हमला कर दिया जिनके बारे में हिन्दू संगठनों का आरोप है कि वे ईसाई मिशनरी थे और सन्त की धर्मान्तरण विरोधी अभियान की सफलता से हताश होकर यह आक्रमण किया। इस आक्रमण में स्वयं सन्त लक्ष्मणानन्द सरस्वती और उनका वाहन चालक घायल हो गया जिन्हें कटक के अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस आक्रमण के विरोध में राज्य में हिन्दूवादी संगठनों विश्व हिन्दू परिषद ने कुछ घण्टों के बन्द का आयोजन किया जिसके बाद हिंसा भड़की और कन्धामल से जुड़े कुछ अन्य जिलों में भी इसकी लपट पहुँची। उग्र भीड़ ने एक मन्त्री के घर को आग लगा दी और अनेक कच्चे घरों में बने चर्चों को भी निशाना बनाया।

 वैसे अधिकतर आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियाँ लोगों के कच्चे घरों को ही चर्च के रूप में प्रयोग में लाती हैं इस कारण चर्च में आगजनी की घटना के सम्बन्ध में किसी सूचना के आने पर यह निश्चय करना आवश्यक हो जाता है कि यह आगजनी कामचलाऊ पूजा स्थल में हुई है या फिर आधिकारिक चर्च में।  वैसे इस कारण को आधार बनाकर पूजा स्थल में आगजनी को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता परन्तु ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती।

इस साम्प्रदायिक हिंसा के लिये ईसाई मिशनरी भी उतने ही दोषी हैं जितने हिन्दू संगठन। इस हिंसा को लेकर जो भी बहस होनी चाहिये उसमें दोनों पक्षों की भूमिका पर बहस होनी चाहिये। हमारे देश में समाचार माध्यम अब भी वास्तविक तथ्यों की तह में जाने के स्थान पर प्रचार या प्रोपैगैण्डा पर अधिक ध्यान देते हैं। एक बार फिर इस घटना को कुछ वर्ष पूर्व उड़ीसा में ग्राहम स्टेन्स को उनके बच्चों सहित जीवित जलाने की घटना का स्मरण कराने वाला मानकर प्रचारित किया जा रहा है। निश्चित रूप से दोनों घटनाओं में बिलकुल समानता नहीं है वैसे तो ग्राहम स्टेन्स को जलाने वालों के भी अपने तर्क हैं फिर यदि उन्हें अस्वीकार भी कर दें तो भी कन्धामल की घटना उससे पूरी तरह भिन्न है। यहाँ हिंसा का आरम्भ एक प्रतिष्ठित सन्त पर हमले के बाद हुआ। यह हमला ही अपने आप में काफी कुछ कह देता है।

 ऐसी घटनायें एक ऐसे संघर्ष को इंगित करती हैं जो विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में हिन्दुओं और ईसाइयों के मध्य चल रहा है। यह संघर्ष है धर्मान्तरण का संघर्ष। ईसाई जिसे सेवा कार्य कहते हैं उसके बारे में स्थानीय हिन्दू सन्तों और हिन्दू संगठनों का आरोप रहता है कि यह आदिवासियों का धर्मान्तरण है। इस समस्या पर तार्किक और वास्तविक ढंग से ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।  ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों को लेकर, उनके उद्देश्य और मन्तव्य को लेकर देश की स्वाधीनता से लेकर अब तक 6 दशकों में अनेक आयोग बन चुके हैं और उनकी रिपोर्ट का लब्बोलुवाब यही रहा है कि ईसाई मिशनरियाँ सेवा कार्यों के बहाने धर्मान्तरण के कार्य में अधिक रूचि लेती हैं जो कालान्तर में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये भी खतरा बन सकता है जैसा कि पूर्वोत्तर के प्रमुख ईसाई प्रदेशों में हो रहा है। इस कारण अब वह समय आ गया है कि ईसाई मिशनरियों की विदेशी सहायता, उनके उद्देश्य, मन्तव्य और धर्मान्तरण के प्रति उनके जुनून पर रोक लगाने के ठोस प्रबन्ध किये जायें ताकि आदिवासी क्षेत्रों में ऐसे संघर्षों को टाला जा सके।

नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमन्त्री की शपथ ग्रहण करने के साथ ही तीसरी बार मुख्यमन्त्री होने का सौभाग्य प्राप्त कर लिया है। नरेन्द्र मोदी की शानदार विजय की व्याख्या का दौर भी चल निकला है और अनेक कारण इस विजय के बताये जा रहे हैं। नरेन्द्र मोदी की विजय के कारण कुछ भी रहे हों परन्तु यह भी समीक्षा का विषय है कि यह विजय किस प्रकार भारतीय राजनीति को प्रभावित करने जा रही है या फिर इस विजय के निहितार्थ क्या हैं ? 

गुजरात चुनाव के परिणामों के पश्चात् कांग्रेस सहित तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने जिस प्रकार मोदी की विजय को साम्प्रदायिकता की विजय बताया है उसके पश्चात यह समझना आवश्यक हो गया है कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की स्थितियाँ न होने के पश्चात भी यह चुनाव साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता का चुनाव क्यों था ?  इसके लिये हमें भारत में चल रही सेकुलर बनाम सूडो सेकुलर की पृष्ठभूमि को समझना होगा।  सूडो सेकुलर दल मानते हैं कि भारत का हिन्दू धार्मिक तो है परन्तु वह राजनीति में धर्म के प्रवेश को उचित नहीं मानता और हिन्दूवादी संगठनों की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति की आलोचना के कारण राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत नहीं होता। इसी धारणा के वशीभूत होकर कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी ने मौत का सौदागर और प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिह ने गुजरात दंगों के मामलों की नये सिरे से जाँच की बात की थी। वास्तव में ये दोनों बयान मुसलमानों को रिझाने से ज्यादा इस विश्वास पर आधारित थे कि गुजरात की जनता की सेकुलरिज्म में आस्था है और यहाँ का हिन्दू मोदी को 2002 के दंगों में उनकी भूमिका के लिये उन्हें दण्डित करना चाहता है। इस विश्वास का कारण पिछले पाँच वर्षों में मोदी के विरूद्ध चलाया गया प्रचार अभियान था। इस बात की पुष्टि कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी के चुनाव परिणामों के तत्काल बाद आये बयानों से भी होती है कि साम्प्रदायिक शक्तियों के विरूद्ध अभियान चुनाव तक ही सीमित नहीं रहना चाहिये वरन् इसे लगातार चलाते रहने की आवश्यकता है। यह बयान प्रमाणित करता है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल गुजरात के चुनावों को विचारधारागत आधार पर भी देख रहे थे। गुजरात के चुनाव परिणामों ने भारत में चल रही सेकुलरिज्म की बहस को प्रभावित किया है। इन चुनाव परिणामों से हिन्दुओं ने दिखाया है कि वे सेकुलर और सूडो सेकुलर के मध्य विभाजन रेखा को पहचानते हैं तथा सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति को सिरे से नकारते हैं। 

यह प्रयोग यदि देश के अन्य भागों में भी सफल होता है या सेकुलरिज्म की बहस को नया मोड़ देता है तो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों को अपनी रणनीति पर नये सिरे से विचार करना होगा और इन चुनाव परिणामों ने इसी कारण इन दलों को चिन्तित कर दिया है।  

इन चुनाव परिणामों का भाजपा पर भी प्रभाव पड़ने वाला है। 2004 में लोकसभा में पराजय के पश्चात से ही भाजपा अपनी दिशा और दशा दोनों को लेकर चिन्तित थी। उसके पास ऐसा कोई रास्ता नहीं दिख रहा था जहाँ से वह अपना लक्ष्य निर्धारित कर सके। भाजपा को एक ब्राण्ड बनाकर प्रस्तुत करने की 2004 की नीति असफल रही थी और भाजपा को नये माडल की तलाश थी। यह कुछ ऐसा ही जब 1990 के आसपास तत्कालीन महासचिव गोविन्दाचार्य ने भाजपा को समाजवादी हिन्दुत्व का फार्मूला दिया था जहाँ हिन्दुत्व की चासनी में पिछड़ा वर्ग के कार्ड को ढालकर कल्याण सिंह के रूप में एक फार्मूला सामने आया था जब अल्पसंख्यकों के मतों के बिना भी पूर्ण बहुमत की सरकार बनना सम्भव हो सका था। नरेन्द्र मोदी ने भाजपा को हिन्दुत्व और उदार अर्थव्यवस्था को मिलाकर एक ऐसा फार्मूला दिया है जो मध्यवर्ग के मध्य भाजपा का आधार बढ़ाने में एक नया मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। उदार अर्थव्यवस्था का परिपालन करते हुये सबको सन्तुष्ट कर मध्यम वर्ग को आक्रामक ढंग से अपने से जोड़कर नरेन्द्र मोदी ने उन्हें घरों से निकलकर मतदान केन्द्र पर जाकर पंक्तिबद्ध होकर मतदान करने की अन्त:प्रेरणा दी जो कि विशेष सफलता है।   

वैसे यह देखना रोचक होगा कि भाजपा अन्य राज्यों में यह प्रयोग कैसे दुहरा पाती है जबकि उसके अन्य राज्यों में मोदी जैसा करिश्माई नेतृत्व नहीं है।  

गुजरात चुनाव के परिणाम संघ परिवार के साथ भाजपा के सम्बन्धों पर भी असर डालेंगें। संघ परिवार के विभिन्न घटकों ने मोदी का खुलकर विरोध किया और इसी कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इन चुनावों में तटस्थ रहना पड़ा और संगठित तौर पर न तो मोदी का समर्थन किया और न विरोध। परन्तु रोचक तथ्य यह रहा कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में जहाँ संघ ने घोषित तौर पर अपने पूर्णकालिकों को भाजपा की सहायता में लगा रखा था वहाँ तमाम प्रयासों के बाद भी परिणाम भाजपा के लिये निराशाजनक रहे तो वहीं गुजरात में संघ के संगठन के तौर पर न लगने के बाद भी भाजपा को लगभग दो तिहाई बहुमत मिला। यह बात क्या संकेत देती है यही कि चुनावों में संगठन की भूमिका होती है परन्तु प्राथमिक तौर पर सरकार का कामकाज, नेतृत्व की स्वीकार्यता और सख्त प्रशासक की छवि जनता के मत देने का आधार बनता है।   मोदी की विजय के पश्चात भाजपा के कामकाज में संघ का दखल कम होगा तथा सत्ता प्राप्ति के पश्चात संघ की उपेक्षा करने का भाव अधिक विकसित होगा। वैसे संघ को भी आभास हो गया है कि भाजपा में अध्यक्ष या उसके कामकाज का निर्धारण करते-करते वह राजनीति में लिप्त होता जा रहा है और व्यक्ति निर्माण का उसका मूल कार्य प्रभावित हो रहा है।   

गुजरात चुनाव परिणामों के पश्चात एक बात और कही गई कि नरेन्द्र मोदी का कद पार्टी से बड़ा हो गया है और वे भविष्य के प्रधानमन्त्री हैं। जिस प्रकार विधायक दल की बैठक में मोदी ने नाटकीय ढंग से इन आशंकाओं का खण्डन किया उससे स्पष्ट है कि वे किसी जल्दी में नहीं हैं और अपनी स्वेच्छारिता और पार्टी से बड़े होने के आरोपों को पहले धुलकर अधिक स्वीकार्य बनना चाहते हैं। इन चुनाव परिणामों के बाद भी 2008 या 2009 के आम चुनावों में फिलहाल लालकृष्ण आडवाणी की उम्मीदवारी को कोई खतरा नहीं है।

पिछले अक्टूबर माह में श्रीराम, रामायण और रामसेतु को लेकर भारत सरकार के संस्कृति मन्त्रालय द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर किये गये शपथ पत्र के साथ ही रामसेतु को लेकर राजनीतिक माहौल गरमा गया था। विषय की संवेदनशीलता को देखते हुये भारत सरकार ने शपथ पत्र वापस ले लिया और सर्वोच्च न्यायालय से इस पूरे विषय के सूक्ष्म परीक्षण के लिये दिसम्बर तक का समय माँगा। इस बीच भारत सरकार ने इस सेतु की स्थिति का आकलन करने के लिये दस सदस्यों की एक विशेषज्ञ समिति बनाई। गत रविवार को एक अंग्रेजी दैनिक ने प्रथम पृष्ठ पर एक समाचार प्रकाशित किया जिसमें उस विशेषज्ञ समिति के निष्कर्षों का उल्लेख सूत्रों के हवाले से दिया गया है। इस निष्कर्ष में समिति ने कहा है कि कोई भी पुरातात्विक और वैज्ञानिक प्रमाण यह सिद्ध नहीं करता कि भारत और श्रीलंका के मध्य पाक की खाड़ी में स्थित यह सेतु मानव निर्मित है। इस समिति के निष्कर्ष के अनुसार यह एक भूसंरचनात्मक निर्मिति है जो विश्व के अनेक भागों में पाई जाती है। इस रिपोर्ट को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष 11 दिसम्बर को प्रस्तुत किया जाना था परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार इसका बारीकी से निरीक्षण करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय से कुछ और समय माँग सकती है।  

इस रिपोर्ट के आने के बाद रामसेतु पर राजनीतिक माहौल गर्माने के आसार प्रतीत होने लगे हैं। लोकमंच के सूत्रों को मिली जानकारी के अनुसार रामेश्वरम् रामसेतु रक्षा मंच जो कि इस सम्बन्ध में देश भर में विभिन्न हिन्दू संगठनों के मंच के रूप में काम करते हुये आन्दोलन चला रहा है उसने इस रपोर्ट को अस्वीकार करने का मन बना लिया है और रामसेतु को लेकर लोगों की आस्था को आधार बनाने के लिये व्यापक आन्दोलन की तैयारी कर ली है। इस सम्बन्ध में आगामी 30 दिसम्बर को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लाखों लोगों को एकत्र करने का निर्णय लिया गया है।  

भारत सरकार द्वारा गठित की गई विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट इस मंच के इस दावे को पुष्ट ही करेगी कि यह सरकार का दिखावा मात्र है क्योंकि इस समिति की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े करते हुये जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी सर्वोच्च न्यायालय भी गये थे यह बात और है कि न्यायालय ने उनकी याचिका को निरस्त कर दिया, परन्तु ऐसा करने से समिति के सदस्यों की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर प्रश्न तो खड़ा हो ही जाता है।  

रामेश्वरम् रामसेतु रक्षा मंच के हाथ में एक और हथियार सरकार का ही एक प्रकाशन लगने वाला है जो पिछले सप्ताह संसद के पटल पर रखा गया। हैदराबाद स्थित रिमोट सेंसिंग एजेन्सी के अन्तरिक्ष विभाग ने एक पुस्तिका इमेजेज इण्डिया श्रृंखला में प्रकाशित की है जिसकी प्रस्तावना इसरो के अध्यक्ष माधवन नायर ने लिखी है। इस पुस्तिका में पृष्ठ संख्या 39 पर रामसेतु का उल्लेख है और इस ढाँचे को 17,50,000 वर्ष पुराना रामेश्वरम् में भारत के दक्षिण में भारत और श्रीलंका के मध्य स्थित बताया गया है। इस पुस्तिका में पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर इसे इतना पुराना आदिकालीन माना गया है। पुस्तिका में रामायण महाकाव्य में ऐसा ही पुल होने की बात भी कही गई है। निश्चित रूप से भारत सरकार का प्रकाशन ही रामसेतु पर सरकार की विरोधाभासी स्थिति को स्पष्ट करता है। सरकार जहाँ श्रीराम और रामसेतु के अस्तित्व से इन्कार करती है वहीं उसका प्रकाशन रामसेतु के अस्तित्व को न केवल स्वीकारता है वरन् आस्थावादियों के मत की पुष्टि करते हुये इसे 17, 50,000 वर्ष प्राचीन भी स्वीकार करता है।  

एक ओर विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और दूसरी ओर सरकारी प्रकाशन में रामसेतु का उल्लेख रामसेतु पर चल रहे आन्दोलन को उद्दीप्त करने के लिये पर्याप्त है। निश्चय ही आने वाले दिनों में रामसेतु को लेकर राजनीतिक और धार्मिक माहौल गरमाने वाला है।

Posted by: amitabhtri | December 7, 2007

बुरे फंसते बुश

हाल ही में अमेरिका की कुछ खुफिया एजेन्सियों द्वारा ईरान के परमाणु कार्यक्रम के सम्बन्ध में नवीन रहस्योद्घाटनों से अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश अपनी विदेश नीति को लेकर घिरते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी की कुछ खुफिया एजेन्सियों द्वारा रिपोर्ट दी गई है कि ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को 2003 में ही विराम दे दिया था। इस रिपोर्ट को लेकर अमेरिका सहित समस्त विश्व में अनेक तरह की प्रतिक्रियायें हुईं। अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने खुफिया रिपोर्टों पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम अभी भी विश्व के लिये एक खतरा है और उन्होंने विश्व समुदाय को इस खतरे के प्रति सचेत किया। वहीं इस रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया में विदेश मन्त्री कोण्डोलिजा राइस ने कहा कि यह रिपोर्ट दर्शाती है कि अमेरिका में लोकतान्त्रिक मूल्यों का आदर है और स्वतन्त्रता है जबकि ईरान में ऐसा नहीं है। 

इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट होता है कि अमेरिका में वर्तमान शासन ईरान को लेकर अपनी नीति के प्रति आश्वस्त है तथा खुफिया रिपोर्ट को लेकर उनकी नीति में विशेष अन्तर आता नहीं दिख रहा है। परन्तु इस रिपोर्ट का विश्व समुदाय पर व्यापक असर पड़ने वाला है। जहाँ पहले से ही यूरोप और रूस ईरान पर कड़े प्रतिबन्ध लगाने के पक्ष में नहीं थे वहीं अब यह रिपोर्ट उन्हें ईरान के पक्ष को रखने में मजबूती प्रदान करेगी। विश्व जनमत पर तो इस रिपोर्ट का प्रभाव पड़ेगा ही अमेरिका की आन्तरिक राजनीति भी इससे अनछुई नहीं रह पायेगी। जैसा कि सबको ज्ञात है कि अगले वर्ष अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव होने वाले हैं और इन चुनावों में जार्ज डब्ल्यू बुश की तथाकथित आक्रामक विदेश नीति उनके विरोधियों के निशाने पर है।  

डेमोक्रेट सदस्यों ने बुश की विदेश नीति और विशेषकर इराक पर उनके कदम की आलोचना की है  और विशेष रूप से यही चुनाव का प्रमुख मुद्दा है। इराक पर आक्रमण के लिये जार्ज डब्ल्यू बुश ने आक्रामक विदेश नीति का सहारा लेते हुये इराक में जनसंहारक हथियारों के होने की बात करते हुये सद्दाम हुसैन के शासन को अपदस्थ करने के लिये इराक पर आक्रमण किया था। परन्तु पूरा युद्ध बीत जाने के बाद भी इराक में जनसंहारक हथियारों के होने का कोई प्रमाण नहीं मिला। जार्ज डब्ल्यू बुश की रिपब्लिकन पार्टी ने पहले आक्रमण की नीति के अन्तर्गत अमेरिका के निवासियों को आश्वस्त किया कि यह युद्ध उनकी सुरक्षा के लिये है और यह नई विदेश नीति है जिसके अन्तर्गत शत्रु के आक्रमण करने से पूर्व ही उसे नष्ट करने की नीति का पालन किया जा रहा है। नई विदेश नीति का हवाला देकर करदाताओं के धन को इराक युद्ध में झोंका गया परन्तु जल्द ही यह युद्ध अमेरिका की जनता की सुरक्षा से अधिक इराक की जनता के कल्याण के रूप मे दिखने लगा।  अमेरिकी सेना की उपस्थिति ने जहाँ एक ओर मध्य-पूर्व के मुस्लिम देशों में गैर-मुस्लिम शासन को अस्वीकार करने की प्रवृत्ति को बलबती करते हुये एक विशेष प्रकार के आतंकवाद को जन्म दिया तो वहीं इराक में अमेरिका के बदलते युद्ध उद्देश्य अमेरिकी जनता को पसन्द नहीं आये। अमेरिका के करदाता अपनी सुरक्षा के लिये तो धन खर्च करने को तैयार हैं परन्तु इराकी जनता के कल्याण के लिये सेना की तैनाती के लिये धन खर्च करने को वे तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि जार्ज बुश इराक की अपनी नीति को लेकर घरेलू मोर्चे पर आलोचना के शिकार हो  रहे हैं। 

ईरान पर आई नई खुफिया रिपोर्ट से बुश के उन आलोचकों को बड़ा सम्बल मिला है जो निओ कन्जर्वेटिव लोगों द्वारा संचालित अमेरिका की अति महत्वाकाँक्षी नीति का विरोध इस आधार पर करते हैं कि यह करदाताओं के धन का अपव्यय है। इसी महत्वाकाँक्षी विदेश नीति के अन्तर्गत समस्त विश्व में हस्तक्षेप बढ़ाना शामिल है। ऐसी खबरें आ रही थीं कि जार्ज डब्ल्यू बुश अपना कार्यकाल समाप्त होते-होते ईरान पर आक्रमण कर देंगे। अब नई परिस्थितियों में उनके लिये ऐसा करना इतना सहज नहीं होगा।  

11 सितम्बर 2001 के पश्चात उपजी सहानुभूति के चलते तथाकथित आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध को लेकर विश्व स्तर पर जो गठबन्धन बना था और अमेरिका ने इस युद्ध को लेकर जो  समर्थन प्राप्त किया था वह तीन वर्षों में समाप्त हो गया और अमेरिका के विरोध में अनेक देश खुलकर सामने आ गये । यह एक ऐसा विषय था जिस पर जार्ज बुश को आत्मविश्लेषण कर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये था परन्तु ऐसा करने के बजाय उन्होंने अपनी भूलें जारी रखीं और तेल प्राप्त करने की अभिलाषा और मध्य-पूर्व में इजरायल के बहाने अनी स्थिति सुदृढ़ करने का अभियान जारी रखा। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर उस पर आक्रमण करने की योजना में भी कहीं न कहीं इजरायल का तत्व काम कर रहा है परन्तु हमें नहीं भूलना चाहिये कि इजरायल अपनी रक्षा करने में स्वयं समर्थ है। 

वैसे तो कुछ लोग ईरान की परमाणु महत्वाकाँक्षा को इराक में अमेरिका की तैनाती से उत्पन्न हुआ भय मानते हैं। कुछ भी हो अमेरिकी खुफिया एजेन्सियों की नई रिपोर्ट से जार्ज बुश की मुश्किलें अवश्य बढ़ गई हैं।

इन दिनों मलेशिया चर्चा में है। कारण मलेशिया में निवास करने वाले भारतीय नस्ल के लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन। इस विरोध प्रदर्शन के अपने कारण हैं। मलेशिया में निवास करने वाले भारतीय नस्ल के लोगों का आरोप है कि उनके साथ नस्ली आधार पर भेदभाव किया जा रहा है तथा मलेशिया के मूल मलयों की अपेक्षा उन्हें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उपेक्षित किया जा रहा है।

भारतीय नस्ल के लोग कोई दो सौ वर्ष पूर्व अंग्रेजों द्वारा मलेशिया मजदूर बनाकर ले जाये गये थे। अपने परिश्रम के बल पर उन्होंने न केवल उस देश के विकास में अपना योगदान दिया वरन् अपनी अलग पहचान भी बनाई। भारतीय नस्ल के इन लोगों में तमिल और मलयालम भाषी अधिक हैं। उस देश में जाकर भी उन्होंने अपनी हिन्दू हचान बरकरार रखी और जगह-जगह मन्दिर बनाये। परिस्थितियों में विशेष परिवर्तन तब आया जब 1957 में अंग्रेजों के उपनिवेश से इस देश को मुक्ति मिल गई तथा अनेक नवस्वतन्त्र देशों की भाँति इस देश को भी एक संविधान मिला और उस संविधान के अनुच्छेद 8 और 11 के अन्तर्गत मलेशिया के निवासियों को क्रमश: समता का अधिकार और धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार मिला। परन्तु संविधान के अनुच्छेद 153 के अन्तर्गत मूल मलय निवासियों को कुछ विशेषाधिकार दिये गये हैं। हालांकि भारतीय नस्ल के प्रति भेदभाव के विषय पर लम्बे समय से आन्दोलन चला रहे भारतीय नस्ल के मलेशिया के नागरिक और अधिवक्ता वेदमूर्ति के अनुसार मूल संविधान में अनुच्छेद 153 की व्यवस्था कुछ मय के लिये की गई थी और संविधान सभा में इस विषय पर भारतीय नस्ल के लोगों से सहमति भी नहीं ली गई थी। वेदमूर्ति के अनुसार मूल मलय संविधान के इसी प्रावधान को आधार बनाकर अपने लिये विशेषाधिकार और भारतीय नस्ल के लोगों के प्रति हीन भावना रखने को सही मानते हैं।  

मलेशिया में भारतीय नस्ल के लोगों का विरोध न तो अचानक है और न ही स्वत:स्फूर्त है । वेदमूर्ति सहित भारतीय नस्ल के पाँच अधिवक्ता भारतीय नस्ल के लोगों के प्रति भेदभाव को लेकर लम्बे समय से अपने सांविधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुये आन्दोलन चला रहे हैं। उनके इस आन्दोलन पर भारतीय नस्ल के बीस लाख मलेशिया निवासियों की पैनी नजर थी और अब इस सुलगती हुई आग ने एकदम से गति पकड़ ली है।  

इस आन्दोलन के गतिमान होने के दो प्रमुख कारण हैं। एक तो भारतीय नस्ल के लोगों की नई पीढ़ी का प्रादुर्भाव और दूसरा कानून का सहारा लेकर धर्म पर आक्रमण जैसे मन्दिर गिराना और जबरन मुसलमान बनाना या शरियत कानून थोपना।  

भारतीय नस्ल के जो लोग मजदूर बनाकर मलेशिया ले जाये गये उनका मानना था कि उन्हें इस देश ने रहने का अवसर दिया जो पर्याप्त है इस कारण उन्होंने अपने अधिकारों के लिये आवाज नहीं उठाई परन्तु उनकी नई पीढ़ी जो मलेशिया में ही जन्मी है और वहाँ की नागरिक जन्म से है उनके अन्दर देश में समान अवसर की आकाँक्षा है इसी कारण यह पूरा आन्दोलन नई पीढ़ी के हाथ में है जो विश्व में समान अधिकार और नस्ली समानता जैसे नारों से आकर्षित होकर समान अवसर की माँग कर रहा है। भारतीय नस्ल के लोगों के आन्दोलन के गतिमान होने का एक और कारण धार्मिक भेदभाव है। मलेशिया में भारतीय नस्ल के लोगों की कुल संख्या का 90 प्रतिशत हिन्दू हैं। मलेशिया में 1957 में जब देश स्वतन्त्र हुआ तो पहले से स्थित धार्मिक स्थलों के लिये नये लाइसेन्स और परमिट की आवश्यकता हुई सरकार ने मस्जिदों के लिये नये भूमि कानूनों के अन्तर्गत लाइसेन्स प्राप्त कर लिये परन्तु मन्दिरों के लिये ऐसा कुछ नहीं किया गया। न केवल इतना वरन् कानून की दुहाई देकर इन मन्दिरों को गिराया गया। अब तक मलेशिया में हजारों मन्दिर ढहाये गये हैं। इस बात ने हिन्दुओं के भीतर एक अल्पसंख्यक भय की मानसिकता का विकास किया है। इसी बीच कुछ वर्ष पूर्व घटी एक घटना ने हिन्दू चेतना को और झकझोर दिया जब एवरेस्ट विजेता एक कर्नल को हिन्दू होते हुये भी उसके परिजनों की इच्छा के विपरीत शरियत अदालत के आदेश पर उसे मुस्लिम रीति से दफना दिया गया। इस घटना ने अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियों के साथ मिलकर हिन्दुओं मे इस्लामवादी आधिपत्य का भय विद्यमान कर दिया और इसी चेतना के चलते अनेक वर्षों से भारतीय नस्ल के लोगों के लिये चल रहा प्रयास आन्दोलन बन कर खड़ा हो गया।   वेदमूर्ति अब भारतीय नस्ल के लोगों के साथ हो रहे अन्याय और भेदभाव के बारे में घूम-घूमकर विभिन्न देशों में सम्पर्क करने का अभियान आरम्भ कर दिया है। निश्चय ही उनके इस अभियान से यह विषय अन्तरराष्ट्रीय पटल पर आ जायेगा। वेदमूर्ति तो इंग्लैण्ड की दीवानी अदालत में जाकर उपनिवेश के दौरान भारतीय नस्ल के लोगों के साथ हुये भेदभाव को लेकर क्षतिपूर्ति भी माँगने वाले हैं। निश्चय ही ऐसे मुद्दे को प्रचार ही देंगे।

Posted by: amitabhtri | November 28, 2007

उमा की वापसी की अटकलें

इन दिनों गुजरात चुनाव को लेकर राजनीति का बाजार गर्म है। गुजरात में चुनाव प्रचार जोरों पर है और इसी के साथ भाजपा की पूर्व नेत्री और सम्प्रति भारतीय जनशक्ति पार्टी अध्यक्षा उमा भारती की भाजपा में वापसी की अटकलें भी तेज हो गई हैं। इन अटकलों में कितनी सच्चाई है यह जानने के लिये हमें उस पृष्ठभूमि को देखना होगा जिसमें उमा भारती ने भाजपा छोड़ा या उन्हें भाजपा से निष्कासित किया गया।  

उमा भारती के भाजपा छोड़ने की घटना को ध्यान में रखते हुये हमें इसे उस घटनाक्रम की चरम परिणति समझना चाहिये जो भाजपा के भीतर चल रही वर्चस्व की लड़ाई को दर्शाता है जिसका आरम्भ भाजपा के पूर्व महासचिव के.एन.गोविन्दाचार्य के तथाकथित अध्ययनावकाश या पार्टी से उनके निलम्बन से आरम्भ हुआ था। गोविन्दाचार्य की पार्टी में मौजूदगी एक नाक का विषय बन गया था विशेषकर मुखौटा विवाद के बाद अटल बिहारी वाजपेयी और गोविन्दाचार्य आमने-सामने आ गये और तत्कालीन भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी की अपरिहार्यता के चलते गोविन्दाचार्य को पार्टी से बाहर आना पड़ा। गोविन्दाचार्य की भाजपा से विदाई वास्तव में एक वैचारिक संघर्ष का भी परिणाम था। जिन दिनों गोविन्दाचार्य उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रभारी हुआ करते थे उन दिनों वे उत्तर भारत में एक विशेष प्रकार के समीकरण के सहारे भाजपा के जनाधार का विस्तार करना चाहते थे और यह समीकरण दक्षिण के उस सामाजिक समीकरण की तरह था जहाँ पिछड़े वर्ग को पार्टी में अधिक प्रतिनिधित्व देने की बात थी। 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और मध्य प्रदेश में उमा भारती जैसे जनाधार वाले नेताओं ने एक विशेष प्रकार का समाजवादी हिन्दुत्व का फार्मूला विकसित किया जहाँ हिन्दुत्व के बैनर तले पिछड़ा वर्ग समाहित हो रहा था। परन्तु केन्द्र में सत्तासीन होने की उत्सुकता ने अटल बिहारी वाजपेयी को उत्तर प्रदेश में विशेष हस्तक्षेप रखना अनिवार्य हो गया इस कारण उन्होंने कल्याण सिंह के फार्मूले से उलट दलित ब्राह्मण समीकरण की खोज आरम्भ की।  

वास्तव में भाजपा में गोविन्दाचार्य की विदाई के पीछे कहीं न कहीं चाल चेहरा चरित्र न बदल पाने की भाजपा की विवशता भी जिम्मेदार थी। गोविन्दाचार्य ने समय की नजाकत भाँप कर स्वयं को सक्रिय राजनीति से अलग कर वृहद सामाजिक प्रकल्प में लगा लिया परन्तु उमा भारती भाजपा में ही रहीं और भाजपा में आन्तरिक सुधार का प्रयास करती रहीं। इन वर्षों में भाजपा सत्ता में रही और एक विशेष प्रकार की कुलीन संस्कृति पार्टी पर हावी हो गई। सामाजिक आधार पर जो समीकरण अगड़े और पिछड़े के मध्य है वही समीकरण कारपोरेट और निम्न वर्ग के मध्य है। भाजपा में एक विशेष प्रकार की कारपोरेट संस्कृति प्रवेश कर गई और सत्ता का प्रयोग कुछ वर्गो के निहित स्वार्थों की पूर्ति में किया जाने लगा। इस बदली हुई संस्कृति में धन और तकनीक को पार्टी के विस्तार का आधार मान लिया गया और जनता से जुड़े मुद्दे गौड़ हो गये इसी कारण जनाधार से जुड़े नेता भार माने जाने लगे और धन या तकनीक से जुड़ने को केन्द्रीय नेत़ृत्व के निकट आने का आधार माना जाने लगा।  

उमा भारती ने गोविन्दाचार्य की अधूरी लड़ाई को पार्टी में जारी रखा और दूसरी पीढ़ी के नेतृत्व में स्वयं को आगे करने का प्रयास किया इस बार एक बार फिर उनके सामने चुनौती यथास्थिति बनाम परिवर्तन का संघर्ष था । उमा भारती ने कर्नाटक में हुबली में तिरंगा फहराने के मामले में एक पुराने मामले को लेकर नैतिकता के आधार पर मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री पद से त्यागपत्र दे दिया और देश में तिरंगा यात्रा निकालकर पार्टी के दूसरी पीढ़ी के नेतृत्व में स्वयं को जनाधार वाले नेता के रूप में स्थापित करना प्रयास किया। यहीं उनका संघर्ष उन तत्वों से हुआ जो यथास्थितिवादी थे या पार्टी पर धन और तकनीक को प्रमुखता देते थे। इस संघर्ष में उमा भारती को पहली पंक्ति के नेतृत्व का सहयोग नहीं मिला और उन्होंने अलग रास्ता अपना लिया परन्तु यह रास्ता भाजपा में अन्तर्द्वन्द का ही एक भाग है । इसलिये उमा भारती भाजपा परिवार से तो अलग हैं नहीं प्रश्न केवल इतना है कि कब ऐसी परिस्थितियाँ पार्टी के भीतर बनती हैं जब भाजपा अपना चाल चेहरा या चरित्र बदलने को तैयार होती है।  

वैसे तो फिलहाल उमा भारती की भाजपा में वापसी की अटकल गुजरात चुनावों से जुड़ी है परन्तु गुजरात चुनावों के परिणाम उमा और भाजपा दोनों की दिशा सुनिश्चित करेंगे यदि गुजरात चुनावों में भाजपा विजयी होती है तो नरेन्द्र मोदी निश्चित ही राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी में अपनी भूमिका निभायेंगे और अटल बिहारी वाजपेयी के बाद वर्षो बाद कोई जनाधार वाला नेता भाजपा का नेतृत्व करेगा। ऐसे में निश्चय ही भाजपा के सोच का तरीका बदल जायेगा।  

गुजरात चुनावों के परिणाम आने के बाद भाजपा में दूसरी पीढ़ी नेतृत्व सँभालने का संघर्ष करेगी और ऐसे में नरेन्द्र मोदी को संघ परिवार के विभिन्न घटकों से संघर्ष के लिये सहयोगियों की आवश्यकता होगी और इस भूमिका में मोदी उमा भारती को कहाँ खड़ा पाते हैं यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।       

Posted by: amitabhtri | November 24, 2007

तसलीमा पर खतरा

इन दिनों पश्चिम बंगाल राज्य चर्चा में है। पश्चिमम बंगाल का नाम स्मृति में आते ही नन्दीग्राम में कम्युनिस्ट बर्बरता के दृश्य सजीव हो उठते हैं, परन्तु हम यहाँ पश्चिम बंगाल को नन्दीग्राम के कारण नहीं वरन् दूसरे कारण से चर्चा में ला रहे हैं। हमारी चर्चा का केन्द्र बांग्लादेश की निर्वासित और विवादित लेखिका तसलीमा नसरीन हैं। जिन दिनों पश्चिम बंगाल में नन्दीग्राम को लेकर विरोध प्रदर्शनों का दौर चल रहा था उसी समय अचानक कोलकाता तसलीमा प्रकरण पर हिंसा का शिकार हो गया। बंगाल की राजधानी में तसलीमा की वीजा अवधि बढ़ाने का विरोध करने के लिये मुस्लिम कट्टरपंथी सड़कों पर उतरे और मामला हिंसक हो गया। अल्प अवधि के लिये कुछ क्षेत्र में कर्फ्यू भी लगाना पड़ा। तसलीमा के प्रकरण पर हुई इस हिंसा के भी अपने सन्दर्भ हैं। इस हिंसा का नन्दीग्राम की हिंसा या वहाँ की स्थिति से कोई लेना देना नहीं है परन्तु एक बात स्पष्ट है कि जब अराजकता की स्थिति निर्माण होती है तो कानून व्यवस्था एक निजी विषय बन जाता है और अनेक छोटे गुट समाज में अपनी अभिव्यक्ति के लिये हिंसा का सहारा लेने लगते हैं। वैसे अचानक तसलीमा प्रकरण प्रासंगिक हो जाने से एक प्रश्न सहज ही मन में कौंधता है कि कहीं यह नन्दीग्राम की ओर से ध्यान हटाने का यह प्रयास तो नहीं है। ऐसा प्रश्न इसलिये भी उठता है कि तसलीमा प्रकरण पर विरोध प्रदर्शन का आयोजन करने वाले सज्जन मोहम्मद इदरीस सभी विषयो पर बंगाल सरकार के विरूद्ध विरोध प्रदर्शन आयोजित करने से नहीं चूकते। इनका विरोध प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है और राज्य की पुलिस भी मानती है कि विरोध प्रदर्शन कई घण्टों तक शान्तिपूर्वक ही चलता रहा हिंसा का पुट उसमें बाद में समाहित हुआ। इस अचानक हिंसा से ही प्रश्न उठता है कि कहीं यह सुनियोजित है या फिर अराजकता के चलते भीड़ का मनोविज्ञान। 

वैसे इसके परे भी तसलीमा का पूरा विषय अपने आप में एक गम्भीर विषय है। तसलीमा को लेकर मुस्लिम कट्टरपंथियो का विरोध हमारे समक्ष सलमान रशदी की याद ताजा कर देता है। जिस प्रकार अस्सी के दशक में सेटेनिक वर्सेज पुस्तक लिखने के कारण रशदी के विरूद्ध ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातोल्ला खोमैनी ने मौत का फतवा जारी किया था और वह फतवा वापस लिये जाने के बाद भी रशदी पर खतरा कम नहीं हुआ। रशदी ने पश्चिम के अनेक देशों में शरण ली परन्तु फतवा ने उनका पीछा नहीं छोडा और बाद में खौमैनी के फतवा वापस लेने पर अनेक स्वतन्त्र लोगों ने भी रशदी का पीछा किया। इसी प्रकार तसलीमा के विरूद्ध बांग्लादेश के कट्टरपंथियों द्वारा फतवा जारी किये जाने के बाद भारत में भी मुसलमान उन्हें इस्लाम का शत्रु मान रहा है। इससे एक बात स्पष्ट होती है कि मुसलमान इस्लाम, कुरान और पैगम्बर पर किसी प्रकार की भी टिप्पणी सुनने को तैयार नहीं है।  

भारत के सन्दर्भ में तसलीमा का विषय सेकुलरिज्म की परीक्षा है। देखना है कि सेकुलरिस्ट इस्लामी कट्टरपंथियों के आगे झुकते हैं या फिर तसलीमा को भारतीय नागरिकता का समर्थन कर वास्तव में सेकुलरिज्म की परिभाषा का अनुपालन करते हैं।  

23 नवम्बर की सुबह प्रत्येक दिन की भाँति समस्त देश के लिये समान थी परन्तु दोपहर आते-आते देश का एक प्रदेश आतंकवादियों की कुदृष्टि का शिकार हो गया। देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में तीन स्थानों पर कुछ ही अन्तराल पर तीन विस्फोट हुये। प्रदेश की राजधानी लखनऊ धार्मिक नगरी वाराणसी और एक और महत्वपूर्ण धार्मिक नगरी अयोध्या से कुछ ही दूरी पर स्थित फैजाबाद में ये धमाके हुये। वैसे इन धमाकों के लिये एक धार्मिक नगरी और दूसरी उसके निकट की नगरी को निशाना बनाया गया परन्तु इस बार निशाना धार्मिक नगरी या धर्मस्थल नहीं थे। इस बार के विस्फोटों ने आतंकवादियों की बदली हुई रणनीति  हमारे समक्ष प्रस्तुत हुई। आतंकवादियों ने सिविल कोर्ट और वकीलों को अपने निशाने पर लिया है। आतंकवादियों की इस रणनीति के अपने सन्देश और उद्देश्य हैं।  

खुफिया सूत्रों के अनुसार इस घटना से हूजी ( हरकत-उल-जेहाद-ए-इस्लामी) और जैश-ए-मोहम्मद के तार जुड़े हो सकते हैं। इनके तार जुड़ने के अपने कारण हैं। उत्तर प्रदेश के इन शहरों की विभिन्न जेलों में हूजी के आतंकवादी बन्द हैं जो पिछले वर्षों में अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि परिसर पर आक्रमण, वाराणसी में संकटमोचन मन्दिर परिसर पर हमले सहित लखनऊ में अनेक आतंकवादी घटनाओं के सन्दर्भ में जेलों में बन्द हैं। इस बार आतंकवादियों ने न्याय प्रक्रिया पर हमला बोला है। न्यायालय परिसर और वकील देश की व्यवस्था के सुचारू संचालन और लोकतन्त्र पर लोगों के विश्वास के प्रतीक हैं इस कारण उन पर आक्रमण करने से न केवल न्यायिक प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होगी वरन् आम जनता में भी आतंक का भाव व्याप्त होगा। अब प्रश्न खड़ा होता है कि आतंकवादियों ने सोची समझी रणनीति के अन्तर्गत वकीलों और न्यायालय को निशाना क्यों बनाया जबकि वे अपनी पिछली रणनीति पर चलकर भीड़ भरे इलाकों में विस्फोट कर या धार्मिक स्थलों को निशाना बनाकर भी अपना जिहाद का सन्देश प्रशासन और जनता को दे सकते थे। वकीलों और न्यायालय को निशाना बनाने की रणनीति आतंकवादियों के वैश्विक चिन्तन और उनकी जिहादी रणनीति के नये पैंतरों को स्पष्ट करती है।  

अभी कुछ दिनों पूर्व जब जैश के तीन आतंकवादी लखनऊ में पकड़े गये तो न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किये गये कथित आतंकवादियों को वकीलों ने लखनऊ के न्यायालय में पीटा। इससे पूर्व पिछले वर्षों में जब अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि जब आक्रमण के प्रयास में दोषी आतंकवादियों को पकड़ा गया और उन पर मुकदमा चलाने की नौबत आई तो फैजाबाद बार एसोसिएशन ने एक स्वर से निर्णय लिया कि कोई भी स्थानीय वकील आतंकवदियों की पैरवी नहीं करेगा। इस निर्णय का परिणाम यह हुआ कि आतंकवादियों के लिये बाहर से वकील जुटाने पड़े। वकीलों के इस निर्णय के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में विशेष कार्य बल द्वारा त्वरित कार्रवाई करते हुये वाराणसी में संकट मोचन मन्दिर में हुए आक्रमण के सम्बन्ध में इलाहाबाद के एक मदरसा शिक्षक को मास्टर माइण्ड के रूप में गिरफ्तार किया था। इस गिरफ्तारी के उपरान्त जामा मस्जिद के शाही इमाम ने तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार पर मुस्लिम उत्पीड़न का आरोप भी लगाया था। इस प्रचार के बाद भी उत्तर प्रदेश का मुसलमान आम तौर पर आतंकवादियों की गिरफ्तारी का विरोध करते हुये सड़कों पर नहीं उतरा और आतंकवादियों या उनके समर्थकों को मुसलमानों का उस मात्रा में सक्रिय सहयोग नहीं मिला जिस मात्रा में वे अपेक्षा कर रहे थे।  

इस परिस्थिति के कारण आतंकवादी संगठन कुछ मात्रा में अपनी जमीन खो रहे हैं और उनकी सारी शक्ति स्लीपर सेल के सहारे चल रही है जहाँ वे आम नागरिकों के बीच घुलमिलकर, राशन कार्ड बनवाकर, किराये पर मकान लेकर और यहाँ तक कि आम लोगों की भाँति रोजगार तक करते हुये आतंकवादी घटनाओं के लिये जमीन तैयार करते हैं और जिहाद की विचारधारा का प्रचार करते हुये आम मुसलमानों को बरगलाने का प्रयास करते हैं। आतंकवादियों को स्लीपर सेल बनाने में तो सहयोग मिल रहा है परन्तु बड़े पैमाने पर आतंकवादी घनाओं को अन्जाम देने के लिये मुस्लिम काडर उन्हें नहीं मिल रहा है। इस कारण अल-कायदा सहित जैश और लश्कर भारत के मुसलमानों से भी असन्तुष्ट है और समय-समय पर मालेगाँव और मक्का मस्जिद जैसी घटनायें घट रही हैं।  

उत्तर प्रदेश में तीन शहरों की अदालतों में घटी घटनाओं से स्पष्ट है कि आतंकवादियों को आतंकवादी मामलों में और अन्य आपराधिक मामलों में स्पष्ट विभाजन की वकीलों की मनोवृत्ति पच नहीं रही है। भारत की न्याय व्यवस्था जिस प्रकार की है उसे देखते हुये आतंकवादियों को पूरा विश्वास था कि वे इस व्यवस्था की तकनीकी कमजोरियों का फायदा उठा लेंगे और महानगरों की भाँति छोटे शहरों में भी उन्हें मोटी रकम देकर नामी वकील उनकी पैरवी के लिये मिल जायेंगे परन्तु पहले फैजाबाद और फिर लखनऊ के वकीलों ने आतंकवाद को सामान्य अपराध से पूरी तरह पृथक करते हुये आतंकवाद के प्रति कहीं अधिक संवेदना दिखाई और आतंकवादियों को सामान्य अपराधियों की श्रेणी से अलग रखते हुये पूरी तरह अक्षम्य अपराध माना। उत्तर प्रदेश में वकीलों के इस रूख ने आतंकवादियों को अपनी रणनीति बदलने को विवश किया।  

आतंकवादियों द्वारा इस प्रकार बदली गई रणनीति एक और चीज को स्पष्ट करती है कि आतंकवाद कोई कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है और यह एक विचारधारागत युद्ध की घोषणा है जिसे टक्कर तभी ली जा सकती है जब इस विचारधारा के मूल तत्वों और संचालक धारा की ओर ध्यान दिया जाये। इस विचारधारागत युद्ध के मूल में इस्लामवादी विचारधारा है जो संगठित धर्म का सहारा लेकर एक मजहबी राज्य की संस्थापना करना चाहता है जो पूरी तरह शरियत और कुरान की व्यवस्था पर आधारित हो। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये वे इस्लाम के कट्टरपंथी स्वरूप की व्याख्या करते हैं और गैर इस्लाम धर्मावलम्बियों के विरूद्ध जिहाद का आह्वान करते हैं।  

इस्लामवादियों ने आतंकवाद का सहारा लेकर देशों की व्यवस्था को चुनौती दी है और प्राय: सभी देशों में विस्फोटों, अपहरणों तथा अन्य आतंकी तरीकों के सहारे उनकी स्थापित नीतियों को इस्लामवाद के अनुरूप झुकाने का प्रयास किया है। भारत में 1999-2000 में विमान का अपहरण कर आतंकवादियों को छोड़ने के लिये सरकार को विवश किया और इसी प्रकार अनेक देशों में प्रमुख संस्थानों, परिवहनों पर आक्रमण कर पत्रकारों या सामान्य नागरिकों को अपह्रत कर उन्हें विदेश नीति सम्बन्धी निर्णयों को बदलने पर विवश किया। जैसे इन घटनाओं के बाद अनेक देशों ने इराक से अपनी सेनायें वापस बुला लीं।  

भारत में हुई विस्फोट की इन नवीनतम घटनाओं को इसी सन्दर्भ में देखने की आवश्यकता है। इसे आतंकवादियों की बदली हुई रणनीति के रूप में देखकर इससे निपटने की व्यापक रणनीति बनाने की आवश्यकता है। आतंकवादी हमारे समक्ष कुछ दिग्भ्रमित और बेरोजगार नौजवानों के रूप में नहीं आते वरन् एक विचारधारा की परम्परा लेकर आते हैं जो एक कुशल योद्धा की भाँति समय के अनुसार अपनी रणनीति बदलने में माहिर हैं। स्पष्ट है कि इस समस्या का समाधान तभी सम्भव है जब इसे विचारधारागत युद्ध मानकर शत्रु की पहचान की जाये और उसी अनुरूप रणनीति बनाई जाये।

Posted by: amitabhtri | January 13, 2007

असम नरसंहार

पिछले दिनों जब असम में उग्रवादी संगठनों ने हिन्दी भाषी लोगों को निशाना बनाया तो एक बार फिर एक साथ अनेक सवाल उठकर खड़े हो गये. पहला, इस बर्बर नरसंहार के लिये दोषी किसे ठहराया जाना चाहिये. उग्रवादी संगठन उल्फा को पाकिस्तानी खुफिया संगठन आई.एस.आई को या फिर स्वयं असम सरकार की लापरवाही को. 

    वैसे तो असम के मुख्यमन्त्री ने तत्काल इस नरसंहार की जिम्मेदारी आई.एस.आई पर डाल दी परन्तु क्या इससे मुख्यमन्त्री तरूण गोगोई का उत्तरदायित्व समाप्त हो जाता है. आखिर पिछले चुनावों में  उल्फा की सहायता लेकर और फिर बोडो अलगाववादी संगठन की पूर्ववर्ती शाखा के साथ सरकार बनाकर सेना के हाथ किसने बाँधे थे. कांग्रेस सरकार ने ऐसे बोडो सदस्यों को अपना भागीदार बनाया जिनके अभी भी भूमिगत उग्रवादियों से सम्बन्ध हैं. उल्फा के सहयोग की कीमत चुकाते हुये सरकार ने उल्फा के साथ युद्ध विराम की घोषणा कर दी और इस दौरान इस संगठन को स्वयं को सशक्त करने का अवसर प्राप्त हो गया. तत्काल लापरवाही के साथ-साथ कांग्रेस सरकार की बांग्लादेश घुसपैठ के सम्बन्ध में राष्ट्रीय सुरक्षा से अधिक मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने की नीति ने भी इस समस्या को बढ़ावा दिया है. 

   पिछले वर्ष कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर जब मेघालय में इस्कान मन्दिर में आतंकवादियों द्वारा बम विस्फोट किया गया तभी स्पष्ट हो गया था कि इस्लामी आतंकवादियों ने अपनी रणनीति बदल कर उत्तर पूर्व को अपना नया केन्द्र बनाकर स्थानीय उग्रवादी संगठनों के माध्यम से हमलों को अन्जाम देने का नया फार्मूला अपनाया है. यही नहीं तो जुलाई में मुम्बई में हुये बम विस्फोटों की जाँच कर रही आतंकवाद प्रतिरोध शाखा ने बांग्लादेश की सीमा से सटे पूर्वोत्तर क्षेत्र को इस्लामी आतंकवादियों का नया केन्द्र बताया था और त्रिपुरा से लेकर मेघालय तक अनेक मदरसों को संदेह के दायरे में रखा था. मुम्बई विस्फोटों के बाद अनेक आतंकवादियों को असम में कामाख्या मन्दिर पर आक्रमण के षड़यन्त्र में गिरफ्तार भी किया गया है. अभी कुछ महीनों पहले सिलीगुड़ी में हुये रेल विस्फोट की जाँच के दौरान पाया गया कि इस विस्फोट को बांग्लादेश स्थित जेहादी संगठन जमातुल मुजाहिदीन बांग्लादेश ने स्थानीय उग्रवादी संगठन कामतपुर लिबरेशन आर्गनाइजेशन की सहायता से कराया है. जमातुल मुजाहिदीन कट्टर जेहादी संगठन है जिसके अल-कायदा से सम्बन्ध हैं और इस संगठन ने उत्तरी बंगाल में अपनी घुसपैठ कर ली है और अपने प्रशिक्षण शिविर चला रहा है. 

   इन तथ्यों से एक बात पूरी स्पष्ट है कि आई.एस.आई पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठनों की सहायता से इस्लामी मिशन को पूरा कर रहा है. असम में हिन्दी भाषियों पर आक्रमण का सीधा उद्देश्य उन्हें असम से बाहर निकलने को विवश करना है ताकि यहाँ निर्बाध गति से बांग्लादेशी घुसपैठ हो सके और इन क्षेत्रों को बांग्लादेश से मिलाया जा सके. आखिर इस भयावह स्थिति के लिये उत्तरदायी कौन है, मुस्लिम वोटों के भिखारी राजनेता जो राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता करने में तनिक भी नहीं हिचकते.  

बांग्लादेश घुसपैठ के मामले में कांग्रेस का रवैया कितना ढुलमुल रहा है यह बताने की आवश्यकता नहीं है, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आई.एम.डी.टी अधिनियम समाप्त करने के बाद केन्द्र सरकार ने एक और अध्यादेश जारी कर उसे फिर से लागू करने का प्रयास किया सर्वोच्च न्यायालय ने उस अध्यादेश को भी असंवैधानिक घोषित कर दिया. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दो बार कहे जाने के बाद भी सरकार ने आज तक अवैध घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने का कोई प्रयास नहीं किया है. अभी इसी सप्ताह एक और जनहित याचिका की सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने फिर अवैध घुसपैठियों को देश से बाहर निकाले जाने के मामले में सरकार से प्रगति आख्या मंगाई है. 

   आखिर मुस्लिम वोटों की लालच में कब तक देश की सुरक्षा के साथ समझौता होता रहेगा, अच्छा होता राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय को सभी राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति से दूर रखकर इस सम्बन्ध में कड़े निर्णय सर्वानुमति से लेते.

Posted by: amitabhtri | January 5, 2007

हमारे तीर्थ

यदि हमसे कोई कहे कि हिन्दू होने के नाते आप अपनी किस बात पर गर्व कर सकते हैं तो शायद आज की हमारी पीढ़ी कुछ किताबी बातों के रटे-रटाये उत्तर दे देगी, यह बात मैं अपने पिछले लेख के क्रम में ही कह रहा हूँ. पिछले लेख में मैंने वैश्वीकरण में अन्तर्निहित बाजारवादी शक्ति के कथित दुष्प्रभावों का वर्णन किया था. वैश्वीकरण की इस बाजारवादी सोच का सीधा परिणाम किस प्रकार हमारी सांस्कृतिक सोच पर पड़ रहा है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण मैंने प्रयाग में अर्धकुम्भ में स्नान करते हुये सिसकती माँ गंगा के स्वरों में अनुभव किया. स्नान करते हुये प्रदूषित होती गंगा माँ को देखकर मुझे दुख भी हो रहा था और लज्जा भी आ रही थी.

आज यदि हमसे पूछा जाये कि हिन्दू संस्कृति में विलक्षण क्या है तो हमारा उत्तर होगा गंगा, गो, गीता और गायत्री हमें अपनी पहचान देती हैं, परन्तु इन सबकी रक्षा करने में हमारा योगदान कितना है. गंगा को प्रदूषित करने का कार्य कौन कर रहा है. कानपुर और आस-पास की टेनरीज. इस विषय को लेकर हिन्दुओं की जागरूकता देखने लायक है. सदियों से भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक रहा कुम्भ मेला कल को प्रदूषित हो रही गंगा के कारण समाप्त हो जायेगा उसी प्रकार जैसे कृष्ण की यमुना आज नाला बनकर रह गयी है या फिर उनकी लीलाभूमि ब्रज पत्थरों के लालची माफियाओं की भेंट चढ़ चुकी है. यह बताने की आवश्यकता नहीं कि जो जाति या समाज अपने इतिहास या महापुरूषों की रक्षा नहीं कर पाता वह अपनी पहचान भी खो देता है.

यह कोई पहला अवसर नहीं है जब हिन्दू तीर्थस्थानों को नष्ट करने के षड़यन्त्र होते रहे हैं और हिन्दू समाज आधुनिकता के नाम पर वाराणसी के शहर की गन्दगी गंगा में आने पर, कानपुर की गंदगी प्रयाग में आने पर, टिहरी पर बाँध बनाकर भागीरथी का प्रवाह रोकने पर मूक दर्शक बना तालियाँ पीटता रहा है. प्रयाग में गंगा माँ के साथ हो रहे अन्याय पर मेरी समझ में एक ही बात आ रही थी कि गंगा को प्रदूषित करना हो, उसके प्रवाह को अवरूद्ध करना हो यह सब शासकों की अश्रद्धा का परिणाम है. आज ताजमहल के आस-पास के पर्यावरण को लेकर सर्वोच्च न्यायालय से सरकारों की सक्रियता प्रश्न खड़ा करती है कि यह सक्रियता गंगा के सम्बन्ध में क्यों नहीं. यदि दिल्ली में राष्ट्रमण्डल खेलों के लिए आधारभूत ढाँचा खड़ा करने के लिये झुग्गियाँ और दुकानें हटायी जा सकती हैं तो गंगा माँ को प्रदूषित करने वाली फैक्ट्रियों को बन्द क्यों नहीं किया जा सकता. शायद इसलिये कि गंगा से शासकों को आर्थिक लाभ नहीं है या फिर उससे कोई मुगलकालीन प्रेम कथा नहीं जुड़ी है.

वैसे शासकों की मानसिकता तो समझी जा सकती है परन्तु अपने तीर्थों को लेकर हिन्दुओं की उदासीनता समझ से परे है. आज समस्त विश्व के हिन्दुओं को अदृश्य होकर भी सशक्त भाव से जोड़ने का कोई माध्यम हैं तो वे हमारे तीर्थ स्थल और मन्दिर है. जरा कल्पना करिये कि जब हिन्दुओं पर मुगल आततायियों का शासन था और हिन्दुओं को हिन्दू होने का जुर्माना भरना पड़ता था ऐसे विपरीत समय में भी हमारे पूर्वजों ने कुम्भ को सांस्कृतिक एकता का बड़ा माध्यम बनाये रखा, परन्तु आज जब हम स्वतन्त्र हैं तो उन्हीं सांस्कृतिक प्रतीकों को क्षरित होते देखकर भी तनिक व्यथित नहीं हैं. तीर्थ स्थानों के साथ भेदभाव, मन्दिरों को कुशल संचालन के नाम पर सरकार द्वारा अपने हाथों में लेकर उसकी राशि का उपयोग मस्जिदों, चर्चों और हज के लिये करने पर इसके भयानक दूरगामी परिणामों से हिन्दू बेपरवाह होकर ताल ठोंककर आयातित संस्कृति के स्वागत में तल्लीन हैं. यदि हमारे तीर्थ नहीं रहेंगे तो विशिष्ट सांस्कृतिक एकता भी नहीं रहेगी, हमारा विशिष्ट जीवन मूल्य नहीं रहेगा तो हमारी पहचान नहीं रहेगी और यदि हमारी परिभाषा, भाषा, संस्कार नहीं रहेगा तो विश्व में मानवता और विविधता नहीं रहेगी.

आज हिन्दुओं की सांस्कृतिक संवेदनहीनता का सबसे बड़ा कारण सेक्यूलरिज्म का एनेस्थीसिया है. हिन्दू समाज इसी सेक्यूलरिज्म के कारण सुन्न हो गया है और अब चाहे तीर्थ स्थल नष्ट हो , मन्दिर नष्ट हो या फिर पूरा हिन्दू धर्म ही चूल्हे में जाये उसे क्या फर्क पड़ता है उसे तो भौतिकतावाद के आगोश में पशुवत जीवन व्यतीत करना है जहाँ नौकरी, पत्नी, बच्चे, दो-तीन कमरे का फ्लैट, किश्त की चार पहिया की गाड़ी, टी.वी, फ्रिज, ए.सी और अन्य भौतिक सामानों के साथ सबेरे जलपान के समय घर के लान में बैठकर चाय की चुश्कियाँ लेते हुये व्यवस्था, समाज, धर्म और संस्कृति को कोसने का परम कर्तव्य निभाना है.

मैं गाँव के उन भोले-भाले अशिक्षित और अन्धविश्वासी भाइयों को इन तथाकथित आधुनिक शिक्षितों से श्रेष्ठ मानता हूँ जो अपने पूर्वजों की परम्पराओं पर अन्धश्रद्धा रखते हुये सांस्कृतिक और सामाजिक अनुशासन का पालन करते हुये हर वृक्ष और नदी को पूजा योग्य मानकर उसका संरक्षण करते हैं. अपनी अन्धश्रद्धा में ही वे प्रकृति और संस्कृति का कितना भला करते हैं.

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