हिंदू जागरण

हिंदू चेतना का स्वर

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प्रसंगवश

Posted by amitabhtri on अगस्त 14, 2006

कल  रविवार के दिन समाचार पत्र पढ़ते समय और फिर सायंकाल टेलीविजन देखते हुये कुछ पढ़ने और सुनने का अवसर मिला जिसके बाद मैं उन पर अपने विचार व्यक्त करने से स्वयं को रोक न सका.         प्रसिद्ध अंग्रेजी समाचार पत्र टाइम्स ऑफ इण्डिया में कांग्रेस के उदीयमान नेता सचिन पायलट     ने वर्तमान आतंकवाद की पृष्ठभूमि में बढ़ती धार्मिक कट्टरता पर विचार व्यक्त करते हुये एक लेख लिखा. इस लेख में उन्होंने जिहादी कट्टरता के लिये साम्प्रदायिकतावादियों को आड़े हाथों लिया. एक उदीयमान राजनेता को सत्य के सर्वाधिक निकट देखकर उत्साह हुआ कि आखिरकार आतंकवाद की सच्चाई से लोगों का सामना होने ही लगा, परन्तु इसके साथ ही उनकी एक टिप्पणी ऐसी भी थी जो स्वीकृत नहीं हो सकती. उन्होंने कहा कि कट्टरपंथी हिन्दू निर्दोष मुसलमानों की महिलाओं और बच्चो को इस कारण मारने से नहीं चूकते कि वे अल्लाह की पूजा करते हैं. यही वह टिप्पणी है जो आपत्तिजनक है.           सर्वप्रथम श्री सचिन पायलट की यह टिप्पणी उस मानसिकता की ओर संकेत करती है जिसमें मुस्लिम कट्टरपंथ को निशाना बनाते हुये उसी सांस में हिन्दू कट्टरपंथ की बात कर दी जाती है. प्रथम तो हिन्दू मूल रूप में उन्मादी या कट्टरपंथी नहीं हो सकता. यदि हिन्दू कट्टरपंथी होता भी है तो उन अर्थों में नहीं जैसे सेमेटिक धर्म होते हैं और अपनी उपासना पद्धति या अपने पैगम्बर को अन्तिम सत्य मानते हुये धर्मान्तरण का प्रयास करते हुये दूसरे धर्मों को हिंसक ढंग से समाप्त करने का प्रयास करते हैं. एक कट्टरपंथी हिन्दू अपने मूल सिद्धान्तों को लेकर कट्टर होता है जो सह-अस्तित्व, विश्व बन्धुत्व, प्रेम, सौहार्द और करूणा पर आधारित है. इन सिद्धान्तों का पालन प्रत्येक हिन्दू करता है, ऐसे में हिन्दुओं को कट्टर और नरम खेमे में बाँटकर हिन्दुत्व की गलत ब्याख्या करने का अधिकार किसी को नहीं है.           हिन्दू मूल रूप में और अपने संस्कारों के कारण कभी उपासना पद्धति के आधार पर भेदभाव कर ही नहीं सकता, इसलिये श्री पायलट का कहना कि कट्टरपंथी हिन्दुओं ने निर्दोष मुसलमानों को निशाना उनकी उपासना पद्धति के कारण बनाया सरासर गलत है.          सम्भवत: सचिन पायलट का इशारा गुजरात में हुई उस प्रतिक्रिया की ओर है जो गोधरा में कारसेवकों को जीवित जलाने के बाद सामने आई थी. गुजरात की सरकार के आंकड़ों ने भी स्पष्ट किया था कि गोधरा की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के 24 घण्टों बाद कई लाख लोग सड़कों पर उतर आये . यह एक समाज की वर्षों से पनप रही कुण्ठा का संगठित प्रकटीकरण था और इसका निशाना वह मानसिकता थी जो अपने ही देश में बहुसंख्यक हिन्दुओं को तीर्थयात्रा का दण्ड उन्हें जीवित जलाकर देती है. इस घटना के मनोवैज्ञानिक कारणों को समझने का प्रयास करना चाहिये न कि राजनीतिक नफा-नुकसान का आकलन करना चाहिये.          प्रात:काल इस समाचार पत्र को पढ़ने के बाद सायंकाल टेलीविजन पर आतंकवाद के विषय पर एक बहस देखने को मिली. इस बहस में पाकिस्तान के एक पत्रकार हामिद मीर भी टेलीफोन के द्वारा शामिल हुये. श्री मीर ने बताया कि लन्दन में असफल हुये आतंकवादी षड़यन्त्र को लेकर जनधारणा है कि यह सब अमेरिका और ब्रिटेन का खेल है ताकि लेबनान में हो रही घटनाओं से विश्व जनमानस का ध्यान बँटाया जा सके. यह एक और उदाहरण है कि किस प्रकार षड़यन्त्रकारी सिद्धान्तों को गढ़कर आतंकवाद की सच्चाई से मुँह फेरने की प्रवृत्ति उभर रही है. इसी टेलीविजन बहस के दौरान सरकार के एक मन्त्री मोहम्मद फातमी ने मुस्लिमों पर अत्याचार और पिछड़ेपन को आतंकवाद का कारण बताया.                   मैंने अपने पिछले लेखों में भी ऐसी आशंका प्रकट की थी कि मुस्लिम नेतृत्व और जनमत निर्माता आतंकवाद को मुस्लिमों  पर काल्पनिक अत्याचार की धारणा और उनके पिछड़ेपन को आतंकवाद से जोड़कर इसे न्यायसंगत ठहराकर मुस्लिम आतंकवादी संगठनों को सशक्त कर रहे हैं और आम मुसलमान को शासन तथा बहुसंख्यक समाज के प्रति सशंकित होने  लिये उकसा रहे हैं. खुले आम ऐसी बातों के प्रति मुस्लिम नेतृत्व के जोर देने से आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध में उनकी भूमिका भी सन्देह के दायरे से बाहर नहीं है.

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