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निष्पक्ष प्रश्न

Posted by amitabhtri on अगस्त 18, 2006

केरल के प्रसिद्ध शबरीमला मन्दिर में एक आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबन्ध की लम्बी परम्परा के विरूद्ध दिल्ली स्थित कुछ महिला अधिवक्ताओं द्वारा दायर की गई याचिका पर कार्रवाई करते हुये सर्वोच्च न्यायालय ने केरल सरकार को नोटिस जारी कर उससे जवाब माँगा है कि इस मन्दिर में स्त्रियों को प्रवेश क्यों न दिया जाये. इस नोटिस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये राज्य के देवासम विभाग के मन्त्री ने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार सुनिश्चित करेगी कि राज्य में कोई लैंगिक भेदभाव न हो.                                                     कुछ लोगों की दृष्टि में यह प्रगतिशील कदम है परन्तु इसकी निष्पक्षता को लेकर कुछ प्रश्न मस्तिष्क में उमड़ रहे हैं. आखिर जो वामपंथी महिला संगठन लोकतन्त्र के नाम पर एकमात्र हिन्दू मन्दिर में परम्परा के परिपालन में  महिलाओं के एक विशेष आयु वर्ग के प्रवेश पर प्रतिबन्ध को लेकर इतने व्यथित हैं उन्होंने मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश या इस्लाम की अन्य मान्यताओं में स्त्रियों के साथ भेदभाव को कभी मुद्दा क्यों नहीं बनाया. आज भी इस्लाम धर्म स्त्रियों को सामाजिक अशान्ति के प्रतीक के रूप में देखता है तभी अरबी में सामाजिक अशान्ति और स्त्री दोनों के लिये एक ही शब्द फितना प्रयोग में आता है.                      शाहबानो से लेकर आज तक सर्वोच्च न्यायालय या विभिन्न   न्यायालयों ने जितने भी प्रगतिशील निर्णय मुस्लिम स्त्रियों के सम्बन्ध में दिये उसका पालन कराने का दायित्व निभाने के स्थान पर राज्य ने उन्हें रद्दी की टोकरी में डाल दिया. हमारे समक्ष इमराना का उदाहरण है कि उसके साथ बलात्कार करने वाले श्वसुर को दण्ड देने के स्थान पर  इमराना से उलेमाओं ने कहा कि वह अपने पति को अपना पुत्र माने और अपने पति से उत्पन्न सन्तानों पर उसके पति का अधिकार नहीं है. ऐसा इस्लाम के कानून के आधार पर हुआ जिसमें स्त्री को इस कदर कामुक माना गया है कि उसके साथ स्वेच्छा या जबरन बनाये गये यौन सम्बन्ध में सदैव स्त्री की पहल ही मानी जाती है.                        अभी इसी वर्ष के आरम्भिक महीनों में उड़ीसा के एक मुस्लिम युगल को साथ रहने के लिये सर्वोच्च न्यायालय तक का दरवाजा खटखटाना पड़ा क्योंकि शेरू नामक इस मुस्लिम ने अपनी पत्नी नजमा बीबी को नशे की हालत में तलाक दे दिया प्रात: काल उसे पश्चाताप हुआ तो उन्होंने साथ रहने का निश्चय किया. स्थानीय उलेमाओं ने इसका विरोध किया क्योंकि शरियत या इस्लामी कानून के अनुसार तलाक के बाद फिर उसी व्यक्ति से विवाह के लिये स्त्री को हलाला से गुजरना होगा     अर्थात् दूसरे व्यक्ति से विवाह कर उससे सम्बन्ध स्थापित कर फिर उससे तलाक लेना होगा. उलेमाओं के इस निर्णय के कारण दोनों मुस्लिम युगल सर्वोच्च न्यायालय तक गये कि उन्हें साथ रहने दिया जाये. सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य को निर्देश दिया कि युगल की पूरी सुरक्षा की जाये. सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय पर उड़ीसा के मुस्लिम उलेमा संगठनों ने सर्वोच्च न्यायालय को चेतावनी दी कि तलाक जैसे मामलों में हस्तक्षेप का सर्वोच्च न्यायालय को अधिकार नहीं है. दुर्भाग्यवश लैंगिक भेदभाव का विरोध करने वाले प्रगतिशील संगठन  उस अवसर पर क्यों मौन रहे यह समझ से परे है.                   इन तथ्यों के प्रकाश में शबरीमला के विषय में दिखाई जा रही सक्रियता निष्पक्ष स्त्री अधिकार से अधिक हिन्दू संस्कृति को कटघरे में खड़ा करने की कवायद का हिस्सा अधिक दिखती है. मजदूरों के अधिकारों के नाम पर बाबा रामदेव के बहाने योग परम्परा पर प्रहार के षड़यन्त्र के असफल होने के बाद उन्हीं शक्तियों ने हिन्दू संस्कृति में स्त्री उपेक्षा के काल्पनिक विषय को फिर से चर्चा में लाने का बीड़ा उठाया है ताकि धर्मान्तरण में प्रवृत्त शक्तियों के खेल को आसान किया जा सके. आखिर तिरूमला पहाड़ियों में धर्मान्तरण के ऐसे घिनौने प्रास आरम्भ ही कर दिये गये हैं अब दक्षिण भारत के दूसरे सबसे बड़े श्रद्धा स्थल पर आक्रमण की तैयारी है.

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