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वन्देमातरम् पर आपत्ति

Posted by amitabhtri on अगस्त 23, 2006

एक बार फिर वन्देमातरम् विवादों में है. कारण वही पुरानी इस्लामी जिद कि हमारे लिये देश से बढ़कर धर्म है. हालिया विवाद का आरम्भ उस समय हुआ जब मानव संसाधन मन्त्रालय की ओर से एक शासनादेश जारी कर वन्देमातरम् की रचना के शताब्दी समारोहों को समस्त देश में मनाने के उद्देश्य से समस्त विद्यालयों को आदेशित किया गया कि 7 सितम्बर को उनके यहाँ वन्देमातरम् के दो प्रारम्भिक चरण अनिवार्य रूप से गवाये जायें. इस शासनादेश के जारी होते ही मुस्लिम संगठनों और उलेमाओं ने वन्देमातरम् को इस्लाम के विरूद्ध बताते हुये कहा कि इसे गाते समय उन्हें भारतमाता की आराधना करनी होगी जबकि उनका धर्म अल्लाह और रसूल के अतिरिक्त किसी अन्य की प्रशंसा या आराधना की अनुमति नहीं देता. वन्देमातरम् के अनिवार्य गायन पर आपत्ति करने वालों में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य जफरयाब जिलानी प्रमुख थे फिर उनका अनुसरण किया दिल्ली के शाही इमाम अहमद बुखारी ने. आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मुसलमानों का प्रतिनिधि संगठन है इसलिये उसके प्रतिनिधि द्वारा वन्देमातरम् न गाने की बात करने से यह स्पष्ट होता है कि आम मुसलमान इसी विचार का है. मुसलमानों द्वारा वन्देमातरम् गाने की अनिवार्यता पर आपत्ति उठाये जाते ही मानव संसाधन मन्त्री ने कहा कि इसे गाना अनिवार्य नहीं है. अब सवाल यह है कि क्या देशभक्ति या राष्ट्रीय कर्तव्य से जुड़े प्रश्नों का निर्धारण भी वोट बैंक को ध्यान में रखकर किया जायेगा. आखिर किस स्तर तक इस देश में इस्लामी हठधर्मिता स्वीकार की जायेगी. वैसे वन्देमातरम् को इस्लामी हठधर्मिता के समस्त नतमस्तक कराने का श्रेय भी कांग्रेस और उसके दो महापुरूषों महात्मा गाँधी और जवाहर लाल नेहरू को ही जाता है. 1923 में काग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन में जब मुस्लिम प्रतिनिधियों ने इसे इस्लाम विरोधी बताकर इसे न बजाने की माँग की और सम्मेलन से बाहर आकर कान में अंगुली डालकर खड़े हो गये तो भी कांग्रेस ने इस विभाजनकारी विषाक्त मानसिकता के मनोविज्ञान को पहचानने के स्थान पर उसे प्रश्रय ही दिया. आज एक बार पुन: कांग्रेस वही भूल दुहराने जा रही है और राष्ट्र में ही एक और उपराष्ट्र निर्मित करने वाले तत्वों के समस्त नतमस्तक हो रही है. वन्देमातरम् न गाने का हठधर्मितापूर्ण निर्णय भारत के मुसलमानों और उनके जनमत निर्माताओं को कटघरे में खड़ा करता है जो आधे-अधूरे मन से राष्ट्रभक्ति की कसमें खाते हैं. इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में उस सम्मेलन की चर्चा करना भी समीचीन प्रतीत हो रहा है जो 20 और 21 सितम्बर को संसद भवन में जमायत-उलेमा-हिन्द की पहल पर आतंकवाद के विषय पर आयोजित की गई थी. इस सम्मेलन में देश के अनेक प्रमुख उलेमा आये थे. सम्मेलन में सरकार की ओर से पहले दिन सूचना प्रसारण मन्त्री और दूसरे दिन गृहमन्त्री और स्वयं प्रधानमन्त्री ने भाग लिया. इस सम्मेलन में दर्शक के रूप में उपस्थित रहे लोगों के अनुसार दोनों ही दिन मुस्लिम प्रतिनिधियों की बात से ऐसा नहीं लगा कि वे इस्लामी आतंकवाद का प्रतिरोध करने के प्रति गम्भीर हैं. पहले दिन उनका सारा जोर मीडिया को कोसने में लगा और कुछ प्रतिनिधियों ने तो मीडिया को अमेरिका और इजरायल का जासूस और दलाल की संज्ञा दे डाली. इन प्रतिनिधियों के अनुसार मीडिया मुसलमानों को बदनाम कर रहा है. प्रतिनिधियों ने सूचना प्रसारण मन्त्री से आग्रह किया कि मीडिया पर अंकुश लगाया जाये क्योंकि वे मदरसों और मस्जिदों को आतंकवाद का केन्द्र बता रहे हैं. इस पूरी बहस में आतंकवाद की धार्मिक प्रेरणा, उसके समाधान को लेकर कोई पहल मुस्लिम उलेमाओं की ओर से नहीं हुई. केवल प्रलाप हुआ कि मुसलमानों का उत्पीड़न हो रहा है , उनकी छवि खराब की जा रही है. सम्मेलन के दूसरे दिन वही घिसा-पिटा प्रस्ताव कि इस्लाम में हिंसा के लिये कोई स्थान नहीं है और सभी उपस्थित प्रतिनिधि आतंकवादी कृत्य की निन्दा करते हैं. अच्छा होता इन कर्मकाण्डी प्रस्तावों से परे कुछ ऐसा ठोस और दीर्घगामी कदम ये लोग उठाते जो इनकी ईमानदारी को पुष्ट करता. आखिर आज तक दुनिया के किसी भी कोने में आतंकवाद के विरूद्ध मुसलमानों की वैसी रैली क्यों नहीं आयोजित हो सकी जैसी पैगम्बर के कार्टून के प्रकाशित होने पर या अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत आगमन पर हुई थी. आखिर यही उलेमा मुस्लिम जनमानस को आतंकवाद के विरूद्ध आन्दोलित करने मे क्यों असफल हैं या तो मुसलमान इस सम्बन्ध में उनसे सहमत नहीं है या फिर उलेमा स्वयं आतंकवादियों से असहमत नहीं हैं. आखिर जिस देश में मुसलमान विशेषाधिकारों से पुरस्कृत है. जिसे देश का कानून या राष्ट्रीय कर्तव्य पालन न करने की स्वतन्त्रता है उसका उत्पीड़न कहाँ हो रहा है , हाँ इतना अवश्य है कि समाज के सभी क्षेत्रों पर दबाव बनाकर वह अपने इस्लामी एजेण्डे को गतिशील और प्रभावी बनाता जा रहा है. इसका नवीनतम उदाहरण तसलीमा नसरीन का वह वक्तव्य है जो उन्होंने केरल में एक पुस्तक विमोचन के अवसर पर दिया है और इस्लाम की वास्तविकता से समाज को परिचित कराया है.आज आवश्यकता इसी बात की है कि तुलनात्मक धर्मों के अध्ययन की परम्परा विकसित होनी चाहिये इस्लाम के उद्देश्य और उसकी कलाबाजियों से हम परिचित हो सकें.

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