हिंदू जागरण

हिंदू चेतना का स्वर

Archive for अगस्त, 2006

एक और हमला

Posted by amitabhtri on अगस्त 17, 2006

कल जब सारा देश कृष्ण जन्माष्टमी के उल्लास के डूबा हुआ था तो सुदूर पूर्वोत्तर में आतंकवादी हिन्दुओं के विरूद्ध अपने अभियान को गतिमान करते हुये श्रद्धालुओं पर बम से आकमण कर रहे थे.            स्वतन्त्रता दिवस से ही मैं भी शेष देशवासियों की भाँति सांसे थामे हर पल के घटनाविहीन व्यतीत होने की प्रतीक्षा कर रहा था. परन्तु कृष्ण जन्माष्टमी का दिन इतना सौभाग्यशाली न रह सका और दिन बीतते-बीतते हिन्दू मन्दिर पर आतंकवादी आक्रमण का समाचार आ ही गया.     मणिपुर की राजधानी इम्फाल में हवाई अड्डे के निकट पश्चिमी जिले में तुलीहल नामक स्थान पर स्थित राज्य के सबसे बड़े इस्कान मन्दिर पर हुये बम धमाके में पाँच लोगों की घटास्थल पर ही मृत्यु हो गई जब कि 50 लोगों को घायलावस्था में अस्पताल पहुँचाया गया जिनमें एक दर्जन लोगों की हालत अत्यन्त गम्भीर बताई जा रही है.         इस आतंकवादी आक्रमण की जिम्मेदारी किसी भी संगठन ने नहीं ली है और राज्य के पुलिस अधिकारी किसी भी आशंका के सम्बन्ध में कुछ नहीं बोल रहे हैं.                परन्तु इस आक्रमण के स्वरूप के आधार पर कुछ निष्कर्ष अवश्य निकाले जा सकते हैं. यह आक्रमण मणिपुर के उस क्षेत्र में हुआ है जो वैष्णव मतावलम्बी मीती समुदाय का क्षेत्र है और यहाँ यह समुदाय पूर्वोत्तर अलगाववादियों के निशाने पर सदैव रहा है, अत: इस सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि स्थानीय उग्रवादियों और जिहादी संगठनों ने आपस में हाथ मिला लिया है. इस बात की आशंका काफी समय से खुफिया एजेन्सियों को रही है कि पूर्वोत्तर के विभिन्न उग्रवादी संगठन इस्लामी संगठनों के साथ मिलकर आतंकवाद को एक नया आयाम प्रदान कर सकते हैं.     पूर्वोत्तर राज्यों में स्थित प्रमुख हिन्दू श्रद्धा केन्द्र इस्लामी आतंकवादियों के निशाने पर हैं जिसकी पुष्टि उस समय हुई जब मुम्बई धमाकों के बाद असम में प्रसिद्ध कामाख्या मन्दिर का दौरा करने वाले मुस्लिम कट्टरपंथियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया जो छद्म हिन्दू नाम से इस मन्दिर का एकाधिक बार दौरा कर चुके थे.        इस्लामी आतंकवादियों द्वारा पूर्वोत्तर को भी अपने केन्द्र के रूप में विकसित करने की योजना का रहस्योद्घाटन भी मुम्बई विस्फोटों के बाद तब हुआ था जब गुजरात से लेकर कोलकाता तक कई मदरसों और तबलीग जमात के कार्यकर्ता विस्फोटों के तत्काल बाद मेघालय चले गये थे और पुलिस ने उन्हें  पूछताछ के लिये हिरासत में लिया  था. वास्तव में बांग्लादेश के साथ पूर्वोत्तर की सीमा से निकटता इन इस्लामी आतंकवादियों के लिये वरदान सिद्ध हो रही है.            इम्फाल में हुय़े इस नवीनतम आक्रमण को पूरी गम्भीरता से लेने की आवश्यकता है जो हिन्दुओं के विरूद्ध चलाये जा रहे इस्लामी जिहाद का ही एक भाग है.            कल इस आक्रमण का समाचार आने पर सर्वाधिक निराशा हमारे टेलीविजन चैनलों की प्रतिक्रया पर हुई.आम तौर पर जनता को जबरन अपनी चीजें परोसने के आदी चैनल अपनी इसी प्रवृत्ति में संलग्न रहे और श्रीलंका में हो रही त्रिकोणीय  क्रिकेट श्रृंखला से  दक्षिण अफ्रीका की वापसी उनके लिये इम्फाल विस्फोट से अधिक महत्व का विषय रहा. इसके साथ ही आतंकवादी होने की अफवाह मात्र के आधार पर लन्दन से अमेरिका जा रहे विमान को आपात स्थिति में बोस्टन उतारे जाने को चैनल ब्रेकिंग न्यूज मान रहे थे और इम्फाल विस्फोट के सच को छुपाकर सच से मुँह चुरा रहे थे.          इससे यही प्रतीत होता है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिये औपनिवेशिक खेल की चमक और यूरोप की दहशत अपने देश के निर्दोष लोगों के जीवन से बढ़कर है. यदि इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कृष्ण मन्दिर में हुये विस्फोट के सच को जानबूझकर छुपाया तो अपने पत्रकारिता धर्म के साथ छल किया और यदि क्रिकेट के समाचार को इम्फाल विस्फोट से अधिक महत्वपूर्ण समझा तो यह उसकी संवेदनहीनता का परिचायक है.

Posted in Uncategorized | 2 Comments »

मन्थन

Posted by amitabhtri on अगस्त 16, 2006

देश के एक प्रमुख निजी अंग्रेजी चैनल ने स्वतन्त्रता दिवस के आस-पास देश के जन मानस की दशा और दिशा भाँपने के लिये अनेक बिषयों पर एक व्यापक सर्वेक्षण किया. सर्वेक्षण में अनेक राजनीतिक और सामाजिक बिषयों को स्पर्श किया गया परन्तु हमारी चर्चा का आधार वह सर्वेक्षण परिणाम है जिसमें देश के 35 प्रतिशत लोग आतंकवाद के लिये सीधे-सीधे मुसलमानों को उत्तरदायी मानते हैं और इनमें भी ऐसा मानने वाले हिन्दुओं का प्रतिशत 47 प्रतिशत है.    इस सर्वेक्षण के साथ ही साथ मुम्बई धमाकों के बाद अनेक टेलीविजन चैनलों पर हुई बहस तथा विभिन्न समाचार पत्रों में छपे गम्भीर लेखों के आधार पर मैं यही निष्कर्ष निकालने पर विवश हुआ हूँ कि अब भी इस्लामी आतंकवाद के स्वरूप और उसके स्वभाव को लेकर राजनीतिक नेतृत्व और सामान्य जनता की सोच में व्यापक अन्तर है.            भारत सहित विश्व के अनेक हिस्सों में होने वाली आतंकवादी घटनाओं में मुस्लिम समुदाय की सक्रिय भागीदारी के बाद अब यह रहस्य किसी से छुप नहीं सा है कि यह धार्मिक आतंकवाद है. इस नग्न सत्य के अनावृत होने के बाद आतंकवाद को धर्म से पूरी तरह पृथक कर मात्र कानून व्यवस्था की समस्या के तौर पर आंकना वास्तव में वास्तविकता से भागने जैसा है. इस शुतुरमुर्गी रवैये के घातक परिणाम हो सकते हैं.          पहला हिन्दू और मुसलमानों के मध्य अविश्वास की खाईं और भी बढ़ती जायेगी और मुसलमानों के मध्य वह छोटा सा वर्ग जो इस आतंकवाद को लेकर विचलित है वह भी सन्देह के दायरे में आ जायेगा और इस्लाम में सुधार की किसी भी प्रक्रिया का आरम्भ असम्भव हो जायेगा. दूसरा जिस प्रकार बार-बार विभिन्न दलों के नेता कुछ घटनाओं को भारत में  इस्लाम और मुसलमानों पर अत्याचार के रूप में चित्रित कर आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराने की चेष्टा कर रहे हैं उससे मुस्लिम कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलेगा और हिन्दुओं में हताशा और कुण्ठा का भाव व्याप्त होगा.          अमेरिका में 2001 की घटना के बाद उस देश पर एक भी आतंकवादी आक्रमण नहीं हुआ ऐसा ही स्पेन और लन्दन के साथ भी हुआ. इन देशों ने आतंकवादी घटनाओं के पश्चात उसमें निहित धार्मिक भाव को पहचान कर उस पर बहस आरम्भ की और आतंकवाद प्रतिरोधी योजनायें बनाते समय इसके पीछे छुपी मानसिकता और प्रेरणा को समझकर उस पर प्रहार करने की आवश्यकता भी अनुभव की , परन्तु इसके विपरीत भारत में अब भी आतंकवाद की विचारधारा और प्रेरणा पर व्यापक बहस करने के स्थान पर काल्पनिक अत्याचार की धारणा का पोषण किया जा रहा है.          भारत एक लोकतान्त्रिक देश है जिसने समाज के प्रत्येक वर्ग को समान अवसर और विकास की संवैधानिक गारण्टी है और इस सिद्धान्त को व्यावहारिक स्वरूप देने के लिये इन छह दशकों में पूरे प्रयास भी किये गये हैं. इन छह दशकों के बाद अचानक मुसलमानों के पिछड़ेपन को आधार बनाकर आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराना कहाँ तक उचित है. इसी प्रकार देश की विदेश नीति के सम्बन्ध में लिये गये निर्णयों को मुसलमानों की भावना से जोड़कर उन्हें आतंकवाद के बढ़ने का कारण बताना आतंकवाद के वैश्विक और विचारधारागत स्वरूप को स्वीकार करने जैसा है.        निजी टेलीविजन चैनल द्वारा किये गये इस सर्वेक्षण से पूर्व लेबनान-इजरायल संघर्ष में भी देश के बहुसंख्य जनमानस की सोच और राजनीतिक नेतृत्व के मध्य सोच का अन्तर स्पष्ट तौर पर देखने को मिला था जब एक ओर सरकार ने संसद से लेकर अन्तरराष्ट्रीय मंचों तक पर लेबनान पर हमले के लिये इजरायल की निन्दा की जबकि मुम्बई विस्फोटों की पृष्ठभूमि में देश का बहुसंख्यक समाज इजरायल के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित कर रहा था. देश के बहुसंख्यक समाज के मानस को पढ़ न पाने या पढ़ न पाने का यह ढोंग काफी मंहगा साबित हो सकता है क्योंकि इससे पूर्व हम देख चुके हैं कि गुजरात में गोधरा में कारसेवकों पर हुये आक्रमण की विभीषिका और हिन्दुओं के मानस पर होने वाले उसके प्रभाव क अध्ययन करने में भी तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व पूरी तरह असफल रहा था और उसी असफलता का परिणाम हिन्दुओं की प्रतिक्रया के रूप में सामने आया. एक बार फिर राजनीतिक नेतृत्व पलायनवादी दृष्टिकोण अपनाकर  वास्तविकता से भागकर इस्लामी आतंकवाद का समाधान गहराई में जाकर खोजने के स्थान पर लोगों को दिग्भ्रमित कर उनके आक्रोश को हवा दे रहा है.           इस्लामी आतंकवाद पर रोक लगाने के लिये आवश्यक है कि मुस्लिमों पर  अत्याचार की काल्पनिक धारणा के झूठे प्रचार पर अंकुश लगाया जाये क्योंकि इस अनर्गल प्रचार ने ही पढ़े-लिखे  और समृद्ध मुसलमानों को इस्लाम की रक्षा के लिये जिहाद की ओर प्रवृत्त होने को प्रेरित  किया है.  

Posted in Uncategorized | 3 Comments »

मन्थन

Posted by amitabhtri on अगस्त 16, 2006

देश के एक प्रमुख निजी अंग्रेजी चैनल ने स्वतन्त्रता दिवस के आस-पास देश के जन मानस की दशा और दिशा भाँपने के लिये अनेक बिषयों पर एक व्यापक सर्वेक्षण किया. सर्वेक्षण में अनेक राजनीतिक और सामाजिक बिषयों को स्पर्श किया गया परन्तु हमारी चर्चा का आधार वह सर्वेक्षण परिणाम है जिसमें देश के 35 प्रतिशत लोग आतंकवाद के लिये सीधे-सीधे मुसलमानों को उत्तरदायी मानते हैं और इनमें भी ऐसा मानने वाले हिन्दुओं का प्रतिशत 47 प्रतिशत है.           इस सर्वेक्षण के साथ ही साथ मुम्बई धमाकों के बाद अनेक टेलीविजन चैनलों पर हुई बहस तथा विभिन्न समाचार पत्रों में छपे गम्भीर लेखों के आधार पर मैं यही निष्कर्ष निकालने पर विवश हुआ हूँ कि अब भी इस्लामी आतंकवाद के स्वरूप और उसके स्वभाव को लेकर राजनीतिक नेतृत्व और सामान्य जनता की सोच में व्यापक अन्तर है.            भारत सहित विश्व के अनेक हिस्सों में होने वाली आतंकवादी घटनाओं में मुस्लिम समुदाय की सक्रिय भागीदारी के बाद अब यह रहस्य किसी से छुप नहीं सा है कि यह धार्मिक आतंकवाद है. इस नग्न सत्य के अनावृत होने के बाद आतंकवाद को धर्म से पूरी तरह पृथक कर मात्र कानून व्यवस्था की समस्या के तौर पर आंकना वास्तव में वास्तविकता से भागने जैसा है. इस शुतुरमुर्गी रवैये के घातक परिणाम हो सकते हैं.               पहला हिन्दू और मुसलमानों के मध्य अविश्वास की खाईं और भी बढ़ती जायेगी और मुसलमानों के मध्य वह छोटा सा वर्ग जो इस आतंकवाद को लेकर विचलित है वह भी सन्देह के दायरे में आ जायेगा और इस्लाम में सुधार की किसी भी प्रक्रिया का आरम्भ असम्भव हो जायेगा. दूसरा जिस प्रकार बार-बार विभिन्न दलों के नेता कुछ घटनाओं को भारत में  इस्लाम और मुसलमानों पर अत्याचार के रूप में चित्रित कर आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराने की चेष्टा कर रहे हैं उससे मुस्लिम कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलेगा और हिन्दुओं में हताशा और कुण्ठा का भाव व्याप्त होगा.            अमेरिका में 2001 की घटना के बाद उस देश पर एक भी आतंकवादी आक्रमण नहीं हुआ ऐसा ही स्पेन और लन्दन के साथ भी हुआ. इन देशों ने आतंकवादी घटनाओं के पश्चात उसमें निहित धार्मिक भाव को पहचान कर उस पर बहस आरम्भ की और आतंकवाद प्रतिरोधी योजनायें बनाते समय इसके पीछे छुपी मानसिकता और प्रेरणा को समझकर उस पर प्रहार करने की आवश्यकता भी अनुभव की , परन्तु इसके विपरीत भारत में अब भी आतंकवाद की विचारधारा और प्रेरणा पर व्यापक बहस करने के स्थान पर काल्पनिक अत्याचार की धारणा का पोषण किया जा रहा है.               भारत एक लोकतान्त्रिक देश है जिसने समाज के प्रत्येक वर्ग को समान अवसर और विकास की संवैधानिक गारण्टी है और इस सिद्धान्त को व्यावहारिक स्वरूप देने के लिये इन छह दशकों में पूरे प्रयास भी किये गये हैं. इन छह दशकों के बाद अचानक मुसलमानों के पिछड़ेपन को आधार बनाकर आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराना कहाँ तक उचित है. इसी प्रकार देश की विदेश नीति के सम्बन्ध में लिये गये निर्णयों को मुसलमानों की भावना से जोड़कर उन्हें आतंकवाद के बढ़ने का कारण बताना आतंकवाद के वैश्विक और विचारधारागत स्वरूप को स्वीकार करने जैसा है.             निजी टेलीविजन चैनल द्वारा किये गये इस सर्वेक्षण से पूर्व लेबनान-इजरायल संघर्ष में भी देश के बहुसंख्य जनमानस की सोच और राजनीतिक नेतृत्व के मध्य सोच का अन्तर स्पष्ट तौर पर देखने को मिला था जब एक ओर सरकार ने संसद से लेकर अन्तरराष्ट्रीय मंचों तक पर लेबनान पर हमले के लिये इजरायल की निन्दा की जबकि मुम्बई विस्फोटों की पृष्ठभूमि में देश का बहुसंख्यक समाज इजरायल के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित कर रहा था. देश के बहुसंख्यक समाज के मानस को पढ़ न पाने या पढ़ न पाने का यह ढोंग काफी मंहगा साबित हो सकता है क्योंकि इससे पूर्व हम देख चुके हैं कि गुजरात में गोधरा में कारसेवकों पर हुये आक्रमण की विभीषिका और हिन्दुओं के मानस पर होने वाले उसके प्रभाव क अध्ययन करने में भी तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व पूरी तरह असफल रहा था और उसी असफलता का परिणाम हिन्दुओं की प्रतिक्रया के रूप में सामने आया. एक बार फिर राजनीतिक नेतृत्व पलायनवादी दृष्टिकोण अपनाकर  वास्तविकता से भागकर इस्लामी आतंकवाद का समाधान गहराई में जाकर खोजने के स्थान पर लोगों को दिग्भ्रमित कर उनके आक्रोश को हवा दे रहा है.             इस्लामी आतंकवाद पर रोक लगाने के लिये आवश्यक है कि मुस्लिमों पर  अत्याचार की काल्पनिक धारणा के झूठे प्रचार पर अंकुश लगाया जाये क्योंकि इस अनर्गल प्रचार ने ही पढ़े-लिखे  और समृद्ध मुसलमानों को इस्लाम की रक्षा के लिये जिहाद की ओर प्रवृत्त होने को प्रेरित  किया है.  

Posted in Uncategorized | Leave a Comment »

प्रसंगवश

Posted by amitabhtri on अगस्त 14, 2006

कल  रविवार के दिन समाचार पत्र पढ़ते समय और फिर सायंकाल टेलीविजन देखते हुये कुछ पढ़ने और सुनने का अवसर मिला जिसके बाद मैं उन पर अपने विचार व्यक्त करने से स्वयं को रोक न सका.         प्रसिद्ध अंग्रेजी समाचार पत्र टाइम्स ऑफ इण्डिया में कांग्रेस के उदीयमान नेता सचिन पायलट     ने वर्तमान आतंकवाद की पृष्ठभूमि में बढ़ती धार्मिक कट्टरता पर विचार व्यक्त करते हुये एक लेख लिखा. इस लेख में उन्होंने जिहादी कट्टरता के लिये साम्प्रदायिकतावादियों को आड़े हाथों लिया. एक उदीयमान राजनेता को सत्य के सर्वाधिक निकट देखकर उत्साह हुआ कि आखिरकार आतंकवाद की सच्चाई से लोगों का सामना होने ही लगा, परन्तु इसके साथ ही उनकी एक टिप्पणी ऐसी भी थी जो स्वीकृत नहीं हो सकती. उन्होंने कहा कि कट्टरपंथी हिन्दू निर्दोष मुसलमानों की महिलाओं और बच्चो को इस कारण मारने से नहीं चूकते कि वे अल्लाह की पूजा करते हैं. यही वह टिप्पणी है जो आपत्तिजनक है.           सर्वप्रथम श्री सचिन पायलट की यह टिप्पणी उस मानसिकता की ओर संकेत करती है जिसमें मुस्लिम कट्टरपंथ को निशाना बनाते हुये उसी सांस में हिन्दू कट्टरपंथ की बात कर दी जाती है. प्रथम तो हिन्दू मूल रूप में उन्मादी या कट्टरपंथी नहीं हो सकता. यदि हिन्दू कट्टरपंथी होता भी है तो उन अर्थों में नहीं जैसे सेमेटिक धर्म होते हैं और अपनी उपासना पद्धति या अपने पैगम्बर को अन्तिम सत्य मानते हुये धर्मान्तरण का प्रयास करते हुये दूसरे धर्मों को हिंसक ढंग से समाप्त करने का प्रयास करते हैं. एक कट्टरपंथी हिन्दू अपने मूल सिद्धान्तों को लेकर कट्टर होता है जो सह-अस्तित्व, विश्व बन्धुत्व, प्रेम, सौहार्द और करूणा पर आधारित है. इन सिद्धान्तों का पालन प्रत्येक हिन्दू करता है, ऐसे में हिन्दुओं को कट्टर और नरम खेमे में बाँटकर हिन्दुत्व की गलत ब्याख्या करने का अधिकार किसी को नहीं है.           हिन्दू मूल रूप में और अपने संस्कारों के कारण कभी उपासना पद्धति के आधार पर भेदभाव कर ही नहीं सकता, इसलिये श्री पायलट का कहना कि कट्टरपंथी हिन्दुओं ने निर्दोष मुसलमानों को निशाना उनकी उपासना पद्धति के कारण बनाया सरासर गलत है.          सम्भवत: सचिन पायलट का इशारा गुजरात में हुई उस प्रतिक्रिया की ओर है जो गोधरा में कारसेवकों को जीवित जलाने के बाद सामने आई थी. गुजरात की सरकार के आंकड़ों ने भी स्पष्ट किया था कि गोधरा की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के 24 घण्टों बाद कई लाख लोग सड़कों पर उतर आये . यह एक समाज की वर्षों से पनप रही कुण्ठा का संगठित प्रकटीकरण था और इसका निशाना वह मानसिकता थी जो अपने ही देश में बहुसंख्यक हिन्दुओं को तीर्थयात्रा का दण्ड उन्हें जीवित जलाकर देती है. इस घटना के मनोवैज्ञानिक कारणों को समझने का प्रयास करना चाहिये न कि राजनीतिक नफा-नुकसान का आकलन करना चाहिये.          प्रात:काल इस समाचार पत्र को पढ़ने के बाद सायंकाल टेलीविजन पर आतंकवाद के विषय पर एक बहस देखने को मिली. इस बहस में पाकिस्तान के एक पत्रकार हामिद मीर भी टेलीफोन के द्वारा शामिल हुये. श्री मीर ने बताया कि लन्दन में असफल हुये आतंकवादी षड़यन्त्र को लेकर जनधारणा है कि यह सब अमेरिका और ब्रिटेन का खेल है ताकि लेबनान में हो रही घटनाओं से विश्व जनमानस का ध्यान बँटाया जा सके. यह एक और उदाहरण है कि किस प्रकार षड़यन्त्रकारी सिद्धान्तों को गढ़कर आतंकवाद की सच्चाई से मुँह फेरने की प्रवृत्ति उभर रही है. इसी टेलीविजन बहस के दौरान सरकार के एक मन्त्री मोहम्मद फातमी ने मुस्लिमों पर अत्याचार और पिछड़ेपन को आतंकवाद का कारण बताया.                   मैंने अपने पिछले लेखों में भी ऐसी आशंका प्रकट की थी कि मुस्लिम नेतृत्व और जनमत निर्माता आतंकवाद को मुस्लिमों  पर काल्पनिक अत्याचार की धारणा और उनके पिछड़ेपन को आतंकवाद से जोड़कर इसे न्यायसंगत ठहराकर मुस्लिम आतंकवादी संगठनों को सशक्त कर रहे हैं और आम मुसलमान को शासन तथा बहुसंख्यक समाज के प्रति सशंकित होने  लिये उकसा रहे हैं. खुले आम ऐसी बातों के प्रति मुस्लिम नेतृत्व के जोर देने से आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध में उनकी भूमिका भी सन्देह के दायरे से बाहर नहीं है.

Posted in Uncategorized | 4 Comments »

इस्लामी आतंकवाद और आम मुसलमान

Posted by amitabhtri on अगस्त 12, 2006

 इस्लामी आतंकवाद के इस युग में आम मुसलमानों की स्थिति का अध्ययन अपने आप में एक रोचक विषय है. काफी दिनों से मेरी यह इच्छा थी कि भारत के सामान्य मुसलमानों की इस समस्या पर राय जानने का अवसर मिले. कल मेरी यह इच्छा स्वत: पूर्ण हो गई जब मेरे घर में इन दिनों लकड़ी का काम रहे एक बढ़ई ने स्वयं इस बिषय पर चर्चा आरम्भ कर दी.  प्यारे मियाँ नाम का यह बढ़ई मुसलमान है और मेरे बारे में इतना जानता है कि मैं कुछ लिखने-पढ़ने का काम करता हूँ. कल काम करते-करते उसने टेलीविजन पर समाचार सुना कि भारत में आने वाले दिनों में कुछ आतंकवादी हमले हो सकते हैं. इस समाचार के बाद उसने बातचीत आरम्भ की.  उसकी बातचीत में दो-तीन बातें मोटे तौर पर निकल कर सामने आईं. उसका कहना था कि ये उग्रवादी अत्यन्त सुविधा सम्पन्न और शातिर हैं और पुलिस इन तक तो पहुँच नहीं पाती बेगुनाह मुसलमानों को अपना निशाना बनाती है. इस सम्बन्ध में उसने लाल किले पर हुये आतंकवादी हमले का उदाहरण देते हुये कहा कि इसके असली आरोपियों को तो काफी बाद में पकड़ा गया उससे पहले पुलिस ने रमजान महीने में एक निर्दोष मुसलमान को इन काउन्टर में आतंकवादी बताकर मार गिराया.    इसके बाद प्यारे मियाँ ने मुसलमानों को सन्देह की दृष्टि से देखे जाने का मुद्दा उठाया. उनका कहना था कि आज हर दाढ़ी वाले पर शक किया जा रहा है.   अन्त में प्यारे मियाँ ने मुझसे ही पूछा आखिर आतंकवादी ये हमले क्यों कर रहे हैं. मेरा उत्तर था कि इन आतंकवादियों की भाषा में वे इस्लाम की लड़ाई लड़ रहे हैं और मुसलमानों पर दुनिया भर में हो रहे अत्याचार का बदला ले रहे हैं. इस पर उस एक सामान्य मुसलमान का जिसने अपने धर्म के पालन में लड़कियों को पढ़ाया नहीं और जो दिन भर मजदूरी कर अपना पेट पालता है जो उत्तर था वह चौंकाने वाला था. इस उत्तर पर उन लोंगो को विशेष ध्यान देना चाहिये जो मानते हैं कि आम मुसलमान इस अन्तरराष्ट्रीय मुस्लिम राजनीति से नहीं जुड़ा है. प्यारे मियाँ ने कहा कि जिस तरह ईराक और लेबनान में इजरायल और अमेरिका निर्दोष मुसलमानों को रोज मार रहे हैं उससे तो आतंकवादी ही पैदा होंगे. आखिर दुनिया ऐसे काम क्यों नहीं रूकवाती जिस दिन ये रूक गया आतंकवाद भी रूक जायेगा.     प्यारे मियाँ की इस पूरी बातचीत से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि दुनिया भर के मुसलमानों की सोच एक है और उनके जनमत निर्माता और उनकी जागरूकता के केन्द्र मौलवी और जुमा की सामूहिक नमाज उन्हें ऐसे तर्क सिखा रहे हैं कि वे इस्लामी आतंकवाद को न्यायसंगत ठहरा सकें. इसके अतिरिक्त समस्त दुनिया के मुसलमानों के मध्य उन पर अत्याचार का झूठा और मनगढ़न्त प्रचार किया जा रहा है.   अब भी समय है यदि सामान्य मुसलमानों को इस इस्लामी आतंकवाद के वैश्विक आन्दोलन से परे रखना है तो इनके मस्तिष्क को अपने अनुसार दिशा देने वाली मुस्लिम प्रचार मशीन पर कड़ी निगाह रखनी होगी और मस्जिदों और उसमें होने वाली तकरीरों पर भी ध्यान देना होगा. अन्यथा भारत की मुस्लिम जनसंख्या को आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध में हम साथ नहीं ला पायेंगे और न चाहते हुये भी यह धर्म युद्ध का स्वरूप ग्रहण कर लेगा.

Posted in Uncategorized | Leave a Comment »

नाकाम आतंकवादी साजिश ने अपने पीछे छोड़े कई सवाल

Posted by amitabhtri on अगस्त 11, 2006

इस दुनिया में रहने वाले हर सभ्य व्यक्ति ने अप्रत्याशित आतंकवादी घटनाओं से साक्षात्कार को अपनी नियति बना लिया है. अमेरिका, यूरोप, एशिया, अफ्रीका और अरब देशों तक कोई भी देश आतंकवाद की बिभीषिका से परे नहीं है. आज दुनिया के समस्त देशों की नीतियों का निर्धारण आतंकवाद के बढ़ते खतरों की पृष्ठभूमि में हो रहा है.लन्दन में सम्भवत: इस शताब्दी की शान्तिकाल की सबसे बड़ी तबाही का षड़यन्त्र विफल होने से निर्दोष लोगों की जान भले ही बच गई हो, परन्तु आतंकवाद का खतरा या ऐसी अन्य घटनाओं की पुनरावृत्ति का खतरा कहीं से कम नहीं हुआ है.11 सितम्बर 2001 को आतंकवादियों ने न्यूयार्क को निशाना बनाकर समस्त विश्व को अपनी शक्ति और उद्देश्यों का परिचय दे दिया था. इस घटना के पश्चात प्राय: हर वर्ष एक नया देश इन आतंकवादियों की सूची में जुड़ जाता है. 2002 में बाली में धमाके कर आतंकवादियों ने  दक्षिण पूर्व एशिया सहित आस्ट्रेलिया तक लोगों को आतंक से परिचित कराया, फिर 2004 में स्पेन के शहर मैड्रिड में रेलसेवा में विस्फोट किया. अगले वर्ष 2005 में लन्दन की परिवहन सेवा इनका निशाना बनी और 2006 में विनाश लीला से भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई  का सक्षात्कार हुआ. अभी मुम्बई की घटना को एक माह भी व्यतीत नहीं हुये हैं कि लन्दन में एक व्यापक आतंकवादी षड़यन्त्र के विफल होने से समस्त विश्व स्तब्ध है.लन्दन में जिस विस्फोट की योजना रची गई थी यदि वह सफल होती तो क्या होता कहने की आवश्यकता नहीं है. इन विस्फोटों में जिस तकनीक के प्रयोग की बात की जा रही है वह तरल विस्फोटक अत्यन्त आधुनिक रॉकेट तकनीक में प्रयोग की जाती है अर्थात आतंकवाद का यह खेल कुछ गुमराह और बेरोजगार नौजवानों का खेल नहीं रह गया है जैसा कि आम तौर पर कहा जाता है, यह एक सुनियोजित आन्दोलन है जिसमें बड़े स्तर पर वैज्ञानिक और इन्जीनियर भी संलग्न हैं.2001 में न्यूयार्क में हुये आतंकवादी आक्रमण से लेकर आज तक जितने भी बड़े आतंकवादी हमले हुये हैं उनमें उच्च श्रेणी के शिक्षित और अच्छी पृष्ठभूमि के लोगों की संख्या अधिक रही है. मुझे यह लिखते हुये जितना कष्ट हो रहा है उतना ही आपको पढ़ने में भी अरूचिकर होगा कि इन आतंकवादी आक्रमणों में मुसलमानों की संख्या शत प्रतिशत रही है.आखिर ऐसा क्या कारण है कि अच्छी पृष्ठभूमि का मुस्लिम नवयुवक जो हमारे आपके बीच में रहता है हमारी आपकी तरह बात करता है अचानक अपने ही देशवासियों का दुश्मन बन जाता है. कुछ लोग इसके पीछे मुस्लिम असन्तोष और पूरी दुनिया में उन पर हो रहे अत्याचार को कारण मानते हैं. लेकिन क्या कोई कारण इतना बड़ा हो सकता है कि वह हजारों निर्दोष लोगों के प्राण लेने को न्यायसंगत ठहरा सके.अभी पिछले दिनों जब कनाडा में बहुत बड़े आतंकवादी आतंकवादी षड़यन्त्र का पर्दाफाश हुआ तो कनाडा से मेरे मित्र ने ई-मेल के माध्यम से आश्चर्यमिश्रित आवेश में पूछा कि आखिर हमारे लोकतन्त्र ने आप्रवासी मुसलमानों को क्या नहीं दिया यहाँ तक कि सरकारी खर्चे पर उन्हें अंग्रेजी सिखाने का प्रबन्ध भी किया इसके बाद भी हमारे बीच के मुसलमानों ने ही संसद और प्रधानमन्त्री के विरूद्ध योजना रची. आज ऐसे कितने ही प्रश्न वातावरण में गूँज रहे हैं. भारत और ब्रिटेन जैसे देश जिन्होंने मुसलमानों को देश के कानून से अंशकालिक स्वतन्त्रता दे दी. भारत में परिवार नियोजन, विवाह, तलाक जैसे सभी मुद्दों पर मुस्लिम समुदाय देश के कानून का पालन नहीं करता और पर्सनल लॉ से शासित होता है . देश में न्यायालय होते हुये भी शरियत अदालतों को महत्व देता है, विद्यालयों में वन्देमातरम् न गाने की स्वतन्त्रता का पालन करता है. सुदूर देश में बनने वाले पैगम्बर के कार्टून के विरोध में सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाता है . इसके बाद भी भारत में मुसलमानों के उत्पीड़न की काल्पनिक धारणा बनाकर उन्हें न्याय दिलाने के नाम पर देश में धर्म के नाम पर आतंकवाद को प्रश्रय दिया जा रहा है.विश्व में चल रहा इस्लामी आतंकवाद ऐस दौर में पहुँच चुका है जहाँ उसकी धार्मिक भूमिका की अवहेलना नहीं की जा सकती. जो संगठन समस्त विश्व में निर्दोष लोगों को निशाना बना रहे हैं उन्होंने अपना आशयस्पष्ट कर दिया है कि वे विश्व में खिलाफत का राज्य स्थापित करना चाहते हैं जो पूरी तरह कुरान और शरियत पर आधारित हो. उनके लिये आतंकवाद उनका धार्मिक दायित्व है जो वे मुजाहिदीन बन कर पूरा कर रहे हैं.आतंकवाद के इस दौर में यह जिम्मेदारी मुसलमानों की है कि वे आगे आकर या तो इस्लाम के इस स्वरूप को स्वीकार करें या फिर इसका खण्डन करें अन्यथा गैर मुस्लिमों के लिये यह पूर्वानुमान लगा पाना असम्भव होगा कि उनके आस पास रहने वाला मुसलमान कब अपने धार्मिक दायित्व को पूरा करते हुये उसका दुश्मन बन जायेगा.यह आतंकवाद महज कानून की समस्या नहीं है इसके पीछे धार्मिक जुनून है. लन्दन के षड़यन्त्र के सामने आने से स्पष्ट है कि वह दिन दूर नहीं जब इस्लामी आतंकवादियों के पास परमाणु बम भी होगा और उसका प्रयोग करने में उन्हें हिचक नहीं होगी.

Posted in Uncategorized | Leave a Comment »

बन्द हो कन्या भ्रूण हत्या

Posted by amitabhtri on अगस्त 10, 2006

आज प्रात:काल जब समाचार पत्र देखा तो एक अत्यन्त ह्रदयविदारक और विचलित कर देने वाली घटना से साक्षात्कार हुआ. पंजाब राज्य के पटियाला शहर में एक नर्सिंग होम के पास एक गड्ढे से 35 कन्या भ्रूण बरामद हुये. सूत्रों के अनुसार इस गोरखधन्धे में सहभागी रही एक मिडवाइफ या दाई को उस नर्सिंग होम से निकाल देने के बाद उसने जिले के चिकित्सा अधिकारियों को इसकी सूचना देकर इस मामले का भण्डाफोड़ किया.इस ह्रदयविदारक घटना ने छद्म आधुनिकता और समाज की ह्रदयहीनता का एक और नग्न सत्य हमारे समक्ष रखा है.    पिछली अनेक जनसंख्या गणनाओं में जिन राज्यों में बालक-बालिकाओं की जनसंख्या के अनुपात में सर्वाधिक विषमता दिखी है उनमें पंजाब और हरियाणा अग्रणी हैं. ये दो राज्य सम्पन्नता के सूचकांक में कई अन्य राज्यों से आगे हैं फिर भी कन्या भ्रूण हत्या के सम्बन्ध में इनका रिकार्ड सिद्ध करता है कि इस समस्या का कारण आर्थिक स्थिति नहीं है.   वैसे इस कुरीति का पालन करने वाले  पंजाब और हरियाणा अकेले राज्य नहीं हैं. इस समस्या ने अनेक राज्यों को अपनी चपेट में ले लिया है. आज समय की आवश्यकता है कि इस समस्या के कारणों की गहराई से जाँच कर उनके समाधान का गम्भीर प्रयास किया जाये. इस समस्या के मूल में सामाजिक और धार्मिक कारण हैं.सामाजिक कारण- हिन्दुओं में आम धारणा होती है कि पुत्री पराया धन है और उसे एक दिन दूसरे के घर जाना है. इस धारणा के परिणामस्वरूप जन्म से लेकर उसके विवाह तक उसे आम तौर पर एक जिम्मेदारी के तौर पर देखा जाता  है जिसके लिये दहेज एकत्र करना ही माँ-बाप का दायित्व समझा जाता है. इस पराया धन की मानसिकता के कारण ही पुत्री को एक बोझ माना जाता है और उस पर पुत्र को वरीयता दी जाती है.इसके अतिरिक्त स्त्रियों के प्रति समाज की दृष्टि में आया परिवर्तन भी माँ-बाप में बड़ी होती लड़की के प्रति असुरक्षा की भावना का संचार करता है.  धार्मिक कारण हिन्दुओं की धार्मिक मान्यता के अनुसार  मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति की मुक्ति तभी सम्भव है जब पुत्र उसे मुखाग्नि दे. इस कारण भी पुत्र को कुलदीपक या खानदान चलाने वाला माना जाता है.     इन दोनों ही कारणों की पृष्ठभूमि में कन्या भ्रूण हत्या की कुरीति रोकने के लिये सरकारी प्रयास या कानून पर्याप्त नहीं हो सकते. इसके लिये समाज को अपनी मानसिकता में परिवर्तन करना होगा जो किसी कानून के बल पर एक दिन में सम्भव नहीं है.   समाज की मानसिकता में इस परिवर्तन के लिये उस सन्त शक्ति को आगे आना होगा जिसके प्रति अब भी हिन्दू समाज की श्रद्धा है. इसके साथ ही एक ऐसे नारी सशक्तीकरण आन्दोलन की आवश्यकता है जो प्रतिक्रयात्मक न होकर अपनी ऐतिहासिक चेतना से संपुष्ट हो और हिन्दू संस्कृति में स्त्रियों के गौरवशाली और गरिमामयी स्थान के प्रति समाज को जागरूक और शिक्षित कर सके. अन्यथा हिन्दू समाज एक ऐसे ढोंगियों और आडम्बरियों का समाज बनकर रह जायेगा जिसमें  स्त्रियों का सम्मान शास्त्रों तक ही सीमित रह जायेगा.

Posted in Uncategorized | 1 Comment »

हिन्दू पर्व रक्षाबन्धन

Posted by amitabhtri on अगस्त 9, 2006

विश्व में हिन्दू संस्कृति एकमात्र ऐसी संस्कृति है, जहाँ भाई और बहनों के लिये भी पर्व है. रक्षाबन्धन को सामान्य भाषा में राखी के नाम से भी जाना जाता है. वास्तव में रक्षाबन्धन और राखी एक ही पर्व के अलग-अलग नाम हैं. फिर भी इन दोनों में एक सूक्ष्म अन्तर है.     रक्षाबन्धन हमें अपनी प्राचीन परम्परा से जोड़ता है जबकि राखी इस पर्व का मध्यकालीन रूपान्तरण है.      हमारी ऐतिहासिक परम्पराओं और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस पर्व के आरम्भ से जुड़ी अनेक दन्तकथायें हैं परन्तु सभी कथाओं में एक आम सहमति है कि रक्षासूत्र कलाई मे बाँधकर रक्षा का वचन लिया जाता है. एक पौराणिक कथा के अनुसार देवासुर संग्राम में जब इन्द्र असुरों के विरूद्ध युद्ध में मिल रही पराजयों से हताश हो गये तो उनकी पत्नी शची ने  मन्त्रों से दीक्षित  एक रक्षासूत्र उनकी कलाई में बाँध दिया और इस रक्षासूत्र के प्रभाव से देवता असुरों के विरूद्ध विजय प्राप्त करने में सफल रहे.   इसी प्रकार ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार राजगुरू समस्त प्रजा की ओर से राजा की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधकर उससे समस्त प्रजा की रक्षा का आश्वासन लेता था. श्रावण मास में मनाया जाने वाले इस पर्व ने राखी का स्वरूप मध्यकालीन काल में उस समय ग्रहण किया जब मुस्लिम आक्रान्ताओं की कुदृष्टि से बालिकाओं को बचाने का गुरूतर दायित्व भाईयों के कन्धों पर आन पड़ा.      मध्यकालीन युग में रक्षाबन्धन के राखी का स्वरूप ग्रहण कर भाई-बहनों के पर्व के रूप में परिवर्तित होने का उदाहरण हमारे पास है जब रानी कर्णावती ने बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर उनसे सहायता माँगी थी. इस कथा से स्पष्ट होता है कि मध्यकाल में राखी का पर्व भाई-बहनों के पर्व के रूप में प्रचलित हो चुका था.

Posted in Uncategorized | 2 Comments »