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Archive for सितम्बर 15th, 2006

पाकिस्तान में महिला कानून

Posted by amitabhtri on सितम्बर 15, 2006

पाकिस्तान में महिलाओं की स्थिति में सुधार के निमित्त प्रस्तावित महिला अधिकार बिल 2006 पर गतिरोध अभी बरकरार है प्रमुख विपक्षी दलों के बीच इस कानून को लेकर सहमति बनाने के प्रयास विफल रहे और वर्तमान स्वरूप में प्रमुख विपक्षी दल ने  ने इसे अस्वीकार कर दिया.    प्रस्तावित बिल की प्रति प्राप्त करने के बाद मजलिसे मुत्तेहदा अमल के महासचिव मौलाना फजुर्ररहमान ने पाकिस्तान मुस्लिम लीग के अध्यक्ष चौधरी सजात सहित उलेमाओं और सरकार के प्रतिनिधियों से इस बावत विचार विमर्श किया और उसके बाद विपक्षी दलों के इस गठबन्धन ने इसे अस्वीकार कर दिया. कट्टरपंथी इस्लामी गठबन्धन मजलिसे अमल के अनुसार प्रस्तावित कानून पूरी तरह कुरान और सुन्ना के विपरीत है. इस संगठन का कहना है कि पिछले दो दिनों में सरकार ने दो ड्राफ्ट भेजे हैं और वे दोनों ही कुरान और सुन्ना के विपरीत हैं       उधर पाकिस्तान मुस्लिम लीग के नेता चौधरी सुजात ने इसे पूरी तरह कुरान सम्मत बताते हुये इस सम्बन्ध में  उलेमाओं की सहमति का भी दावा किया है.   ज्ञातव्य हो कि प्रस्तावित महिला अधिकार कानून के अन्तर्गत प्रसिद्ध इस्लामी हदूद कानून को संशोधित किया जाना है जिसमें बलात्कार पीड़ित महिला को अपराध सिद्ध करने के लिये चार पुरूष साक्षियों को लाना पड़ता है अन्यथा महिला को ही दण्डित किया जाता है.

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भारत में मिली एक नई पक्षी की प्रजाति

Posted by amitabhtri on सितम्बर 15, 2006

 नई दिल्ली,14 सितम्बर. पक्षियों के विषय के अन्तरराष्ट्रीय जानकार रामना अथरेया ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि भारत में एक पक्षी की नयी प्रजाति खोजी गई है. श्री रामना ने ही मई महीने में अरूणाचल प्रदेश के ईगलनेट अभयारण्य में पहली बार इस पक्षी को देखा था. इस क्षेत्र में रहने वाली आदिवासी जाति बुगुन के नाम पर इस चिड़िया का नामकरण लियोचिचला बुगुनोरम किया गया है. यह रंगीन आकर्षक पक्षी एक चिड़िया है जिसका सिर काला है और उसकी आँखों के आसपास पीले रंग का निशान है जबकि इसके पंखों पर काले ओर सफेद चिन्ह हैं.श्री अथरेया ने इस प्रजाति के दो पक्षियों को पकड़ा ओर बाद में उनकी जाँच कर उन्हें छोड़ दिया गया.      यद्यपि इस प्रजाति की खोज मई महीने में ही हो गई थी परन्तु इसकी पुष्टि होने तक इस समाचार को गुप्त ही रखा गया.

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आधुनिक जीवन शैली

Posted by amitabhtri on सितम्बर 15, 2006

आधुनिक जीवन शैली में जंक फूड, विद्यालय की पढ़ाई के बोझ और बड़े स्तर पर बाजारीकरण की चपेट में आकर बच्चों के बचपन की रचनात्मकता खोती जा रही है. ब्रिटेन में अनेक अकादमिकों सहित बच्चों के अभिभावकों और मनोविज्ञानियों ने इस आशय का पत्र ब्रिटेन के एक प्रमुख समाचार पत्र को भी लिखा है. डेली टेलीग्राफ को लिखे पत्र में बच्चों के रचनाकार फिलिप पुलमैन और जैक्यूलिन विल्सन और वैज्ञानिक बारोनेस ग्रीनफील्ड ने बच्चों में बढ़ रही अवसाद की घटनाओं की ओर ध्यान दिलाते हुये इस पर कार्रवाई करने की माँग भी की है.      क्या हम बच्चों को पालना भूल गये शीर्षक के इस पत्र में इस बात का दावा किया गया है कि सरकार यह समझ पाने में पूरी तरह विफल है कि बच्चों का विकास कैसे होता है.      बच्चों से सम्बन्धित इन विशेषज्ञों का मानना है दयनीय आहार, बच्चों को व्यायाम न करने देना और अकादमिक रूप से उन्हें सीमित कर देने से उनकी रचनात्मकता भी सीमित होकर रह गई है. इस पत्र  के अन्त में कहा गया है कि बच्चों को शारीरिक क्षति से बचाने के तो पूरे प्रबन्ध हमने किये हैं परन्तु इस क्रम में उनकी सामाजिक और भावनात्मक आवश्यकताओं की ओर ध्यान नहीं दिया .इन विश्लेषकों ने किशोर और युवाओं में बढ़ रही गाली-गलौज और हिंसा की प्रवृत्ति के लिये इसी मानसिक दशा को दोषी ठहराया है. इन शिकायतों के बीच इन अकादमिकों ने 21वीं शताब्दी में बच्चों के पालन-पोषण पर नये सिरे से देश व्यापी बहस की आवश्यकता जताई है.

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