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पोप के बयान

Posted by amitabhtri on सितम्बर 16, 2006

पोप बेनेडिक्ट 16 द्वारा पिछले दिनों जर्मनी के रेजेनबर्ग विश्विद्यालय के एक कार्यक्रम में इस्लाम पर दिये गये उनके बयान ने एक विवाद का स्वरूप ग्रहण कर लिया है. एक समारोह में इस्लाम की जिहाद की अवधारणा  और उसमें अन्तर्निहित हिंसा को पोप ने ईश्वर की इच्छा के विपरीत घोषित करते हुये इस सम्बन्ध में पूर्वी रोमन साम्राज्य के ईसाई शासक मैनुअल द्वितीय को उद्धृत करते हुये कहा कि मोहम्मद ने कुछ भी नया नहीं किया. इस्लाम में जो भी है अमानवीय और हिंसक है तथा इस धर्म का प्रचार तलवार के बल पर हुआ है.      पोप के इस बयान के बाद अनेक मुस्लिम देशों और गैर-मुस्लिम देशों के  मुसलमानों के मध्य तीव्र प्रतिक्रिया हुई है , इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में यह समझना अत्यन्त आवश्यक है कि इस बयान के माध्यम से कैथोलिक ईसाइयों के सर्वश्रेष्ठ धर्मगुरू आखिर क्या सन्देश देना चाहते हैं.           

                            पोप बेनेडिक्ट के पूर्ववर्ती पोप जॉन पॉल ने इस्लाम के साथ संवाद आरम्भ कर दोनों धर्मों के मध्य आपसी समझ स्थापित करने का प्रयास किया था और इस क्रम में वर्ष 2001 में उन्होंने सीरिया की मस्जिद में प्रवेश किया था और वे ऐसा करने वाले पहले ईसाई धर्म गुरू थे. परन्तु वर्ष 2003 तक विश्व के निचले श्रेणी के पादरी या कार्डिनल अनेक बैठकों में दारूल इस्लाम में रहने वाले 4 करोड़ ईसाई अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले द्वितीय श्रेणी के व्यवहार का प्रश्न उठाने लगे थे और इसी दबाव के चलते पोप जॉन पॉल ने 2003 में समान व्यवहार का विषय उठाना आरम्भ कर दिया था.        

                     पोप जॉन पॉल के उत्तराधिकारी बेनेडिक्ट 16 कार्डिनल राटजिंगर की भूमिका में भी इस्लाम के सम्बन्ध में अपने कठोर विचारों के लिये जाने जाते थे. पोप बनने के बाद इस्लाम के साथ ईसाइयों का सम्बन्ध उनके एजेण्डे में सर्वोपरि था. इस क्रम में उन्होंने वेटिकन में कुछ बड़ी बैठकें आयोजित कर इस विषय में पूरी दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के कैथोलिक पादरियों की राय जानने का प्रयास भी किया.    

                          पोप का इस्लाम के सम्बन्ध में पहला सार्वजनिक दृष्टिकोण जनवरी 2006 में सामने आया जब पोप के साथ ह्यूज हेविट शो सेमिनार में भाग लेने वाले फादर जोसेफ डी फेसियो ने रहस्योद्घाटन किया कि इस सेमिनार में पोप ने कुछ नरमपंथी मुस्लिम विद्वानों की इस बात का जोरदार खण्डन किया था कि कुरान में किसी भी प्रकार सुधार सम्भव है. पोप ने इस सम्मेलन में कहा कि कुरान में जो कुछ कहा गया है वह पैगम्बर द्वारा भले कहा गया हो परन्तु वे अल्लाह के सीधे आदेश हैं इसलिये उनमें कोई सुधार सम्भव नहीं है.        

                        अप्रैल 2005 में पोप बनने के बाद यह पहला अवसर था जब बेनेडिक्ट ने इस्लाम पर अपनी सीधी राय व्यक्त की थी. इसी प्रकार अनेक गोपनीय बैठकों में भी पोप ने इस्लाम के संवाद जारी रखने का समर्थन करते हुये भी इसे बेमानी बताया जब तक इस्लाम में जिहाद की अवधारणा और उसमें अन्तर्निहित हिंसा की धारणा खण्डित नहीं होती.    

                         पोप का नवीनतम बयान इस्लाम और ईसाइयों के मध्य सम्बन्धों के सन्तुलन में आये अन्तर का प्रकटीकरण है. दशकों पुरानी नीति में नाटकीय परिवर्तन करते हुये वेटिकन ने  दारूल इस्लाम में रह रहे ईसाइयों की दुर्दशा का कारण फिलीस्तीन में  इजरायल की नीतियों को  मानने के स्थान पर इसे कूटनीतिक और सांस्कृतिक सम्बन्धों के पारस्परिक सम्बन्ध से  जोड़ा है.      

                        डेनमार्क के प्रसिद्ध समाचार पत्र जायलैण्ड्स पोस्टेन में छपे मोहम्मद के तथाकथित कार्टून के बाद वेटिकन की नीति में आया यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ था जब आरम्भ में वेटिकन ने इन कार्टूनों के प्रकाशन का विरोध किया था परन्तु नाईजीरिया और तुर्की में हुई हिंसा में पादरियों के मरने के बाद वेटिकन प्रवक्ता ने आक्रामक लहजे में कहा कि, यदि आप हमारे लोगों से कहेंगे कि उन्हें आक्रमण का अधिकार नहीं है तो हमें अन्य लोगों से भी कहना पड़ेगा कि उन्हें हमें नष्ट करने का अधिकार नहीं है . वेटिकन के विदेश मन्त्री आर्कविशप गिवोवानी लाजोलो ने इसमें जोड़ा कि हमें मुस्लिम देशों में कूटनीतिक सम्पर्कों और सांस्कृतिक सम्पर्कों में सम्बन्धों में उचित प्रतिफल की माँग पर जोर देते रहना चाहिये.              

                        इसी प्रकार मार्च महीने में अफगानिस्तान में अब्दुल रहमान नामक व्यक्ति के ईसाई बनने पर अफगानिस्तान सरकार द्वारा उसे मृत्युदण्ड दिये जाने का जैसा विरोध वेटिकन सहित प्रमुख पश्चिमी ईसाई देशों ने किया था उससे वेटिकन की नई आक्रामक नीति का संकेत मिलता है.       

                      पोप बेनेडिक्ट ने यूरोपियन संघ में तुर्की के शामिल होने का विरोध करते हुये यूरोप में बढ़ रही सेकुलर प्रवृत्ति की भी खुली आलोचना करते हुये यूरोप से अनेक अवसरों पर कहा है कि वह अपनी ईसाई पहचान को न भूले.       

                       वैसे पोप का इस्लाम सम्बन्धी रूख यूरोप के इस्लामीकरण के भय को स्वर देता है. ईसाई जन्म स्थान बेथलहम में पिछली दो सहस्राब्दी में ईसाइयों के अल्पसंख्या में आ जाने के बाद यूरोप में आप्रवास के बहाने बढ़ती मुस्लिम जनसंख्या और उनका मुखर और आक्रामक स्वभाव यूरोप को अपनी पहचान सहेजने को विवश कर रहा है.    

                        बेथलेहम में 1922 में ईसाइयों की जनसंख्या मुसलमानों से अधिक थी परन्तु आज यह घटकर 2 प्रतिशत रह गयी है, इसी प्रकार अपनी परम्परा और मूल्यों के साथ सम्बन्ध क्षीण करता हुआ यूरोप उत्तर ईसाई समाज बनता जा रहा है. पिछली दो पीढ़ियों में आस्थावान और धर्मपालक ईसाइयों की संख्या इतनी कम हुई है कि पर्यवेक्षकों ने इसे नया अन्ध महाद्वीप कहना आरम्भ कर दिया है. विश्लेषकों का पहले ही अनुमान है कि मस्जिदों में उपासना करने वालों की संख्या प्रत्येक सप्ताह चर्च आफ इंगलैण्ड से अधिक होती है.     

                         किसी जनसंख्या को कायम रखने के लिये आवश्यक है कि महिलाओं का सन्तान धारण करने का औसत 2.1 हो परन्तु पूरे यूरोपीय संघ में दर एक तिहाई 1.5 प्रति महिला है और वह भी गिर रही है . एक अध्ययन के अनुसार यदि जनसंख्या का यही रूझान कायम रहे और आप्रवास पर रोक लगा दी जाये तो 2075 तक आज की 375 मिलियन की जनसंख्या घटकर 275 मिलियन हो हो जायेगी. यहाँ तक कि अपने कारोबार के लिये यूरोप को प्रतिवर्ष 1.6 करोड़ आप्रवासियों की आवश्यकता है. इसी प्रकार वर्तमान कर्मचारी और सेवानिवृत्त लोगों के औसत को कायम रखने के लिये आश्चर्यजनक 13.5 करोड़ आप्रवासियों की प्रतिवर्ष आवश्यकता है.इसी रिक्त स्थान में इस्लाम और मुसलमान को प्रवेश मिल रहा है. जहाँ ईसाइयत अपनी गति खो रही है वहीं इस्लाम सशक्त, दृढ़ और महत्वाकांक्षी है. जहाँ यूरोपवासी बड़ी आयु मे भी कम बच्चे पैदा करते हैं वहीं मुसलमान युवावस्था में ही बड़ी मात्रा में सन्तानों को जन्म देते हैं.यूरोपियन संघ का 5% या लगभग 2 करोड़ लोग मुसलमान हैं. यदि यही रूझान जारी रहा तो 2020 तक यह संख्या 10% पहुँच जायेगी.जैसा कि दिखाई पड़ रहा है कि गैर मुसलमान नयी इस्लामी व्यवस्था की ओर प्रवृत्त हुये तो यह महाद्वीप मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्र बन जायेगा.       

                        इन तथ्यों की पृष्ठभूमि में यह स्पष्ट हो जाता है कि इस्लाम के सम्बन्ध में पोप का बयान कोई भावात्मक या आवेशपूर्ण उक्ति नहीं है वरन् यूरोप और ईसाई समाज की असुरक्षा की भावना की अभिव्यक्ति है. पोप बेनेडिक्ट के दृष्टिकोण से स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में इस्लाम और ईसाइयत के मध्य आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चलेगा और उसका परिणाम आने वाले वर्षों में  विश्व स्तर पर नये  राजनीतिक और सांस्कृतिक ध्रुवीकरण के तौर पर देखने को मिल सकता है.

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