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बुश पर बढ़ता दबाव

Posted by amitabhtri on सितम्बर 24, 2006

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन द्वारा जार्ज बुश प्रशासन पर कुख्यात आतंकवादी सरगना ओसामा बिन लादेन को पकड़ने के लिये पर्याप्त प्रयास न करने के आरोप के साथ ही अमेरिका में आतंकवाद के मुद्दे पर बुश की कठिनाइयाँ बढ़ती ही जा रही हैं. अमेरिकी काँग्रेस के समक्ष खुफिया एजेन्सी द्वारा  आतंकवादियों की पूछताछ के लिये कुछ गोपनीय जेलों की बात स्वीकार करने के बाद बुश को अपने ही दल में पहली बार स्पष्ट ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है. पूर्व विदेश मन्त्री कोलिन पावेल के नेतृत्व में तीन प्रमुख सीनेटरों ने जार्ज बुश द्वारा प्रस्तावित उस कानून का स्पष्ट विरोध किया है जिसमें युद्धबन्दियों के साथ होने वाले व्यवहार को निर्धारित करने वाले मानक जिनेवा अन्तरराष्ट्रीय सन्धि की धारा 3 में संशोधन कर आतंकवादियों के साथ पूछताछ के विशेष प्रावधान बनाने का सुझाव दिया गया है. इस संशोधन पर रिपब्लिकन सीनेटरों की आपत्ति यह है कि इस संशोधन से अमेरिका के संविधान की मूलभूत आत्मा पर चोट पहुँचेगी और मानवाधिकार तथा व्यक्ति की स्वतन्त्रता के उसके नैतिक सिद्धान्त पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.

               वहीं इस संशोधन के पैरोकारों का अपना तर्क है उनके अनुसार जिनेवा सन्धि में युद्ध की स्थिति के अनुसार नियम बनाये गये हैं जब शत्रु युद्ध सम्बन्धी अन्तरराष्ट्रीय नियमों का पालन करता है  अब बदली परिस्थितियों में  जब आतंकवादी ऐसे किसी अन्तरराष्ट्रीय नियम का अनुपालन नहीं करते तो उन्हें जिनेवा सन्धि की छूट नहीं मिलनी चाहिये और  उनके साथ विशेष असाधारण व्यवहार होना चाहिये.        

                       यह कोई पहला अवसर नहीं है जब बुश की आतंकवाद सम्बन्धी नीति पर  परस्पर विरोधी  विचार सामने आये है. इससे पूर्व कुछ माह पहले अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने क्यूबा में ग्वान्टेनामो बे में आतंकवादियों की पूछताछ के लिये स्थापित की गई विशेष जेलों को समाप्त करने का आदेश दिया था. अमेरिका के संविधान में सर्वोच्च न्यायालय की नैतिक सर्वोच्चता के चलते इस निर्णय को भी बुश की नीतियों के लिये एक बड़ा झटका माना गया था. हालांकि अमेरिका के राष्ट्रपति को वीटो अधिकार से कोई भी कानून अन्तिम रूप में पारित कराने के विशेषाधिकार के चलते सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय बुश के लिये कानूनी रूप से भले ही विवशता न बना हो परन्तु उनकी स्थिति को कमजोर करने के लिये पर्याप्त था.     इन घटनाक्रमों के बीच यह समझना अत्यन्त आवश्यक है कि आखिर बुश पर बढ़ते दबाव के पीछे उनकी कौन सी नीतियाँ दोषी हैं.    

                          11 सितम्बर 2001 को न्यूयार्क पर हुये आतंकवादी हमले के बाद समस्त विश्व ने एकजुट होकर न केवल इस घटना की निन्दा की वरन् अमेरिका के राष्ट्रपति के आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध के आह्वान को सहर्ष स्वीकार भी किया. इस घटना के दोषियों को खोज निकालने के लिये अमेरिका ने अफगानिस्तान की तालिबान सरकार पर हमला किया और तालिबान का प्रभाव इस क्षेत्र में समाप्त कर दिया. परन्तु आज पाँच वर्षों के उपरान्त अफगानिस्तान में तालिबान फिर जोर मारने लगा है. इसी बीच 2003 में ईराक पर हुये आक्रमण को न्यायसंगत ठहराने में बुश की असफलता और अमेरिकी सैनिकों की मृत्यु सहित दिनोंदिन वहाँ की बिगड़ती स्थिति ने आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध की धारणा पर प्रश्न खड़े कर दिये हैं.       

                  वास्तव में इन दोनों युद्धों के पश्चात इन क्षेत्रों में उपजी अराजकता को समझने के लिये हमें अमेरिका की पूरी नीति को समझना होगा. इन दोनों ही युद्धों की पूरी रणनीति अमेरिकी रक्षामन्त्री डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने बनाई जिन्होंने अमेरिका की हवाई क्षमता पर पूरा भरोसा रखते हुये जमीन पर लड़ाई को अधिक प्राथमिकता नहीं दी जिसका परिणाम कई बार गलत लोगों को निशाना बनाने के रूप में सामने आया . जैसे 2003 में ईराक के फालुजा शहर में हुई बमबारी में मारे गये निर्दोष ईराकियों ने पूरी दुनिया में आतंकवादियों और उनके समर्थकों को मुस्लिमों पर अत्याचार के सिद्धान्त को विश्वव्यापी रूप से मनमाना और मनगढ़न्त स्वरूप देने का अवसर मिल गया. ऐसे आक्रमणों के कारण देश के असन्तुष्ट गुट भी खुलकर अमेरिका का साथ देने की स्थिति में नहीं रहे. इसके साथ ही रम्सफेल्ड की रणनीति में आक्रमण किये गये देश के असन्तुष्ट वर्ग को देश पर विजय प्राप्त करने के बाद साथ लिया गया. इससे इन देशों में आशंका व्याप्त हुई कि अमेरिका लोकतन्त्र की स्थापना के स्थान पर इन क्षेत्रों में अपना कठपुतली शासन स्थापित करना चाहता है.     

                      बुश की रिपब्लिकन पार्टी मूल रूप से नव परम्परावादियों या निवो कन्जर्वेटिव विचारधारा पर अवलम्बित है जिसका मूल उद्देश्य मध्य पूर्व में इजरायल विरोधी शक्तियों को कमजोर करते हुये वहाँ के तेल संसाधनों पर नियन्त्रण स्थापित रखना ताकि ये देश तेल कूटनीति को अमेरिका के विरूद्ध प्रयोग न कर सकें. इसके साथ ही आतंकवाद पर कड़े कदम उठाते हुये इस्लामी देशों को लोकतान्त्रिक बनाने की प्रक्रिया तीव्र करते हुये  पूरी दुनिया में परमाणु अप्रसार और जनसंहारक हथियारों के अप्रसार से अमेरिका को भय रखना भी इस विचारधारा का मुख्य ध्येय है. यही कारण है कि मध्य पूर्व में इजरायल के अस्तित्व के लिये खतरा बनने वाला देश सीधे अमेरिका के निशाने पर आता है. परन्तु इस विचारधारा के क्रियान्वयन को लेकर नव-परम्परावादी एकमत नहीं हैं.       

                            अफगानिस्तान और ईराक दोनों ही देशों में तालिबान और सद्दाम के शासन के पतन के पश्चात जिस प्रकार इन देशों की व्यवस्था को सम्भालने का कार्य यहाँ की स्थानीय शक्तियों को न देकर अमेरिका की सेना के अधीन ही रखा गया उसमें लोगों को अमेरिका अमेरिका की नीयत में खोट दिखने लगा.     

               कुछ वर्ष पूर्व प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक सैमुअल हटिंगटन ने “Who are we: The challenges to America’s national identity “पुस्तक के माध्यम से अमेरिका को अपनी पहचान बनाये रखने के लिये साम्राज्यवादी रास्ता अपनाते हुये अपनी सेना और आर्थिक सत्ता के सहारे समस्त विश्व को अमेरिका बनाने का सुझाव दिया था तो नवपरम्परावादी लेखक डैनियल पाइप्स ने इसे अव्यावहारिक बताते हुये कहा था कि अमेरिकी जनता साम्राज्यवादी विस्तार के लिये अपना धन और अर्थ बहाने को कतई तैयार नहीं है.   वास्तव में ईराक की विजय के बाद ईराक को अमेरिका की महत्वाकांक्षाओं और भावी योजनाओं की प्रयोगशाला के रूप में प्रयोग किया, जहाँ आधुनिक सन्दर्भों में वैचारिक ईमानदारी के अभाव में बुश को मुँह की खानी पड़ी .    आज आतंकवाद पर बुश की रणनीति हो या अफगानिस्तान और ईराक में विजय के पश्चात आतंकवादियों की फिर से बढ़ती सक्रियता हो सभी मामलों में वे अपने देश सहित समस्त विश्व समुदाय को अपनी रणनीति की सार्थकता  समझा पाने में काफी हद तक असफल रहे हैं, फिर भी इससे यह अर्थ लगाना काफी जल्दबाजी होगी कि इससे बुश कमजोर पड़ जायेंगे या अमेरिका की नीति में कोई विशेष अन्तर आ जायेगा.      

                          अमेरिका में प्रस्तावित नवम्बर माह के मध्यावधि आम चुनावों से पूर्व डेमोक्रेट और रिपब्लिकन के मध्य इसी प्रकार आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलेगा और बुश पर दबाव और बढ़ेगा.

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