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इस्लाम का नस्लवादी चेहरा

Posted by amitabhtri on सितम्बर 30, 2006

इस्लामी उम्मा की अवधारणा के अंतर्गत समस्त विश्व के मुसलमानों को एक समान भाव से देखने का दावा करने वाले मुसलमानों के समक्ष सूडान का डाफूर प्रान्त एक चुनौती बनकर इनके दावों का मखौल उड़ा रहा है . सूडान में पिछले तीन वर्षों से राज्य प्रायोजित नरसंहार में  जन्जावीद नामक  अरबी मुसलमान उग्रवादियों ने अब तक गैर- अरब नस्ल के दो लाख मुसलमानों को मौत के घाट उतारा है तथा दस लाख मुसलमान बेघर बार होकर भटक रहे हैं .                        

            क्यूबा में ग्वांटेनामो बे , ईराक और फिलीस्तीन में मुसलमानों के उत्पीड़न पर समस्त विश्व में शोर मचाने वाले तथाकथित मुस्लिम परस्तों की सूडान के मामले में अपनाई गई चुप्पी एक रहस्य बन गई है . आखिर अमेरिका और इजरायल द्वारा मुस्लिम उत्पीड़न की घटनाओं को ही आधार बना कर पूरे विश्व के मुस्लिम समुदाय को ध्रुवीकृत करने का प्रयास क्यों किया जाता है जबकि मुस्लिम देश में मुसलमानों द्वारा ही अपने बंधु बांधवों के नरसंहार पर चुप्पी साध ली जाती है .                         विभिन्न अरब प्रेस और इंटरनेट पर मुसलमानों द्वारा सूडान के विषय को उस देश के आंतरिक कानून व्यवस्था के रुप में प्रस्तुत किया जाता है साथ ही सूडान में मरने वाले निर्दोष मुसलमानों की संख्या को भी कम करके प्रस्तुत किया जाता है . इसके साथ ही सूडान के विषय को अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप देने के लिए यहूदियों को दोषी ठहराकर सिद्ध किया जाता है कि यह  इस्लाम की छवि को खराब करने का यहूदी षड्यंत्र है तथा इस विषय पर किसी भी प्रकार की चर्चा यहूदी दुष्प्रचार को सशक्त बनाएगी . इस आश्चर्यजनक तर्क से निश्चय ही विश्व भर के मुस्लिम नेतृत्व की ईमानदारी पर संदेह होता है जो भारत मे अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा पर या इजरायल के लेबनान पर आक्रमण के बाद सड़कों पर उतरकर इन देशों की आलोचना करते हुए प्रदर्शन करते हैं और डाफूर में उन्हीं मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार से आंखें मूंद लेते हैं.                 

              सूडान में डाफूर में इस संकट के लिए कुछ हद तक प्राकृतिक संसाधनों के लिए हो रहे संघर्ष को उत्तरादायी माना जा सकता है .सूडान के अरब नस्ल के जन्जावीद जनजातीय डाफूर के मुसलमानों की भूल पर नियंत्रण स्थापित करना चाहते हैं .2004 में अश्वेत मुस्लिम डाफूर वासियों ने सूडान लिबरेशन आर्मी के बैनर तले जन्जावीदों के विरुद्ध हथियार उठाया तो सूडान की सरकार ने नियमित सेना के माध्यम से जन्जावीदों को शस्त्र उपलब्ध कराए और जनजातीय डाफूर वासियों की जायज मांगों को बलपूर्वक दबाया.                        

                लेकिन इस विवाद को आर्थिक विवाद मानना एक भूल होगी .इस विवाद के मूल में नस्लवाद की विचारधारा भी  है .सूडान की सरकार विभिन्न इस्लामी संगठनों के माध्यम से सूडान के जनजातीय मुसलमानों का अरबीकरण करना चाहती है . इस क्रम में अरब नस्ल के जन्जावीदों को सूडान की सरकार का पूरा सहयोग मिल रहा है जिसकी सहायता से निर्दोष डाफूर के मुसलमानों का नरसंहार हो रहा है .दूसरी ओर सूडान की सरकार इस हत्या से लोगों का ध्यान हटाने के लिए शोर मचाती है कि खारतोम में इस्लाम संकट में है .                  

           यह विडंबना ही है कि इराक में अमेरिकी आक्रमण के विरोध में पूरी दुनिया को सिर पर उठा लेने वाले अरब के देशों ने सूडान में अपने ही मुसलमानों के मरने पर न केवल चुप्पी साधी वरन् इसे भी यहूदी षड्यंत्र बता दिया. आज सूडान का अश्वेत मुसलमान सोचने पर विवश है कि क्या इराक , फिलीस्तीन या बोस्नीया के मुसलमानों के जीवन की कीमत डाफूर के मुसलमानों से अधिक है .               

           अरब देशों के सबसे बड़े संगठन अरब लीग ने सदैव खारतोम सरकार की आर्थिक सहायता की तथा 2004 में सूडान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों का विरोध भी किया .इस सहायता से उत्साहित सूडान की सरकार ने डाफूर के अश्वेत मुसलमानों को चोर और डाकू कहकर उनपर असाधारण अत्याचार किए .            

            सूडान में अरब नस्ल के मुसलमानों की प्राथमिकता स्थापित करने के क्रम में मुसलमानों पर ही किए जा रहे इस घोर जुल्म के बाद इस्लाम में नस्लवाद की अवधारणा का विरोध तो खोखला हो ही गया है अमेरिका और इजरायल के विरुद्ध मुस्लिम उत्पीड़न के नाम पर होने वाले विश्व व्यापी विरोध में राजनीतिक स्वर भी स्पष्ट सुनाई पड़ रहा है .

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