हिंदू जागरण

हिंदू चेतना का स्वर

Archive for सितम्बर, 2006

मालेगाँव विस्फोट

Posted by amitabhtri on सितम्बर 9, 2006

महाराष्ट्र एक बार फिर आतंकवाद की भेट चढ़ा, इस बार आतंकवादियों का निशाना स्वयं मुसलमान बने. मुसलमानों के प्रमुख पर्व शबेबारात के दिन जुमे की नमाज के बाद पाँच हजार की भीड़ के इस क्षेत्र में किया गया विस्फोट जानमाल के नुकसान के उद्देश्य से किया गया उतना नहीं लगता जितना उसका उद्देश्य संदेश देना है.

      शबेबारात की इस नमाज के बाद खैरात या दान दिया जाता है और इस खैरात के लिये बड़ी संख्या में वहाँ अपाहिज और भिखारी एकत्र थे. देशी बम के द्वारा किये गये इस विस्फोट का निशाना यही गरीब और अपाहिज थे और हुआ भी यही इन लाचारों की मौत हुई और भगदड़ में अधिक संख्या में बच्चे या तो मारे गये या घायल हुये.

       विस्फोटों के बाद एक टी.वी चैनल ने मालेगाँव की जामा मस्जिद के मुफ्ती का बयान भी दिखाया जिसमें उन्होंने विस्फोट की सम्भावना से इन्कार करते हुये पुलिस की एम्बुलेन्स से हुई दुर्घटना के बाद मची अफरा-तफरी का परिणाम इसे बताया. हालांकि इस बात पर किसी ने जोर नहीं दिया कि मुफ्ती ने यह गलत बात क्यों कही.

         वास्तव में कल दोपहर को मालेगाँव की इस विस्फोट की सूचना को लेकर कई घण्टों तक असमंजस की स्थिति बनी रही. पुलिस और सरकार के परस्पर विरोधी बयान आते रहे और बात में पता लगा कि ये श्रृंखलाबद्ध विस्फोट तो थे परन्तु उनका उद्देश्य पिछले वर्ष दिल्ली में हुये विस्फोटों और इस वर्ष वाराणसी और मुम्बई में हुये विस्फोटों जैसी तबाही मचाना नहीं था, तो फिर इसका उद्देश्य क्या था. भगदड़ मचाना, अफरातफरी फैलाना और इस्लामी आतंकवाद की पूरी बहस को नय रंग देना.

         जैसा कि कुछ समाचार पत्रों ने आशंका व्यक्त की है कि पिछले फरवरी में पाक अधिकृत कश्मीर में आई.एस.आई और पाक आधारित आतंकवादी संगठनों की संयक्त जिहाद कौंसिल की बैठक में भारत में बड़े पैमाने पर आक्रमणों का सिलसिला चलाने सम्बन्धी प्रस्ताव पारित हुआ और उस प्रस्ताव में मन्दिरों के साथ कभी-कभी मस्जिदों को भी निशाना बनाने की बात कही गयी.

        पाकिस्तान ने अपनी इस शातिर चाल से दो शिकार एक साथ किये हैं एक तो भारत में साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ना और दूसरा सुरक्षा एजेन्सियों और सरकार को इस्लामी आतंकवाद की मूल विचारधारा और उसे अन्जाम देने वालों की पहचान को लेकर असमंजस में डालना.

      भारत जैसे उदारवादी और पंथनिरपेक्ष देश में जहाँ हिन्दू अपनी उदारता और सदाशयता के कारण इस्लामी आतंकवाद के मूल में जाने को अधिक उत्साहित नहीं है , मुस्लिम धर्मस्थलों पर हुये ऐसे आक्रमणों के बाद इन आक्रमणों की मूल मानसिकता को लेकर भ्रमित हो जायेगा और इस स्थिति का पूरा लाभ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित उन स्लीपर सेल को मिलेगा जो पहले से कहीं अधिक निश्चिन्त भाव से आम मुसलमानों के मध्य रहकर अपने कार्य को सम्पन्न कर सकेंगे.

      आज प्रधानमन्त्री से लेकर सभी प्रमुख सुरक्षा विशेषज्ञ इस बात की घोषणा कर रहे हैं कि देश एक अघोषित युद्ध से जूझ रहा है जिसमें शत्रु का निशाना निर्दोष नागरिक हैं, इसलिये हमें शत्रु की हर रणीनीति के बारे में सावधानी से और भावुक हुये बिना सोचना होगा.

        यह बात बिल्कुल सच है कि कल के विस्फोट में जिन निर्दोष लोगों की जान गई है वे सभी सहानुभूति के पात्र हैं परन्तु साथ ही इस विस्फोट की अन्य विस्फोटों से तुलना, क्षति का अनुपात और प्रयोग किये गये विस्फोटकों को ध्यान में रखना चाहिये. यह आतंकवाद का युद्ध किसी समुदाय का किसी समुदाय के विरूद्ध भले न हो परन्तु एक समुदाय के धार्मिक जुनून का परिणाम अवश्य है इसलिये इस युद्ध में विजय के लिये आवश्यक है कि आतंकवाद की इस विचारधारा को लेकर आरम्भ हुई बहस किसी भावुकता के आवेश में रूकनी नहीं चाहिये.

Posted in Uncategorized | टिप्पणी बन्द मालेगाँव विस्फोट में

मालेगाँव विस्फोट

Posted by amitabhtri on सितम्बर 9, 2006

महाराष्ट्र एक बार फिर आतंकवाद की भेट चढ़ा, इस बार आतंकवादियों का निशाना स्वयं मुसलमान बने. मुसलमानों के प्रमुख पर्व शबेबारात के दिन जुमे की नमाज के बाद पाँच हजार की भीड़ के इस क्षेत्र में किया गया विस्फोट जानमाल के नुकसान के उद्देश्य से किया गया उतना नहीं लगता जितना उसका उद्देश्य संदेश देना है. शबेबारात की इस नमाज के बाद खैरात या दान दिया जाता है और इस खैरात के लिये बड़ी संख्या में वहाँ अपाहिज और भिखारी एकत्र थे. देशी बम के द्वारा किये गये इस विस्फोट का निशाना यही गरीब और अपाहिज थे और हुआ भी यही इन लाचारों की मौत हुई और भगदड़ में अधिक संख्या में बच्चे या तो मारे गये या घायल हुये. विस्फोटों के बाद एक टी.वी चैनल ने मालेगाँव की जामा मस्जिद के मुफ्ती का बयान भी दिखाया जिसमें उन्होंने विस्फोट की सम्भावना से इन्कार करते हुये पुलिस की एम्बुलेन्स से हुई दुर्घटना के बाद मची अफरा-तफरी का परिणाम इसे बताया. हालांकि इस बात पर किसी ने जोर नहीं दिया कि मुफ्ती ने यह गलत बात क्यों कही. वास्तव में कल दोपहर को मालेगाँव की इस विस्फोट की सूचना को लेकर कई घण्टों तक असमंजस की स्थिति बनी रही. पुलिस और सरकार के परस्पर विरोधी बयान आते रहे और बात में पता लगा कि ये श्रृंखलाबद्ध विस्फोट तो थे परन्तु उनका उद्देश्य पिछले वर्ष दिल्ली में हुये विस्फोटों और इस वर्ष वाराणसी और मुम्बई में हुये विस्फोटों जैसी तबाही मचाना नहीं था, तो फिर इसका उद्देश्य क्या था. भगदड़ मचाना, अफरातफरी फैलाना और इस्लामी आतंकवाद की पूरी बहस को नय रंग देना. जैसा कि कुछ समाचार पत्रों ने आशंका व्यक्त की है कि पिछले फरवरी में पाक अधिकृत कश्मीर में आई.एस.आई और पाक आधारित आतंकवादी संगठनों की संयक्त जिहाद कौंसिल की बैठक में भारत में बड़े पैमाने पर आक्रमणों का सिलसिला चलाने सम्बन्धी प्रस्ताव पारित हुआ और उस प्रस्ताव में मन्दिरों के साथ कभी-कभी मस्जिदों को भी निशाना बनाने की बात कही गयी. पाकिस्तान ने अपनी इस शातिर चाल से दो शिकार एक साथ किये हैं – एक तो भारत में साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ना और दूसरा सुरक्षा एजेन्सियों और सरकार को इस्लामी आतंकवाद की मूल विचारधारा और उसे अन्जाम देने वालों की पहचान को लेकर असमंजस में डालना. भारत जैसे उदारवादी और पंथनिरपेक्ष देश में जहाँ हिन्दू अपनी उदारता और सदाशयता के कारण इस्लामी आतंकवाद के मूल में जाने को अधिक उत्साहित नहीं है , मुस्लिम धर्मस्थलों पर हुये ऐसे आक्रमणों के बाद इन आक्रमणों की मूल मानसिकता को लेकर भ्रमित हो जायेगा और इस स्थिति का पूरा लाभ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित उन स्लीपर सेल को मिलेगा जो पहले से कहीं अधिक निश्चिन्त भाव से आम मुसलमानों के मध्य रहकर अपने कार्य को सम्पन्न कर सकेंगे. आज प्रधानमन्त्री से लेकर सभी प्रमुख सुरक्षा विशेषज्ञ इस बात की घोषणा कर रहे हैं कि देश एक अघोषित युद्ध से जूझ रहा है जिसमें शत्रु का निशाना निर्दोष नागरिक हैं, इसलिये हमें शत्रु की हर रणीनीति के बारे में सावधानी से और भावुक हुये बिना सोचना होगा. यह बात बिल्कुल सच है कि कल के विस्फोट में जिन निर्दोष लोगों की जान गई है वे सभी सहानुभूति के पात्र हैं परन्तु साथ ही इस विस्फोट की अन्य विस्फोटों से तुलना, क्षति का अनुपात और प्रयोग किये गये विस्फोटकों को ध्यान में रखना चाहिये. यह आतंकवाद का युद्ध किसी समुदाय का किसी समुदाय के विरूद्ध भले न हो परन्तु एक समुदाय के धार्मिक जुनून का परिणाम अवश्य है इसलिये इस युद्ध में विजय के लिये आवश्यक है कि आतंकवाद की इस विचारधारा को लेकर आरम्भ हुई बहस किसी भावुकता के आवेश में रूकनी नहीं चाहिये.

Posted in Uncategorized | Leave a Comment »

पोलियो में भी धर्म

Posted by amitabhtri on सितम्बर 6, 2006

देश में मुसलमानों के साथ भेदभाव न करने और उन्हें आत्मसात् करने की अपील सर्वत्र होती है, परन्तु मुस्लिम समाज की जड़ता और उनके बुद्धिजीवियों द्वारा उन्हें दिग्भ्रमित करने के लगातार उदाहरणों के मध्य यह तय कर पाना अत्यन्त कठिन है कि मुस्लिम समाज में सुधार सम्भव भी है या नहीं.                            मुस्लिम समाज की जड़ता और मूर्खता का नवीनतम उदाहरण पल्स पोलियो अभियान की असफलता है. भारत सरकार के तमाम प्रयासों के बाद भी इस वर्ष पोलियो के मामले देश में  पिछले वर्ष की अपेक्षा अधिक पाये गये हैं. इस वर्ष कुल 256 पोलियो संक्रमण के शिकार लोग देश में पाये गये और इनमें से 232 मामले उत्तर प्रदेश के हैं और उनमें भी 56 मामले मुरादाबाद और उसके आस-पास के उन क्षेत्रों के हैं जहाँ मुसलमानों की संख्या अधिक है.                भारत के एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इण्डिया ने 27 जुलाई के अपने अंक में इस बावत एक समाचार प्रकाशित करते हुये सिद्ध किया था कि मुरादाबाद, रामपुर, ज्योतिबा फुले नगर जैसे क्षेत्रों में मुसलमान अपने बच्चों को पल्स पोलियो की खुराक नहीं पिलाते. इसका कारण मुसलमानों के मध्य व्याप्त यह धारणा है कि यह खुराक मुसलमानों की सन्तानों को बच्चा पैदा करने की क्षमता से वंचित करने का षड़यन्त्र है.                वास्तव में भारत में इसकी शुरूआत 2005 में एक उर्दू समाचार पत्र में छपे एक लेख के बाद हुई जिसमें मुसलमानों को इस खतरनाक दवा से अपने बच्चों को दूर रखने की चेतावनी दी गई थी.                             इस षड़यन्त्रकारी सिद्धान्त का प्रतिपादन नाईजीरिया की सुप्रीम शरियत काउन्सिल के अध्यक्ष और पेशे से डाक्टर इब्राहिम दत्ती अहमद ने किया था जिसका रहस्योद्घाटन अमेरिकी विद्वान डेनियल पाइप्स ने 2005 में अपने एक लेख के द्वारा किया था. नाईजीरियई डाक्टर के सिद्धान्त के बाद कि यह मुस्लिम पीढ़ी के बन्ध्याकरण का संगठित अमेरिकी प्रयास है, इस अफवाह ने गति पकड़ी और आज मुस्लिम बस्तियों में पोलियो की खुराक को लेकर कोई उत्साह नहीं है. इस बात की पुष्टि कोई भी पल्स पोलियो अभियान में लगी स्वयंसेवी संस्थाओं से कर सकता है.                   इस घटनाक्रम के बाद एक बार फिर प्रश्न उठता है कि आखिर मुस्लिम इतना अधिक असुरक्षा भाव से क्यों ग्रस्त है कि विकास या परिवर्तन की एक भी लहर उसके धर्म के अस्तित्व के लिये संकट बन कर खड़ी हो जाती है. कभी एक गीत उनके धर्म को नष्ट करने का खतरा उत्पन्न कर देता है तो कभी विकलांगता के अभिशाप से मुक्त करने का अभियान उन्हें अपने विरूद्ध षड़यन्त्र के रूप में दिखाई देता है, ऐसे में मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन का उत्तरदायी कौन है, गैर-मुसलमान या फिर स्वयं मुसलमान.             यही नहीं इससे यह प्रश्न भी उठता है कि मुसलमान आखिर किस आधार पर देश के विकास का अंग बनना चाहता है. जनसंख्या नियन्त्रण कार्यक्रमों का पालन न कर, पल्स पोलियो का विरोध कर, तलाक और विवाह में शरियत का पालन कर.                     कुछ उदारवादी लोगों की दृष्टि में ये विषय मुसलमानों पर छोड़ देने चाहिये पर अन्ततोगत्वा ये चीजें तो देश को ही प्रभावित करती हैं. यदि शरीर का कोई अंग पूरी तरह स्वस्थ नहीं है तो पूरा शरीर प्रभावित होगा और सम्भव है कि इस अंग का संक्रमण शरीर के अन्य हिस्सों को प्रभावित करे. ऐसे में व्यक्ति को क्या करना चाहिये इसका निर्णय तो सभी कर सकते हैं.

Posted in Uncategorized | 1 Comment »

अपने भानू जी

Posted by amitabhtri on सितम्बर 5, 2006

कभी-कभी कुछ लोग हमारे मध्य रहते हैं तो हम उनसे इतने अधिक आत्मसात् हो जाते हैं कि उनके बिछुड़ने मात्र की कल्पना से हम सिहर उठते हैं और यदि ऐसा बिछोह हो भी जाता है तो मन को मनाते हैं कि वे हमारे मध्य पुन: किसी न किसी स्वरूप में वापस आयेंगे. ऐसा ही हिन्दी के ख्यातिलब्ध पत्रकार स्व. भानुप्रताप शुक्ल के पाठकों, प्रशंसकों और आत्मीयजनों के साथ हुआ. पिछले 17 अगस्त को लम्बी बीमारी के बाद अन्तिम श्वांस लेने वाले श्री भानु जी अपने पीछे कितनी समृद्ध विरासत छोड़ गये हैं इसका आभास कल उनकी श्रद्धाजलि सभा को देखकर हुआ. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लगभग हजार लोगों की क्षमता वाले साईं आडीटोरियम का खचाखच भरा सभाकक्ष इस बात की पुष्टि कर रहा था कि अपने पाठकों, प्रशंसकों और आत्मीय जनों के मध्य भानू जी के नाम से लोकप्रिय स्व. भानुप्रताप शुक्ल ने अपनी वैचारिक साधना और तपस्वी जीवन से लोगों के ह्रदय में कितनी गहरी पैठ बना रखी थी.        जीवन के आरम्भिक वर्षों में माँ और पिता के स्नेह से वंचित रहे भानू जी ने अपने जीवन की इस रिक्तता को अपने जीवन का एक मिशन भी बनाया और जैसा कि वात्सल्य ग्राम की संचालिका साध्वी ऋतम्भरा जी ने कहा कि वे इस प्रकल्प के मानस शिल्पी थे और ऋतम्भरा जी में उन्होंने अपनी माँ के दर्शन किये और उन्हें दीदी माँ नाम दिया. भानू जी के व्यक्तित्व के इस पक्ष से स्पष्ट होता है कि उन्होंने कितनी संवेदनशीलता से अपने जीवन को पढ़ा था और जीवन को समष्टि में और समष्टि को अपने जीवन में एकाकार किया था.     जीवन के आरम्भिक दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ सम्पर्क में आये भानू जी को श्रीगुरूजी और पं.दीन दयाल उपाध्याय को निकट से देखने और उनका सान्निध्य प्राप्त करने का अवसर मिला था. उन दोनों ही महापुरूषों के व्यक्तित्व का प्रभाव उनके जीवन पर था. इसी कारण हिन्दुत्व की विचारधारा के प्रति अटूट निष्ठा और आग्रह होने के बाद भी वैचारिक मत भिन्नता वाले व्यक्तियों के साथ भी उनके व्यक्तिगत सम्बन्ध थे और इसका प्रमाण उनकी श्रद्धांजलि सभा में भी देखने को मिला जब श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के शिल्पियों के साथ इस आन्दोलन के खलनायक मुलायम सिंह यादव भी मंचासीन रहे. भानू जी की यह विशेषता हिन्दुत्व की उसी भावना के अनुरूप थी जिसमें समस्त जड़ चेतन में एक ही परमात्मा की अनुभूति की जाती है जो विविध स्वरूपों में स्वयं को प्रकट करता है.       हिन्दू संस्कृति की बिशेषता के अनुरूप उनका ह्रदय विशाल था परन्तु विचारधारा और संस्कृति के प्रति उनका आग्रह इतना आस्थावान था कि उसमें समझौता करने के बारे में वे सोच भी नहीं सकते थे. अपनी लेखनी के माध्यम से उन्होंने जिन युवाओं को हिन्दुत्व विचारधारा के प्रति प्रवृत्त किया उनमें मैं भी एक था. हालांकि साहित्यकार और घोर हिन्दूवादी पिता की सन्तान होने के  कारण लेखन और विचारधारा मुझे विरासत में मिली परन्तु अपनी विचारधारा का सशक्त प्रकटीकरण और छवि की चिन्ता किये बिना सत्य को स्थापित करने का साहस मुझे भानू जी से ही मिला.     श्रीराम मन्दिर आन्दोलन के पूर्व जब देश का बौद्धिक वर्ग स्वयं को सेकुलर खेमे में रखने के लिये अपनी संस्कृति, परम्परा, गौरव और इतिहास को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ता था, तब भानू जी ने हिन्दुत्व को बौद्धिक आन्दोलन बनाया और उसे वृहद आयाम प्रदान किया.        आज भी हमारे देश का बौद्धिक वर्ग छवि निर्माण के रोग से ग्रस्त है. इस रोग के कारण सत्य का अनुभव करते हुये भी उसे न बोलने की बौद्धिक बेईमानी हमारे अन्दर घर कर गई है. हम हिन्दुत्व की बात तो करना चाहते हैं परन्तु जाने-अनजाने मुस्लिम विरोधी होने की छवि से भयाक्रान्त हो जाते हैं. इसी भय का निवारण कर लेखन धर्म को सर्वोपरि रखा भानू जी ने.              उनका तर्क था बौद्धिक विपन्नता और कायरता राष्ट्र को नष्ट कर देती है. इसका शिकार हम हजारों वर्षों से होते आये हैं फिर भी हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई के भुलावे में जी रहे है.           श्रद्धाजलि सभा में बैठकर मुझे अपने चिट्ठों पर आई कुछ टिप्पणियाँ स्मरण  हो रही थीं जिनमें मुझे सलाह दी गई थी कि हिन्दू चेतना का प्रसार तो करूँ पर मुस्लिम विरोधी न बन जाऊँ. यह बात कुछ हजम होने लायक नहीं है. हमारे देश में ऐसे बहुत से उदारवादी हैं जो मुसलमानों को खुश करने के लिये संस्कृति, परम्परा, इतिहास, अतीत सब कुछ छोड़कर केवल भाई चारे की बात करना चाहते हैं पर भाई चारा कैसे सम्भव है जब हम एक को भाई मानते हैं और अगला हमें चारा समझता हो. आखिर संस्कृति की बात होगी तो इतिहास का उल्लेख होगा, इतिहास का उल्लेख होगा तो हिन्दुओं पर हुये मुस्लिम अत्याचारी शासकों की बात आयेगी. बात शिवाजी और महाराणा प्रताप की आयेगी. इतिहास के आधार पर कल के मुसलमानों और आज के मुसलमानों और आज के मुसलमानों की तुलना होगी. तुलना तो ऐतिहासिक अनुभव और परिप्रेक्ष्य में होगी. जिन प्रश्नों और विषयों पर इतिहास में हिन्दू मुस्लिम संघर्ष हुये यदि वे आज भी उसी स्वरूप में हैं तो इसका अर्थ है कि सांस्कृतिक संघर्ष अपनी पुरानी स्थिति पर टिका है. ऐसे में यदि हिन्दुओं से आग्रह होता है कि वे पुरानी बात छोड़कर विकास की बात करें, भाईचारे की बात करें तो साफ अर्थ है कि हिन्दू अपना सब कुछ त्याग दें और भाई चारा कायम करें.        आज विदेशी आक्रान्ता बाबर के ढाँचे से मुसलमानों को अगाध श्रद्धा है उनके लिये इसका ढहना उनके धर्म पर आघात है. एक विदेशी आक्रान्ता किसी राष्ट्र की जनता का श्रद्धापात्र कैसे बन सकता है. आज यदि ओसामा बिन लादेन अमेरिका पर हमला कर स्टेच्यू आफ लिबर्टी को ध्वस्त कर वहाँ अपने नाम की मस्जिद बना ले तो अमेरिकी जनता उसे स्वीकार करेगी नहीं सदियों तक उसके लिये संघर्ष करेगी और अवसर मिलने पर ओसामा मस्जिद गिरा देगी, अब यदि अमेरिका का मुसलमान चिल्लाये कि हमारे मजहब का प्रतीक गिरा दिया गया तो साथी अमेरिकी इन मुसलमानों के बारे में क्या सोचेंगे. यही बात भारत के मुसलमानों पर लागू होती है.      1937 में वन्देमातरम् का विरोध हुआ और 10 साल बाद पाकिस्तान बन गया कितने मुसलमान आगे आये जिन्ना की जिद रोकने. गाँधी जी ने क्या नहीं किया मुसलमानों को साथ रखने के लिये हिन्दुओं से हँसते-हँसते मर जाने तक कहा लेकिन क्या गाँधी मुस्लिम हठधर्मिता को रोक पाये. इसलिये देश के समक्ष उत्पन्न खतरों का उल्लेख जो नफा-नुकसान या छवि बचाकर करते हैं वे सत्य बोलने का या तो साहस नहीं रखते या फिर खतरों की गम्भीरता और उसके वास्तविक कारणों से अनभिज्ञ रहते हैं.      इस देश का भला हिन्दुओं के जाग्रत होने से ही होगा और इस जागरण के क्रम में यदि मुस्लिम विरोध होता है तो उसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये , क्योंकि यह समस्या हमारी नहीं है. हिन्दुओं ने सदैव मुसलमानों से मित्रता ही चाही है उन्होंने ही मानवता को काफिर और मोमिन में बाँटा है.

Posted in Uncategorized | 6 Comments »