हिंदू जागरण

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Archive for अक्टूबर, 2006

बेशर्म सेकुलरवादी

Posted by amitabhtri on अक्टूबर 14, 2006

गुजरात उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में रेल मन्त्री लालू प्रसाद यादव द्वारा गोधरा काण्ड की जाँच के लिये गठित की गई यू.सी.बनर्जी कमेटी के गठन को अवैध सिद्ध कर दिया है. लालू प्रसाद यादव रेलवे इन्क्वायरी एक्ट का नाम लेकर इस आयोग को गठित किया था. अपने गठन के आरम्भ से ही यह समिति राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित राजनीतिक सन्देश के एजेण्डे पर चल रही थी. आनन-फानन में इस समिति ने बिहार विधानसभा चुनावों से पहली अपनी रिपोर्ट देकर कुछ हास्यास्पद निष्कर्ष निकाले. यथा आग रेलगाड़ी में अन्दर से लगी थी. कारसेवकों के पास त्रिशूल थे इस कारण बाहरी हमलावरों का वे प्रतिरोध करते. यह निष्कर्ष स्वयं ही इस बात की पुष्टि करता है कि बनर्जी न्यायाधीश कम सेकुलरवादी राजनेता के रूप में अपनी जाँच कर रहे थे, अन्यथा उन्हें इतना तो पता होता कि कारसेवकों के पास रखा त्रिशूल कितनी प्रतिरोधक क्षमता का होता है.

                   बनर्जी ने अपनी अन्तरिम रिपोर्ट में फोरेन्सिक रिपोर्ट के अनेक तथ्यों की मनमाने आधार पर ब्याख्या कर गोधरा काण्ड को एक दुर्घटना सिद्ध कर दिया. अब बनर्जी आयोग के गठन को ही अवैधानिक बताकर गुजरात उच्च न्यायालय ने लालू प्रसाद सहित पूरे सेकुलरवादी खेमे की निष्पक्षता पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगा दिया है.     

            स्वाभाविक है कि इस निर्णय के बाद बहस बनर्जी आयोग तक सीमित न रहकर सेकुलरवाद के चरित्र तक जायेगी. गुजरात उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने लालू प्रसाद यादव के त्याग पत्र की माँग की है . उधर कांग्रेस ने इस निर्णय के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में जाने का संकेत देते हुये इस निर्णय को अन्तिम निर्णय न मानने का अनुरोध किया है. दोनों दलों के रूख से साफ है कि यदि भाजपा इसे सही ढंग से उठा पाई तो आने वाले दिनों में देश का राजनीतिक तापमान बढ़ सकता है.       परन्तु इन सबसे परे उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद सेकुलरवाद की अवधारणा पर नये सिरे से बहस की आवश्यकता अनुभव हो रही है. बनर्जी आयोग का गठन और फिर उससे मनचाही रिपोर्ट प्राप्त कर लेना इस बात का संकेत है कि भारतीय राजनीतिक ढाँचा सेकुलरवाद के नाम पर मुसलमानों का बन्धक बन चुका है जहाँ प्रत्येक नियम, कानून या घटनाओं की ब्याख्या इस आधार पर की जाती है कि मुसलमानों को कितनी सुविधा रहे.                       

             जिस प्रकार 27 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन पर अयोध्या से श्रीराम का दर्शन कर वापस लौट रहे कारसेवकों को साबरमती रेलगाड़ी में जीवित जला दिया गया था वह हिन्दुओं के विरूद्ध इस्लाम के आक्रमण की सीधी घोषणा थी. कोई कल्पना कर सकता है कि हज यात्रियों को ला रही रेलगाड़ी में आग लगाकर 56 हजयात्रियों को जीवित जला देने के बाद मुस्लिम प्रतिक्रिया क्या होगी, या फिर भारत के राजनीतिक दलों का क्या रूख होगा. परन्तु गोधरा काण्ड के बाद देश के राजनीतिक दलों ने लीपा पोती शुरू की और बेशर्मी से अन्दर से आग लगी जैसे मिथक गढ़ कर आरोपियों को बचाने के साथ मुसलमानों को सन्देश दिया कि वे अपने अभियान में लगे रहें.    

             गोधरा काण्ड के बाद जिस तरह अन्दर से आग लगी अवधारणा विकसित कर उसे प्रचारित किया गया उससे सेकुलरवाद के नाम पर समस्त विश्व में मुसलमानों के समक्ष समर्पण की सामान्य प्रवृत्ति का संकेत मिलता है. बीते कुछ वर्षों में हमें अनेक ऐसे अवसर देखने को मिले हैं जब बड़ी इस्लामी आतंकवादी घटनाओं को वामपंथी-उदारवादी सेकुलर नेताओं और बुद्धिजीवियों ने मुसलमानों को उस घटना से अलग करते हुये विचित्र मिथक विकसित किये हैं. 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुये आतंकी हमले के बाद समस्त विश्व के वामपंथी-उदारवादी सेकुलरपंथियों ने इजरायल और अमेरिका की खुफिया एजेन्सियों को इसके लिये दोषी ठहराते हुये इन देशों पर अपने ही निवासियों को मरवाने का आरोप मढ़ दिया. आज प्रत्येक वामपंथी-उदारवादी और मुस्लिम बुद्धिजीवी  इस सिद्धान्त के पक्ष में अपने तर्क भी देता है, इसी प्रकार अगस्त महीने में ब्रिटेन में अनेक विमानों को उड़ाने के षड़यन्त्र के असफल होने पर विश्व भर में इसी लाबी ने प्रचारित किया कि यह अमेरिका और ब्रिटेन का षड़यन्त्र है ताकि लेबनान मे हो रहे अत्याचार से विश्व का ध्यान खींचा जा सके.    

                 इसी भावना से प्रेरित भारत स्थित वामपंथी-उदारवादी सेकुलर सम्प्रदाय के लोग भारत में होने वाले प्रत्येक आतंकवादी हमलों के बाद सुरक्षा बलों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हुये हिन्दूवादी संगठनों को इन हमलों से जोड़ने का प्रयास करते हैं. संकेत साफ है कि समस्त विश्व में सेकुलरवाद की ब्याख्या और उसका प्रतिरोध एक ही प्रकार से हो रहा है.    सेकुलरवाद के नाम पर मुस्लिम समर्पण की इस प्रवृत्ति के विकास में उन बुद्धिजीवियों का बड़ी मात्रा में योगदान है जो अपने बुद्धि कौशल के बल पर हर बात में दक्षिण और वामपंथी खेमेबन्दी कर मुसलमानों को पीड़ित के रूप में चित्रित करते हैं.     आज पूरी दुनिया में इस्लाम की आक्रामकता और सेकुलरिज्म की खोखली अवधारणा से उसे मिल रहे प्रोत्साहन की पृष्ठभूमि में समस्त संस्कृतियाँ सेकुलरिज्म की पकड़ से बाहर आना चाहती हैं. यूरोप में सेकुलरिज्म के खोखलेपन ने ईसाइयत के समक्ष अपनी पहचान खोने का संकट खड़ा कर दिया है जहाँ ईसाई नवयुवक तेजी से इस्लाम में धर्मान्तरित हो रहे हैं. इसी प्रकार इजरायल वामपंथियों के प्रचार के समक्ष स्वयं को आक्रान्ता की छवि से मुक्त कर अपनी पीड़ा विश्व के समक्ष लाने को उद्यत है. ऐसे में सेकुलरिज्म की नये सिरे से व्याख्या किये जाने की पहल की जानी चाहिये ताकि इस सिद्धान्त के नाम पर मुसलमानों के समक्ष समर्पण की प्रवृत्ति पर अंकुश लगे और इस सिद्धान्त की आड़ में मुसलमानों को  समस्त विश्व पर शरियत का कानून लागू करने और कुरान थोपने के उनके अभियान से उन्हें रोका जा सके. 

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उत्तर कोरिया

Posted by amitabhtri on अक्टूबर 13, 2006

उत्तर कोरिया द्वारा पिछले दिनों किये गये परमाणु परीक्षण के बाद पूर्वी एशिया सहित समस्त विश्व का कूटनीतिक तापमान बढ़ गया है. पिछले जून महीने में लम्बी दूरी की मिसाइल का परीक्षण करने के बाद उत्तर कोरिया ने एक बार फिर विश्व के अनुरोध को दरकिनार करते हुये परमाणु परीक्षण कर परमाणु अप्रसार पर नये सिरे से बहस आरम्भ कर दी है. उत्तर कोरिया के इस परीक्षण को सभी देश अपने-अपने ढंग से ब्याख्यायित करने में लगे हैं. जापान और दक्षिण कोरिया जहाँ इसे अपने ऊपर सीधा खतरा मानकर अमेरिका और सुरक्षा परिषद से उत्तर कोरिया के विरूद्ध कड़े प्रतिबन्धों की माँग कर रहे हैं तो वहीं अमेरिका कूटनीतिक रास्ते अपनाने के विकल्प पर विचार कर तत्काल सैन्य कार्रवाई से फिलहाल बच रहा है. चीन ने उत्तर कोरिया के परीक्षण की निन्दा अवश्य की है परन्तु वह इस देश को अलग-थलग करने के प्रस्ताव से सहमत नहीं दिखता.       

                विश्लेषकों के अनुसार उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण के पीछे दो प्रमुख कारण हैं- घरेलू मोर्चे पर खस्ता आर्थिक हालात और अकाल जैसी स्थितियों से निबटने के लिये परमाणु ब्लैकमेलिंग के जरिये विश्व की महाशक्तियों से आर्थिक सहायता प्राप्त करना जैसा कि उत्तर कोरिया 1990 के दशक में बिल क्लिंटन के कार्यकाल में भी कर चुका है , साथ ही अमेरिका का ध्यान आकर्षित कर उसे सीधे बातचीत के लिये विवश करना. इसके अतिरिक्त दूसरा प्रमुख कारण अमेरिका के सम्भावित आक्रमण को टालने के लिये शक्ति सन्तुलन स्थापित करना. अमेरिका के राष्ट्रपति बुश द्वारा उत्तर कोरिया को ईरान के साथ बुराई की धुरी बताने के बाद इस देश के शासकों को अमेरिका के आक्रमण का भय सता रहा है. उत्तर कोरिया ने ईराक पर अमेरिकी आक्रमण के बाद निष्कर्ष निकाला कि ईराक आक्रमण का निशाना इसलिये बना कि वह परमाणु शक्ति सम्पन्न नहीं था.      

             विश्व में चल रही कूटनीतिक कवायद के बीच इस सम्बन्ध में परमाणु शक्ति सम्पन्न भारत की स्थिति समझना रोचक होगा. भारत ने अपेक्षा के अनुरूप उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण की तत्काल निन्दा की और परमाणु अप्रसार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दुहराई. उत्तर कोरिया द्वारा परमाणु तकनीक प्राप्त करने में पाकिस्तानी सम्पर्क और विशेषकर अब्दुल कादिर के नेटवर्क ने भारत को पाकिस्तान पर दबाव डालने का एक और अवसर प्रदान कर दिया है, परन्तु उत्तर कोरिया के सम्बन्ध में भारत की तत्काल व्यक्त प्रतिक्रिया से एक और प्रश्न भी खड़ा हुआ है और वह है भारत की विदेश नीति पर वोट बैंक की राजनीति का प्रभाव.      सम्भवत: भारत सरकार उत्तर कोरिया के परीक्षण की तत्काल निन्दा इसलिये कर पाई कि इस देश की भावना से जुड़ा कोई वोट बैंक भारत में नहीं है जबकि इसके विपरीत भारत की सरकार और विदेश नीति का अपहरण करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अब तक स्पष्ट रवैया नहीं अपनाया है. भारत की सरकार ने अन्तरराष्ट्रीय परमाणु एजेन्सी में दो बार मतदान भले ही यूरोप और अमेरिका के साथ कर दिया हो परन्तु घरेलू राजनीति में ईरान के परमाणु मुद्दे को मुस्लिम वोट बैंक के रूप में जीवित रखा है. यहाँ तक कि पिछले विधानसभा चुनावों में केरल में कम्युनिस्ट पार्टी ने विदेश नीति के मुद्दे पर चुनाव लड़ते हुये ईरान और इजरायल के विषय पर कांग्रेस की सहयोगी मुस्लिम लीग को उसके ही गढ़ मल्लापुरम् में पटखनी दे दी. इन्हीं चुनाव परिणामों का असर है कि प्रधानमन्त्री ने संयुक्त राष्ट्र संघ की आमसभा को सम्बोधित करने के स्थान पर क्यूबा में गुट निरपेक्ष सम्मेलन में भाग लेकर क्यूबा और वेनेजुएला के शासनाध्यक्षों के साथ मिलकर ईरान के परमाणु सम्पन्न होने के अधिकार का समर्थन किया.     

                    उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण के पश्चात भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया ने उसे परमाणु अप्रसार के प्रति निष्पक्ष नीति अपनाने को विवश कर दिया है. इस घटनाक्रम के बाद सत्तासीन कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को ईरान और उत्तर कोरिया के मामले में एक ही दृष्टिकोण अपनाने को विवश होना होगा.      

           इससे परे भारत पर उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण के कुछ परिणाम अवश्य होने वाले हैं. उत्तर कोरिया को चीन की सहानुभूति प्राप्त है तथा उसका स्वार्थ अमेरिका के सिरदर्द उत्पन्न करने में है जो कि जापान और दक्षिण कोरिया में भय और असुरक्षा व्याप्त करने से ही सम्भव है. जापान और दक्षिण कोरिया दोनों ही अपनी सुरक्षा के लिये पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर हैं. ईराक में बुरी तरह फँस चुका अमेरिका मध्य पूर्व के बाद पूर्वी एशिया में तत्काल मोर्चा खोलने की स्थिति में नहीं है . इस स्थिति में भारत को पूर्वी एशिया में जापान और दक्षिण कोरिया के सम्बन्ध में अपनी नीति को अधिक प्रभावी बनाते हुये अमेरिका के सहयोगी की भूमिका निभाते हुये सक्रिय होना चाहिये ताकि चीन के किसी भी विस्तार को रोका जा सके.       

            उत्तरी कोरिया के परमाणु परीक्षण के बाद विश्व स्तर पर नये समीकरण उभर सकते हैं जिनमें अमेरिका को नये साथियों की आवश्यकता पड़ सकती है साथ ही जापान और दक्षिण कोरिया में भी सैन्य दृष्टि से सशक्त और स्वावलम्बी होने की आवश्यकता अनुभव हो सकती है जिसका तार्किक परिणति इन दोनों देशों में शस्त्र दौड़ के रूप में हो सकती है. एक उत्तरदायी और शक्ति सम्पन्न राष्ट्र के रूप में भारत का यह दायित्व बनता है कि वह पश्चिम एशिया और पूर्व एशिया में लोकतान्त्रिक शक्तियों को मजबूत करने तथा तानाशाही और कट्टरपंथी शक्तियों को कमजोर करने के लिये अधिक मुखर और सक्रिय भूमिका का निर्वाह करे.

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अफजल की फांसी

Posted by amitabhtri on अक्टूबर 13, 2006

भारत के लोकतान्त्रिक ढ़ाँचे के सर्वोच्च संस्थान संसद पर आक्रमण कर भारतीय सम्प्रभुता को चुनौती देने वाले आतंकवादियों में से एक मो. अफजल को  फांसी की प्रस्तावित 20 अक्टूबर की तिथि को फिलहाल टालने के साथ ही अफजल को माफ करवाने के प्रयास भी तेज कर दिये गये हैं. अफजल को माफी दिलाने का पहला स्वर जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री की ओर से आया जब उन्होंने प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह को राज्य में शान्ति व्यवस्था बनाये रखने के हित में अफजल को माफ करने की माँग की. जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री गुलाम नबी आजाद की इस अपील के बाद जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमन्त्री फारूख अब्दुल्ला ने भी ऐसी ही माँग की तथा उनका साथ राज्य की सत्ताधारी पी.डी.पी की नेत्री महबूबा मुफ्ती ने भी दिया.    

         राज्य के कतिपय नेताओं के बयान से उत्साहित अफजल के परिजनों से देश की राजधानी आकर स्वयं राष्ट्रपति से मिलने का निर्णय लिया है. जम्मू कश्मीर के इन नेताओं और अफजल के परिजनों की यह माँग कुछ अर्थों में कार्य करती दिख रही है और कुछ अपुष्ट सूत्रों के अनुसार अफजल की फांसी की प्रस्तावित तिथि 20 अक्टूबर को फिलहाल टाल देने का निर्णय लिया जा चुका है. इस निर्णय के बाद कुछ प्रश्न अवश्य उठ खड़े हुये हैं.    

           जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री ने अफजल की फांसी को टालने या क्षमा करने का जो प्रमुख तर्क दिया था वह यह था कि फांसी की प्रस्तावित तिथि 20 अक्टूबर रमजान महीने का अन्तिम शुक्रवार है और इस तिथि को अफजल को फांसी देने से राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति तो बिगड़ेगी ही साथ ही पाकिस्तान के साथ चल रही शान्ति प्रक्रिया भी प्रभावित होगी.     जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री का यह तर्क समस्त विश्व के इस्लामी आतंकवादियों की उस रणनीति की बहुत बड़ी विजय है जिसे उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में विश्व के अनेक क्षेत्रों में अपनाया है. यह रणनीति है राज्य की संस्थाओं या जनमत निर्माण करने वाले संगठनों या व्यक्तियों को आतंकित करना या हिंसा का भय दिखाकर उन्हें अपना निर्णय बदलने पर विवश करना.   

              2004 में हालैण्ड के प्रसिद्ध लेखक और फिल्म निर्देशक थियो वान गाग की एम्सटर्डम में दिन दहाड़े की गई क्रूर हत्या इस रणनीति का अहम हिस्सा थी जब अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर पश्चिमी विश्व  को इस्लाम की आलोचना से डराकर रोका गया था. इसी प्रकार ब्रिटेन में जुलाई 2005 में परिवहन ढाँचे पर हमला कर इस्लामी आतंकवादियों ने प्रत्यक्ष रूप से इस देश को धमकाया फिर फ्रांस में दंगों के माध्यम से जनता को कम से कम क्षति पहुँचाकर सरकारी सम्पत्ति को निशाना बनाकर फ्रांस की जनता और सरकार में ईराक के सम्बन्ध में देश की भूमिका पर बहस आरम्भ करने को विवश किया था.      

            2003 में अमेरिका द्वारा ईराक पर किये गये हमले के बाद ईराक में अनेक देशों की सेनाओं को देश छोड़ने के लिये बाध्य करने के लिये इस्लामी आतंकी  संगठनों ने अनेक देशों के नागरिकों या सैनिकों का अपहरण कर इन देशों को अपनी विदेश नीति बदलने पर विवश किया.     अभी पिछले महीने फिलीस्तीन में अमेरिका के    दो  पत्रकारों का अपहरण कर उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेने की शर्त पर छोड़ दिया गया.    

             विश्व में इस्लामी आतंकवादियों की इस नई नीति को गम्भीरता से लिये जाने की आवश्यकता है विशेषकर उन परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में कि इस्लामी आतंकवादियों का एजेण्डा पूरी तरह स्पष्ट है कि वे हिंसा के सहारे विभिन्न देशों की नीतियों को अपने अनुसार संचालित करना चाहते हैं.        

          इस्लामी आतंकवादियों के इस कार्य में सबसे बड़ा सम्बल उन राजनीतिक शक्तियों और बुद्धिजीवियों से मिलता है जो मुस्लिमों पर अत्याचार के इस्लामी आतंकवादियों के अपप्रचार को सहयोग प्रदान करते हुये आतंकवादियों के विरूद्ध कड़ी कार्रवाई का विरोध मानव अधिकारियों के नाम पर करते हैं तथा आतंकवादियों के पक्ष में सहानुभूति के वातावरण का निर्माण करते हैं.   इस्लामी आतंकवाद के इस युग में सबसे बड़ी आवश्यकता आतंकवादियों की रणनीति को पूरी तरह समझकर उसमें सहयोग करने वाले तत्वों को पहचानकर उन्हें बेनकाब करने की है.    

          मो. अफजल की फांसी की सजा की माफी का अभियान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत में भी ऐसा बौद्धिक राजनीतिक  वर्ग है जो अपने निहित स्वार्थों के लिये इस्लामी आतंकवादियों के प्रति पूरी सहानुभूति रखता है. इस्लामी आतंकवादियों की यह नई रणनीति विश्वव्यापी जेहाद को नया आयाम स्वरूप प्रदान करते हुये इसका प्रतिरोध करने के लिये कुछ विशेष वैश्विक रणनीति की आवश्यकता की ओर संकेत करती है.     

             आतंकियों को सजा दिलाने या उनके प्रति कठोरता से पेश आने के मामले में अमेरिका और यूरोप के देशों की अपेक्षा कहीं अधिक नरम देश की छवि बना चुका भारत यदि मो. अफजल जैसे आतंकवादियों की सजा इस्लामवादियों के दबाव में टालने या क्षमा करने की नई प्रवृत्ति का विकास करता है तो निश्चय ही यह देशवासियों की पराजय और  भात पर शरियत और इस्लाम का शासन स्थापित करने की आकांक्षा रखने वाले इस्लामादियों की विजय होगी.  

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अफजल की फांसी की माफी के मायने

Posted by amitabhtri on अक्टूबर 4, 2006

भारत के लोकतान्त्रिक ढ़ाँचे के सर्वोच्च संस्थान संसद पर आक्रमण कर भारतीय सम्प्रभुता को चुनौती देने वाले आतंकवादियों में से एक मो. अफजल को  फांसी की प्रस्तावित 20 अक्टूबर की तिथि को फिलहाल टालने के साथ ही अफजल को माफ करवाने के प्रयास भी तेज कर दिये गये हैं. अफजल को माफी दिलाने का पहला स्वर जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री की ओर से आया जब उन्होंने प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह को राज्य में शान्ति व्यवस्था बनाये रखने के हित में अफजल को माफ करने की माँग की. जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री गुलाम नबी आजाद की इस अपील के बाद जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमन्त्री फारूख अब्दुल्ला ने भी ऐसी ही माँग की तथा उनका साथ राज्य की सत्ताधारी पी.डी.पी की नेत्री महबूबा मुफ्ती ने भी दिया.     

                  राज्य के कतिपय नेताओं के बयान से उत्साहित अफजल के परिजनों से देश की राजधानी आकर स्वयं राष्ट्रपति से मिलने का निर्णय लिया है. जम्मू कश्मीर के इन नेताओं और अफजल के परिजनों की यह माँग कुछ अर्थों में कार्य करती दिख रही है और कुछ अपुष्ट सूत्रों के अनुसार अफजल की फांसी की प्रस्तावित तिथि 20 अक्टूबर को फिलहाल टाल देने का निर्णय लिया जा चुका है. इस निर्णय के बाद कुछ प्रश्न अवश्य उठ खड़े हुये हैं.    

                         जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री ने अफजल की फांसी को टालने या क्षमा करने का जो प्रमुख तर्क दिया था वह यह था कि फांसी की प्रस्तावित तिथि 20 अक्टूबर रमजान महीने का अन्तिम शुक्रवार है और इस तिथि को अफजल को फांसी देने से राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति तो बिगड़ेगी ही साथ ही पाकिस्तान के साथ चल रही शान्ति प्रक्रिया भी प्रभावित होगी.     जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री का यह तर्क समस्त विश्व के इस्लामी आतंकवादियों की उस रणनीति की बहुत बड़ी विजय है जिसे उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में विश्व के अनेक क्षेत्रों में अपनाया है. यह रणनीति है राज्य की संस्थाओं या जनमत निर्माण करने वाले संगठनों या व्यक्तियों को आतंकित करना या हिंसा का भय दिखाकर उन्हें अपना निर्णय बदलने पर विवश करना.   

                    2004 में हालैण्ड के प्रसिद्ध लेखक और फिल्म निर्देशक थियो वान गाग की एम्सटर्डम में दिन दहाड़े की गई क्रूर हत्या इस रणनीति का अहम हिस्सा थी जब अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर पश्चिमी विश्व  को इस्लाम की आलोचना से डराकर रोका गया था. इसी प्रकार ब्रिटेन में जुलाई 2005 में परिवहन ढाँचे पर हमला कर इस्लामी आतंकवादियों ने प्रत्यक्ष रूप से इस देश को धमकाया फिर फ्रांस में दंगों के माध्यम से जनता को कम से कम क्षति पहुँचाकर सरकारी सम्पत्ति को निशाना बनाकर फ्रांस की जनता और सरकार में ईराक के सम्बन्ध में देश की भूमिका पर बहस आरम्भ करने को विवश किया था.      

                    2003 में अमेरिका द्वारा ईराक पर किये गये हमले के बाद ईराक में अनेक देशों की सेनाओं को देश छोड़ने के लिये बाध्य करने के लिये इस्लामी आतंकी  संगठनों ने अनेक देशों के नागरिकों या सैनिकों का अपहरण कर इन देशों को अपनी विदेश नीति बदलने पर विवश किया.     अभी पिछले महीने फिलीस्तीन में अमेरिका के    दो  पत्रकारों का अपहरण कर उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेने की शर्त पर छोड़ दिया गया.    

                  विश्व में इस्लामी आतंकवादियों की इस नई नीति को गम्भीरता से लिये जाने की आवश्यकता है विशेषकर उन परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में कि इस्लामी आतंकवादियों का एजेण्डा पूरी तरह स्पष्ट है कि वे हिंसा के सहारे विभिन्न देशों की नीतियों को अपने अनुसार संचालित करना चाहते हैं.       

                        इस्लामी आतंकवादियों के इस कार्य में सबसे बड़ा सम्बल उन राजनीतिक शक्तियों और बुद्धिजीवियों से मिलता है जो मुस्लिमों पर अत्याचार के इस्लामी आतंकवादियों के अपप्रचार को सहयोग प्रदान करते हुये आतंकवादियों के विरूद्ध कड़ी कार्रवाई का विरोध मानव अधिकारियों के नाम पर करते हैं तथा आतंकवादियों के पक्ष में सहानुभूति के वातावरण का निर्माण करते हैं.   इस्लामी आतंकवाद के इस युग में सबसे बड़ी आवश्यकता आतंकवादियों की रणनीति को पूरी तरह समझकर उसमें सहयोग करने वाले तत्वों को पहचानकर उन्हें बेनकाब करने की है.     मो. अफजल की फांसी की सजा की माफी का अभियान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत में भी ऐसा बौद्धिक राजनीतिक  वर्ग है जो अपने निहित स्वार्थों के लिये इस्लामी आतंकवादियों के प्रति पूरी सहानुभूति रखता है. इस्लामी आतंकवादियों की यह नई रणनीति विश्वव्यापी जेहाद को नया आयाम स्वरूप प्रदान करते हुये इसका प्रतिरोध करने के लिये कुछ विशेष वैश्विक रणनीति की आवश्यकता की ओर संकेत करती है.     

                आतंकियों को सजा दिलाने या उनके प्रति कठोरता से पेश आने के मामले में अमेरिका और यूरोप के देशों की अपेक्षा कहीं अधिक नरम देश की छवि बना चुका भारत यदि मो. अफजल जैसे आतंकवादियों की सजा इस्लामवादियों के दबाव में टालने या क्षमा करने की नई प्रवृत्ति का विकास करता है तो निश्चय ही यह देशवासियों की पराजय और  भात पर शरियत और इस्लाम का शासन स्थापित करने की आकांक्षा रखने वाले इस्लामादियों की विजय होगी.  

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