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उत्तर कोरिया

Posted by amitabhtri on अक्टूबर 13, 2006

उत्तर कोरिया द्वारा पिछले दिनों किये गये परमाणु परीक्षण के बाद पूर्वी एशिया सहित समस्त विश्व का कूटनीतिक तापमान बढ़ गया है. पिछले जून महीने में लम्बी दूरी की मिसाइल का परीक्षण करने के बाद उत्तर कोरिया ने एक बार फिर विश्व के अनुरोध को दरकिनार करते हुये परमाणु परीक्षण कर परमाणु अप्रसार पर नये सिरे से बहस आरम्भ कर दी है. उत्तर कोरिया के इस परीक्षण को सभी देश अपने-अपने ढंग से ब्याख्यायित करने में लगे हैं. जापान और दक्षिण कोरिया जहाँ इसे अपने ऊपर सीधा खतरा मानकर अमेरिका और सुरक्षा परिषद से उत्तर कोरिया के विरूद्ध कड़े प्रतिबन्धों की माँग कर रहे हैं तो वहीं अमेरिका कूटनीतिक रास्ते अपनाने के विकल्प पर विचार कर तत्काल सैन्य कार्रवाई से फिलहाल बच रहा है. चीन ने उत्तर कोरिया के परीक्षण की निन्दा अवश्य की है परन्तु वह इस देश को अलग-थलग करने के प्रस्ताव से सहमत नहीं दिखता.       

                विश्लेषकों के अनुसार उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण के पीछे दो प्रमुख कारण हैं- घरेलू मोर्चे पर खस्ता आर्थिक हालात और अकाल जैसी स्थितियों से निबटने के लिये परमाणु ब्लैकमेलिंग के जरिये विश्व की महाशक्तियों से आर्थिक सहायता प्राप्त करना जैसा कि उत्तर कोरिया 1990 के दशक में बिल क्लिंटन के कार्यकाल में भी कर चुका है , साथ ही अमेरिका का ध्यान आकर्षित कर उसे सीधे बातचीत के लिये विवश करना. इसके अतिरिक्त दूसरा प्रमुख कारण अमेरिका के सम्भावित आक्रमण को टालने के लिये शक्ति सन्तुलन स्थापित करना. अमेरिका के राष्ट्रपति बुश द्वारा उत्तर कोरिया को ईरान के साथ बुराई की धुरी बताने के बाद इस देश के शासकों को अमेरिका के आक्रमण का भय सता रहा है. उत्तर कोरिया ने ईराक पर अमेरिकी आक्रमण के बाद निष्कर्ष निकाला कि ईराक आक्रमण का निशाना इसलिये बना कि वह परमाणु शक्ति सम्पन्न नहीं था.      

             विश्व में चल रही कूटनीतिक कवायद के बीच इस सम्बन्ध में परमाणु शक्ति सम्पन्न भारत की स्थिति समझना रोचक होगा. भारत ने अपेक्षा के अनुरूप उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण की तत्काल निन्दा की और परमाणु अप्रसार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दुहराई. उत्तर कोरिया द्वारा परमाणु तकनीक प्राप्त करने में पाकिस्तानी सम्पर्क और विशेषकर अब्दुल कादिर के नेटवर्क ने भारत को पाकिस्तान पर दबाव डालने का एक और अवसर प्रदान कर दिया है, परन्तु उत्तर कोरिया के सम्बन्ध में भारत की तत्काल व्यक्त प्रतिक्रिया से एक और प्रश्न भी खड़ा हुआ है और वह है भारत की विदेश नीति पर वोट बैंक की राजनीति का प्रभाव.      सम्भवत: भारत सरकार उत्तर कोरिया के परीक्षण की तत्काल निन्दा इसलिये कर पाई कि इस देश की भावना से जुड़ा कोई वोट बैंक भारत में नहीं है जबकि इसके विपरीत भारत की सरकार और विदेश नीति का अपहरण करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अब तक स्पष्ट रवैया नहीं अपनाया है. भारत की सरकार ने अन्तरराष्ट्रीय परमाणु एजेन्सी में दो बार मतदान भले ही यूरोप और अमेरिका के साथ कर दिया हो परन्तु घरेलू राजनीति में ईरान के परमाणु मुद्दे को मुस्लिम वोट बैंक के रूप में जीवित रखा है. यहाँ तक कि पिछले विधानसभा चुनावों में केरल में कम्युनिस्ट पार्टी ने विदेश नीति के मुद्दे पर चुनाव लड़ते हुये ईरान और इजरायल के विषय पर कांग्रेस की सहयोगी मुस्लिम लीग को उसके ही गढ़ मल्लापुरम् में पटखनी दे दी. इन्हीं चुनाव परिणामों का असर है कि प्रधानमन्त्री ने संयुक्त राष्ट्र संघ की आमसभा को सम्बोधित करने के स्थान पर क्यूबा में गुट निरपेक्ष सम्मेलन में भाग लेकर क्यूबा और वेनेजुएला के शासनाध्यक्षों के साथ मिलकर ईरान के परमाणु सम्पन्न होने के अधिकार का समर्थन किया.     

                    उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण के पश्चात भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया ने उसे परमाणु अप्रसार के प्रति निष्पक्ष नीति अपनाने को विवश कर दिया है. इस घटनाक्रम के बाद सत्तासीन कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को ईरान और उत्तर कोरिया के मामले में एक ही दृष्टिकोण अपनाने को विवश होना होगा.      

           इससे परे भारत पर उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण के कुछ परिणाम अवश्य होने वाले हैं. उत्तर कोरिया को चीन की सहानुभूति प्राप्त है तथा उसका स्वार्थ अमेरिका के सिरदर्द उत्पन्न करने में है जो कि जापान और दक्षिण कोरिया में भय और असुरक्षा व्याप्त करने से ही सम्भव है. जापान और दक्षिण कोरिया दोनों ही अपनी सुरक्षा के लिये पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर हैं. ईराक में बुरी तरह फँस चुका अमेरिका मध्य पूर्व के बाद पूर्वी एशिया में तत्काल मोर्चा खोलने की स्थिति में नहीं है . इस स्थिति में भारत को पूर्वी एशिया में जापान और दक्षिण कोरिया के सम्बन्ध में अपनी नीति को अधिक प्रभावी बनाते हुये अमेरिका के सहयोगी की भूमिका निभाते हुये सक्रिय होना चाहिये ताकि चीन के किसी भी विस्तार को रोका जा सके.       

            उत्तरी कोरिया के परमाणु परीक्षण के बाद विश्व स्तर पर नये समीकरण उभर सकते हैं जिनमें अमेरिका को नये साथियों की आवश्यकता पड़ सकती है साथ ही जापान और दक्षिण कोरिया में भी सैन्य दृष्टि से सशक्त और स्वावलम्बी होने की आवश्यकता अनुभव हो सकती है जिसका तार्किक परिणति इन दोनों देशों में शस्त्र दौड़ के रूप में हो सकती है. एक उत्तरदायी और शक्ति सम्पन्न राष्ट्र के रूप में भारत का यह दायित्व बनता है कि वह पश्चिम एशिया और पूर्व एशिया में लोकतान्त्रिक शक्तियों को मजबूत करने तथा तानाशाही और कट्टरपंथी शक्तियों को कमजोर करने के लिये अधिक मुखर और सक्रिय भूमिका का निर्वाह करे.

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