हिंदू जागरण

हिंदू चेतना का स्वर

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जागो हिन्दू

Posted by amitabhtri on नवम्बर 19, 2006

वैसे तो पिछले डेढ़ वर्ष से केन्द्र में सत्तारूढ़ होने  के बाद से संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन ने एक के बाद एक मुस्लिम तुष्टीकरण के ऐसे कदम उठाये हैं जो पिछले सारे रिकार्ड धवस्त करते हैं. पिछले वर्ष दो निजी टेलीविजन के साथ साक्षात्कार में कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी ने स्वीकार किया था कि मुसलमान कांग्रेस के स्वाभाविक मित्र हैं और उन्हें अपने पाले में वापस लाने का पूरा प्रयास किया जायेगा. यह इस बात का संकेत था कि मुसलमानों को कुछ और विशेषाधिकार दिये जायेंगे.

                 इसी बीच  केन्द्र सरकार ने सेवा निवृत्त न्यायाधीश राजेन्द्र सच्चर की अध्यक्षता में एक आयोग बनाकर समाज के प्रत्येक क्षेत्र में मुसलमानों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति का आकलन करने का निर्णय लिया. सेना में मुसलमानों की गिनती सम्बन्धी आदेश को लेकर उठे विवाद के बाद उस निर्णय को तो टाल दिया गया परन्तु न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका में मुस्लिम भागीदारी का सर्वेक्षण अवश्य किया गया. 

     

       राजेन्द्र सच्चर आयोग ने अब अपनी विस्तृत रिपोर्ट प्रधानमन्त्री को सौंप दी है. इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने से पूर्व ही जिस प्रकार प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह ने मुसलमानों की बराबर हिस्सेदारी की बात कह डाली वह तो स्पष्ट करता है कि सरकार ने मुसलमानों को आरक्षण देने का मन बना लिया है. इसकी झलक पहले भी मिल चुकी है जब आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमन्त्री ने अपने प्रदेश में मुसलमानों को आरक्षण दिया परन्तु आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने उसे निरस्त कर दिया. फिर भी सरकार का तुष्टीकरण का खेल जारी रहा. संघ लोक सेवा आयोग में मुस्लिम प्रत्याशियों के लिये सरकारी सहायता, रिजर्व बैंक से मुसलमानों को ऋण की विशेष सुविधा, विकास योजनाओं का कुछ प्रतिशत मुसलमानों के लिये आरक्षित करना ऐसे कदम थे जो मुस्लिम आरक्षण की भूमिका तैयार कर रहे थे. अब सच्चर आयोग ने आरक्षण की सिफारिश न करते हुये भी मुस्लिम आरक्षण के लिये मार्ग प्रशस्त कर दिया है.  

    

        मुसलमानों को बराबर की हिस्सेदारी का सवाल उठा ही क्यो? इसका उत्तर हे कि हमारे सेक्यूलर वामपंथी उदारवादी दलील देते हैं कि इस्लामी आतंकवाद मुसलमानों के पिछड़ेपन का परिणाम है. इसी तर्क के सन्दर्भ में दो महत्वपूर्ण तथ्यों को समझना समीचीन होगा. सच्चर आयोग ने ही अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देश की जेलों में बन्द कैदियों की संख्या में मुसलमानों की संख्या उनकी जनसंख्या के अनुपात से काफी अधिक है. भारत की जेलों में कुल 102,652 मुसलमान बन्द हैं और उनमें भी 6 माह से 1 वर्ष की सजा काट रहे मुसलमानों की संख्या का प्रतिशत और भी अधिक है. कुछ लोग इसका कारण भी मुसलमानों के पिछड़ेपन को ठहरा सकते हैं पर ऐसा नहीं है.

     केवल भारत में ही नहीं फ्रांस, इटली, ब्रिटेन, स्काटलैण्ड और अमेरिका में भी जेलों में बन्द मुसलमानों का प्रतिशत उनकी कुल जनसंख्या के अनुपात में अधिक है. इसका कारण मुसलमानों का पिछड़ापन नहीं वरन् जेलों में गैर मुसलमान कैदियों का मुसलमानों द्वारा कराया जाने वाला धर्मान्तरण है. अभी हाल में मुम्बई में आर्थर रोड जेल में डी कम्पनी के गैंगस्टरों द्वारा हिन्दू कैदियों को धर्मान्तरित कर उन्हें मदरसों में जिहाद के प्रशिक्षण का मामला सामने आया था. यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि मुसलमान का एकमेव उद्देश्य अपना धर्म मानने वालों की संख्या बढ़ाना है. इस कट्टरपंथी सोच को आरक्षण या विशेषाधिकार देने का अर्थ हुआ उन्हें अपना एजेण्डा पालन करने की छूट देना.

    

        दूसरा उदाहरण 22 जून 2006 को अमेरिका स्थित सेन्ट्रल पिउ रिसर्च सेन्टर द्वारा किया गये सर्वेक्षण की रिपोर्ट है 6 मुस्लिम बहुल और 7 गेर मुस्लिम देशों में किये गये सर्वेक्षण के आधार पर प्रसिद्ध अमेरिकी विद्वान डेनियल पाइप्स ने निष्कर्ष निकाला कि दो श्रेणी के देशों के मुसलमान अलग-थलग और कट्टर हैं एक तो ब्रिटेन जहाँ उन्हें विशेषाधिकार प्राप्त है और दूसरा नाइजीरिया जहाँ शरियत का राज्य चलता है. अर्थात विशेषाधिकार मुसलमानों को और कट्टर बनाता है. ब्रिटेन का उदाहरण भारत के लिये प्रासंगिक है क्योंकि भारत की शासन व्यवस्था और राजनीतिक पद्धति काफी कुछ ब्रिटेन की ही भाँति है. 

    

               इन दृष्टान्तों की पृष्ठभूमि में केन्द्र सरकार के मुस्लिम तुष्टीकरण के पागलपन को समझने की आवश्यकता है विशेषकर तब जब जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी सार्वजनिक रूप से श्रीमती सोनिया गाँधी के साथ इस्लामी संगठनों के सम्पर्क की बात कह चुके हैं. ऐसा लगता है इस्लाम बहुसंख्यक हिन्दू समाज की कनपटी पर बन्दूक रखकर आतंकवादी घटनाओं के सहारे अपने लिये विशेषाधिकार चाहता है.  

   

                 वे जनसंख्या उपायों का पालन नहीं करेंगे और जनसंख्या बढ़ायेंगे , देश के किसी कानून का पालन नहीं करेंगें और ऊपर देश में बम विस्फोट कर आरक्षण तथा विशेषाधिकार भी प्राप्त करेंगे. यह फैसला हिन्दुओं को करना है कि उन्हें धिम्मी बनकर शरियत के अधीन जजिया देकर रहना है या फिर ऋषियों की परम्परा जीवित रखकर इसे देवभूमि बने रहने देना है.

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पहल

Posted by amitabhtri on नवम्बर 17, 2006

  इधर काफी दिनों से ब्लाग की दुनिया से गायब रहा और लम्बे समय से कोई लेख भी नहीं लिख सका. इसके कई कारण रहे परन्तु उनमें से एक यह भी था कि तकनीकी कमियों के कारण नारद के कुछ दिन तक काम न करने के कारण लेख पर टिप्पणियाँ प्राप्त नहीं होती थीं इस कारण अधिक उत्साह भी नहीं रहता था. इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मैं टिप्पणियों के लोभ में लिखता हूँ परन्तु उससे द्विपक्षीय वार्तलाप होता है और हमें पता चलता रहता है कि हमारे विचार किस स्तर के हैं और उनमें सुधार की कितनी सम्भावनायें हैं.    

              ब्लाग की दुनिया से मेरा सर्वप्रथम परिचय मेरे मित्र भाई शशि कुमार सिंह ने कराया और उसके उपरान्त मुझे इसमें आनन्द आने लगा. आरम्भिक दौर में स्वान्त: सुखाय ही यह करता रहा, परन्तु कुछ ही महीनों में भाई शशि के साथ बातचीत में विचार आया कि यूनीकोड की इस सुविधा को क्यों न एक वरदान के रूप में प्रयोग किया जाये. वास्तव में तो इण्टरनेट पश्चिमी आविष्कार है और यह वैश्वीकरण में अन्तर्निहित बाजारमूलक शक्तियों का प्रचार का सबसे बड़ा हथियार है फिर भी हमें भूलना नहीं चाहिये कि अपने शासन को भारत में शाश्वत बनाने के लिये लार्ड मैकाले द्वारा थोपी गई अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने ही राजा राममोहन राय, अरविन्द घोष, स्वामी विवेकानन्द और सुभाषचन्द्र बोष जैसे यशस्वी देश भक्तों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया जिन्होंने सामयिक साम्राज्यवादी शक्तियों को उनकी ही भाषा में ही न केवल उत्तर दिया वरन् हिन्दू पुनर्जागरण की पताका फहराकर हिन्दुत्व की पुनर्स्थापना की.         

         आज एक बार फिर सेमेटिक धर्मों से प्रेरित शक्तियाँ जेहाद और वैश्वीकरण के स्वरूप में विश्व की विविधता नष्ट कर उसका एकसमानीकरण करना चाहती हैं, इस प्रकृति विरोधी एकसमानीकरण प्रवृत्ति का उत्तर क्या हो सकता है तो भारत की विविधतावादी संस्कृति. विविधतावादी इसलिये नहीं कि यहाँ भारतवंशी धर्मों की स्वीकार्यता है वरन् विविधतावादी इसलिये कि इस संस्कृति में चर-अचर जगत को परमात्मा की अभिव्यक्ति मानकर कण-कण में एक ही आत्मा के दर्शन किये जाते हैं, इसी कारण जो हमारी उपासना पद्धति से मोक्ष प्राप्त नहीं करना चाहता उसके भी व्यक्तित्व का सम्मान होता है, उसे भी जीने का पूरा अधिकार होता है क्योंकि उसके भीतर भी वही प्रकाश है जो हमारे अन्दर है.                     

    दुर्भाग्यवश एक ओर बन्दूक के जोर से तो दूसरी ओर बाजारमूलक शक्तियों के जोर से विश्व को एकसमान बनाने का प्रयास हो रहा है. जेहाद जहाँ लोगों को भयभीत कर उनकी आस्था को डाँवाडोल कर रहा है तो बाजारी शक्तियाँ हमारी भाषा, संस्कार और मूल्यों को नष्ट करने पर आमादा हैं. मुनाफे को परम लक्ष्य मानकर, शारीरिक सुख को सबसे बड़ा सुख मानकर तथा सफलता को अच्छाई पर प्राथमिकता देकर एक नई संस्क़ति का सृजन किया जा रहा है जहाँ आत्मीयता, प्रेम, संस्कार और मूल्य पैसे या मुनाफे के तराजू में तोले जा रहे हैं.               मैंने आप लोगों के समक्ष कोई नई बात नहीं बताई है, मैं नया केवल इतना बताने जा रहा हूँ कि हमने इस वैश्वीकरण की आँधी को रोकने का मार्ग निकाल लिया है और उस दिशा में पहल भी आरम्भ कर दी है.   वैश्वीकरण और जिहाद की यह आँधी रोकने का एकमेव मार्ग है अपना आधार पुष्ट किया जाये. अधिक से अधिक लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़ने के लिये लोकशिक्षण से जन-जागरण की तकनीक अपनाई जाये.                        

         जैसा कि मैंने आरम्भ में कुछ महापुरूषों का नाम लिया था उसी प्रकार हम इण्टरनेट की तकनीक के सहारे अपनी भाषा और संस्कृति को भ्रष्ट होने से बचा सकते हैं. बाजारमूलक शक्तियाँ एक विचित्र प्रकार की भाषा का समावेश पत्रकारिता में कर रही हैं. वे उत्तेजना और कण्डोम संस्कृति को प्रोत्साहन देकर अपनी पत्र, पत्रिकाओं , इलेक्ट्रानिक माध्यमों और फिल्मों के लिये बाजार बनाना चाहती हैं. इस विचार को रोकने का सशक्त माध्यम भाषाई समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा स्वप्रेरित भाव से साहित्य सृजन या रचनात्मक कार्य में लगे लोगों को प्रोत्साहित करते हुये उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर एक संगठित स्वरूप देना है.                     

 हमने इस दिशा में एक सार्थक पहल 11व 12 नवम्बर 2006 को नई दिल्ली स्थित संकटमोचन आश्रम रामकृष्णपुरम् से-6 में की जब भाषाई समाचार पत्रों के देश भर के 85 सम्पादक एक मंच पर एकत्र आये और दो दिन तक देश के ज्वलन्त विषयों पर परस्पर विचार-विनमय हुआ तथा राष्ट्रीय सन्दर्भ में भाषाई समाचार पत्रों का आकलन किया गया. इस कार्यक्रम में लिट्टी चोखा वाले भाई शशि कुमार सिंह का बड़ा सहयोग रहा, इसके साथ ही जागरण डाट काम के समाचार सम्पादक अर्जुन देशप्रेमी ने अपने सम्बोधन में जिस प्रकार नई तकनीक को व्यावहारिक भाषा में समझाकर उसके उपयोग को अत्यन्त सरल सिद्ध कर दिया उससे प्रतिभागियों का उत्साह सातवें आसमान पर था.   

           यह पहल अब रूकने वाली नहीं है इस कल्पना को साकार स्वरूप देने के लिये हर उस व्यक्ति से सहयोग अपेक्षित है जो अपनी अगली पीढ़ी को संस्कार, भाषा, मूल्य और धर्म की वही विरासत देना चाहता है जिसमें हम पले-बढ़े हैं. बाजारमूलक शक्तियाँ भारत के प्रचार माध्यम पर अपनी पूँजी का शिकंजा कस कर उसे मुनाफे का बाजार बनाना चाहती हैं जहाँ सेक्स, उत्तेजना, कामुकता, यौनसुख को चर्चा का विषय माना जायेगा. क्रिकेट, फिल्म देश की अभिव्यक्ति मानी जायेगी. किसानों की आत्महत्या, मजदूर की पसीने की कमाई, संयुक्त परिवार का संस्कार न तो देखने को मिलेगा और न सुनने को .

         इससे पहले कि वैश्वीकरण की आँधी हमारी साहित्यिक और रचनात्मक सोच को भ्रष्ट कर हमें बाजारमूलक बना दे हमें समय रहते चेत कर अपनी बिखरी हुई शक्ति को सहेजना होगा. भाषाई समाचार पत्रों, आंचलिक रचनाधर्मियों, साहित्यकारों को एकत्र लाना होगा ताकि अपनी संस्कृति को परिवार से बाजार बनने से रोका जा सके.

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