हिंदू जागरण

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असम नरसंहार

Posted by amitabhtri on जनवरी 13, 2007

पिछले दिनों जब असम में उग्रवादी संगठनों ने हिन्दी भाषी लोगों को निशाना बनाया तो एक बार फिर एक साथ अनेक सवाल उठकर खड़े हो गये. पहला, इस बर्बर नरसंहार के लिये दोषी किसे ठहराया जाना चाहिये. उग्रवादी संगठन उल्फा को पाकिस्तानी खुफिया संगठन आई.एस.आई को या फिर स्वयं असम सरकार की लापरवाही को. 

    वैसे तो असम के मुख्यमन्त्री ने तत्काल इस नरसंहार की जिम्मेदारी आई.एस.आई पर डाल दी परन्तु क्या इससे मुख्यमन्त्री तरूण गोगोई का उत्तरदायित्व समाप्त हो जाता है. आखिर पिछले चुनावों में  उल्फा की सहायता लेकर और फिर बोडो अलगाववादी संगठन की पूर्ववर्ती शाखा के साथ सरकार बनाकर सेना के हाथ किसने बाँधे थे. कांग्रेस सरकार ने ऐसे बोडो सदस्यों को अपना भागीदार बनाया जिनके अभी भी भूमिगत उग्रवादियों से सम्बन्ध हैं. उल्फा के सहयोग की कीमत चुकाते हुये सरकार ने उल्फा के साथ युद्ध विराम की घोषणा कर दी और इस दौरान इस संगठन को स्वयं को सशक्त करने का अवसर प्राप्त हो गया. तत्काल लापरवाही के साथ-साथ कांग्रेस सरकार की बांग्लादेश घुसपैठ के सम्बन्ध में राष्ट्रीय सुरक्षा से अधिक मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने की नीति ने भी इस समस्या को बढ़ावा दिया है. 

   पिछले वर्ष कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर जब मेघालय में इस्कान मन्दिर में आतंकवादियों द्वारा बम विस्फोट किया गया तभी स्पष्ट हो गया था कि इस्लामी आतंकवादियों ने अपनी रणनीति बदल कर उत्तर पूर्व को अपना नया केन्द्र बनाकर स्थानीय उग्रवादी संगठनों के माध्यम से हमलों को अन्जाम देने का नया फार्मूला अपनाया है. यही नहीं तो जुलाई में मुम्बई में हुये बम विस्फोटों की जाँच कर रही आतंकवाद प्रतिरोध शाखा ने बांग्लादेश की सीमा से सटे पूर्वोत्तर क्षेत्र को इस्लामी आतंकवादियों का नया केन्द्र बताया था और त्रिपुरा से लेकर मेघालय तक अनेक मदरसों को संदेह के दायरे में रखा था. मुम्बई विस्फोटों के बाद अनेक आतंकवादियों को असम में कामाख्या मन्दिर पर आक्रमण के षड़यन्त्र में गिरफ्तार भी किया गया है. अभी कुछ महीनों पहले सिलीगुड़ी में हुये रेल विस्फोट की जाँच के दौरान पाया गया कि इस विस्फोट को बांग्लादेश स्थित जेहादी संगठन जमातुल मुजाहिदीन बांग्लादेश ने स्थानीय उग्रवादी संगठन कामतपुर लिबरेशन आर्गनाइजेशन की सहायता से कराया है. जमातुल मुजाहिदीन कट्टर जेहादी संगठन है जिसके अल-कायदा से सम्बन्ध हैं और इस संगठन ने उत्तरी बंगाल में अपनी घुसपैठ कर ली है और अपने प्रशिक्षण शिविर चला रहा है. 

   इन तथ्यों से एक बात पूरी स्पष्ट है कि आई.एस.आई पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठनों की सहायता से इस्लामी मिशन को पूरा कर रहा है. असम में हिन्दी भाषियों पर आक्रमण का सीधा उद्देश्य उन्हें असम से बाहर निकलने को विवश करना है ताकि यहाँ निर्बाध गति से बांग्लादेशी घुसपैठ हो सके और इन क्षेत्रों को बांग्लादेश से मिलाया जा सके. आखिर इस भयावह स्थिति के लिये उत्तरदायी कौन है, मुस्लिम वोटों के भिखारी राजनेता जो राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता करने में तनिक भी नहीं हिचकते.  

बांग्लादेश घुसपैठ के मामले में कांग्रेस का रवैया कितना ढुलमुल रहा है यह बताने की आवश्यकता नहीं है, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आई.एम.डी.टी अधिनियम समाप्त करने के बाद केन्द्र सरकार ने एक और अध्यादेश जारी कर उसे फिर से लागू करने का प्रयास किया सर्वोच्च न्यायालय ने उस अध्यादेश को भी असंवैधानिक घोषित कर दिया. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दो बार कहे जाने के बाद भी सरकार ने आज तक अवैध घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने का कोई प्रयास नहीं किया है. अभी इसी सप्ताह एक और जनहित याचिका की सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने फिर अवैध घुसपैठियों को देश से बाहर निकाले जाने के मामले में सरकार से प्रगति आख्या मंगाई है. 

   आखिर मुस्लिम वोटों की लालच में कब तक देश की सुरक्षा के साथ समझौता होता रहेगा, अच्छा होता राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय को सभी राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति से दूर रखकर इस सम्बन्ध में कड़े निर्णय सर्वानुमति से लेते.

2 Responses to “असम नरसंहार”

  1. Very neatly written post. I completely agree with you. The politicians are ready to sell th countries for their petty interests. Bangladeshi politics has been going on for a very long time. I have lived in Bengal for a while and I did see a lot of Bangladeshi coming in and settling in those areas. Very recently I saw bangladeshis in areas like Allahabad, Rajasthan and I am sure they are moving to far away places. This vote bank politics is not going to yield us anything.

  2. यथार्थपरक लेख । सब नेताओं का खेल है ।

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