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Archive for नवम्बर, 2007

उमा की वापसी की अटकलें

Posted by amitabhtri on नवम्बर 28, 2007

इन दिनों गुजरात चुनाव को लेकर राजनीति का बाजार गर्म है। गुजरात में चुनाव प्रचार जोरों पर है और इसी के साथ भाजपा की पूर्व नेत्री और सम्प्रति भारतीय जनशक्ति पार्टी अध्यक्षा उमा भारती की भाजपा में वापसी की अटकलें भी तेज हो गई हैं। इन अटकलों में कितनी सच्चाई है यह जानने के लिये हमें उस पृष्ठभूमि को देखना होगा जिसमें उमा भारती ने भाजपा छोड़ा या उन्हें भाजपा से निष्कासित किया गया।  

उमा भारती के भाजपा छोड़ने की घटना को ध्यान में रखते हुये हमें इसे उस घटनाक्रम की चरम परिणति समझना चाहिये जो भाजपा के भीतर चल रही वर्चस्व की लड़ाई को दर्शाता है जिसका आरम्भ भाजपा के पूर्व महासचिव के.एन.गोविन्दाचार्य के तथाकथित अध्ययनावकाश या पार्टी से उनके निलम्बन से आरम्भ हुआ था। गोविन्दाचार्य की पार्टी में मौजूदगी एक नाक का विषय बन गया था विशेषकर मुखौटा विवाद के बाद अटल बिहारी वाजपेयी और गोविन्दाचार्य आमने-सामने आ गये और तत्कालीन भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी की अपरिहार्यता के चलते गोविन्दाचार्य को पार्टी से बाहर आना पड़ा। गोविन्दाचार्य की भाजपा से विदाई वास्तव में एक वैचारिक संघर्ष का भी परिणाम था। जिन दिनों गोविन्दाचार्य उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रभारी हुआ करते थे उन दिनों वे उत्तर भारत में एक विशेष प्रकार के समीकरण के सहारे भाजपा के जनाधार का विस्तार करना चाहते थे और यह समीकरण दक्षिण के उस सामाजिक समीकरण की तरह था जहाँ पिछड़े वर्ग को पार्टी में अधिक प्रतिनिधित्व देने की बात थी। 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और मध्य प्रदेश में उमा भारती जैसे जनाधार वाले नेताओं ने एक विशेष प्रकार का समाजवादी हिन्दुत्व का फार्मूला विकसित किया जहाँ हिन्दुत्व के बैनर तले पिछड़ा वर्ग समाहित हो रहा था। परन्तु केन्द्र में सत्तासीन होने की उत्सुकता ने अटल बिहारी वाजपेयी को उत्तर प्रदेश में विशेष हस्तक्षेप रखना अनिवार्य हो गया इस कारण उन्होंने कल्याण सिंह के फार्मूले से उलट दलित ब्राह्मण समीकरण की खोज आरम्भ की।  

वास्तव में भाजपा में गोविन्दाचार्य की विदाई के पीछे कहीं न कहीं चाल चेहरा चरित्र न बदल पाने की भाजपा की विवशता भी जिम्मेदार थी। गोविन्दाचार्य ने समय की नजाकत भाँप कर स्वयं को सक्रिय राजनीति से अलग कर वृहद सामाजिक प्रकल्प में लगा लिया परन्तु उमा भारती भाजपा में ही रहीं और भाजपा में आन्तरिक सुधार का प्रयास करती रहीं। इन वर्षों में भाजपा सत्ता में रही और एक विशेष प्रकार की कुलीन संस्कृति पार्टी पर हावी हो गई। सामाजिक आधार पर जो समीकरण अगड़े और पिछड़े के मध्य है वही समीकरण कारपोरेट और निम्न वर्ग के मध्य है। भाजपा में एक विशेष प्रकार की कारपोरेट संस्कृति प्रवेश कर गई और सत्ता का प्रयोग कुछ वर्गो के निहित स्वार्थों की पूर्ति में किया जाने लगा। इस बदली हुई संस्कृति में धन और तकनीक को पार्टी के विस्तार का आधार मान लिया गया और जनता से जुड़े मुद्दे गौड़ हो गये इसी कारण जनाधार से जुड़े नेता भार माने जाने लगे और धन या तकनीक से जुड़ने को केन्द्रीय नेत़ृत्व के निकट आने का आधार माना जाने लगा।  

उमा भारती ने गोविन्दाचार्य की अधूरी लड़ाई को पार्टी में जारी रखा और दूसरी पीढ़ी के नेतृत्व में स्वयं को आगे करने का प्रयास किया इस बार एक बार फिर उनके सामने चुनौती यथास्थिति बनाम परिवर्तन का संघर्ष था । उमा भारती ने कर्नाटक में हुबली में तिरंगा फहराने के मामले में एक पुराने मामले को लेकर नैतिकता के आधार पर मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री पद से त्यागपत्र दे दिया और देश में तिरंगा यात्रा निकालकर पार्टी के दूसरी पीढ़ी के नेतृत्व में स्वयं को जनाधार वाले नेता के रूप में स्थापित करना प्रयास किया। यहीं उनका संघर्ष उन तत्वों से हुआ जो यथास्थितिवादी थे या पार्टी पर धन और तकनीक को प्रमुखता देते थे। इस संघर्ष में उमा भारती को पहली पंक्ति के नेतृत्व का सहयोग नहीं मिला और उन्होंने अलग रास्ता अपना लिया परन्तु यह रास्ता भाजपा में अन्तर्द्वन्द का ही एक भाग है । इसलिये उमा भारती भाजपा परिवार से तो अलग हैं नहीं प्रश्न केवल इतना है कि कब ऐसी परिस्थितियाँ पार्टी के भीतर बनती हैं जब भाजपा अपना चाल चेहरा या चरित्र बदलने को तैयार होती है।  

वैसे तो फिलहाल उमा भारती की भाजपा में वापसी की अटकल गुजरात चुनावों से जुड़ी है परन्तु गुजरात चुनावों के परिणाम उमा और भाजपा दोनों की दिशा सुनिश्चित करेंगे यदि गुजरात चुनावों में भाजपा विजयी होती है तो नरेन्द्र मोदी निश्चित ही राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी में अपनी भूमिका निभायेंगे और अटल बिहारी वाजपेयी के बाद वर्षो बाद कोई जनाधार वाला नेता भाजपा का नेतृत्व करेगा। ऐसे में निश्चय ही भाजपा के सोच का तरीका बदल जायेगा।  

गुजरात चुनावों के परिणाम आने के बाद भाजपा में दूसरी पीढ़ी नेतृत्व सँभालने का संघर्ष करेगी और ऐसे में नरेन्द्र मोदी को संघ परिवार के विभिन्न घटकों से संघर्ष के लिये सहयोगियों की आवश्यकता होगी और इस भूमिका में मोदी उमा भारती को कहाँ खड़ा पाते हैं यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।       

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तसलीमा पर खतरा

Posted by amitabhtri on नवम्बर 24, 2007

इन दिनों पश्चिम बंगाल राज्य चर्चा में है। पश्चिमम बंगाल का नाम स्मृति में आते ही नन्दीग्राम में कम्युनिस्ट बर्बरता के दृश्य सजीव हो उठते हैं, परन्तु हम यहाँ पश्चिम बंगाल को नन्दीग्राम के कारण नहीं वरन् दूसरे कारण से चर्चा में ला रहे हैं। हमारी चर्चा का केन्द्र बांग्लादेश की निर्वासित और विवादित लेखिका तसलीमा नसरीन हैं। जिन दिनों पश्चिम बंगाल में नन्दीग्राम को लेकर विरोध प्रदर्शनों का दौर चल रहा था उसी समय अचानक कोलकाता तसलीमा प्रकरण पर हिंसा का शिकार हो गया। बंगाल की राजधानी में तसलीमा की वीजा अवधि बढ़ाने का विरोध करने के लिये मुस्लिम कट्टरपंथी सड़कों पर उतरे और मामला हिंसक हो गया। अल्प अवधि के लिये कुछ क्षेत्र में कर्फ्यू भी लगाना पड़ा। तसलीमा के प्रकरण पर हुई इस हिंसा के भी अपने सन्दर्भ हैं। इस हिंसा का नन्दीग्राम की हिंसा या वहाँ की स्थिति से कोई लेना देना नहीं है परन्तु एक बात स्पष्ट है कि जब अराजकता की स्थिति निर्माण होती है तो कानून व्यवस्था एक निजी विषय बन जाता है और अनेक छोटे गुट समाज में अपनी अभिव्यक्ति के लिये हिंसा का सहारा लेने लगते हैं। वैसे अचानक तसलीमा प्रकरण प्रासंगिक हो जाने से एक प्रश्न सहज ही मन में कौंधता है कि कहीं यह नन्दीग्राम की ओर से ध्यान हटाने का यह प्रयास तो नहीं है। ऐसा प्रश्न इसलिये भी उठता है कि तसलीमा प्रकरण पर विरोध प्रदर्शन का आयोजन करने वाले सज्जन मोहम्मद इदरीस सभी विषयो पर बंगाल सरकार के विरूद्ध विरोध प्रदर्शन आयोजित करने से नहीं चूकते। इनका विरोध प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है और राज्य की पुलिस भी मानती है कि विरोध प्रदर्शन कई घण्टों तक शान्तिपूर्वक ही चलता रहा हिंसा का पुट उसमें बाद में समाहित हुआ। इस अचानक हिंसा से ही प्रश्न उठता है कि कहीं यह सुनियोजित है या फिर अराजकता के चलते भीड़ का मनोविज्ञान। 

वैसे इसके परे भी तसलीमा का पूरा विषय अपने आप में एक गम्भीर विषय है। तसलीमा को लेकर मुस्लिम कट्टरपंथियो का विरोध हमारे समक्ष सलमान रशदी की याद ताजा कर देता है। जिस प्रकार अस्सी के दशक में सेटेनिक वर्सेज पुस्तक लिखने के कारण रशदी के विरूद्ध ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातोल्ला खोमैनी ने मौत का फतवा जारी किया था और वह फतवा वापस लिये जाने के बाद भी रशदी पर खतरा कम नहीं हुआ। रशदी ने पश्चिम के अनेक देशों में शरण ली परन्तु फतवा ने उनका पीछा नहीं छोडा और बाद में खौमैनी के फतवा वापस लेने पर अनेक स्वतन्त्र लोगों ने भी रशदी का पीछा किया। इसी प्रकार तसलीमा के विरूद्ध बांग्लादेश के कट्टरपंथियों द्वारा फतवा जारी किये जाने के बाद भारत में भी मुसलमान उन्हें इस्लाम का शत्रु मान रहा है। इससे एक बात स्पष्ट होती है कि मुसलमान इस्लाम, कुरान और पैगम्बर पर किसी प्रकार की भी टिप्पणी सुनने को तैयार नहीं है।  

भारत के सन्दर्भ में तसलीमा का विषय सेकुलरिज्म की परीक्षा है। देखना है कि सेकुलरिस्ट इस्लामी कट्टरपंथियों के आगे झुकते हैं या फिर तसलीमा को भारतीय नागरिकता का समर्थन कर वास्तव में सेकुलरिज्म की परिभाषा का अनुपालन करते हैं।  

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आतंकवादियों की नई रणनीति

Posted by amitabhtri on नवम्बर 24, 2007

23 नवम्बर की सुबह प्रत्येक दिन की भाँति समस्त देश के लिये समान थी परन्तु दोपहर आते-आते देश का एक प्रदेश आतंकवादियों की कुदृष्टि का शिकार हो गया। देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में तीन स्थानों पर कुछ ही अन्तराल पर तीन विस्फोट हुये। प्रदेश की राजधानी लखनऊ धार्मिक नगरी वाराणसी और एक और महत्वपूर्ण धार्मिक नगरी अयोध्या से कुछ ही दूरी पर स्थित फैजाबाद में ये धमाके हुये। वैसे इन धमाकों के लिये एक धार्मिक नगरी और दूसरी उसके निकट की नगरी को निशाना बनाया गया परन्तु इस बार निशाना धार्मिक नगरी या धर्मस्थल नहीं थे। इस बार के विस्फोटों ने आतंकवादियों की बदली हुई रणनीति  हमारे समक्ष प्रस्तुत हुई। आतंकवादियों ने सिविल कोर्ट और वकीलों को अपने निशाने पर लिया है। आतंकवादियों की इस रणनीति के अपने सन्देश और उद्देश्य हैं।  

खुफिया सूत्रों के अनुसार इस घटना से हूजी ( हरकत-उल-जेहाद-ए-इस्लामी) और जैश-ए-मोहम्मद के तार जुड़े हो सकते हैं। इनके तार जुड़ने के अपने कारण हैं। उत्तर प्रदेश के इन शहरों की विभिन्न जेलों में हूजी के आतंकवादी बन्द हैं जो पिछले वर्षों में अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि परिसर पर आक्रमण, वाराणसी में संकटमोचन मन्दिर परिसर पर हमले सहित लखनऊ में अनेक आतंकवादी घटनाओं के सन्दर्भ में जेलों में बन्द हैं। इस बार आतंकवादियों ने न्याय प्रक्रिया पर हमला बोला है। न्यायालय परिसर और वकील देश की व्यवस्था के सुचारू संचालन और लोकतन्त्र पर लोगों के विश्वास के प्रतीक हैं इस कारण उन पर आक्रमण करने से न केवल न्यायिक प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होगी वरन् आम जनता में भी आतंक का भाव व्याप्त होगा। अब प्रश्न खड़ा होता है कि आतंकवादियों ने सोची समझी रणनीति के अन्तर्गत वकीलों और न्यायालय को निशाना क्यों बनाया जबकि वे अपनी पिछली रणनीति पर चलकर भीड़ भरे इलाकों में विस्फोट कर या धार्मिक स्थलों को निशाना बनाकर भी अपना जिहाद का सन्देश प्रशासन और जनता को दे सकते थे। वकीलों और न्यायालय को निशाना बनाने की रणनीति आतंकवादियों के वैश्विक चिन्तन और उनकी जिहादी रणनीति के नये पैंतरों को स्पष्ट करती है।  

अभी कुछ दिनों पूर्व जब जैश के तीन आतंकवादी लखनऊ में पकड़े गये तो न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किये गये कथित आतंकवादियों को वकीलों ने लखनऊ के न्यायालय में पीटा। इससे पूर्व पिछले वर्षों में जब अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि जब आक्रमण के प्रयास में दोषी आतंकवादियों को पकड़ा गया और उन पर मुकदमा चलाने की नौबत आई तो फैजाबाद बार एसोसिएशन ने एक स्वर से निर्णय लिया कि कोई भी स्थानीय वकील आतंकवदियों की पैरवी नहीं करेगा। इस निर्णय का परिणाम यह हुआ कि आतंकवादियों के लिये बाहर से वकील जुटाने पड़े। वकीलों के इस निर्णय के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में विशेष कार्य बल द्वारा त्वरित कार्रवाई करते हुये वाराणसी में संकट मोचन मन्दिर में हुए आक्रमण के सम्बन्ध में इलाहाबाद के एक मदरसा शिक्षक को मास्टर माइण्ड के रूप में गिरफ्तार किया था। इस गिरफ्तारी के उपरान्त जामा मस्जिद के शाही इमाम ने तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार पर मुस्लिम उत्पीड़न का आरोप भी लगाया था। इस प्रचार के बाद भी उत्तर प्रदेश का मुसलमान आम तौर पर आतंकवादियों की गिरफ्तारी का विरोध करते हुये सड़कों पर नहीं उतरा और आतंकवादियों या उनके समर्थकों को मुसलमानों का उस मात्रा में सक्रिय सहयोग नहीं मिला जिस मात्रा में वे अपेक्षा कर रहे थे।  

इस परिस्थिति के कारण आतंकवादी संगठन कुछ मात्रा में अपनी जमीन खो रहे हैं और उनकी सारी शक्ति स्लीपर सेल के सहारे चल रही है जहाँ वे आम नागरिकों के बीच घुलमिलकर, राशन कार्ड बनवाकर, किराये पर मकान लेकर और यहाँ तक कि आम लोगों की भाँति रोजगार तक करते हुये आतंकवादी घटनाओं के लिये जमीन तैयार करते हैं और जिहाद की विचारधारा का प्रचार करते हुये आम मुसलमानों को बरगलाने का प्रयास करते हैं। आतंकवादियों को स्लीपर सेल बनाने में तो सहयोग मिल रहा है परन्तु बड़े पैमाने पर आतंकवादी घनाओं को अन्जाम देने के लिये मुस्लिम काडर उन्हें नहीं मिल रहा है। इस कारण अल-कायदा सहित जैश और लश्कर भारत के मुसलमानों से भी असन्तुष्ट है और समय-समय पर मालेगाँव और मक्का मस्जिद जैसी घटनायें घट रही हैं।  

उत्तर प्रदेश में तीन शहरों की अदालतों में घटी घटनाओं से स्पष्ट है कि आतंकवादियों को आतंकवादी मामलों में और अन्य आपराधिक मामलों में स्पष्ट विभाजन की वकीलों की मनोवृत्ति पच नहीं रही है। भारत की न्याय व्यवस्था जिस प्रकार की है उसे देखते हुये आतंकवादियों को पूरा विश्वास था कि वे इस व्यवस्था की तकनीकी कमजोरियों का फायदा उठा लेंगे और महानगरों की भाँति छोटे शहरों में भी उन्हें मोटी रकम देकर नामी वकील उनकी पैरवी के लिये मिल जायेंगे परन्तु पहले फैजाबाद और फिर लखनऊ के वकीलों ने आतंकवाद को सामान्य अपराध से पूरी तरह पृथक करते हुये आतंकवाद के प्रति कहीं अधिक संवेदना दिखाई और आतंकवादियों को सामान्य अपराधियों की श्रेणी से अलग रखते हुये पूरी तरह अक्षम्य अपराध माना। उत्तर प्रदेश में वकीलों के इस रूख ने आतंकवादियों को अपनी रणनीति बदलने को विवश किया।  

आतंकवादियों द्वारा इस प्रकार बदली गई रणनीति एक और चीज को स्पष्ट करती है कि आतंकवाद कोई कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है और यह एक विचारधारागत युद्ध की घोषणा है जिसे टक्कर तभी ली जा सकती है जब इस विचारधारा के मूल तत्वों और संचालक धारा की ओर ध्यान दिया जाये। इस विचारधारागत युद्ध के मूल में इस्लामवादी विचारधारा है जो संगठित धर्म का सहारा लेकर एक मजहबी राज्य की संस्थापना करना चाहता है जो पूरी तरह शरियत और कुरान की व्यवस्था पर आधारित हो। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये वे इस्लाम के कट्टरपंथी स्वरूप की व्याख्या करते हैं और गैर इस्लाम धर्मावलम्बियों के विरूद्ध जिहाद का आह्वान करते हैं।  

इस्लामवादियों ने आतंकवाद का सहारा लेकर देशों की व्यवस्था को चुनौती दी है और प्राय: सभी देशों में विस्फोटों, अपहरणों तथा अन्य आतंकी तरीकों के सहारे उनकी स्थापित नीतियों को इस्लामवाद के अनुरूप झुकाने का प्रयास किया है। भारत में 1999-2000 में विमान का अपहरण कर आतंकवादियों को छोड़ने के लिये सरकार को विवश किया और इसी प्रकार अनेक देशों में प्रमुख संस्थानों, परिवहनों पर आक्रमण कर पत्रकारों या सामान्य नागरिकों को अपह्रत कर उन्हें विदेश नीति सम्बन्धी निर्णयों को बदलने पर विवश किया। जैसे इन घटनाओं के बाद अनेक देशों ने इराक से अपनी सेनायें वापस बुला लीं।  

भारत में हुई विस्फोट की इन नवीनतम घटनाओं को इसी सन्दर्भ में देखने की आवश्यकता है। इसे आतंकवादियों की बदली हुई रणनीति के रूप में देखकर इससे निपटने की व्यापक रणनीति बनाने की आवश्यकता है। आतंकवादी हमारे समक्ष कुछ दिग्भ्रमित और बेरोजगार नौजवानों के रूप में नहीं आते वरन् एक विचारधारा की परम्परा लेकर आते हैं जो एक कुशल योद्धा की भाँति समय के अनुसार अपनी रणनीति बदलने में माहिर हैं। स्पष्ट है कि इस समस्या का समाधान तभी सम्भव है जब इसे विचारधारागत युद्ध मानकर शत्रु की पहचान की जाये और उसी अनुरूप रणनीति बनाई जाये।

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