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Archive for दिसम्बर, 2007

बेनजीर की हत्या के मायने

Posted by amitabhtri on दिसम्बर 28, 2007

बेनजीर भुट्टो की पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने जब निर्णय लिया कि उनकी नेता रावलपिंडी के लियाकत बाग में 27 दिसम्बर 2007 को चुनाव प्रचार के सम्बन्ध में बड़ी रैली को सम्बोधित करेंगी तो उनकी पार्टी के कार्यकर्ता अत्यन्त सशंकित थे और उन्होंने पाकिस्तान के पत्रकारों को बताया था कि उनकी नेता काफी बड़ा जोखिम लेने जा रही हैं। उनकी आशंका निर्मूल सिद्ध नहीं हुई और रैली के बाद कार में बैठते समय एक आत्मघाती हमलावर के द्वारा गोलीबारी और फिर बम धमाके में पाकिस्तान की दो बार प्रधानमन्त्री रह चुकी और तीसरी बार सत्ता संभालने की ओर अग्रसर 54 वर्षीया बेनजीर भुट्टो मारी गईं। 

बेनजीर भुट्टो की हत्या किसने की और इसके पीछे मकसद क्या है? यह विषय समझना कोई कठिन नहीं है। 1999 के बाद निर्वासन झेल रही भुट्टो जब 8 वर्षों बाद अपने देश की धरती पर लौटीं तो उससे पूर्व ही पाकिस्तान में तालिबानी कमाण्डर बैतुल्लाह महसूद ने उन पर आत्मघाती हमले की चेतावनी दी थी। यह चेतावनी कोई कोरा गप्प नहीं सिद्ध हुआ और 18 अक्टूबर को श्रीमती भुट्टो के कराची आते ही भीषण आत्मघाती आक्रमण से उनका स्वागत हुआ। इस आक्रमण में श्रीमती भुट्टो तो बाल-बाल बच गईं परन्तु 140 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इस आत्मघाती आक्रमण के पश्चात निश्चित हो गया कि श्रीमती भुट्टो की राह आसान नहीं है।  इस आक्रमण के बाद श्रीमती भुट्टो ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को एक पत्र लिखकर सरकार, सेना और खुफिया एजेन्सी के आठ लोगों के नाम गिनाये जिनसे उन्हें खतरा था। श्रीमती भुट्टो ने बैतुल्लाह महसूद को एक मोहरा बताया और असली खिलाड़ियों को जनरल जिया उल हक के समय का बताया जो जनरल जिया के समर्थक और उनकी विचारधारा में पगे रहे हैं। यह वह असली सवाल है जिसका हल खोजा जाना है कि अब जबकि अल-कायदा के अफगानिस्तान स्थित कमाण्डर ने बेनजीर की हत्या की जिम्मेदारी ले ली है तो इस हत्या का पाकिस्तान की राजनीति और दक्षिण एशिया की राजनीति पर क्या असर होने वाला है? 

पाकिस्तान आज एक विचित्र हालात से गुजर रहा है। जिस देश ने अफगानिस्तान से रूस को हटाने के लिये मुजाहिदीनों को तैयार किया, कश्मीर में आतंकवाद को एक जिहादी रंग दिया, पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन को हवा देकर भारत को रिसते हुये घाव  देने की नीति का खाका खींचा और फिर उसका अनुपालन किया। 1980 के दशक में पाकिस्तान ने जिहाद और आतंकवाद को अपनी नीति का प्रमुख अंग बना लिया और प्रत्येक शासन फिर वह 1988-89 में बेनजीर भुट्टो का ही क्यों न रहा हो उसने कश्मीर में आतंकवाद को जारी रखने और जिहादी तत्वों के प्रश्रय में या फिर कहें कि सेना और खुफिया विभाग के जिहादीकरण की नीति में लगा रहा। जिहादीकरण की इस नीति से पाकिस्तान भारत पर लगातार दबाव बनाने में सफल रहा और शीतयुद्ध में अमेरिका का विश्वसनीय साथी बना रहा। रूस के विरूद्ध अमेरिका को भी इस जिहादीकरण की आवश्यकता थी। परन्तु यह जिहाद उनके लिये विश्व पटल या देशों के साथ पारस्परिक लेनदेन में एक बड़ा बिन्दु मात्र था और इस जिहादीकरण को न तो पाकिस्तान और न ही अमेरिका व्यापक इस्लामी क्रान्ति के रूप में देख रहा था। इसके ठीक उलट 1990 के दशक में ओसामा बिन लादेन ने जिहाद को व्यापक रूप से ब्याख्यायित कर समस्त विश्व में शरियत के आधार पर शासन तथा इस्लाम के विश्वव्यापी प्रभाव के साथ इसे जोड़ दिया। अब जिहादीकरण की यह नीति पाकिस्तान और अमेरिका के हाथों से निकलकर कट्टर इस्लाम समर्थकों के हाथों में आ गई जिनके लिये जिहाद का अर्थ विश्व में इस्लाम की प्रभुत्व स्थापना, शरियत के आधार पर शासन संचालन है। इस क्रम में शुद्धतावादी इस्लामवादियों के निशाने पर वे मुस्लिम बहुल देश हैं जहाँ का शासन मुसलमानों के हाथ में होते हुये भी शरियत के आधार पर संचालित नहीं हो रहा है। मध्य पूर्व के अनेक देशों सहित पाकिस्तान भी इसी श्रेणी में आता है।  

बेनजीर भुट्टो की हत्या से एक बात पूरी तरह स्पष्ट हो गई है कि पाकिस्तान में स्थिति न केवल राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के नियन्त्रण से बाहर हो चुकी है वरन् पाकिस्तान में आन्तरिक स्तर पर स्पष्ट विभाजन है। सेना, सरकार, खुफिया एजेन्सियों और कबाइली क्षेत्रों में अनेक ऐसे तत्व हैं जो जिहादी तत्वों के साथ सहानुभूति रखते हैं और 11 सितम्बर 2001 की बदली हुई परिस्थितियों में पाकिस्तान का अमेरिका का साथ देना और आधुनिकता की ओर जाना पसन्द नहीं आ रहा है।  

आज पाकिस्तान के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि  पाकिस्तान अपने इस विभाजन से किस प्रकार बाहर आये और आधुनिकता को अंगीकार करे। बेनजीर भुट्टो और परवेज मुशर्रफ के बीच कटु सम्बन्धों को मिठास में बदलकर अमेरिका ने दोनों के बीच समझौता करवा दिया और पाकिस्तान में लोकतन्त्र का मार्ग प्रशस्त करते हुये एक कामचलाऊ रास्ता निकाला जिसमें परवेज मुशर्रफ राष्ट्रपति बने और उन्होंने अपनी वर्दी उतारी और 8 जनवरी 2008 को आम चुनाव कराने की घोषणा की। सब कुछ अमेरिका की योजना के अनुरूप ही चल रहा था कि अल-कायदा ने बेनजीर भुट्टो को निशाना बनाकर पाकिस्तान के शासकों को सन्देश दिया है कि वह अमेरिका की किसी नीति सफल नहीं होने देगा और पाकिस्तान को लोकतन्त्र और आधुनिकता के रास्ते पर जाने में हरसम्भव अवरोध उत्पन्न करेगा। श्रीमती भुट्टो की हत्या के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक शून्यता आ गई है। इससे परवेज मुशर्रफ की स्थिति और कमजोर होगी और पाकिस्तान में ऐसा नेतृत्व उभरने में समय लगेगा जो पश्चिमी साँचे में ढला हो और आधुनिकता की बात करता हो। वैसे भी यह बात ध्यान देने की है कि अमेरिका नेतृत्व को थोपकर देश को पटरी पर नहीं ला सकता। जब तक पाकिस्तान का आन्तरिक विभाजन कम नहीं होगा यह समस्या बढ़ती जायेगी और आन्तरिक विभाजन कम होने की सम्भावना फिलहाल तो नहीं दिखती।  

पाकिस्तान के इस संकट का भारत पर प्रत्यक्ष असर तो नहीं पड़ेगा परन्तु पड़ोसी देश में कट्टरपंथियों के बढ़ते प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रह सकेगा। सर्वप्रथम तो जिहादवाद का व्यापक इस्लामी क्रान्ति का स्वरूप भारत में उन तत्वों को प्रेरित करेगा जो जिहादवादी आन्दोलन से सहानुभूति रखते हैं और पाकिस्तान जिस मात्रा में असफल राज्य बनता जायेगा उसी मात्रा में जिहाद का आन्दोलन वैश्विक रूप से अधिक मुखर और आक्रामक होता जायेगा। क्योंकि अब अल-कायदा अपने आन्दोलन को वैश्विक स्वरूप देने के लिये संगठित राज्य की खोज में है जो उसके पास अफगानिस्तान की पराजय के बाद से नहीं है।  

बेनजीर की हत्या के पीछे केवल राजनीतिक मकसद नहीं है वरन् यह एक व्यापक आन्दोलन का हिस्सा है। आज आवश्यकता जिहाद की मानसिकता और पाकिस्तान के आन्तरिक विभाजन से मिलने वाली इसकी खुराक पर लगाम लगानी होगी। इसके लिये पाकिस्तान में लोकतन्त्र और आधुनिकता के लिये काम कर रहे लोगों को सशक्त करने का प्रयास भारत को विशेष तौर पर करना होगा। भारत अब अमेरिका के भरोसे हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकता उसे पाकिस्तान के सम्बन्ध में तटस्थता की अपनी नीति का त्याग कर पाकिस्तान में हस्तक्षेप करना होगा।

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कंधामल की घटना से सबक

Posted by amitabhtri on दिसम्बर 27, 2007

उड़ीसा राज्य एक बार फिर ऐसी घटनाओं के लिये चर्चा में है कि इस कारण चर्चा में रहना शायद वह पसन्द न करे। ईसाइयों के प्रमुख पर्व क्रिसमस के दिन उड़ीसा राज्य ईसाइयों और हिन्दुओं के मध्य साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार हो गया। उड़ीसा के कन्धामल जिले में पिछले अनेक वर्षों से धर्मान्तरण के विरूद्ध अभियान चला रहे हिन्दू सन्त लक्ष्मणानन्द सरस्वती के ऊपर कुछ लोगों ने हमला कर दिया जिनके बारे में हिन्दू संगठनों का आरोप है कि वे ईसाई मिशनरी थे और सन्त की धर्मान्तरण विरोधी अभियान की सफलता से हताश होकर यह आक्रमण किया। इस आक्रमण में स्वयं सन्त लक्ष्मणानन्द सरस्वती और उनका वाहन चालक घायल हो गया जिन्हें कटक के अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस आक्रमण के विरोध में राज्य में हिन्दूवादी संगठनों विश्व हिन्दू परिषद ने कुछ घण्टों के बन्द का आयोजन किया जिसके बाद हिंसा भड़की और कन्धामल से जुड़े कुछ अन्य जिलों में भी इसकी लपट पहुँची। उग्र भीड़ ने एक मन्त्री के घर को आग लगा दी और अनेक कच्चे घरों में बने चर्चों को भी निशाना बनाया।

 वैसे अधिकतर आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियाँ लोगों के कच्चे घरों को ही चर्च के रूप में प्रयोग में लाती हैं इस कारण चर्च में आगजनी की घटना के सम्बन्ध में किसी सूचना के आने पर यह निश्चय करना आवश्यक हो जाता है कि यह आगजनी कामचलाऊ पूजा स्थल में हुई है या फिर आधिकारिक चर्च में।  वैसे इस कारण को आधार बनाकर पूजा स्थल में आगजनी को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता परन्तु ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती।

इस साम्प्रदायिक हिंसा के लिये ईसाई मिशनरी भी उतने ही दोषी हैं जितने हिन्दू संगठन। इस हिंसा को लेकर जो भी बहस होनी चाहिये उसमें दोनों पक्षों की भूमिका पर बहस होनी चाहिये। हमारे देश में समाचार माध्यम अब भी वास्तविक तथ्यों की तह में जाने के स्थान पर प्रचार या प्रोपैगैण्डा पर अधिक ध्यान देते हैं। एक बार फिर इस घटना को कुछ वर्ष पूर्व उड़ीसा में ग्राहम स्टेन्स को उनके बच्चों सहित जीवित जलाने की घटना का स्मरण कराने वाला मानकर प्रचारित किया जा रहा है। निश्चित रूप से दोनों घटनाओं में बिलकुल समानता नहीं है वैसे तो ग्राहम स्टेन्स को जलाने वालों के भी अपने तर्क हैं फिर यदि उन्हें अस्वीकार भी कर दें तो भी कन्धामल की घटना उससे पूरी तरह भिन्न है। यहाँ हिंसा का आरम्भ एक प्रतिष्ठित सन्त पर हमले के बाद हुआ। यह हमला ही अपने आप में काफी कुछ कह देता है।

 ऐसी घटनायें एक ऐसे संघर्ष को इंगित करती हैं जो विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में हिन्दुओं और ईसाइयों के मध्य चल रहा है। यह संघर्ष है धर्मान्तरण का संघर्ष। ईसाई जिसे सेवा कार्य कहते हैं उसके बारे में स्थानीय हिन्दू सन्तों और हिन्दू संगठनों का आरोप रहता है कि यह आदिवासियों का धर्मान्तरण है। इस समस्या पर तार्किक और वास्तविक ढंग से ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।  ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों को लेकर, उनके उद्देश्य और मन्तव्य को लेकर देश की स्वाधीनता से लेकर अब तक 6 दशकों में अनेक आयोग बन चुके हैं और उनकी रिपोर्ट का लब्बोलुवाब यही रहा है कि ईसाई मिशनरियाँ सेवा कार्यों के बहाने धर्मान्तरण के कार्य में अधिक रूचि लेती हैं जो कालान्तर में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये भी खतरा बन सकता है जैसा कि पूर्वोत्तर के प्रमुख ईसाई प्रदेशों में हो रहा है। इस कारण अब वह समय आ गया है कि ईसाई मिशनरियों की विदेशी सहायता, उनके उद्देश्य, मन्तव्य और धर्मान्तरण के प्रति उनके जुनून पर रोक लगाने के ठोस प्रबन्ध किये जायें ताकि आदिवासी क्षेत्रों में ऐसे संघर्षों को टाला जा सके।

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मोदी की विजय के निहितार्थ

Posted by amitabhtri on दिसम्बर 26, 2007

नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमन्त्री की शपथ ग्रहण करने के साथ ही तीसरी बार मुख्यमन्त्री होने का सौभाग्य प्राप्त कर लिया है। नरेन्द्र मोदी की शानदार विजय की व्याख्या का दौर भी चल निकला है और अनेक कारण इस विजय के बताये जा रहे हैं। नरेन्द्र मोदी की विजय के कारण कुछ भी रहे हों परन्तु यह भी समीक्षा का विषय है कि यह विजय किस प्रकार भारतीय राजनीति को प्रभावित करने जा रही है या फिर इस विजय के निहितार्थ क्या हैं ? 

गुजरात चुनाव के परिणामों के पश्चात् कांग्रेस सहित तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने जिस प्रकार मोदी की विजय को साम्प्रदायिकता की विजय बताया है उसके पश्चात यह समझना आवश्यक हो गया है कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की स्थितियाँ न होने के पश्चात भी यह चुनाव साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता का चुनाव क्यों था ?  इसके लिये हमें भारत में चल रही सेकुलर बनाम सूडो सेकुलर की पृष्ठभूमि को समझना होगा।  सूडो सेकुलर दल मानते हैं कि भारत का हिन्दू धार्मिक तो है परन्तु वह राजनीति में धर्म के प्रवेश को उचित नहीं मानता और हिन्दूवादी संगठनों की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति की आलोचना के कारण राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत नहीं होता। इसी धारणा के वशीभूत होकर कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी ने मौत का सौदागर और प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिह ने गुजरात दंगों के मामलों की नये सिरे से जाँच की बात की थी। वास्तव में ये दोनों बयान मुसलमानों को रिझाने से ज्यादा इस विश्वास पर आधारित थे कि गुजरात की जनता की सेकुलरिज्म में आस्था है और यहाँ का हिन्दू मोदी को 2002 के दंगों में उनकी भूमिका के लिये उन्हें दण्डित करना चाहता है। इस विश्वास का कारण पिछले पाँच वर्षों में मोदी के विरूद्ध चलाया गया प्रचार अभियान था। इस बात की पुष्टि कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी के चुनाव परिणामों के तत्काल बाद आये बयानों से भी होती है कि साम्प्रदायिक शक्तियों के विरूद्ध अभियान चुनाव तक ही सीमित नहीं रहना चाहिये वरन् इसे लगातार चलाते रहने की आवश्यकता है। यह बयान प्रमाणित करता है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल गुजरात के चुनावों को विचारधारागत आधार पर भी देख रहे थे। गुजरात के चुनाव परिणामों ने भारत में चल रही सेकुलरिज्म की बहस को प्रभावित किया है। इन चुनाव परिणामों से हिन्दुओं ने दिखाया है कि वे सेकुलर और सूडो सेकुलर के मध्य विभाजन रेखा को पहचानते हैं तथा सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति को सिरे से नकारते हैं। 

यह प्रयोग यदि देश के अन्य भागों में भी सफल होता है या सेकुलरिज्म की बहस को नया मोड़ देता है तो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों को अपनी रणनीति पर नये सिरे से विचार करना होगा और इन चुनाव परिणामों ने इसी कारण इन दलों को चिन्तित कर दिया है।  

इन चुनाव परिणामों का भाजपा पर भी प्रभाव पड़ने वाला है। 2004 में लोकसभा में पराजय के पश्चात से ही भाजपा अपनी दिशा और दशा दोनों को लेकर चिन्तित थी। उसके पास ऐसा कोई रास्ता नहीं दिख रहा था जहाँ से वह अपना लक्ष्य निर्धारित कर सके। भाजपा को एक ब्राण्ड बनाकर प्रस्तुत करने की 2004 की नीति असफल रही थी और भाजपा को नये माडल की तलाश थी। यह कुछ ऐसा ही जब 1990 के आसपास तत्कालीन महासचिव गोविन्दाचार्य ने भाजपा को समाजवादी हिन्दुत्व का फार्मूला दिया था जहाँ हिन्दुत्व की चासनी में पिछड़ा वर्ग के कार्ड को ढालकर कल्याण सिंह के रूप में एक फार्मूला सामने आया था जब अल्पसंख्यकों के मतों के बिना भी पूर्ण बहुमत की सरकार बनना सम्भव हो सका था। नरेन्द्र मोदी ने भाजपा को हिन्दुत्व और उदार अर्थव्यवस्था को मिलाकर एक ऐसा फार्मूला दिया है जो मध्यवर्ग के मध्य भाजपा का आधार बढ़ाने में एक नया मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। उदार अर्थव्यवस्था का परिपालन करते हुये सबको सन्तुष्ट कर मध्यम वर्ग को आक्रामक ढंग से अपने से जोड़कर नरेन्द्र मोदी ने उन्हें घरों से निकलकर मतदान केन्द्र पर जाकर पंक्तिबद्ध होकर मतदान करने की अन्त:प्रेरणा दी जो कि विशेष सफलता है।   

वैसे यह देखना रोचक होगा कि भाजपा अन्य राज्यों में यह प्रयोग कैसे दुहरा पाती है जबकि उसके अन्य राज्यों में मोदी जैसा करिश्माई नेतृत्व नहीं है।  

गुजरात चुनाव के परिणाम संघ परिवार के साथ भाजपा के सम्बन्धों पर भी असर डालेंगें। संघ परिवार के विभिन्न घटकों ने मोदी का खुलकर विरोध किया और इसी कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इन चुनावों में तटस्थ रहना पड़ा और संगठित तौर पर न तो मोदी का समर्थन किया और न विरोध। परन्तु रोचक तथ्य यह रहा कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में जहाँ संघ ने घोषित तौर पर अपने पूर्णकालिकों को भाजपा की सहायता में लगा रखा था वहाँ तमाम प्रयासों के बाद भी परिणाम भाजपा के लिये निराशाजनक रहे तो वहीं गुजरात में संघ के संगठन के तौर पर न लगने के बाद भी भाजपा को लगभग दो तिहाई बहुमत मिला। यह बात क्या संकेत देती है यही कि चुनावों में संगठन की भूमिका होती है परन्तु प्राथमिक तौर पर सरकार का कामकाज, नेतृत्व की स्वीकार्यता और सख्त प्रशासक की छवि जनता के मत देने का आधार बनता है।   मोदी की विजय के पश्चात भाजपा के कामकाज में संघ का दखल कम होगा तथा सत्ता प्राप्ति के पश्चात संघ की उपेक्षा करने का भाव अधिक विकसित होगा। वैसे संघ को भी आभास हो गया है कि भाजपा में अध्यक्ष या उसके कामकाज का निर्धारण करते-करते वह राजनीति में लिप्त होता जा रहा है और व्यक्ति निर्माण का उसका मूल कार्य प्रभावित हो रहा है।   

गुजरात चुनाव परिणामों के पश्चात एक बात और कही गई कि नरेन्द्र मोदी का कद पार्टी से बड़ा हो गया है और वे भविष्य के प्रधानमन्त्री हैं। जिस प्रकार विधायक दल की बैठक में मोदी ने नाटकीय ढंग से इन आशंकाओं का खण्डन किया उससे स्पष्ट है कि वे किसी जल्दी में नहीं हैं और अपनी स्वेच्छारिता और पार्टी से बड़े होने के आरोपों को पहले धुलकर अधिक स्वीकार्य बनना चाहते हैं। इन चुनाव परिणामों के बाद भी 2008 या 2009 के आम चुनावों में फिलहाल लालकृष्ण आडवाणी की उम्मीदवारी को कोई खतरा नहीं है।

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रामसेतु पर फिर घमासान के आसार

Posted by amitabhtri on दिसम्बर 10, 2007

पिछले अक्टूबर माह में श्रीराम, रामायण और रामसेतु को लेकर भारत सरकार के संस्कृति मन्त्रालय द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर किये गये शपथ पत्र के साथ ही रामसेतु को लेकर राजनीतिक माहौल गरमा गया था। विषय की संवेदनशीलता को देखते हुये भारत सरकार ने शपथ पत्र वापस ले लिया और सर्वोच्च न्यायालय से इस पूरे विषय के सूक्ष्म परीक्षण के लिये दिसम्बर तक का समय माँगा। इस बीच भारत सरकार ने इस सेतु की स्थिति का आकलन करने के लिये दस सदस्यों की एक विशेषज्ञ समिति बनाई। गत रविवार को एक अंग्रेजी दैनिक ने प्रथम पृष्ठ पर एक समाचार प्रकाशित किया जिसमें उस विशेषज्ञ समिति के निष्कर्षों का उल्लेख सूत्रों के हवाले से दिया गया है। इस निष्कर्ष में समिति ने कहा है कि कोई भी पुरातात्विक और वैज्ञानिक प्रमाण यह सिद्ध नहीं करता कि भारत और श्रीलंका के मध्य पाक की खाड़ी में स्थित यह सेतु मानव निर्मित है। इस समिति के निष्कर्ष के अनुसार यह एक भूसंरचनात्मक निर्मिति है जो विश्व के अनेक भागों में पाई जाती है। इस रिपोर्ट को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष 11 दिसम्बर को प्रस्तुत किया जाना था परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार इसका बारीकी से निरीक्षण करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय से कुछ और समय माँग सकती है।  

इस रिपोर्ट के आने के बाद रामसेतु पर राजनीतिक माहौल गर्माने के आसार प्रतीत होने लगे हैं। लोकमंच के सूत्रों को मिली जानकारी के अनुसार रामेश्वरम् रामसेतु रक्षा मंच जो कि इस सम्बन्ध में देश भर में विभिन्न हिन्दू संगठनों के मंच के रूप में काम करते हुये आन्दोलन चला रहा है उसने इस रपोर्ट को अस्वीकार करने का मन बना लिया है और रामसेतु को लेकर लोगों की आस्था को आधार बनाने के लिये व्यापक आन्दोलन की तैयारी कर ली है। इस सम्बन्ध में आगामी 30 दिसम्बर को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लाखों लोगों को एकत्र करने का निर्णय लिया गया है।  

भारत सरकार द्वारा गठित की गई विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट इस मंच के इस दावे को पुष्ट ही करेगी कि यह सरकार का दिखावा मात्र है क्योंकि इस समिति की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े करते हुये जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी सर्वोच्च न्यायालय भी गये थे यह बात और है कि न्यायालय ने उनकी याचिका को निरस्त कर दिया, परन्तु ऐसा करने से समिति के सदस्यों की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर प्रश्न तो खड़ा हो ही जाता है।  

रामेश्वरम् रामसेतु रक्षा मंच के हाथ में एक और हथियार सरकार का ही एक प्रकाशन लगने वाला है जो पिछले सप्ताह संसद के पटल पर रखा गया। हैदराबाद स्थित रिमोट सेंसिंग एजेन्सी के अन्तरिक्ष विभाग ने एक पुस्तिका इमेजेज इण्डिया श्रृंखला में प्रकाशित की है जिसकी प्रस्तावना इसरो के अध्यक्ष माधवन नायर ने लिखी है। इस पुस्तिका में पृष्ठ संख्या 39 पर रामसेतु का उल्लेख है और इस ढाँचे को 17,50,000 वर्ष पुराना रामेश्वरम् में भारत के दक्षिण में भारत और श्रीलंका के मध्य स्थित बताया गया है। इस पुस्तिका में पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर इसे इतना पुराना आदिकालीन माना गया है। पुस्तिका में रामायण महाकाव्य में ऐसा ही पुल होने की बात भी कही गई है। निश्चित रूप से भारत सरकार का प्रकाशन ही रामसेतु पर सरकार की विरोधाभासी स्थिति को स्पष्ट करता है। सरकार जहाँ श्रीराम और रामसेतु के अस्तित्व से इन्कार करती है वहीं उसका प्रकाशन रामसेतु के अस्तित्व को न केवल स्वीकारता है वरन् आस्थावादियों के मत की पुष्टि करते हुये इसे 17, 50,000 वर्ष प्राचीन भी स्वीकार करता है।  

एक ओर विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और दूसरी ओर सरकारी प्रकाशन में रामसेतु का उल्लेख रामसेतु पर चल रहे आन्दोलन को उद्दीप्त करने के लिये पर्याप्त है। निश्चय ही आने वाले दिनों में रामसेतु को लेकर राजनीतिक और धार्मिक माहौल गरमाने वाला है।

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बुरे फंसते बुश

Posted by amitabhtri on दिसम्बर 7, 2007

हाल ही में अमेरिका की कुछ खुफिया एजेन्सियों द्वारा ईरान के परमाणु कार्यक्रम के सम्बन्ध में नवीन रहस्योद्घाटनों से अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश अपनी विदेश नीति को लेकर घिरते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी की कुछ खुफिया एजेन्सियों द्वारा रिपोर्ट दी गई है कि ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को 2003 में ही विराम दे दिया था। इस रिपोर्ट को लेकर अमेरिका सहित समस्त विश्व में अनेक तरह की प्रतिक्रियायें हुईं। अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने खुफिया रिपोर्टों पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम अभी भी विश्व के लिये एक खतरा है और उन्होंने विश्व समुदाय को इस खतरे के प्रति सचेत किया। वहीं इस रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया में विदेश मन्त्री कोण्डोलिजा राइस ने कहा कि यह रिपोर्ट दर्शाती है कि अमेरिका में लोकतान्त्रिक मूल्यों का आदर है और स्वतन्त्रता है जबकि ईरान में ऐसा नहीं है। 

इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट होता है कि अमेरिका में वर्तमान शासन ईरान को लेकर अपनी नीति के प्रति आश्वस्त है तथा खुफिया रिपोर्ट को लेकर उनकी नीति में विशेष अन्तर आता नहीं दिख रहा है। परन्तु इस रिपोर्ट का विश्व समुदाय पर व्यापक असर पड़ने वाला है। जहाँ पहले से ही यूरोप और रूस ईरान पर कड़े प्रतिबन्ध लगाने के पक्ष में नहीं थे वहीं अब यह रिपोर्ट उन्हें ईरान के पक्ष को रखने में मजबूती प्रदान करेगी। विश्व जनमत पर तो इस रिपोर्ट का प्रभाव पड़ेगा ही अमेरिका की आन्तरिक राजनीति भी इससे अनछुई नहीं रह पायेगी। जैसा कि सबको ज्ञात है कि अगले वर्ष अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव होने वाले हैं और इन चुनावों में जार्ज डब्ल्यू बुश की तथाकथित आक्रामक विदेश नीति उनके विरोधियों के निशाने पर है।  

डेमोक्रेट सदस्यों ने बुश की विदेश नीति और विशेषकर इराक पर उनके कदम की आलोचना की है  और विशेष रूप से यही चुनाव का प्रमुख मुद्दा है। इराक पर आक्रमण के लिये जार्ज डब्ल्यू बुश ने आक्रामक विदेश नीति का सहारा लेते हुये इराक में जनसंहारक हथियारों के होने की बात करते हुये सद्दाम हुसैन के शासन को अपदस्थ करने के लिये इराक पर आक्रमण किया था। परन्तु पूरा युद्ध बीत जाने के बाद भी इराक में जनसंहारक हथियारों के होने का कोई प्रमाण नहीं मिला। जार्ज डब्ल्यू बुश की रिपब्लिकन पार्टी ने पहले आक्रमण की नीति के अन्तर्गत अमेरिका के निवासियों को आश्वस्त किया कि यह युद्ध उनकी सुरक्षा के लिये है और यह नई विदेश नीति है जिसके अन्तर्गत शत्रु के आक्रमण करने से पूर्व ही उसे नष्ट करने की नीति का पालन किया जा रहा है। नई विदेश नीति का हवाला देकर करदाताओं के धन को इराक युद्ध में झोंका गया परन्तु जल्द ही यह युद्ध अमेरिका की जनता की सुरक्षा से अधिक इराक की जनता के कल्याण के रूप मे दिखने लगा।  अमेरिकी सेना की उपस्थिति ने जहाँ एक ओर मध्य-पूर्व के मुस्लिम देशों में गैर-मुस्लिम शासन को अस्वीकार करने की प्रवृत्ति को बलबती करते हुये एक विशेष प्रकार के आतंकवाद को जन्म दिया तो वहीं इराक में अमेरिका के बदलते युद्ध उद्देश्य अमेरिकी जनता को पसन्द नहीं आये। अमेरिका के करदाता अपनी सुरक्षा के लिये तो धन खर्च करने को तैयार हैं परन्तु इराकी जनता के कल्याण के लिये सेना की तैनाती के लिये धन खर्च करने को वे तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि जार्ज बुश इराक की अपनी नीति को लेकर घरेलू मोर्चे पर आलोचना के शिकार हो  रहे हैं। 

ईरान पर आई नई खुफिया रिपोर्ट से बुश के उन आलोचकों को बड़ा सम्बल मिला है जो निओ कन्जर्वेटिव लोगों द्वारा संचालित अमेरिका की अति महत्वाकाँक्षी नीति का विरोध इस आधार पर करते हैं कि यह करदाताओं के धन का अपव्यय है। इसी महत्वाकाँक्षी विदेश नीति के अन्तर्गत समस्त विश्व में हस्तक्षेप बढ़ाना शामिल है। ऐसी खबरें आ रही थीं कि जार्ज डब्ल्यू बुश अपना कार्यकाल समाप्त होते-होते ईरान पर आक्रमण कर देंगे। अब नई परिस्थितियों में उनके लिये ऐसा करना इतना सहज नहीं होगा।  

11 सितम्बर 2001 के पश्चात उपजी सहानुभूति के चलते तथाकथित आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध को लेकर विश्व स्तर पर जो गठबन्धन बना था और अमेरिका ने इस युद्ध को लेकर जो  समर्थन प्राप्त किया था वह तीन वर्षों में समाप्त हो गया और अमेरिका के विरोध में अनेक देश खुलकर सामने आ गये । यह एक ऐसा विषय था जिस पर जार्ज बुश को आत्मविश्लेषण कर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये था परन्तु ऐसा करने के बजाय उन्होंने अपनी भूलें जारी रखीं और तेल प्राप्त करने की अभिलाषा और मध्य-पूर्व में इजरायल के बहाने अनी स्थिति सुदृढ़ करने का अभियान जारी रखा। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर उस पर आक्रमण करने की योजना में भी कहीं न कहीं इजरायल का तत्व काम कर रहा है परन्तु हमें नहीं भूलना चाहिये कि इजरायल अपनी रक्षा करने में स्वयं समर्थ है। 

वैसे तो कुछ लोग ईरान की परमाणु महत्वाकाँक्षा को इराक में अमेरिका की तैनाती से उत्पन्न हुआ भय मानते हैं। कुछ भी हो अमेरिकी खुफिया एजेन्सियों की नई रिपोर्ट से जार्ज बुश की मुश्किलें अवश्य बढ़ गई हैं।

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मलेशिया में विरोध प्रदर्शन क्यों?

Posted by amitabhtri on दिसम्बर 7, 2007

इन दिनों मलेशिया चर्चा में है। कारण मलेशिया में निवास करने वाले भारतीय नस्ल के लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन। इस विरोध प्रदर्शन के अपने कारण हैं। मलेशिया में निवास करने वाले भारतीय नस्ल के लोगों का आरोप है कि उनके साथ नस्ली आधार पर भेदभाव किया जा रहा है तथा मलेशिया के मूल मलयों की अपेक्षा उन्हें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उपेक्षित किया जा रहा है।

भारतीय नस्ल के लोग कोई दो सौ वर्ष पूर्व अंग्रेजों द्वारा मलेशिया मजदूर बनाकर ले जाये गये थे। अपने परिश्रम के बल पर उन्होंने न केवल उस देश के विकास में अपना योगदान दिया वरन् अपनी अलग पहचान भी बनाई। भारतीय नस्ल के इन लोगों में तमिल और मलयालम भाषी अधिक हैं। उस देश में जाकर भी उन्होंने अपनी हिन्दू हचान बरकरार रखी और जगह-जगह मन्दिर बनाये। परिस्थितियों में विशेष परिवर्तन तब आया जब 1957 में अंग्रेजों के उपनिवेश से इस देश को मुक्ति मिल गई तथा अनेक नवस्वतन्त्र देशों की भाँति इस देश को भी एक संविधान मिला और उस संविधान के अनुच्छेद 8 और 11 के अन्तर्गत मलेशिया के निवासियों को क्रमश: समता का अधिकार और धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार मिला। परन्तु संविधान के अनुच्छेद 153 के अन्तर्गत मूल मलय निवासियों को कुछ विशेषाधिकार दिये गये हैं। हालांकि भारतीय नस्ल के प्रति भेदभाव के विषय पर लम्बे समय से आन्दोलन चला रहे भारतीय नस्ल के मलेशिया के नागरिक और अधिवक्ता वेदमूर्ति के अनुसार मूल संविधान में अनुच्छेद 153 की व्यवस्था कुछ मय के लिये की गई थी और संविधान सभा में इस विषय पर भारतीय नस्ल के लोगों से सहमति भी नहीं ली गई थी। वेदमूर्ति के अनुसार मूल मलय संविधान के इसी प्रावधान को आधार बनाकर अपने लिये विशेषाधिकार और भारतीय नस्ल के लोगों के प्रति हीन भावना रखने को सही मानते हैं।  

मलेशिया में भारतीय नस्ल के लोगों का विरोध न तो अचानक है और न ही स्वत:स्फूर्त है । वेदमूर्ति सहित भारतीय नस्ल के पाँच अधिवक्ता भारतीय नस्ल के लोगों के प्रति भेदभाव को लेकर लम्बे समय से अपने सांविधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुये आन्दोलन चला रहे हैं। उनके इस आन्दोलन पर भारतीय नस्ल के बीस लाख मलेशिया निवासियों की पैनी नजर थी और अब इस सुलगती हुई आग ने एकदम से गति पकड़ ली है।  

इस आन्दोलन के गतिमान होने के दो प्रमुख कारण हैं। एक तो भारतीय नस्ल के लोगों की नई पीढ़ी का प्रादुर्भाव और दूसरा कानून का सहारा लेकर धर्म पर आक्रमण जैसे मन्दिर गिराना और जबरन मुसलमान बनाना या शरियत कानून थोपना।  

भारतीय नस्ल के जो लोग मजदूर बनाकर मलेशिया ले जाये गये उनका मानना था कि उन्हें इस देश ने रहने का अवसर दिया जो पर्याप्त है इस कारण उन्होंने अपने अधिकारों के लिये आवाज नहीं उठाई परन्तु उनकी नई पीढ़ी जो मलेशिया में ही जन्मी है और वहाँ की नागरिक जन्म से है उनके अन्दर देश में समान अवसर की आकाँक्षा है इसी कारण यह पूरा आन्दोलन नई पीढ़ी के हाथ में है जो विश्व में समान अधिकार और नस्ली समानता जैसे नारों से आकर्षित होकर समान अवसर की माँग कर रहा है। भारतीय नस्ल के लोगों के आन्दोलन के गतिमान होने का एक और कारण धार्मिक भेदभाव है। मलेशिया में भारतीय नस्ल के लोगों की कुल संख्या का 90 प्रतिशत हिन्दू हैं। मलेशिया में 1957 में जब देश स्वतन्त्र हुआ तो पहले से स्थित धार्मिक स्थलों के लिये नये लाइसेन्स और परमिट की आवश्यकता हुई सरकार ने मस्जिदों के लिये नये भूमि कानूनों के अन्तर्गत लाइसेन्स प्राप्त कर लिये परन्तु मन्दिरों के लिये ऐसा कुछ नहीं किया गया। न केवल इतना वरन् कानून की दुहाई देकर इन मन्दिरों को गिराया गया। अब तक मलेशिया में हजारों मन्दिर ढहाये गये हैं। इस बात ने हिन्दुओं के भीतर एक अल्पसंख्यक भय की मानसिकता का विकास किया है। इसी बीच कुछ वर्ष पूर्व घटी एक घटना ने हिन्दू चेतना को और झकझोर दिया जब एवरेस्ट विजेता एक कर्नल को हिन्दू होते हुये भी उसके परिजनों की इच्छा के विपरीत शरियत अदालत के आदेश पर उसे मुस्लिम रीति से दफना दिया गया। इस घटना ने अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियों के साथ मिलकर हिन्दुओं मे इस्लामवादी आधिपत्य का भय विद्यमान कर दिया और इसी चेतना के चलते अनेक वर्षों से भारतीय नस्ल के लोगों के लिये चल रहा प्रयास आन्दोलन बन कर खड़ा हो गया।   वेदमूर्ति अब भारतीय नस्ल के लोगों के साथ हो रहे अन्याय और भेदभाव के बारे में घूम-घूमकर विभिन्न देशों में सम्पर्क करने का अभियान आरम्भ कर दिया है। निश्चय ही उनके इस अभियान से यह विषय अन्तरराष्ट्रीय पटल पर आ जायेगा। वेदमूर्ति तो इंग्लैण्ड की दीवानी अदालत में जाकर उपनिवेश के दौरान भारतीय नस्ल के लोगों के साथ हुये भेदभाव को लेकर क्षतिपूर्ति भी माँगने वाले हैं। निश्चय ही ऐसे मुद्दे को प्रचार ही देंगे।

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