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रामसेतु पर फिर घमासान के आसार

Posted by amitabhtri on दिसम्बर 10, 2007

पिछले अक्टूबर माह में श्रीराम, रामायण और रामसेतु को लेकर भारत सरकार के संस्कृति मन्त्रालय द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर किये गये शपथ पत्र के साथ ही रामसेतु को लेकर राजनीतिक माहौल गरमा गया था। विषय की संवेदनशीलता को देखते हुये भारत सरकार ने शपथ पत्र वापस ले लिया और सर्वोच्च न्यायालय से इस पूरे विषय के सूक्ष्म परीक्षण के लिये दिसम्बर तक का समय माँगा। इस बीच भारत सरकार ने इस सेतु की स्थिति का आकलन करने के लिये दस सदस्यों की एक विशेषज्ञ समिति बनाई। गत रविवार को एक अंग्रेजी दैनिक ने प्रथम पृष्ठ पर एक समाचार प्रकाशित किया जिसमें उस विशेषज्ञ समिति के निष्कर्षों का उल्लेख सूत्रों के हवाले से दिया गया है। इस निष्कर्ष में समिति ने कहा है कि कोई भी पुरातात्विक और वैज्ञानिक प्रमाण यह सिद्ध नहीं करता कि भारत और श्रीलंका के मध्य पाक की खाड़ी में स्थित यह सेतु मानव निर्मित है। इस समिति के निष्कर्ष के अनुसार यह एक भूसंरचनात्मक निर्मिति है जो विश्व के अनेक भागों में पाई जाती है। इस रिपोर्ट को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष 11 दिसम्बर को प्रस्तुत किया जाना था परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार इसका बारीकी से निरीक्षण करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय से कुछ और समय माँग सकती है।  

इस रिपोर्ट के आने के बाद रामसेतु पर राजनीतिक माहौल गर्माने के आसार प्रतीत होने लगे हैं। लोकमंच के सूत्रों को मिली जानकारी के अनुसार रामेश्वरम् रामसेतु रक्षा मंच जो कि इस सम्बन्ध में देश भर में विभिन्न हिन्दू संगठनों के मंच के रूप में काम करते हुये आन्दोलन चला रहा है उसने इस रपोर्ट को अस्वीकार करने का मन बना लिया है और रामसेतु को लेकर लोगों की आस्था को आधार बनाने के लिये व्यापक आन्दोलन की तैयारी कर ली है। इस सम्बन्ध में आगामी 30 दिसम्बर को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लाखों लोगों को एकत्र करने का निर्णय लिया गया है।  

भारत सरकार द्वारा गठित की गई विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट इस मंच के इस दावे को पुष्ट ही करेगी कि यह सरकार का दिखावा मात्र है क्योंकि इस समिति की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े करते हुये जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी सर्वोच्च न्यायालय भी गये थे यह बात और है कि न्यायालय ने उनकी याचिका को निरस्त कर दिया, परन्तु ऐसा करने से समिति के सदस्यों की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर प्रश्न तो खड़ा हो ही जाता है।  

रामेश्वरम् रामसेतु रक्षा मंच के हाथ में एक और हथियार सरकार का ही एक प्रकाशन लगने वाला है जो पिछले सप्ताह संसद के पटल पर रखा गया। हैदराबाद स्थित रिमोट सेंसिंग एजेन्सी के अन्तरिक्ष विभाग ने एक पुस्तिका इमेजेज इण्डिया श्रृंखला में प्रकाशित की है जिसकी प्रस्तावना इसरो के अध्यक्ष माधवन नायर ने लिखी है। इस पुस्तिका में पृष्ठ संख्या 39 पर रामसेतु का उल्लेख है और इस ढाँचे को 17,50,000 वर्ष पुराना रामेश्वरम् में भारत के दक्षिण में भारत और श्रीलंका के मध्य स्थित बताया गया है। इस पुस्तिका में पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर इसे इतना पुराना आदिकालीन माना गया है। पुस्तिका में रामायण महाकाव्य में ऐसा ही पुल होने की बात भी कही गई है। निश्चित रूप से भारत सरकार का प्रकाशन ही रामसेतु पर सरकार की विरोधाभासी स्थिति को स्पष्ट करता है। सरकार जहाँ श्रीराम और रामसेतु के अस्तित्व से इन्कार करती है वहीं उसका प्रकाशन रामसेतु के अस्तित्व को न केवल स्वीकारता है वरन् आस्थावादियों के मत की पुष्टि करते हुये इसे 17, 50,000 वर्ष प्राचीन भी स्वीकार करता है।  

एक ओर विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और दूसरी ओर सरकारी प्रकाशन में रामसेतु का उल्लेख रामसेतु पर चल रहे आन्दोलन को उद्दीप्त करने के लिये पर्याप्त है। निश्चय ही आने वाले दिनों में रामसेतु को लेकर राजनीतिक और धार्मिक माहौल गरमाने वाला है।

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