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कंधामल की घटना से सबक

Posted by amitabhtri on दिसम्बर 27, 2007

उड़ीसा राज्य एक बार फिर ऐसी घटनाओं के लिये चर्चा में है कि इस कारण चर्चा में रहना शायद वह पसन्द न करे। ईसाइयों के प्रमुख पर्व क्रिसमस के दिन उड़ीसा राज्य ईसाइयों और हिन्दुओं के मध्य साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार हो गया। उड़ीसा के कन्धामल जिले में पिछले अनेक वर्षों से धर्मान्तरण के विरूद्ध अभियान चला रहे हिन्दू सन्त लक्ष्मणानन्द सरस्वती के ऊपर कुछ लोगों ने हमला कर दिया जिनके बारे में हिन्दू संगठनों का आरोप है कि वे ईसाई मिशनरी थे और सन्त की धर्मान्तरण विरोधी अभियान की सफलता से हताश होकर यह आक्रमण किया। इस आक्रमण में स्वयं सन्त लक्ष्मणानन्द सरस्वती और उनका वाहन चालक घायल हो गया जिन्हें कटक के अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस आक्रमण के विरोध में राज्य में हिन्दूवादी संगठनों विश्व हिन्दू परिषद ने कुछ घण्टों के बन्द का आयोजन किया जिसके बाद हिंसा भड़की और कन्धामल से जुड़े कुछ अन्य जिलों में भी इसकी लपट पहुँची। उग्र भीड़ ने एक मन्त्री के घर को आग लगा दी और अनेक कच्चे घरों में बने चर्चों को भी निशाना बनाया।

 वैसे अधिकतर आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियाँ लोगों के कच्चे घरों को ही चर्च के रूप में प्रयोग में लाती हैं इस कारण चर्च में आगजनी की घटना के सम्बन्ध में किसी सूचना के आने पर यह निश्चय करना आवश्यक हो जाता है कि यह आगजनी कामचलाऊ पूजा स्थल में हुई है या फिर आधिकारिक चर्च में।  वैसे इस कारण को आधार बनाकर पूजा स्थल में आगजनी को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता परन्तु ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती।

इस साम्प्रदायिक हिंसा के लिये ईसाई मिशनरी भी उतने ही दोषी हैं जितने हिन्दू संगठन। इस हिंसा को लेकर जो भी बहस होनी चाहिये उसमें दोनों पक्षों की भूमिका पर बहस होनी चाहिये। हमारे देश में समाचार माध्यम अब भी वास्तविक तथ्यों की तह में जाने के स्थान पर प्रचार या प्रोपैगैण्डा पर अधिक ध्यान देते हैं। एक बार फिर इस घटना को कुछ वर्ष पूर्व उड़ीसा में ग्राहम स्टेन्स को उनके बच्चों सहित जीवित जलाने की घटना का स्मरण कराने वाला मानकर प्रचारित किया जा रहा है। निश्चित रूप से दोनों घटनाओं में बिलकुल समानता नहीं है वैसे तो ग्राहम स्टेन्स को जलाने वालों के भी अपने तर्क हैं फिर यदि उन्हें अस्वीकार भी कर दें तो भी कन्धामल की घटना उससे पूरी तरह भिन्न है। यहाँ हिंसा का आरम्भ एक प्रतिष्ठित सन्त पर हमले के बाद हुआ। यह हमला ही अपने आप में काफी कुछ कह देता है।

 ऐसी घटनायें एक ऐसे संघर्ष को इंगित करती हैं जो विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में हिन्दुओं और ईसाइयों के मध्य चल रहा है। यह संघर्ष है धर्मान्तरण का संघर्ष। ईसाई जिसे सेवा कार्य कहते हैं उसके बारे में स्थानीय हिन्दू सन्तों और हिन्दू संगठनों का आरोप रहता है कि यह आदिवासियों का धर्मान्तरण है। इस समस्या पर तार्किक और वास्तविक ढंग से ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।  ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों को लेकर, उनके उद्देश्य और मन्तव्य को लेकर देश की स्वाधीनता से लेकर अब तक 6 दशकों में अनेक आयोग बन चुके हैं और उनकी रिपोर्ट का लब्बोलुवाब यही रहा है कि ईसाई मिशनरियाँ सेवा कार्यों के बहाने धर्मान्तरण के कार्य में अधिक रूचि लेती हैं जो कालान्तर में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये भी खतरा बन सकता है जैसा कि पूर्वोत्तर के प्रमुख ईसाई प्रदेशों में हो रहा है। इस कारण अब वह समय आ गया है कि ईसाई मिशनरियों की विदेशी सहायता, उनके उद्देश्य, मन्तव्य और धर्मान्तरण के प्रति उनके जुनून पर रोक लगाने के ठोस प्रबन्ध किये जायें ताकि आदिवासी क्षेत्रों में ऐसे संघर्षों को टाला जा सके।

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