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बेनजीर की हत्या के मायने

Posted by amitabhtri on दिसम्बर 28, 2007

बेनजीर भुट्टो की पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने जब निर्णय लिया कि उनकी नेता रावलपिंडी के लियाकत बाग में 27 दिसम्बर 2007 को चुनाव प्रचार के सम्बन्ध में बड़ी रैली को सम्बोधित करेंगी तो उनकी पार्टी के कार्यकर्ता अत्यन्त सशंकित थे और उन्होंने पाकिस्तान के पत्रकारों को बताया था कि उनकी नेता काफी बड़ा जोखिम लेने जा रही हैं। उनकी आशंका निर्मूल सिद्ध नहीं हुई और रैली के बाद कार में बैठते समय एक आत्मघाती हमलावर के द्वारा गोलीबारी और फिर बम धमाके में पाकिस्तान की दो बार प्रधानमन्त्री रह चुकी और तीसरी बार सत्ता संभालने की ओर अग्रसर 54 वर्षीया बेनजीर भुट्टो मारी गईं। 

बेनजीर भुट्टो की हत्या किसने की और इसके पीछे मकसद क्या है? यह विषय समझना कोई कठिन नहीं है। 1999 के बाद निर्वासन झेल रही भुट्टो जब 8 वर्षों बाद अपने देश की धरती पर लौटीं तो उससे पूर्व ही पाकिस्तान में तालिबानी कमाण्डर बैतुल्लाह महसूद ने उन पर आत्मघाती हमले की चेतावनी दी थी। यह चेतावनी कोई कोरा गप्प नहीं सिद्ध हुआ और 18 अक्टूबर को श्रीमती भुट्टो के कराची आते ही भीषण आत्मघाती आक्रमण से उनका स्वागत हुआ। इस आक्रमण में श्रीमती भुट्टो तो बाल-बाल बच गईं परन्तु 140 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इस आत्मघाती आक्रमण के पश्चात निश्चित हो गया कि श्रीमती भुट्टो की राह आसान नहीं है।  इस आक्रमण के बाद श्रीमती भुट्टो ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को एक पत्र लिखकर सरकार, सेना और खुफिया एजेन्सी के आठ लोगों के नाम गिनाये जिनसे उन्हें खतरा था। श्रीमती भुट्टो ने बैतुल्लाह महसूद को एक मोहरा बताया और असली खिलाड़ियों को जनरल जिया उल हक के समय का बताया जो जनरल जिया के समर्थक और उनकी विचारधारा में पगे रहे हैं। यह वह असली सवाल है जिसका हल खोजा जाना है कि अब जबकि अल-कायदा के अफगानिस्तान स्थित कमाण्डर ने बेनजीर की हत्या की जिम्मेदारी ले ली है तो इस हत्या का पाकिस्तान की राजनीति और दक्षिण एशिया की राजनीति पर क्या असर होने वाला है? 

पाकिस्तान आज एक विचित्र हालात से गुजर रहा है। जिस देश ने अफगानिस्तान से रूस को हटाने के लिये मुजाहिदीनों को तैयार किया, कश्मीर में आतंकवाद को एक जिहादी रंग दिया, पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन को हवा देकर भारत को रिसते हुये घाव  देने की नीति का खाका खींचा और फिर उसका अनुपालन किया। 1980 के दशक में पाकिस्तान ने जिहाद और आतंकवाद को अपनी नीति का प्रमुख अंग बना लिया और प्रत्येक शासन फिर वह 1988-89 में बेनजीर भुट्टो का ही क्यों न रहा हो उसने कश्मीर में आतंकवाद को जारी रखने और जिहादी तत्वों के प्रश्रय में या फिर कहें कि सेना और खुफिया विभाग के जिहादीकरण की नीति में लगा रहा। जिहादीकरण की इस नीति से पाकिस्तान भारत पर लगातार दबाव बनाने में सफल रहा और शीतयुद्ध में अमेरिका का विश्वसनीय साथी बना रहा। रूस के विरूद्ध अमेरिका को भी इस जिहादीकरण की आवश्यकता थी। परन्तु यह जिहाद उनके लिये विश्व पटल या देशों के साथ पारस्परिक लेनदेन में एक बड़ा बिन्दु मात्र था और इस जिहादीकरण को न तो पाकिस्तान और न ही अमेरिका व्यापक इस्लामी क्रान्ति के रूप में देख रहा था। इसके ठीक उलट 1990 के दशक में ओसामा बिन लादेन ने जिहाद को व्यापक रूप से ब्याख्यायित कर समस्त विश्व में शरियत के आधार पर शासन तथा इस्लाम के विश्वव्यापी प्रभाव के साथ इसे जोड़ दिया। अब जिहादीकरण की यह नीति पाकिस्तान और अमेरिका के हाथों से निकलकर कट्टर इस्लाम समर्थकों के हाथों में आ गई जिनके लिये जिहाद का अर्थ विश्व में इस्लाम की प्रभुत्व स्थापना, शरियत के आधार पर शासन संचालन है। इस क्रम में शुद्धतावादी इस्लामवादियों के निशाने पर वे मुस्लिम बहुल देश हैं जहाँ का शासन मुसलमानों के हाथ में होते हुये भी शरियत के आधार पर संचालित नहीं हो रहा है। मध्य पूर्व के अनेक देशों सहित पाकिस्तान भी इसी श्रेणी में आता है।  

बेनजीर भुट्टो की हत्या से एक बात पूरी तरह स्पष्ट हो गई है कि पाकिस्तान में स्थिति न केवल राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के नियन्त्रण से बाहर हो चुकी है वरन् पाकिस्तान में आन्तरिक स्तर पर स्पष्ट विभाजन है। सेना, सरकार, खुफिया एजेन्सियों और कबाइली क्षेत्रों में अनेक ऐसे तत्व हैं जो जिहादी तत्वों के साथ सहानुभूति रखते हैं और 11 सितम्बर 2001 की बदली हुई परिस्थितियों में पाकिस्तान का अमेरिका का साथ देना और आधुनिकता की ओर जाना पसन्द नहीं आ रहा है।  

आज पाकिस्तान के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि  पाकिस्तान अपने इस विभाजन से किस प्रकार बाहर आये और आधुनिकता को अंगीकार करे। बेनजीर भुट्टो और परवेज मुशर्रफ के बीच कटु सम्बन्धों को मिठास में बदलकर अमेरिका ने दोनों के बीच समझौता करवा दिया और पाकिस्तान में लोकतन्त्र का मार्ग प्रशस्त करते हुये एक कामचलाऊ रास्ता निकाला जिसमें परवेज मुशर्रफ राष्ट्रपति बने और उन्होंने अपनी वर्दी उतारी और 8 जनवरी 2008 को आम चुनाव कराने की घोषणा की। सब कुछ अमेरिका की योजना के अनुरूप ही चल रहा था कि अल-कायदा ने बेनजीर भुट्टो को निशाना बनाकर पाकिस्तान के शासकों को सन्देश दिया है कि वह अमेरिका की किसी नीति सफल नहीं होने देगा और पाकिस्तान को लोकतन्त्र और आधुनिकता के रास्ते पर जाने में हरसम्भव अवरोध उत्पन्न करेगा। श्रीमती भुट्टो की हत्या के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक शून्यता आ गई है। इससे परवेज मुशर्रफ की स्थिति और कमजोर होगी और पाकिस्तान में ऐसा नेतृत्व उभरने में समय लगेगा जो पश्चिमी साँचे में ढला हो और आधुनिकता की बात करता हो। वैसे भी यह बात ध्यान देने की है कि अमेरिका नेतृत्व को थोपकर देश को पटरी पर नहीं ला सकता। जब तक पाकिस्तान का आन्तरिक विभाजन कम नहीं होगा यह समस्या बढ़ती जायेगी और आन्तरिक विभाजन कम होने की सम्भावना फिलहाल तो नहीं दिखती।  

पाकिस्तान के इस संकट का भारत पर प्रत्यक्ष असर तो नहीं पड़ेगा परन्तु पड़ोसी देश में कट्टरपंथियों के बढ़ते प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रह सकेगा। सर्वप्रथम तो जिहादवाद का व्यापक इस्लामी क्रान्ति का स्वरूप भारत में उन तत्वों को प्रेरित करेगा जो जिहादवादी आन्दोलन से सहानुभूति रखते हैं और पाकिस्तान जिस मात्रा में असफल राज्य बनता जायेगा उसी मात्रा में जिहाद का आन्दोलन वैश्विक रूप से अधिक मुखर और आक्रामक होता जायेगा। क्योंकि अब अल-कायदा अपने आन्दोलन को वैश्विक स्वरूप देने के लिये संगठित राज्य की खोज में है जो उसके पास अफगानिस्तान की पराजय के बाद से नहीं है।  

बेनजीर की हत्या के पीछे केवल राजनीतिक मकसद नहीं है वरन् यह एक व्यापक आन्दोलन का हिस्सा है। आज आवश्यकता जिहाद की मानसिकता और पाकिस्तान के आन्तरिक विभाजन से मिलने वाली इसकी खुराक पर लगाम लगानी होगी। इसके लिये पाकिस्तान में लोकतन्त्र और आधुनिकता के लिये काम कर रहे लोगों को सशक्त करने का प्रयास भारत को विशेष तौर पर करना होगा। भारत अब अमेरिका के भरोसे हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकता उसे पाकिस्तान के सम्बन्ध में तटस्थता की अपनी नीति का त्याग कर पाकिस्तान में हस्तक्षेप करना होगा।

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