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Archive for जनवरी, 2008

इस्लामी आतंकवाद से जूझता एक बौद्धिक योद्धा

Posted by amitabhtri on जनवरी 22, 2008

वर्तमान विश्व में जब हम समस्याओं की बात करते हैं तो सर्वाधिक ध्यान जिस समस्या कि ओर जाता है वह समस्या है आतंकवाद की। वैसे तो इस विश्व में अनेक प्रकार के आतंकवाद हैं परंतु जिस आतंकवाद ने सभी देशों और सभ्यताओं को संकत में डाल रखा हैं वह आतंकवाद है इस्लामी आतंकवाद और इस आतंकवाद ने सभी देशों को अपनी नीतियों में इस प्रकार संशोधन के लिये विवश कर दिया कि इस्लामी आतंकवाद सभी देशों के लिये पहली प्राथमिकता बन गया है।  पिछ्ले दिनों दिल्ली में भारत के एक प्रमुख हिन्दी दैनिक समचार पत्र समूह की ओर से एशिया में उपस्थित अनेक समस्याओं को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह गोष्ठी अंतरराष्ट्रीय इस सन्दर्भ में थी कि इसमें भाग लेने वाले अनेक वक्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर के थे। इस संगोष्ठी में अनेक विषयों के अतिरिक्त धार्मिक आतंकवाद और उससे निपटने के उपायों पर भी चर्चा होनी थी। इस विषय पर लोगों का मार्गदर्शन करने के लिये विशेष रूप से अमेरिका स्थित मिडिल ईस्ट फोरम के निदेशक डा. डैनियल पाइप्स को बुलाया गया था। डा. पाइप्स न केवल अमेरिका में वरन समस्त विश्व में मध्य पूर्व की राजनीति और इस्लामी राजनीति के जानकार माने जाते हैं।  डा. पाइप्स की यह कोई पहली भारत यात्रा नही थी इससे पूर्व वे चार बार भारत आ चुके हैं। इस बार उनकी यात्रा का मह्त्व इस सन्दर्भ में अधिक था कि इससे पूर्व जब भी वे भारत आये विश्व में इस्लामी राजनीति और इस्लामी आतंकवाद उस चरमोत्कर्ष पर नहीं था जहाँ आज वह है।

पाइप्स इस्लामी राजनीति और इस्लामवाद पर पिछ्ले 28 वर्षों से लिख रहे हैं और 1970 के दशक में ईरान में हुई इस्लामी क्रांति के बाद से ही इस्लाम में बढ. रहे कट्टरपंथ की ओर समस्त विश्व और विशेषकर पश्चिम का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। 1980 के दशक से ही पाइप्स अपने लेखों का केन्द्र कट्टरपंथी इस्लामी ताकतों को बनाते रहे हैं उन्होंने न केवल इस्लामी अतिवाद की बढती प्रव्रत्ति की ओर संकेत किया वरन् प्रत्येक घटना का बारीकी से अध्ययन कर उसमें छुपी जेहादी प्रव्रत्ति को ढूँढ निकाला। हालांकि उनके लेखों को इस्लामीफोबिक कह कर हवा में उडा दिया गया परंतु जब 11 सितम्बर 2001 को वर्ल्ड ट्रएड सेंटर पर आतंकवादी आक्रमण हुआ तो अमेरिका के अनेक अग्रणी समाचार पत्रों ने अपने विश्लेषण में कहा कि यदि डा. डैनियल पाइप्स की बातों को ध्यान से सुना गया होता तो इस आक्रमण को टाला जा सकता था। 11 सितम्बर की घटना के उपरांत डा. पाइप्स को समस्त विश्व में इस्लामी राजनीति के विशेषज्ञ के रूप में लिया जाने लगा और उनकी ओर विश्व एक आशाभरी निगाहों से देखने लगा कि उनके पास इस समस्या का कोई इलाज होगा। इसी क्रम में जब वे इस बार भारत आये तो उनसे मिलने की उत्सुकता भी थी। 

 हिन्दी समाचार पत्र समूह द्वारा आयोजित कार्यक्रम 16 जनवरी को था और डैनियल पाइप्स 15 जनवरी को भारत आ गये थे। लोकमंच को इसकी सूचना थी और इसी कारण लोकमंच के सम्पादक अमिताभ त्रिपाठी और कर्यकारी सम्पादक शशि कुमार सिंह दो अन्य सदस्यों रघुनाथ शरण पाठक और मनीष के साथ डा. पाइप्स से मिलने दिल्ली स्थित ताज पैलेस होटल पहुँचे जहाँ डा. पाइप्स ठहरे थे। करीब 45 मिनट की इस भेंट में अनेक विषयों पर चर्चा हुई। सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय यह रहा कि उन्होंने जब इस्लाम की राजनीति की चर्चा समस्त विश्व के सन्दर्भ में की तो उनके मूल में वही विषय सामने आये जो भारत में हैं अर्थात समस्या की ओर से आंख मूँदकर मुस्लिम तुष्टीकरण में लिप्त हो जाना। यह जानकर अत्यंत आश्चर्य हुआ कि समस्त विश्व में इस्लामी राजनीति एक ही परिपाटी पर चल रही है और इस्लामी आतंकवाद से निपटने के सम्बन्ध में भी एक ही जैसा प्रयास है।  डा. पाइप्स ने जब पश्चिम के नजरिये के सम्बन्ध में बात की तो ऐसा लगा मानों वे हमारे देश की बात कर रहे हों। उन्होंने बताया कि पश्चिम में भी इस्लामी अतिवाद का कारण वामपंथियों कि नजर में इस्लाम के साथ हुआ अन्याय है और इसके समाधान के रूप में मुसलमानों को अधिक से अधिक विशेषाधिकार दिये जाने की आवश्यकता है। पश्चिम के देशों में भी मुसलमान शरियत के आधार पर संचालित होते हैं और अधिक से अधिक बच्चे पैदाकर भूजनांकिकी का संतुलन बिगाड.रहे हैं।

डा. पाइप्स केवल समस्याओं का ही उल्लेख नहीं करते वरन समाधान भी सुझाते हैं। डा. पाइप्स का मानना है कि समस्या समस्त इस्लाम धर्म नहीं है वरन इस्लाम धर्म का राजनीतिक उपयोग है। उनके  अनुसार जब तक इस्लाम 1200 वर्षों तक विजय पथ पर अग्रसर होता रहा तब तक उसके अनुयायी प्रसन्न रहे परंतु जब यूरोप ने तरक्की कर ली और इस्लाम पीछे रह गया और उसे पता लगा कि वह पीछे रह गया है तो उसमें कट्टरता का समावेश हो गया और जब भी इस्लाम पिछ्ड.ता है तो उसमें जेहादी तत्वों का प्राधान्य हो जाता है। डा. पाइप्स के अनुसार विश्व में कुल मिलाकर तीन खतरनाक विचारधारायें हैं वामपंथी, फासिस्ट और इस्लामवादी। इन तीनों ही विचारधाराओं के मुकाबले के लिये सभ्य विश्व को पहल करनी होगी।  डा. पाइप्स के विचारों में सर्वाधिक संतोष प्रदान करने वाला जो तथ्य है वह यह है कि जब वे सभ्य विश्व की बात करते हैं तो उनमें बीसवीं शताब्दी की पश्चिम की सभ्य विश्व की अवधारणा नहीं है जिसमें सभ्य का अर्थ केवल ईसाई देशों से था। डा. पाइप्स जब सभ्य विश्व की बात करते हैं तो उनकी नजर में भारत की भी एक भूमिका है।

डा. पाइप्स इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि नरमपंथी इस्लाम के विकास की सम्भावनायें हैं और उसी नेतृत्व के विकास पर जोर दिया जाना चाहिये। उनके अनुसार इस्लामी आतंकवाद ने सर्वाधिक नुकसान मुसलमानों को ही पहुँचाया है. इस कारण एक बार नरमपंथी इस्लाम के विकास की प्रक्रिया आरम्भ हुई तो इसमें मुसलमानों का भी सहयोग मिलेगा।डा. पाइप्स पिछ्ले कुछ वर्षों से अपने लेखों का अनुवाद विश्व की विभिन्न भाषाओं में करा रहे हैं और इसी क्रम में उनके कार्य का हिन्दी अनुवाद भी हो रहा है और यह कार्य लोकमंच के द्वारा किया जा रहा है। डा. डैनियल पाइप्स लोकमंच के सलाह्कार भी हैं। उन्होंने लोकमंच के प्रतिनिधियों से भेंट में लोकमंच का हर प्रकार से हरसम्भव सहयोग का आश्वाशन दिया है। डा. पाइप्स ने लोकमन्च के प्रतिनिधियों के साथ भेंट में भारत के सम्बन्ध में विभिन्न जानकारियों में विशेष रुचि दिखायी और माना कि विश्व के इस भाग के सम्बन्ध में उनका ज्ञान अल्प है, परंतु यह अवश्य कहा कि अब वे जल्दी जल्दी भारत की यात्रा करेंगे और अपना सन्देश आम जनता तक ले जाने का प्रयास करेंगे।

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हरभजन सिंह पर प्रतिबन्ध के मायने

Posted by amitabhtri on जनवरी 8, 2008

भारत और आस्ट्रेलिया के मध्य चल रही सीरीज में एक नाटकीय मोड- उस समय आया जब भारत के आफ स्पिनर हरभजन सिंह को आस्ट्रेलिया के हरफनमौला खिलाडी एन्ड्रयु सायमंड्स के विरुद्ध नस्लभेदी टिप्पणी के आरोप में तीन टेस्ट मैचों के लिये प्रतिबन्धित कर दिया गया। टीम प्रबन्धन और भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने भी इस विषय को काफी गम्भीरता से लिया है, एक ओर जहाँ टीम प्रबन्धन ने तत्काल प्रेस कांफ्रेंस कर आई.सी.सी के निर्णय़ पर अपनी आपत्ति जताते हुए इस प्रतिबन्ध के विरुद्ध अपील करने की घोषणा कर डाली तो वहीं भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने टीम को वापस बुलाने के विकल्प को खुला रखा। सिडनी टेस्ट में अम्पायरों के खराब निर्णय के बाद टेस्ट में मिली पराजय के सदमे से टीम इन्डिया उबर भी न पाई थी कि हरभजन सिंह पर लगे प्रतिबन्ध से टीम इन्डिया अन्दर तक हिल गयी। अब पूरे देश में एक ही माँग उठ रही है कि भारतीय  क्रिकेट बोर्ड को टीम को तत्काल स्वदेश  वापस बुला लेना चाहिये। निश्चित ही जिस प्रकार क्रिकेट को इस देश में एक धर्म का दर्जा दिया जाता है उसे देखते हुए हरभजन सिंह के साथ हुए व्यवहार को और सिडनी में हुई अम्पायरिंग को लोग राष्ट्रीय स्वाभिमान के साथ जोड्कर देख रहे हैं।  

इस पूरे प्रकरण में टीम प्रबन्धन और भारतीय क्रिकेट बोर्ड का आरोप है कि हरभजन सिंह के मामले में सुनिश्चित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, आई.सी.सी ने सुनवायी के दौरान दोहरे मानदण्ड अपनाये। जहाँ आई.सी.सी ने आस्ट्रेलिया के दो खिलाडियों मैथ्यू हेडेन और माइकल क्लार्क की गवाही के आधार पर हरभजन सिंह को दोषी करार दे दिया वहीं भारत के खिलाडियों की गवाही को मान्यता नहीं दी गयी। इस एकतरफा निर्णय को आधार बनाकर टीम प्रबन्धन और क्रिकेट बोर्ड आई.सी.सी में अपील की तैयारी कर रहे हैं।

इन सभी सवालों के मध्य एक और बात की ओर हमारा ध्यान नहीं गया है और वो यह कि जो आरोप हरभजन सिंह पर लगाये गये हैं वह आरोप नस्लभेदी टिप्पणी का है। यह वह आरोप है जो पहली बार किसी भारतीय पर लगाया गया है। भारत वह देश है जो सभी राजनीतिक और कूटनीतिक मामलों में नस्लभेद का विरोध करता रहा है यदि ऐसे देश के किसी प्रतिनिधि पर नस्लभेदी टिप्पणी करने का आरोप लगा है तो निश्चित रूप से यह कूट्नीतिक विषय भी बनता है और इस विषय में भारत सरकार को भी दखल देना चाहिये। भारत सरकार को चहिये कि वह इस विषय पर एक स्वतंत्र जांच कराये और यदि इन आरोपों को आधारहीन पाया जाये तो आस्ट्रेलिया से इसकी शिकायत कूटनीतिक स्तर पर की जाये। भारत के किसी खिलाडी पर लगाया यह आरोप भारत की प्रतिष्ठा पर एक धब्बा है जिसे पूरी गम्भीरता से धुलने की आवश्यकता है।   

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