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पश्चिम की इस्लाम को चुनौती

Posted by amitabhtri on मार्च 9, 2008

पिछ्ले कुछ दिनों से एक ऐसी घटना की भूमिका बन रही है जो आने वाले दिनों में बडा तूफान खडा कर सकती है। यह घटना पिछ्ले दो दशकों से पश्चिम और इस्लाम के मध्य चल रही उस अदावट को नया आयाम दे सकती है जिसका आरम्भ 1989 में उस समय हुआ था जब ब्रिटिश मूल के लेखक सलमान रश्दी ने सेटेनिक वर्सेज नामक पुस्तक लिखी थी और उसमें इस्लाम के तथाकथित पवित्र ग्रंथ कुरान की कुछ आयतों पर टिप्प्णी की थी जो सदियों से समस्त विश्व और गैर मुसलमानों के मध्य चर्चा का विषय रही हैं। इस पुस्तक के प्रकाशित होते ही पूरे इस्लामी जगत में मानों भूचाल आ गया और ईरान के सर्वोच्च धर्मगुरु अयातोला खोमेनी ने सलमान रश्दी के विरुद्ध फतवा जारी कर उनका सर कलम करने का आदेश इस्लाम धर्मावलम्बियों को दे दिया। इस फतवे के बाद सलमान रुश्दी को अपनी जान के लाले पड गये और यह पुस्तक प्रायः सभी देशों में प्रतिबन्धित हो गयी।

यह पहला अवसर था जब समस्त विश्व के सामने अभियक्ति की स्वतंत्रता और इस्लाम के विशेषाधिकार को लेकर बहस आरम्भ हुई। इसके बाद अगला वह अवसर 1997 में आया जब इस्लाम के अनुयायियों ने पश्चिम के किसी कदम को अपने धर्म के सिद्धांतों के प्रतिकूल माना और इसे लेकर आक्रामक प्रदर्शन तक हुए यह अवसर तब आया जब अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने परिसर में इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद की उस प्रतिमा को हटाने की अनुमति नहीं दी जिसमें उन्हें विश्व के कानून प्रदाताओं के साथ खडा किया गया था। 1930 की इस प्रतिमा के सम्बन्ध में मुसलमानों का तर्क था कि इस्लाम के अनुसार पैगम्बर की प्रतिमा नहीं हो सकती। अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के उपरांत अनेक स्थानों पर आक्रामक प्रदर्शन हुए।  2002 में एक अवसर फिर आया जब हमें पश्चिम की ओर से आये किसी वक्तव्य के कारण इस्लामी जगत में उसकी घोर प्रतिक्रिया देखने को मिली।

 2002 में एक ईसाई धर्मप्रचारक जेरी फाल्वेल ने पैगम्बर मोहम्मद को एक इंटरव्यू में पहला आतंकवादी कह दिया और इसके बाद सर्वत्र आक्रामक प्रदर्शन हुए। इस प्रदर्शन में अनेक लोग घायल भी हुए और कुछ लोगों को अपनी जान से भी हाथ धोना पडा। इस प्रदर्शन की लपट भारत तक भी आयी और देश के अनेक हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हुए। इसी प्रकार 2005 में प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रिका न्यूजवीक में एक अफवाह जैसा समाचार छपा कि अमेरिका द्वारा आतंकवादियों के लिये बनाई गयी जेल ग्वांटेनामो बे में किसी अमेरिकी जेल अधिकारी ने कैदियों के सामने कुरान की प्रति शौचालय में बहा दी है। इस समाचार के आने के बाद मानों हडकम्प मच गया और जैसी उम्मीद थी उसी अनुसार हिंसा और प्रदर्शन हुए।

पश्चिम और इस्लाम का यह संघर्ष फरवरी  2006 में  फिर  देखने को मिला जब डेनमार्क की एक प्रसिद्ध पत्रिका जायलेंड पोस्टेन ने इस्लामी पैगम्बर मोहम्मद के कुछ कार्टून प्रकाशित किये और यही कार्टून फिर यूरोप के अनेक देशों की पत्र पत्रिकाओं ने प्रकाशित किये। इस घटना ने समस्त इस्लामी विश्व को उद्वेलित कर दिया और विश्व के अनेक हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हुए और इस अभूतपूर्व हिंसा में समस्त विश्व के अनेक हिस्सों में 100 से अधिक लोग मारे गये और अनेक धार्मिक स्थलों को भी नुकसान हुआ। भारत में भी कश्मीर, लखनऊ, हैदराबाद में हिंसा हुई और अनेक लोग घायल हुए। इसके बाद सितम्बर 2006 में रोमन कैथोलिक चर्च के सर्वोच्च धर्म गुरू पोप बेनेडिक्ट ने अपने एक वक्तव्य में इस्लाम के सन्दर्भ में बायजेंटाइन सम्राट को उद्ध्रत करते हुए कहा कि इस्लाम के पास कुछ भी नया नहीं है और जो भी है वह बुरा और अमानवीय है। पोप की यह टिप्पणी अपनी नहीं थी परंतु इस्लामी विश्व में इस पर जमकर बवाल हुआ और पूरी दुनिया में अनेक दिनों तक हिंसक विरोध प्रदर्शन होते रहे। भारत में जामा मस्जिद के इमाम सैयद बुखारी ने पोप को जान से मारने की बात कही। आक्रोश का यही आलम विश्व के अनेक इस्लामी हिस्सों में रहा और इस विषय पर भी हिंसा हुई। 

पश्चिम और इस्लाम की इस अदावट की नवीनतम कडी में हालैण्ड की संसद के सदस्य और आप्रवास विरोधी राजनीतिक दल के नेता गीर्ट वाइल्डर्स ने कुरान पर एक फिल्म बनाने का निर्णय लिया है और यही नहीं तो वे फिल्म पूरी भी कर चुके हैं पहले यह फिल्म जनवरी में प्रस्तावित थी परंतु अब यह मार्च के महीने में कभी भी आ सकती है। इस को लेकर सारी दुनिया में चर्चा हो रही है। इस चर्चा के पीछे दो प्रमुख कारण हैं एक तो वाइल्डर्स हालैंड की संसद के सदस्य हैं, संसद की कुल 150 सदस्य संख्या में उनके 9 सदस्य है और इससे पूर्व भी वे कुरान को हिंसा का प्रेरणा स्रोत मानते हुए उस पर प्रतिबन्ध लगाने की बात कर चुके हैं। उन्होंने कुरान की तुलना हिटलर की आत्म कथा मीन कैम्फ से की है। अभी तक पश्चिम और इस्लाम के मध्य विवाद के जितने उदाहरण हमारे सामने आये थे उसमें पहल या तो धार्मिक व्यक्ति द्वारा या किसी लेखक द्वारा हुई थी और इन सभी विषयों पर कानून निर्माताओं की एक ही राय होती थी कि इस्लाम मतावलम्बियों की भावना को ठेस नहीं लगनी चाहिये। इससे पूर्व के सभी मामलों में पूरे मामले को शांत करने का प्रयास होता था।

पहली बार इस्लाम की आलोचना की पहल किसी कानून निर्माता द्वारा हुई है। इस फिल्म को लेकर हालैण्ड की सरकार ने जो रुख दिखाया है वह भी बडा रोचक है। सरकार ने इस पूरे विषय पर दो स्तर की रणनीति बनाई है जिसमें एक ओर जहाँ फिल्म को प्रदर्शित होने से रोकने के प्रयास करने की बात की गयी है वहीं दूसरी ओर इस फिल्म के प्रदर्शन पर होने वाली मुस्लिम प्रतिक्रिया से अपने  देश में और विदेश में निपटने के विकल्पों पर भी चर्चा हो रही है। वाइल्डर्स के आसपास पुलिस निगरानी बढा दी गयी है और उनके शेष सांसदों की भी निगरानी हो रही है। हालांकि हालैण्ड के टी वी चैनलों ने वाइल्डर्स की फिल्म फितना को प्रदर्शित करने से मना कर दिया है परंतु वाइल्डर्स ने इसके लिये अलग वेबसाइट बनायी है और यू ट्यूब पर भी फिल्म दिखाने की बात कही है। हालैण्ड की सरकार के प्रबन्धों पर वाइल्डर्स का  मानना है कि सरकार के रूख से लगता है कि वह भी फिल्म के प्रदर्शन के लिये तैयार है। यही वह बिन्दु है जिसे टर्निंग प्वांइट कहा जा सकता है। 

 हालैण्ड वह पहला यूरोपिय देश है जहाँ इस्लाम के विशेषाधिकार को सबसे पहले चुनौती दी गयी। इस देश के  राजनीतिक नेता पिम फार्च्यून ने सबसे पहले हालैण्ड में मुस्लिम आप्रवास पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की बाद में वे एक पशु कार्यकर्ता द्वारा मार दिये गये। इसके बाद प्रसिद्ध कलाकार थिओ वान गाग ने सोमालिया मूल की इस्लामी महिला अयान हिरसी अली के साथ मिलकर इस्लाम में महिलाओं की दयनीय स्थिति पर एक फिल्म सबमिसन अर्थात समर्पण जो कि इस्लाम का अर्थ होता है निर्मित की। इस फिल्म को लेकर काफी प्रतिक्रिया हुई और इस फिल्म को इस्लाम और अल्लाह का अपमान बताया गया और 2004 में एक अफ्रीकी मुसलमान ने दिनदहाडे वान गाग की हत्या कर दी। वान गाग के ह्त्यारे मोहम्मद बायेरी ने इसे जेहाद बताया और मुकदमे के दौरान गर्व से स्वीकार किया कि उसने अपने धर्म के अपमान का बदला लिया है।  2004 में इस घटना के बाद हालैण्ड में अभिवयक्ति की स्वतंत्रता और इस्लाम के विशेषाधिकार पर चर्चा आरम्भ हुई।

2006 में पैगम्बर मोहम्मद के कार्टून को लेकर पूरे पश्चिम में जो बह्स आरम्भ हुई तो उसका सर्वाधिक मुखर बिन्दु यह था कि इस्लाम को पश्चिमी समाज की लोकतांत्रिक परम्पराओं के दायरे में लाने के लिये इस बात के लिये बाध्य किया जाये कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धर्मों तथा पैगम्बरों की आलोचना के सामान्य सिद्धांतों को स्वीकार करे। हालैण्ड की फ्रीडम पार्टी के नेता गीर्ट वाइल्डर्स ने अब कुरान पर न केवल वक्तव्य दिया है वरन उसे पुष्ट करने के लिये उसे चित्र में भी लाने का प्रयास किया है। वे स्वयं भी कह्ते हैं कि इस फिल्म में वे वह प्रदर्शित करेंगे जिस पर वे विश्वास करते हैं। इस फिल्म को लेकर हालैण्ड की सरकार तथा अन्य राजनीतिक दलों का जो रवैया है वह निश्चय ही इस बात का संकेत है कि वे इस फिल्म का प्रदर्शन चाह्ते हैं। इसके पीछे असली कारण यही है कि हालैण्ड वह यूरोपिय देश बन रहा है जो इस्लाम को बहस के दायरे में लाकर उसके विशेषाधिकार पर चोट करने जा रहा है।  निश्चय ही यह घटना आने वाले दिनों में समस्त विश्व में चर्चा का विषय बनने वाली है और यह घटना पश्चिम और इस्लाम की अदावट को नया आयाम प्रदान कर सकती है। इस घटना के विकास और परिपक्व रूप लेने के बीच के घटनाक्रम से एक बात स्पष्ट हो रही है कि पश्चिम में इस्लाम को लेकर चिंतन नये सिरे से आरम्भ हो गया है और पश्चिम इस्लाम को अपने अनुरूप ढालने की कवायद में जुट गया है। फिर वह मुस्लिम आप्रवास हो, मुसलमानों का व्यक्तिगत कानून हो , जेहाद हो या फिर समस्त विश्व को शरियत के आधार पर चलाने की उनकी मंशा।

One Response to “पश्चिम की इस्लाम को चुनौती”

  1. काफी जानकारी से परिपूर्ण लेख है।आभार।

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