हिंदू जागरण

हिंदू चेतना का स्वर

क्या भारत बदल रहा है?

Posted by amitabhtri on मई 3, 2008

कल सायंकाल जब टेलीविजन सेट खोलकर समाचार देखने का प्रयास किया तो देखा कि भारत का मशहूर रेसमर खली तीन वर्षों के बाद अपने देश वापस आ रहा है। खली को देखने के लिये एयरपोर्ट पर उसके प्रशंसकों की भीड उमड रही थी और टेलीविजन चैनल उस रोमांच का सीधा प्रसारण कर रहे थे। टेलीविजन के इस प्रसारण को लेकर कुछ लोगों की अलग- अलग राय हो सकती है कि यह टीआरपी का चक्कर रहा होगा आदि आदि पर यहाँ मैं इस विषय पर बिलकुल चर्चा नहीं करना चाहता कि टेलीविजन चैनलों का खली की वापसी दिखाना गलत था या सही। मैं यहाँ उस रूझान की ओर पाठकों का ध्यान खींचना चाहता हूँ जो पिछ्ले कुछ वर्षों से भारत में देखने को मिल रहा हैं।

 

इससे पूर्व भारत के एकदिवसीय और टी- 20 टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी के नेतृत्व में जब भारत ने पहला टी-20 विश्व कप जीत था तो उसकी अगवानी में भी भारी भीड मुम्बई में उमडी। यही नजारा एक बार फिर जूनियर क्रिकेट टीम के विश्व कप जीतने और भारत द्वारा आस्ट्रेलिया को एकदिवसीय श्रृंखला में हराने पर हुआ। दोनों ही अवसरों पर भारत के लोग खिलाडियों के स्वागत में उमड पडे और यह वेग असाधारण लगा। आखिर यह घटनायें क्या संकेत देती हैं। यदि यह बात केवल क्रिकेट तक सीमित होती तो शायद यह मानने का कारण था कि भारतवासियों में क्रिकेट को लेकर जुनून है। लेकिन जब यही स्वागत कुश्ती के नायक लिये भी हो रहा है तो इस रूझान पर गौर करना ही होगा।

 

पिछ्ले कुछ महीनों से जब खली को भारत में टीवी चैनलों ने घर घर तक पहुँचाया तो भी आश्चर्य हुआ कि क्या टीवी चैनल के पास खबरों का अकाल हो गया। ऐसा नहीं है। वास्तव में अब भारत बदल रहा है और यह बदलाव पूरे भारत में एक साथ हो रहा है। यह बदलाव है भारतवासियों की आकांक्षा का बदलाव। अब भारतवासी एक ऐसे भारत को देखना चाहते हैं जो दुनिया में अपना रूतबा रखता हो और जिसमें सुपर पावर या महाशक्ति बनने की शक्ति हो। यही कारण है कि अब क्रिकेट में खेल के मैदान में आस्ट्रेलिया के खिलाडियों को स्लेजिंग का जवाब स्लेजिंग से देने वाले खिलाडियों को जनता सर माथे पर बैठाती है।

 

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने जब टी-20 के नये संस्करण में ढला हुआ आईपीएल का फार्मूला लोगों के सामने परोसा तो उत्सुकता इसी बात को लेकर नहीं थी कि इस खेल के नये संस्करण से मनोरंजन होगा वरन इसके पीछे यह भाव भी सन्निहित था कि अब क्रिकेट जैसे खेल का गुरुत्व केन्द्र भारत में आ गया और जिस खेल पर कभी गोरी चमडी वालों को आधिपत्य हुआ करता था वे ही लोग आज भारतीय क्रिकेट बोर्ड के इशारों पर नाच रहे हैं। क्योंकि आज दर्शक और उससे होने वाली विज्ञापन की आय भारत पर निर्भर है।

 

इसलिये खली हो या क्रिकेट ये तो प्रतीक मात्र हैं जो देश के जनमानस की उस आकांक्षा को प्रकट करते हैं जो भारत को एक महाशक्ति के रूप में देखना चाहती है।

 

भारत में यह आकांक्षा तो सदियों से रही है पर उसका स्वाभिमानी स्वरूप वैश्वीकरण और उन्मुक्त अर्थव्यवस्था के बाद आया है। आज सूचना तंत्रों के व्याप के बीच भारत के हर स्तर के व्यक्ति को पता चल चुका है अमेरिका में नासा में उच्च पदों पर बैठे लोग भी भारतीय मूल के हैं और वहाँ इंजीनियर, डाक्टर और आईटी के लोग भारतीय मूल के हैं और अमेरिका के अर्थव्यवस्था का अधिकाँश भारत पर निर्भर है। आज विदेशों में बैठे भारतीय अपने लिये सम्मान और बराबरी चाहते हैं। सूचनाओं के व्याप से पूरे भारत में ऐसी सूचनायें पहुँचती हैं और इन उपलब्धियों से प्रत्येक भारतीय अपने आप को जोड्ता है।

 

नयी बाजारमूलक अर्थव्यवस्था के अनेक दोष हमारे सामने आ रहे हैं परंतु इसने हमारे लिये अनेक ऐसे द्वार भी खोले हैं जो भारत के बदलते स्वरूप को दर्शाता है। मध्य वर्ग की बढ्ती ताकत ने राष्ट्रवाद की इस आकांक्षा को और सशक्त किया है। अपने सामान्य जीवन स्तर को लेकर असुरक्षा के भाव से मुक्त होकर वह विदेश नीति, विश्व में भारत के स्तर सहित अनेक विषयों पर अपनी राय और आकांक्षा रखने लगा है और यह राष्ट्रवाद का भाव भले ही मध्य वर्ग में सशक्त हुआ हो परंतु इस नये रूझान से पूरा देश आप्लावित है इसका प्रकटीकरण क्रिकेट में इसलिये हो रहा है कि आज समाज में ऐसे महापुरुष ही नहीं हैं जिन्हें भारतवासी अपना आदर्श बना सकें।

 

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है और हम इसे स्वीकार करें या नहीं यह अपने अनुसार स्वाभाविक विकास करता ही है। उसी प्रकार भारत में भी बहुत सी चीजें बदल रही हैं। एक ओर वैश्वीकरण और उन्मुक्त अर्थव्यवस्था से सशक्त हुआ समाज भी है तो वहीं इससे बुरी तरह प्रभावित समाज भी है परंतु इन सबके मध्य भी भारत में राष्ट्रवाद की प्रखरता स्पष्ट दिखाई पड रही है। निश्चित रूप से इस भाव को सकारात्मक स्वरूप तभी मिलेगा जब विश्व स्तर पर हो रहे परिवर्तन के प्रति अपनी नजर रखते हुए हम इसकी निष्पक्ष समीक्षा करें और संक्रमणकालीन स्थिति में भी देश में पनप रहे उत्साह के वातावरण को बनाये रख सकें। समाज में हो रहे परिवर्तनों को कुछ अंशों में स्वीकार भी करना सीखें।

 

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: