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भारत के जिहादीकरण का खतरा

Posted by amitabhtri on जुलाई 27, 2008

भारत में पिछले 20 वर्षों के इस्लामी आतंकवाद के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब चौबीस घण्टे के भीतर दो प्रमुख शहरों में विस्फोट हुए। पहले 25 जुलाई को बंगलोर में कम क्षमता वाले सात श्रृखलाबद्ध विस्फोट हुए और फिर एक दिन बाद गुजरात की राजधानी अहमदाबाद को निशाना बनाया गया। बंगलोर के विस्फोट में जहाँ केवल एक महिला की मृत्यु हुई और कोई एक दर्जन लोग घायल हुए तो वहीं अहमदाबाद में कम क्षमता वाले विस्फोटों के बाद भी 39 लोगों के मारे जाने और 100 से अधिक लोगों के घायल होने का समाचार है।

बंगलोर में हुए विस्फोट को लेकर अधिक चिंतित सरकारें दिखी नहीं और कुछ समाचार पत्रों ने तो इसे आपराधिक गतिविधि तक की संज्ञा दे डाली। बंगलोर में हुए विस्फोट की गुत्थी सुलझ पाती इससे पहले अहमदाबाद में विस्फोट कर आतंकवादियों ने अपनी मंशा प्रकट कर दी। बंगलोर और फिर अहमदाबाद में हुए विस्फोट कुछ समानतायें दर्शाते हैं। ये विस्फोट नवम्बर 2007 में उत्तर प्रदेश में कुछ न्यायालय परिसर में हुए विस्फोट के समान ही हैं। पिछ्ले वर्ष उत्तर प्रदेश में हुए विस्फोट के बाद 13 मई को जयपुर में हुए विस्फोट और अब बंगलोर और अहमदाबाद में विस्फोटों में बडी समानता है। इन सभी विस्फोटों में साइकिल का प्रयोग हुआ, बम रखने के लिये टिफिन या प्रेशर कुकर का प्रयोग हुआ और इन सभी विस्फोटों में अमोनियम नाइट्रेट, नुकीले पदार्थो और जिलेटिन छडों का प्रयोग किया गया है। यह समानता कुछ संकेत देती है। एक तो यह कि अब अधिकतर विस्फोटों को अंजाम भारत में स्थानीय मुसलमान दे रहा है और बम की सामग्री या विस्फोटकों के निर्माण के लिये उसे पाकिस्तान की आई.एस.आई पर निर्भर नहीं होना पड रहा है अर्थात अब इन विस्फोटों को करने के लिये आर.डी.एक्स का आयात आवश्यक नहीं है। यह रूझान कुछ खतरनाक संकेत देता है। एक तो यह कि भारत सरकार का यह दावा बेमानी सिद्ध होता है कि सभी आतंकवादी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई या लश्कर और जैश का हाथ है और यह दावा कि भारत में मुसलमान वैश्विक जिहादी नेटवर्क से न तो जुडा है और न ही उस भाव से प्रभावित है।

बंगलोर में हुए विस्फोट की जिम्मेदारी तो किसी संगठन ने नहीं ली है परंतु अहमदाबाद में हुए विस्फोट की जिम्मेदारी उस इण्डियन मुजाहिदीन नामक अप्रचलित आतंकवादी संगठन ने ली है जो पहली बार चर्चा में तब आया था जब पिछले वर्ष नवम्बर में उत्तर प्रदेश में हुए विस्फोटों की जिम्मेदारी लेते हुए ईमेल मीडिया के लोगों को भेजा था। इसी संगठन ने जयपुर विस्फोटों की जिम्मेदारी लेते हुए जिहाद का एक घोषणा पत्र ही मीडिया को जारी किया। एक बार फिर जब इस संगठन ने अहमदाबाद में हुए विस्फोटों की जिम्मेदारी ली है और इसे गुजरात में हुए दंगों का प्रतिशोध बताया है तो पूरी स्थिति पर पुनर्विचार करने का अवसर आ गया है।

पिछले वर्ष नवम्बर में जब इण्डियन मुजाहिदीन ने उत्तर प्रदेश के अनेक न्यायालयों में श्रृखलाबद्ध विस्फोट किये थे तो इसका कारण घटना के कुछ दिन पूर्व जैश-ए-मोहम्मद के कुछ आतंकवादियों की लखनऊ में हुई गिरफ्तारी तथा मुम्बई बम काण्ड के आरोपियों के रूप में मुसलमानों को अधिक मात्रा में सजा देना साथ ही पिछ्ले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में हुए आतंकवादी आक्रमणों के आरोपी आतंकवादियों के पक्ष में पैरवी करने से वकीलों के इंकार करना माना गया था। यह एक ऐसा आतंकवादी आक्रमण था जो रणनीतिक दृष्टि से एक दम नया प्रयोग था और सीधे-सीधे न्यायपालिका को निशाना बनाया गया था। इसी प्रकार जयपुर में 13 मई को हुए विस्फोट के बाद इण्डियन मुजाहिदीन ने एक बार फिर विस्फोटों की जिम्मेदारी लेते हुए जिहाद का घोषणा पत्र मीडिया को भेजा और पहली बार हिन्दुओं की पूजा पद्धति के चलते उनको निशाना बनाने और इस्लामी उम्मा के साथ ही विदेश नीति और मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा की बातें की। एक बार फिर इस संगठन ने गुजरात के दंगों का प्रतिशोध लेने की बात कर भारत के मुसलमानों की सहानुभूति लेने का प्रयास किया है और जिहाद को चर्चा में लाने में सफलता प्राप्त की है। समाचारों के अनुसार इण्डियन मुजाहिदीन ने जिस प्रकार राजस्थान और मध्य प्रदेश सरकार को चेतावनी दी है कि वह सिमी के कार्यकर्ताओं को छोड दे अन्यथा अपने राज्यों मे आतंकवादी आक्रमणों के लिये तैयार रहे वह भी एक खतरनाक संकेत है और यह राज्य और प्रशासन पर दबाव डालने और अपनी माँगें मनवाने के साथ ही मुस्लिम जिहादी तत्वों की सहानुभूति प्राप्त कर अधिक भर्ती के लिये नये मुसलमानों को प्रेरित करने का प्रया भी है।

इण्डियन मुजाहिदीन ने जो सदेश मीडिया को भेजा है उसमें बाम्बे स्टाक एक्स्चेंज को निशाना बनाने और अग्रणी उद्योगपति मुकेश अम्बानी को भी निशाने पर लेने की बात की है। बंगलोर में जिस प्रकार विस्फोट हुए और मुम्बई में स्टाक एक्सचेंज सहित मुकेश अम्बानी पर भी आक्रमण करने की बात इस्लामी आतंकवादी संगठनों ने की है उसके अपने निहितार्थ हैं। जयपुर में हुए विस्फोट के बाद इस संगठन ने जो सन्देश मीडिया को भेजा था उसमें यह भी कहा था कि मुस्लिम विरोधी सरकारों और राजनीतिक दलों को धन और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का परिणाम उद्योगपतियों और आम जनता को ऐसे विस्फोटो के रूप में भुगतना पडेगा।

जयपुर में भयानक विस्फोटों के बाद जिस प्रकार दो माह से कम समय में इस्लामी आतंकवादियों ने चौबीस घण्टे के भीतर देश के दो आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न शहरों को निशाना बनाया है उससे स्पष्ट है कि खतरा अब पडोसी देश से नहीं वरन भारत के भीतर ही एक मुस्लिम वर्ग से है जो वैश्विक जिहाद से जुड गया है और कभी भी कहीं भी आक्रमण या विस्फोट करने की क्षमता रखता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इस समस्या को सही सन्दर्भ में देखा जाये और इसे देश पर आक्रमण मान कर अपने शत्रुओं की पहचान कर ली जाये।

देश में इस्लामी आतंकवाद की परम्परा रही है और इसके प्रति सरकारों और बुद्धिजीवियों के शुतुरमुर्गी रवैये की परम्परा भी रही है। आज भी जब यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है कि पिछले चार वर्षों में भारत में जितने भी विस्फोट हुए हैं उसमें सिमी और स्थानीय मुस्लिम समुदाय का सक्रिय योगदान रहा है फिर भी हमारी सरकार बिना कोई प्रमाण लाये लश्कर, जैश और आई.एस.आई के मत्थे दोष मढ देती है। यह बात किसी को भी आश्चर्यजनक लग सकती है कि भारत में आतंकवादी गतिविधियों में पाकिस्तान को दोषी कैसे न माना जाये पर अब भारत के जिहादीकरण का खतरा उत्पन्न हो गया है और हमने 13 दिसम्बर 2001 को संसद पर हुए आक्रमण के बाद पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कार्रवाई न करके एक बडा अवसर खो दिया था अब भारत में आतंकवाद का व्याकरण बदल गया है और भारत में विस्फोटों के लिये पाकिस्तान को हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है अब भारत में मुसलमानों का एक बडा वर्ग जिहाद से प्रेरित है और वह स्वयं भारत के विरुद्ध जिहाद में लिप्त है। यह जिहाद पूरी तरह वैश्विक जिहादवाद से प्रेरित है और मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा, अमेरिका और इजरायल के साथ भारत की बढ्ती निकटता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुरान और शरियत के आधार पर एक काल्पनिक विश्व व्यवस्था के निर्माण का संकल्प इस जिहादवाद को प्रेरित कर रहा है और इस विचार से प्रभावित होने वाले मुसलमानों की संख्या निरंतर बढ रही है।

एक अजीब विडम्बना है कि देश में कुछ प्रमुख इस्लामी संगठनों ने पिछ्ले कुछ महीनों में इस्लामी आतंकवाद की निन्दा और इसे इस्लाम से पूरी तरह असम्पृक्त करने के प्रयास किये हैं। इस क्रम में देश के प्रमुख इस्लामी संगठनों ने अलग-अलग प्रयासों के द्वारा कई बार आतंकवाद विरोधी सम्मेलन तक आयोजित किये परंतु इन सम्मेलनों के बाद से इस्लामी आतंकवादी घटनाओं में तीव्रता आ गयी है। आखिर ऐसे प्रयासों का क्या लाभ जो आतंकवादी घटनायें रोकने में असफल है। ऐसे प्रयासों को गम्भीरता पूर्वक आतंकवाद रोकने के प्रयास के बजाय इस्लाम की छवि को ठीक करने और मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा को न्यायसंगत ठहराने के प्रयासों के रूप में अधिक लेने की आवश्यकता है।

इस्लामी आतंकवाद की इस परिपाटी का नया आयाम हमारे समक्ष सामने आ रहा है जब आतंकवाद का नया गुरुत्व केन्द्र दक्षिण एशिया बनता जा रहा है। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुए विनाशकारी आक्रमण के पश्चात अमेरिका ने बौद्धिक और प्रशासनिक तौर पर इस समस्या को नये सन्दर्भ में लिया और इसे एक युद्ध माना यही तथ्य यूरोप के विषय में भी सत्य है और यही कारण है कि मैड्रिड और लन्दन में हुए विस्फोटों के बाद ये देश भी आतंकवादी घटनाओं में अपने निर्दोष लोगों की जान बचाने में सफल रहे हैं। इसके विपरीत हमारा देश प्रत्येक तीन महीने में सैकडों लोगों की जान दाँव पर लगाता है पर इस समस्या को एक आपातकालीन स्थिति मानकर उस प्रकार की नीतियाँ नहीं बनाता। आश्चर्य तो तब होता है जब आतंकवाद प्रतिरोध के विशेषज्ञ बी रमन जैसे लोग भी मान लेते हैं कि भारत की सरकार को मुसलमानों को विश्वास दिलाना चाहिये कि न्याय व्यवस्था में उनके साथ न्याय होगा। साथ ही वे यह ही स्वीकार करते हैं कि भारत इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिका जैसा जवाब नहीं दे सकता क्योंकि भारत मुस्लिम पडोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से घिरा है और भारत में मुसलमान 15 प्रतिशत से अधिक है और कुलमिलाकर इन देशों में मुस्लिम जनसंख्या 57 प्रतिशत होती है। बी रमन के विश्लेषण से यही निष्कर्ष निकलता है कि वह भी मानते हैं कि इस्लामी आतंकवाद एक विचारधारागत विषय है जिसके साथ इस दक्षिण एशिया का मुसलमान बडी मात्रा में जुडा है। आज आवश्यकता है कि इस समस्या से मुँह चुराने के स्थान पर इस पर बहस हो और आतंकवाद के इस्लामी स्वरूप और इस्लामी प्रेरणा के कारणों को जानने के साथ ही इसकी महत्वाकाँक्षा को दबाया जाये।

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