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सेकुलरिज्म के बहाने आतंकवाद का समर्थन?

Posted by amitabhtri on सितम्बर 28, 2008

सेकुलरिज्म के बहाने आतंकवाद का समर्थन? अमिताभ त्रिपाठी

पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी के बौद्धिक प्रकोष्ठ ने आतंकवाद के विषय पर एक सार्थक चर्चा का आयोजन किया और इस कार्यक्रम में पार्टी के राष्ट्रीय महाचिव अरुण जेटली ने जो विचार रखे उसमें एक बात अत्यन्त मौलिक थी कि देश एक ऐसी स्थिति में आ गया है जहाँ देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल काँग्रेस ने अपने वर्षों की परम्परा जो राष्ट्रवाद और सेकुलरिज्म के संतुलन पर आधारित थी उसे तिलाँजलि देकर अब सेकुलरिज्म को ही अपना लिया है और वह भी ऐसा सेकुलरिज्म जो इस्लामी कट्टरवाद की ओर झुकाव रखता है। यह बात केवल काँग्रेस के सम्बन्ध में ही सत्य नहीं है पूरे देश में विचारधारा के स्तर पर जबर्दस्त ध्रुवीकरण हो रहा है और स्वयं को मुख्यधारा के उदारवादी-वामपंथी बुद्धिजीवी कहने वाले लोग सेकुलरिज्म के नाम पर इस्लामी कट्टरवाद को प्रोत्साहन दे रहे हैं।
पिछले कुछ महीनों में देश के अनेक भागों में हुए आतंकवादी आक्रमणों के बाद यह बहस और मुखर हो गयी है विशेषकर 13 सितम्बर को दिल्ली में हुए श्रृखलाबद्ध विस्फोटों के बाद मीडिया ने इस विषय पर बहस जैसा वातावरण निर्मित किया तो पता चलने लगा कि कौन किस पाले में है? प्रिंट मीडिया के अनेक पत्रकारों ने इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किये और दिल्ली विस्फोटों में उत्तर प्रदेश के आज़मगढ का नाम आने पर एक बहस आरम्भ हुई जिसके अनेक पहलू सामने आये। एक तो इलेक्ट्रानिक मीडिया का एक स्वरूप सामने आया जिसने काफी समय से अनुत्तरदायित्वपूर्ण पत्रकारिता का आरोप झेलने के बाद पहली बार आतंकवाद को एक अभियान के रूप में लिया और इसके अनेक पहलुओं पर विचार किया। इसी बह्स में अनेक चैनलों ने अनेक प्रकार की बहस की और सर्वाधिक आश्चर्यजनक बह्स कभी पत्रकारिता के स्तम्भ रहे और पत्रकार द्वारा संचालित चैनल का दावा करने वाले राजदीप सरदेसाई के सीएनएन-आईबीएन के चैनल पर देखने को मिली। प्रत्येक शनिवार और रविवार को विशेष कार्यक्रम प्रसारित करने वाले राजदीप सरदेसाई ने आतंकवाद पर एक विशेष सर्वेक्षण के परिणामों की व्याख्या के लिये यह कार्यक्रम आयोजित किया। सीएनएन- आईबीएन और हिन्दुस्तान टाइम्स के संयुक्त प्रयासों से किये गये इस सर्वेक्षण में जो कुछ चौंकाने वाले पहलू थे उनमें दो मुख्य थे- एक तो सर्वेक्षण के अंतर्गत दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, अहमदाबाद, हैदराबाद के लोगों से यह पूछना कि उनकी दृष्टि में किस मात्रा में उनकी पुलिस साम्प्रदायिक है और दूसरा काँग्रेस, भाजपा और पुलिस अधिकारी को बहस में बुलाकर उनके ऊपर विशेष राय के लिये प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर को रखना। यही नहीं 27 सितम्बर को दिल्ली में मेहरौली में हुए बम विस्फोट के बाद जब सीएनएन-आईबीएन ने अपने न्यूजरूम में इन्हीं जावेद अख्तर को बुलाया तो इससे स्पष्ट संकेत लगाना चाहिये कि इस चैनल के मन में आतंकवाद को लेकर क्या है?

किस आधार पर राजदीप सरदेसाई जावेद अख्तर को देश का ऐसा चेहरा मानते हैं जो पूरी तरह निष्पक्ष है और आतंकवाद पर इनकी नसीहत किसी पक्षपात से परे है जबकि इनकी पत्नी ने कुछ ही महीनों पहले कहा था कि उन्हें मुम्बई में फ्लैट नहीं मिल पा रहा है क्योंकि इस देश में मुसलमानों के साथ भेदभाव होता है। जिस शबाना आज़मी के पास मुम्बई के विभिन्न स्थानों पर सम्पत्ति है उसे अचानक लगता है कि उन्हें इस देश में मुसलमान होने की कीमत चुकानी पड रही है और जो बात पूरी तरह निराधार भी सिद्ध होती है ऐसे शबाना आजमी के पति पूरे देश के लिये एक निष्पक्ष दार्शनिक कैसे बन गये? पूरी बह्स के बाद जब राजदीप सरदेसाई ने आतंकवाद के समाधान के लिये जावेद अख्तर से समाधान पूछा तो उनका उत्तर था कि सभी प्रकार के आतंकवाद से लडा जाना चाहिये फिर वह भीड का आतंकवाद हो, राज्य का आतंकवाद हो या फिर और कोई आतंकवाद हो। पूरी बहस में राजदीप सरदेसाई और जावेद अख्तर देश भर में हो रहे जिहादी आतंकवाद के विचारधारागत पक्ष पर चर्चा करने से बचते रहे। जब मुम्बई के पूर्व पुलिस प्रमुख एम एन सिंह ने कहा कि कडा कानून और खुफिया तंत्र भी 50 प्रतिशत ही आतंकवाद से लड सकता है और शेष 50 प्रतिशत की लडाई विचारधारा के स्तर पर लड्नी होगी। इस पर जावेद अख्तर साहब उसी पुराने तर्क पर आ गये कि यदि सिमी पर प्रतिबन्ध लगे तो बजरंग दल पर भी प्रतिबन्ध लगना चाहिये।

राजदीप सरदेसाई की बहस एक विचित्र स्थिति उत्पन्न करती है। जरा कुछ बिन्दुओं पर ध्यान दीजिये। वे आतंकवाद के विरुद्ध कौन सी सरकार बेहतर लडी यह आँकडा प्रस्तुत करते हैं और कहते हैं कि 26 प्रतिशत लोग यूपीए को बेहतर मानते हैं और 28 प्रतिशत लोग एनडीए को। अब राजदीप सरदेसाई भाजपा के राजीव प्रताप रूडी से पूछते हैं कि आप में भी जनता को अधिक विश्वास नहीं है कि आप इस समस्या से बेहतर लडे। सर्वेक्षण में 46 प्रतिशत लोग मानते है कि कोई भी वर्तमान राजनीतिक दल आतंकवाद से प्रभावी ढंग से नहीं लड रहा है। जरा विरोधाभास देखिये कि एक ओर देश के मूर्धन्य पत्रकार राजदीप सरदेसाई पुलिस का इस आधार पर सर्वेक्षण करते हैं कि वह कितनी साम्प्रदायिक है और भाजपा पर आरोप लगाते हैं कि पोटा कानून का अल्पसंख्यकों के विरुद्ध दुरुपयोग होता है तो वहीं कहते हैं कि आप भी तो आतंकवाद से बेहतर ढंग से नहीं लड पाये। लेकिन राजदीप सरदेसाई हों या जावेद अख्तर हों वे उस खतरनाक रूझान की ओर ध्यान नहीं देते कि जिस देश के 46 प्रतिशत लोगों का विश्वास अपने नेताओं से इस सन्दर्भ में उठ जाये कि वे उनकी रक्षा करने में समर्थ हैं तो इसके परिणाम आने वाले समय में क्या हो सकते हैं?

इससे पहले राजदीप सरदेसाई ने अपने चैनल पर कुछ सप्ताह पूर्व आतंकवाद पर ही एक बहस आयोजित की थी और किसी मानवाधिकार कार्यकर्ता के साथ किरण बेदी और अरुण जेटली को भी आमंत्रित किया था और स्वयं को उदारवादी और लोकतांत्रिक सिद्ध करते हुए पुलिस को अपराधी तक सिद्ध करने का अवसर बहस में मानवाधिकार कार्यकर्ता को दिया था। अब प्रश्न है कि पुलिस को अधिकार भी नहीं मिलने चाहिये, जिहाद पर चर्चा भी नहीं होनी चाहिये, सेकुलरिज्म के नाम पर इस्लामी कट्टरवाद को बढावा दिया जाना चाहिये, देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं की बात उठाने वाले को आतंकवादियों के बराबर खडा किये जाने के प्रयासों को महिमामण्डित किया जाना चाहिये, मानवाधिकार के नाम पर आतंकवादियों की पैरोकारी होनी चाहिये, आतंकवाद के आरोप में पकडे गये लोगों के मामले में सेकुलरिज्म के सिद्धांत का पालन होना चाहिये। इन परिस्थितियों में कौन सा देश आतंकवाद से लड सकता है यह फार्मूला तो शायद राजदीप सरदेसाई और जावेद अख्तर के पास ही होगा।

आज सबसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि हमारे चिंतन और व्यवहार में राष्ट्र के लिये कोई स्थान नहीं है और इसका स्थान उन प्रवृत्तियों ने ले लिया है जो राष्ट्र के सापेक्ष नहीं हैं। आश्चर्य का विषय है कि जिस उदारवाद का पाठ हमारे बडे पत्रकार दुनिया के सबसे बडे उदारवादी लोकतंत्र अमेरिका से पढते हैं वे क्यों भूल जाते हैं कि अमेरिका में राज्य के अस्तित्व और उसके ईसाई मूल के चरित्र पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं खडा किया जाता और इन दो विषयों पर पूरे देश में सहमति है इसी कारण 11 सितम्बर 2001 को आतंकवादी आक्रमण के बाद आम सहमति हो या फिर अभी आये आर्थिक संकट के मामले में सहमति हो इस बात को आगे रखा जाता है कि राज्य कैसे सुरक्षित रहे? 11 सितम्बर के आक्रमण के बाद कुछ कानूनों को लेकर उदारवादी-वामपंथियों ने अमेरिका में भी काफी हो हल्ला मचाया था पर राज्य की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गयी न कि उदारवादी-वामपंथियों को फिर भारत में ऐसा सम्भव क्यों नहीं है? निश्चय ही इसका उत्तर अरुण जेटली की इसी बात में है कि अब काँग्रेस में राष्ट्रवाद के लिये कोई स्थान नहीं है और उसका झुकाव सेकुलरिज्म की ओर है जो इस्लामी कट्टरवाद से प्रेरित है।

लेकिन चिंता का विषय यह है कि केवल काँग्रेस ही इस भावना के वशीभूत नहीं है देश में बुद्धिजीवियों का एक बडा वर्ग सेकुलरिज्म और पोलिटिकल करेक्टनेस की ओर झुक रहा है और आतंकवाद ही नहीं राष्ट्रवाद से जुडे सभी विषयों पर विभ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहा है। यही कारण है कि इस्लामी आतंकवाद की चर्चा करते समय अधिकाँश पत्रकार यह भूल जाते हैं कि यह एक वैश्विक आन्दोलन का अंग है और वे इसे 1992 में अयोध्या में बाबरी ढाँचे के ध्वस्त होने से जोडकर चल रहे हैं। लेकिन यह तर्क निरा बकवास है इस देश में मुस्लिम वर्ग के साथ कोई ऐसा अन्याय नहीं हुआ है कि वह हथियार उठा ले। आज समस्त विश्व में इस अवधारणा को प्रोत्साहन दिया जा रहा है कि अमेरिका द्वारा इजरायल को दिये जा रहे समर्थन से अल कायदा जैसे संगठन उत्पन्न हुए। यदि ऐसा है तो ब्रिटेन, स्पेन, बाली में मुस्लिम समाज के साथ क्या अन्याय हुआ था? दक्षिणी थाईलैण्ड में बौद्धों ही पिछले दो वर्ष से हत्यायें क्यों हो रही हैं। आज भारत में सेकुलरिज्म के नाम पर जिस प्रकार इस्लामी आतंकवाद के लिये तर्क ढूँढे जा रहे हैं इसका स्वरूप भी वैश्विक है।

जिस प्रकार 11 सितम्बर 2001 की घटना को विश्व भर के उदारवादी-वामपंथियों ने सीआईए और मोसाद का कार्य बताया था उसी प्रकार भारत में 2002 में गोधरा में रामसेवकों को ले जा रही साबरमती ट्रेन में इस्लामवादियों द्वारा लगायी गयी आग के लिये हिन्दू संगठनों को ही दोषी ठहरा कर षडयंत्रकारी सिद्धांत का प्रतिपादन इसी बिरादरी के भारत के लोगों ने किया । जिस प्रकार विदेशों में सक्रिय इस्लामी आतंकवादी फिलीस्तीन और इजरायल विवाद, इराक में अमेरिका सेना की उपस्थिति और ग्वांटेनामो बे में इस्लामी आतंकवादियों पर अत्याचार को आतंकवाद बढने का कारण बता रहे है उसी प्रकार भारत में 1992 में अयोध्या में बाबरी ढाँचा गिराया जाना, 2002 में गुजरात के दंगे और प्रत्येक आतंकवादी आक्रमण के बाद निर्दोष मुसलमानों को पकडा जाना और उन्हें प्रताडित किये जाने को भारत में इस्लामी आतंकवादी घटनाओं का कारण बताया जा रहा है। आज भारत में हिन्दू संगठनों को इस्लामी आतंकवाद का कारण बताया जा रहा है तो विश्व स्तर पर अमेरिका के राष्ट्रपति बुश और इजरायल को लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं है।

आज विश्व स्तर पर इस्लामी आतंकवाद के आन्दोलन का सहयोग बौद्धिक प्रयासों से, मानवाधिकार के प्रयासों से, मुसलमानों को उत्पीडित बताकर और षडयंत्रकारी सिद्धान्त खोजकर किया जा रहा है। पिछले वर्ष ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने अपने देश में यूरोप और अन्य देशों के उन विद्वानों को आमंत्रित किया जो मानते हैं कि नाजी जर्मनी में यहूदियों का नरसंहार हुआ ही नहीं था और यह कल्पना है जिस आधार पर यहूदी समस्त विश्व को ब्लैकमेल करते हैं।

आज विश्व स्तर पर चल रहे इन प्रयासों के सन्दर्भ में हमें इस्लामी आतंकवाद की समस्या को समझना होगा। आज उदारवादी-वामपंथी बनने के प्रयास में हमारा बुद्धिजीवी समाज आतंकवादियों के हाथ का खिलौना बन रहा है।

आज जिस प्रकार सेकुलरिज्म के नाम पर भारत को कमजोर किया जा रहा है उसकी गम्भीरता को समझने का प्रयास किया जाना चाहिये। आखिर जो लोग मुस्लिम उत्पीडन का तर्क देते हैं और कहते हैं कि बाबरी ढाँचे को गिरता देखने वाली पीढी जवान हो गयी है और उसने हाथों में हथियार उठा लिये हैं या 2002 के दंगों का दर्द मुसलमान भूल नहीं पा रहे हैं तो वे ही लोग बतायें कि भारत विभाजन के समय अपनी आंखों के सामने अपनों का कत्ल देखने वाले हिन्दुओं और सिखों के नौजवानों ने हाथों में हथियार उठाने के स्थान पर अपनी नयी जिन्दगी आरम्भ की और देश के विकास में योगदान दिया। रातोंरात घाटी से भगा दिये गये, अपनों की हत्या और बलात्कार देखने के बाद भी कश्मीर के हिन्दुओं की पीढी ने हथियार नहीं उठाये और आज भी नारकीय जीवन जीकर अपने ही देश में शरणार्थी बन कर भी आतंकवादी नहीं बने क्यों? बांग्लादेश और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का दर्जा पाने वाले हिन्दू पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर आ गये पर उनकी दशा सुनकर कोई विश्व के किसी कोने में हिन्दू आत्मघाती दस्ता नहीं बना क्यों? इस प्रश्न का उत्तर ही इस्लामी आतंकवाद की समस्या का समाधान है।

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इस्लामी आतंकवाद का नया आयाम

Posted by amitabhtri on सितम्बर 25, 2008

पिछले दिनों 13 दिसम्बर को दिल्ली में इंडियन मुजाहिदीन द्वारा किये गये बम विस्फोटों के बाद आतंकवादियों की तलाश में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अनेक स्थानों पर पुलिस ने छापेमारी की और दक्षिणी दिल्ली के जामिया नगर क्षेत्र में एल-18 के एक फ्लैट में मुठभेड में कुछ आतंकवादियों को मार गिराया और एक को गिरफ्तार किया। इस मुठभेड और गिरफ्तारी के बाद अनेक सनसनीखेज रह्स्योद्घाटन हुए और मुठभेड के बाद कथित मकान की देखरेख कर रहे अब्दुर्ररहमान और उनके पुत्र जियाउर्ररहमान ने कुछ टीवी चैनलों पर आकर इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस को घेरने की कोशिश की और मारे गये आतंकवादियों के सम्बन्ध में मकान पर किराये लेने की औपचारिकता पूरी करवाने में पुलिस की लापरवाही सिद्ध कर स्वयं को इस पूरे मामले से अनभिज्ञ दिखाने की चेष्टा की। लेकिन दिल्लीवासियों सहित पूरे देश को तब आश्चर्य हुआ जब मकान की रखवाली करने वाले अब्दुर्रहमान और उनके पुत्र जियाउर्रहमान को पुलिस ने इस पूरे षडयंत्र में बराबर का साझीदार बताया तथा और तो और जो जियाउर्ररहमान अत्यंत भोले भाले अन्दाज में टीवी चैनल को बता रहा था कि मारे गये आतंकवादियों को वह जानता नहीं था उसके बारे में दिल्ली पुलिस ने बताया कि उसने दिल्ली में अनेक स्थान पर बम भी रखने में सहयोग किया और आतंकवादियों को हर प्रकार का रणनीतिक सहयोग भी उपलब्ध कराया। जब पुलिस की जांच आगे बढी तो पाया गया कि जियाउर्रहमान के साथ एक शकील भी आतंकवाद के इस षडयंत्र में शामिल है और ये दोनों ही दिल्ली के अत्यंत प्रतिष्ठित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्र हैं।

इन छात्रों के आतंकवादी गतिबिधियों में लिप्त होने के आरोप में पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया प्रशासन की पहली प्रतिक्रिया आयी कि इन छात्रों को विश्वविद्यालय से निलम्बित कर दिया गया है लेकिन इस निर्णय के उपरांत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मुशीरुल हसन ने घोषणा की कि विश्वविद्यालय की ओर से तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जा रहा है जो आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार छात्रों को हर प्रकार की सहायता उपलब्ध करायेगी ताकि उनके आरोप सिद्ध होने से पहले तक कानूनी सहायता प्राप्त हो। इसके साथ ही कुलपति महोदय ने पूरे विषय को एक भावनात्मक मोड दिया और छात्रों को सम्बोधित करते हुए कहा कि यह संकट का अवसर है और इससे हम सबको मिलकर लड्ना है। कुलपति ने पुलिस को निशाना बनाया और कहा कि सभी को पता है कि पुलिस कैसे जांच करती है। प्रोफेसर मुशीरुल हसन जो कि देश के सेकुलर पंथियों में एक उदारवादी मुसलमान और श्रेष्ठ बुद्धिजीवी के रूप में स्थान रखते हैं और देश की अधिकाँश समस्यायों के पीछे संघ परिवार और हिन्दू आन्दोलन को देखते हैं उन्होंने इस पूरे मामले में मीडिया को भी घेरा और कहा कि वह रिपोर्टिंग के लिये उडीसा, कर्नाटक और गुजरात जाये। कुलपति द्वारा जामिया मिलिया इस्लामिया के दो छात्रों के आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोपी होने के बाद इसे एक संक़ट सिद्ध कर देने से विश्वविद्यालय के छात्रों ने आतंकवाद के आरोपी छात्रों की कानूनी सहायता के लिये सहायता कोष एकत्र करना आरम्भ कर दिया है। विश्वविद्यालय ने आतंकवाद के आरोपी छात्रों की सहायता के लिये जो तीन सदस्यीय समिति गठित की है उसमें शामिल किये गये लोगों की छवि प्रायः उदारवादी मुसलमानों की रही है जो जिहाद को आत्मसंघर्ष के रूप में परिभाषित करते रहे हैं और जिहाद के नाम पर आतंकवाद करने की आलोचना करते आये हैं।

जामिया प्रशासन द्वारा आतंकवाद के आरोप में पकडे गये अपने दो छात्रों के सम्बन्ध में लिये गये निर्णय के अनेक निहितार्थ हैं।

इस्लामी आतंकवाद के सम्बन्ध में अब यह तर्क पुराना हो गया है कि यह कुछ गुमराह नौजवानों का काम है जो किसी उत्पीडन या बेरोजगारी के चलते ऐसा कर रहे हैं। इसके साथ ही आतंकवादियों के पक्ष में मुस्लिम समाज सहित तथाकथित सेकुलरपंथियों का खुलकर सामने आना एक सामान्य बात हो गयी है। और तो और अब आतंकवादियों के समर्थन में पुलिस को अपराधी बनाना और उसके प्रयासों को झूठा सिद्ध करना साथ उसके द्वारा पकडे गये लोगों को निर्दोष सिद्ध करने के लिये आक्रामक बौद्धिक प्रयास चलाना भी इस्लामी आतंकवाद का नया आयाम है। इसके अतिरिक्त एक अन्य आयाम यह जुडा है कि देश के अत्यंत श्रेष्ठ बौद्धिक लोग इस्लामी आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराने के लिये मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा सृजित करने में अपनी बौद्धिक क्षमता का उपयोग कर रहे हैं। अनेक ऐसे लेखक मिल जायेंगे जो अत्यंत परिश्रम पूर्वक यह प्रयास कर रहे हैं कि भारत राज्य की व्यवस्था में मुस्लिम उत्पीडन और भेदभाव को स्थापित किया जाये ताकि इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप इस्लामी आतंकवाद को न्यायसंगत सिद्ध किया जा सके।

प्रोफेसर मुशीरुल हसन का इस प्रकार आतंकवाद के आरोपियों के पक्ष में खुलकर आना और पुलिस को अपराधी सिद्ध कर आतंकवादियों को निर्दोष घोषित करना अनेक प्रश्न खडॆ करता है। मुशीरुल हसन वही व्यक्ति हैं जिन्होंने कुछ महीनों पूर्व देश के कुछ कुलपतियों के प्रतिनिधिमण्डल के साथ इजरायल की यात्रा की थी और इजरायल के सम्बन्ध में देश में अधिक मुस्लिम समझ बढाने की दिशा में प्रयास करने का आश्वासन इजरायल को दिया था। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि मुशीरुल हसन इस कदर इस्लामवादी नहीं हैं कि वे इजरायल को देखना भी पसन्द न करें फिर ऐसे अपेक्षाकृत बुद्धिजीवी मुसलमान का देश के विरुद्ध आक्रमण की घोषणा करने वाले संगठन इंडियन मुजाहिदीन के सदस्यों की खुलकर वकालत के क्या मायने है?
इस विषय को समझने के लिये हमें अनेक सन्दर्भों को समझना होगा। जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना भारत के प्रमुख इस्लामी संगठन दारूल उलूम देवबन्द के प्रमुख सदस्य ने स्थापित किया था और पहले यह अलीगढ में था और कुछ वर्षों बाद यह दिल्ली आया। दारूल उलूम देवबन्द एक ऐसी कट्टरपंथी विचारधारा का पोषक है जिसमें से तालिबान और उसके प्रमुख मुल्ला उमर जैसे लोग पैदा हुए हैं। कुछ महीनों पहले दारूल उलूम देवबन्द ने अनेक आतंकवाद विरोधी सम्मेलन आयोजित कर आतंकवाद और इस्लाम को असम्पृक्त करने का प्रयास भी किया परंतु इस सभी सम्मेलनों में जिस प्रकार सशर्त ढंग से आतंकवाद की निन्दा की गयी उससे स्पष्ट है कि इस्लामी आतंकवाद को इस्लाम से असम्पृकत रखते हुए भी मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा के आधार पर उसका समर्थन करने का व्यापक षड्यंत्र रचा जा रहा है।

वास्तव में समस्त विश्व में इस्लामवाद एक आन्दोलन के रूप में चलाया जा रहा है जिसका मूलभूत उद्देश्य वर्तमान विश्व व्यवस्था को ध्वस्त कर नयी विश्व व्यवस्था का निर्माण करना है जो कुरान और शरियत पर आधारित है और इसे प्राप्त करने के लिये राज्य को आतंकित कर उसके संस्थानों को ध्वस्त करना इनकी कार्ययोजना है।

विश्व स्तर पर एक बडा परिवर्तन आया है कि 1991 में सोवियत रूस के विघटन के बाद वामपंथी विचार के लोग पूरी तरह असहाय और अप्रासंगिक हो गये और उनके लिये पूँजीवाद और अमेरिका को पराजित करना असम्भव लगने लगा और इसी कारण समस्त विश्व के वामपंथियों ने आर्थिक चिंतन के साथ ही इस्लाम के प्रति भी सहानुभूति दिखानी आरम्भ कर दी और धीरे धीरे इजरायल और फिलीस्तीन का विवाद उनके एजेण्डे में ऊपर आ गया। इस प्रक्रिया में वामपंथ इस्लामवादी आन्दोलन और मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा को समर्थन देने लगा और समस्त विश्व की समस्याओं के मूल में अमेरिका और इजरायल को रख दिया गया। आज समस्त विश्व में इस्लामवाद के नयी विश्व व्यवस्था के निर्माण और कुरान तथा शरियत पर आधारित व्यवस्था विश्व पर लादने के प्रयासों के समर्थन में मुस्लिम उत्पीडन के तर्क वामपंथी चिंतकों द्वारा ही तैयार किये जा रहे हैं फिर वह नोम चोम्सकी हों या विलियम ब्लम।

11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमण के बाद विश्व भर के वामपंथियों को यह विश्वास हो गया कि जो काम स्टालिन, लेनिन और माओ नहीं कर सके वह काम इस्लामी आतंकवादी कर ले जायेंगे और इनकी सहायता से अमेरिका को पराजित किया जा सकता है।

जिस प्रकार विश्व भर के वामपंथियों ने 11 सितम्बर को अमेरिका पर हुए आक्रमण के उपरांत खुलकर इस्लामी आतंकवादियों का समर्थन करना आरम्भ कर दिया है वही रूझान अब भारत में भी देखने को मिल रहा है। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुए आक्रमण को लेकर भारत में वामपंथियों और उनके सहयोगी सेकुलरपंथियों ने इसे अल कायदा और अमेरिका के बीच का संघर्ष बताया और साथ ही साथ वैश्विक स्तर पर इस्लामवाद का समर्थन करते हुए लेख लिखे, धरना प्रदर्शन किया और तो और आज से चार वर्ष पूर्व केरल में हुए विधानसभा चुनावों में वामपंथियों ने फिलीस्तीनी नेता और इंतिफादा में हजारों यहूदियों को आत्मघाती आक्रमणों मे मरवाने वाले यासिर अराफात के चित्र को लेकर और आईए ई ए में ईरान के विरुद्ध भारत सरकार के मतदान को चुनाव का मुद्दा बनाया और कांग्रेस को बुरी तरह पराजित किया। ऐसे कम ही अवसर भारतीय लोकतंत्र में होंगे जब विदेश नीति को साम्प्रदायिकता के साथ जोडा गया और मुस्लिम वोट प्राप्त किया गया।

इसके बाद जब डेनमार्क में इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद का कार्टून प्रकाशित किया गया तो वामपंथियों ने अनेक सेकुलरपंथियों के साथ मिलकर इस्लामवादियों का साथ दिया और सड्कों पर उतर कर अनेक स्थानों पर हिंसा का मार्ग प्रशस्त किया। इसी प्रकार जब अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने जब भारत की यात्रा की तो वामपंथियों और सेकुलरपंथियों ने इस्लामवादियों के साथ मिलकर देश में अनेक स्थानों पर बडी बडी रैलियाँ कीं और आगंतुक राष्ट्रपति को संसद का संयुक्त सत्र संसद भवन में सम्बोधित नहीं करने दिया और सांसदों को दिल्ली में अन्य किसी स्थान पर एकत्र करना पडा।

इन सभी घटनाक्रमों में केवल एक बात सामान्य रही कि सभी मामलों में इस्लामवादियों के एजेण्डे का समर्थन भारत के वामपंथियों और सेकुलर पंथियों ने किया।

जिस समय अमेरिका पर आक्रमण हुआ या फिर यूरोप के देश इस्लामी आतंकवाद का शिकार हुए तो भारत में वामपंथी और सेकुलरपंथी इसे पश्चिम के अन्याय के विरुद्ध इस्लामवादियों की प्रतिक्रिया बताकर भारत को इस्लामी आतंकवाद से लड्ने की तैयारी करने से रोकते रहे और इस बात की प्रतीक्षा करते रहे कि भारत में इस्लामी आतंकवादी कब भारत के राज्य को चुनौती देते हैं और जब 2004 के बाद से भारत में देशी मुसलमानों द्वारा आतंकवादी घटनायें की जानें लगीं तो इनके पक्ष में यह वर्ग खुलकर सामने आने लगा। 2001 में जो लोग जिहाद को आत्मसंघर्ष सिद्ध कर रहे थे अब वे मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा के समर्थन में आ गये हैं और राज्य तथा पुलिस को उत्पीडक सिद्ध कर आतंकवादी घटनाओं को न्यायसंगत ठहरा रहे हैं। ऐसा इसलिये हुआ है कि देश में वामपंथियों और सेकुलरपंथियों को विश्वास हो गया है कि इंडियन मुजाहिदीन जैसे इस्लामी संगठन राज्य को चुनौती देने में सक्षम हैं और वे उनके लक्ष्य में सहायक हैं। प्रोफेसर मुशीरुल हसन जैसे लोग इसी भावना के वशीभूत होकर आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार अपने विश्वविद्यालय के छात्रों का समर्थन कर रहे हैं जिनकी दृष्टि में भारत में सेकुलरिज्म का संतुलन बनाये रखने के लिये आवश्यक है कि देश पर हिन्दू संगठनों का वर्चस्व कम हो और यह काम इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठन ही कर सकते हैं तभी उन्होंने उडीसा और कर्नाटक में चर्च और ईसाइयों पर हुए हमलों को देश के सेकुलर ताने बाने के लिये खतरा बताते हुए विहिप और बजरंग दल को कोसा परंतु 13 दिसम्बर को दिल्ली पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद उसकी निन्दा करना भी उचित नहीं समझा और बाद में मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा के सहारे आतंकवाद और आतंकवादियों का समर्थन करने लगे।

इस्लामी आतंकवाद के इस नये आयाम को इसी सन्दर्भ में समझने की आवश्यकता है। इस्लामी आतंकवाद को सही ढंग से समझने के लिये आवश्यक है कि इसके मूलस्रोत और मूल प्रेरणा को समझा जाये। आज जो भी शक्तियाँ भारत में व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर हिंसक गतिविधियों में लिप्त हैं उन सभी शक्तियों के आपस में गठजोड करने की पूरी सम्भावना है और इसका उदाहरण हमें मिल भी चुका है जब अमरनाथ में भूमि प्राप्त करने के आन्दोलन के समय माओवादियों ने पहली बार कश्मीर में इस्लामी आतंकवादियों का समर्थन करने की घोषणा करते हुए कश्मीर के संघर्ष में अपना सहयोग देने का वचन दिया और कश्मीर की स्वतंत्रता का समर्थन किया। इससे पहले मई माह में केरल में इस्लामी आतंकवादियों और नक्सलियों की पहली संयुक्त बैठक हुई थी और साम्राज्यवाद, राज्य आतंकवाद और हिन्दू फासीवादियों से एक साथ लड्ने का संकल्प व्यक्त किया गया था। यह एक नये ध्रुवीकरण का संकेत है जिसमें वर्तमान व्यवस्था के स्थान पर एक काल्पनिक विश्व व्यवस्था स्थापित करने में प्रयासरत शक्तियाँ एक साथ आ रही हैं और इन सभी को इस्लामी आतंकवादी अपने सहयोगी दिखायी दे रहे हैं। इस्लामी आतंकवाद का मुकाबला करने के लिये राज्य को तो कठोर कदम उठाने ही होंगे विचारधारा के स्तर पर हो रहे ध्रुवीकरण को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध विचारधारा के स्तर पर समान शक्तियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साथ लाया जाये।

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कैसे लडें जिहाद से?

Posted by amitabhtri on सितम्बर 21, 2008

भारत जिहाद नामी इस्लामी आतंकवाद से पिछले दो दशक से लड रहा है परंतु इसका वैश्विक स्वरूप विश्व के समक्ष 11 सितम्बर 2001 के साथ आया। जिन दिनों भारत इस्लामी आतंकवाद से लड रहा था उन दिनों अमेरिका सहित पश्चिमी विश्व के लोग भारत में कश्मीर केन्द्रित आतंकवाद को स्वतंत्रता की लडाई मान कर हाथ पर हाथ धरे बैठे थे। लेकिन क्या भारत ने कभी अपने देश में चल रहे आतंकवाद को परिभाषित कर उससे लड्ने की कोई रणनीति अपनाई? कभी नहीं? इसके पीछे दो कारण हैं। एक तो इस समस्या को वैश्विक परिदृश्य में कभी देखने का प्रयास नहीं हुआ और दूसरा इस आतंकवाद के विचारधारागत पक्ष पर कभी ध्यान नहीं दिया गया। भारत में आतंकवाद के लिये सदैव पडोसी देश को दोषी ठहरा कर हमारे नेता अपने दायित्व से बचते रहे और तो और आतंकवाद के इस्लामी पक्ष की सदैव अवहेलना की गयी और मुस्लिम वोटबैंक के डर से इसे चर्चा में ही नहीं आने दिया गया।

भारत ने जिहाद प्रेरित इस इस्लामी आतंकवाद से लड्ने के तीन अवसर गँवाये हैं। पहली बार जब 1989 में इस्लाम के नाम पर पकिस्तान के सहयोग से कश्मीर घाटी में हिन्दुओं को भगा दिया गया तो भी इस समस्या के पीछे छुपी इस्लामी मानसिकता को नहीं देखा गया। यह वह अवसर था जब राजनीतिक इच्छाशक्ति के द्वारा हिन्दुओं के पलायन को रोककर जिहाद को कश्मीर में ही दबाया जा सकता था। वह अवसर था जब पाकिस्तान के विरुद्ध कठोर कार्रवाई कर जिहाद के इस भयावह स्वरूप से भारत को बचाया जा सकता था। इसके बाद दूसरा अवसर हमने 1993 में गँवाया जब जिहाद प्रेरित इस्लामी आतंकवाद कश्मीर की सीमाओं से बाहर मुम्बई पहुँचा। इस अवसर पर भी इस घटना को बाबरी ढाँचे को गिराने की प्रतिक्रिया मानकर चलना बडी भूल थी और यही वह भूल है जिसका फल आज भारत भोग रहा है। तीसरा अवसर 13 दिसम्बर 2001 का था जब संसद पर आक्रमण के बाद भी पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गयी। यह अंतिम अवसर था जब भारत में देशी मुसलमानों को आतंकवाद की ओर प्रवृत्त होने से रोका जा सकता था। इस समय तक भारत में आतंकवाद का स्रोत पाकिस्तान के इस्लामी संगठन और खुफिया एजेंसी हुआ करते थे और भारत के मुसलमान केवल सीमा पार से आने वाले आतंकवादियों को सहायता उपलब्ध कराते थे। इसके बाद जितने भी आतंकवादी आक्रमण भारत पर हुए उसमें भारत के जिहादी संगठन लिप्त हैं।

अब देखने की आवश्यकता है कि चूक क्यों हुई? एक तो भारत में 1989 के बाद उत्पन्न हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कभी वैश्विक सन्दर्भ में जिहाद और इस्लाम को समझने का प्रयास नहीं किया गया।

आज वैश्विक स्तर पर हम जिस जिहाद की धमक देख रहे हैं या जिस अल कायदा का स्वरूप हमारे समक्ष है वह एक शताब्दी के आन्दोलन का परिणाम है। बीसवीं शताब्दी में मिस्र नामक देश में मुस्लिम ब्रदरहुड नामक उग्रवादी मुस्लिम संगठन का निर्माण हुआ और यह इसे वैचारिक पुष्टता प्रदान करने वाले मिस्र के सैयद कुत्ब थे। जिन्हें 19966 में तत्कालीन राष्ट्रपति ने मिस्र सरकार को अपदस्थ करने के षडयंत्र को रचने के आरोप में मृत्युदण्ड दे दिया था। सैयद कुत्ब ने नये सन्दर्भ में जिहाद की अवधारणा दी और इस्लाम की राजनीतिक भूमिका निर्धारित की। उन्होंने उम्मा को सक्रिय करने और जाहिलियत का सिद्धांत दिया। सैयद कुत्ब के अनुसार इस्लाम का शरियत और क़ुरान आधारित विशुद्ध शासन समय की माँग है और इसके लिये जिहाद द्वारा राज्य के शासन अपने हाथ में लेना इसका तरीका है। कुत्ब के जाहिलियत के सिद्धांत के अनुसार जो इस्लामी देश पश्चिम के देशों के हाथ की कठपुतली हैं उनके विरुद्ध भी जिहाद जायज है। कल पाकिस्तान में हुआ विस्फोट इसी सिद्धांत के अनुपालन में किया गया है। सैयद कुत्ब ने पश्चिम की संस्कृति को अनैतिक और जाहिल करार दिया और इसके विरुद्ध जिहाद का आह्वान किया। सैयद कुत्ब की मृत्यु के उपरांत उनके भाई मोहम्मद कुत्ब ने उनके साहित्य को आगे बढाया। उन पर पुस्तकें और टीका लिखीं और अयमान अल जवाहिरी तथा ओसामा बिन लादेन जैसे अल कायदा के प्रमुखों के लिये प्रेरणास्रोत बने।

आज भारत में जब इस्लामी आतंकवाद और जिहाद की बात होती है तो इसे 1992 के राम मन्दिर आन्दोलन से जोड कर इस्लामी प्रतिक्रिया मान लिया जाता है। परंतु यह बात दो बातों को प्रमाणित करती है। या तो लोग अनभिज्ञ हैं या फिर जान बूझकर झूठ बोलते हैं। 1991 से वैश्विक स्तर पर जिहाद में एक नया परिवर्तन आया था और ओसामा बिन लादेन ने इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट की स्थापना की दिशा में कदम बढा लिया था। 1993 में इस फ्रंट की ओर से पहली बार एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर हुए और ईसाइयों तथा यहूदियों के विरुद्ध जिहाद का आह्वान किया गया। इस आह्वान के बाद विश्व में पश्चिम के अनेक प्रतिष्ठानों पर आक्रमण होने लगे।

अल कायदा का जिहादवाद कुछ सिद्धांतों को लेकर चल रहा था और उसमें एक प्रमुख सिद्धांत था मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा। उनके जिहाद का कारण विश्व में शरियत और कुरान के आधार पर एक नयी विश्व व्यवस्था का निर्माण करना और मुस्लिम उत्पीडन का बदला लेना। इस विचारधारा ने समस्त विश्व के मुसलमानों को बडी तेजी से अपनी ओर आकर्षित किया और एक दशक में अल कायदा का जिहादवाद अनेक विचारधाराओं के समाधान के रूप में देखा जाने लगा और खिलाफत संस्था के पुनर्जीवित होने का स्वप्न सभी देखने लगे।

अल कायदा के विकास को इस सन्दर्भ में समझने की आवश्यकता है कि वह विश्व भर के मुसलमानों के एक बडे वर्ग के लिये अनेक समस्याओं के समाधान के रूप में जिहाद को प्रस्तुत करता है।

आज भारत में भी मुस्लिम समाज का कोई न कोई वर्ग विश्व पर इस्लामी शासन की स्थापना के स्वप्न के अंश के रूप में भारत को भी इस्लामी शासन के अंतर्गत लाने की सोच रखता है। आज हमें इस पूरे जिहादवाद को समझना होगा कि यह अब किसी एक संगठन या नेतृत्व द्वारा प्रेरित नहीं है और इसमें प्रत्येक देश के इतिहास और सोच के सन्दर्भ में इसकी व्याख्या हो रही है। लेकिन इंडियन मुजाहिदीन पूरी तरह अल कायदा की सोच और तकनीक पर काम कर रहा है। उसके आक्रमण और मीडिया प्रबन्धन में यह झलक देख चुके हैं। 15 वर्ष पूर्व यदि अल कायदा ने अमेरिका और पश्चिम तथा पश्चिम के हाथ की कठपुतली बने अरब देशों का विषय उठाया था तो इंडियन मुजाहिदीन पूरी तरह भारत के मुसलमानों से जुडे विषय उठा रहा है। परंतु मूल सिद्धांत एक ही है मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा से आम मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करना और जिहाद द्वारा इस्लामी राज्य स्थापित करने की चेष्टा। पिछले कुछ वर्षों में विश्वस्तर पर वामपंथी भी पूँजीवाद के प्रतीक अमेरिका के विरुद्ध अपनी लडाई में जिहादवादी इस्लामवादी आतंकवादियों को अपना सहयोगी मान कर चल रहे है यही तथ्य भारत में नक्सलियों और माओवादियों के साथ भी है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि भारत में व्यवस्था परिवर्तन का आन्दोलन चलाने वाले भी जाने अनजाने जिहादवादियों के तर्कों का समर्थन करते दिखते हैं।

आज प्रश्न यह है कि इस जिहाद से मुक्ति कैसे मिले? भारत में यह समस्या अत्यंत जटिल है क्योंकि भारत में हिन्दू मुस्लिम सम्बन्धों की कटुता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है और इस बात की आशंका है कि जिहाद की वर्तमान अवधारणा धार्मिक विभाजन को अधिक प्रेरित कर सकती है। जिहाद से लड्ने के लिये राज्य स्तर पर और सामाजिक स्तर पर रणनीति बनानी पडेगी। यह काम किसी भी प्रकार तुष्टीकरण से सम्भव नहीं है और इसका एकमात्र उपाय व्यापक जनजागरण है। व्यापक स्तर पर इस्लाम पर बहस हो। इस्लाम और इस्लामी आतंकवाद के आपसी सम्बन्धों पर बह्स से बचने के स्थान पर इस विषय पर बह्स की जाये और मुसलमानों को अपनी स्थिति स्पष्ट करने को बाध्य किया जाये। यदि मुसलमान आतंकवाद के साथ नहीं हैं तो पुलिस को अपना काम करने दें और जांच में या आतंकवादियों के पक़डे जाने पर मुस्लिम उत्पीडन का रोना बन्द करें। आज देश में प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्व का विकास रोकने क दायित्व मुसलमानों पर है हिन्दुओं पर नहीं। यदि क़ुरान आतंकवाद की आज्ञा नहीं देता और देश के मुसलमान जिहाद से सहानुभूति नहीं रखते तो उन्हें इसे सिद्ध करना होगा अपने आचरण से। अन्यथा इस समस्या को धार्मिक संघर्ष का रूप लेने से कोई नहीं रोक सकता।

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