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कांग्रेस को भारी पड सकती है हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा

Posted by amitabhtri on अक्टूबर 26, 2008

यह कोई संयोग है या फिर सोचा समझा प्रयास कि जिस दिन सेंसेक्स इतना नीचे चला गया कि शेयर बाजार में छोटा निवेश करने वालों की दीपावाली अभिशप्त हो गयी और प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, आर.बी.आई के गवर्नर के तमाम आश्वासनों के बाद भी शेयर बाजार के गिराव थमा नहीं और सर्वत्र हाहाकार मच रहा था कि अचानक महाराष्ट्र के एण्टी टेररिस्ट स्क्वेड ने 29 सितम्बर को मालेग़ाँव में हुए बम विस्फोट की गुत्थी सुलझा लेने का दावा करते हुए इस मामले में पहली बार किसी हिन्दू को गिरफ्तार किया। आतंकवादी घटना में हिन्दू की गिरफ्तारी उतनी चौंकाने वाले नहीं है जितनी उसकी टाइमिंग। अभी कुछ दिन पहले ही केन्द्रीय कैबिनेट की एक विशेष बैठक आयोजित कर बजरंग दल पर प्रतिबन्ध लगाने की चर्चा की गयी और पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में सरकार के अनेक घटक दलों की जबर्दस्त माँग के बाद भी सरकार ऐसा नहीं कर पायी। इसके बाद राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक बुलायी गयी और उस बैठक में साम्प्रदायिकता को विशेष मुद्दा बनाया गया और बैठक में कुछ सदस्यों ने बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग दुहरायी। राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक से पूर्व लेखक ने बैठक के पीछे छुपी मंशा पर सवाल उठाये थे।

वास्तव में देश में बढ रहे इस्लामी आतंकवाद को लेकर जिस प्रकार एक ऐसा माहौल बन रहा है कि उसमें घटनायें करने वाले मुस्लिम ही हैं तो ऐसे में सेकुलरिज्म का दम्भ भरने वाले राजनीतिक दलों के सामने यह गम्भीर प्रश्न खडा हो गया है कि वह इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध इस लडाई को सेकुलर सिद्दांतों के दायरे में रह कर कैसे लडें? दूसरा धर्मसंकट इन दलों के समक्ष मुस्लिम वोटबैंक है। 2006 में जब मुम्बई में लोकल रेल व्यवस्था को निशाना बनाया गया था और बडी संख्या में मुम्बई की मुस्लिम बस्तियों और मुस्लिम उलेमाओं को पुलिस ने निशाने पर लिया था और पूछताछ की थी तो मुस्लिम नेताओं, बुद्धिजीवियों और धर्मगुरुओं ने मिलकर संसद भवन में एनेक्सी में आतंकवाद विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया और केन्द्र सरकार के प्रतिनिधियों के बीच आतंकवाद के नाम पर इस्लाम को बदनाम करने और निर्दोष मुसलमानों को फँसाने की प्रवृत्ति की आलोचना की और सरकार से आश्वासन लिया कि सरकार आतंकवाद के मुद्दे पर मुस्लिम भावनाओं का आदर करेगी। यह पहला अवसर था जब भारत के स्थानीय मुस्लिम समाज की भूमिका आतंकवादी घटनाओं में सामने आयी थी। इसके बाद से आतंकवाद को लेकर सेकुलरिज्म के सिद्धांतों के अनुपालन और संतुलन साधने के प्रयासों के तहत हिन्दू आतंकवाद का आभास सृजित कर एक नयी अवधारणा स्थापित करने का प्रयास आरम्भ हो गया। यदि 2006 के बाद हुई आतंकवादी घटनाओं के पश्चात सेकुलरपंथी राजनेताओं और राजनीतिक दलों के बयानों पर दृष्टि डाली जाये तो स्पष्ट होता है कि अनेक बार आतंकवादी घटनाओं की निष्पक्ष जाँच और हिन्दू संगठनों के षडयंत्र का कोण भी इनके बयानों में आने लगा। इसी के साथ अनेक मुस्लिम संगठन तो खुलकर कहने लगे कि ऐसे आतंकवादी आक्रमण हिन्दू संगठनों द्वारा इस्लाम को बदनाम करने के लिये प्रायोजित किये जा रहे हैं।

जैसे-जैसे देश में आतंकवादी आक्रमण बढते रहे आतंकवाद के विरुद्द कार्रवाई में सेकुलरिज्म के सिद्धांत का पालन करने के लिये और संतुलन साधने के लिये हिन्दू आतंकवाद का आभास सृजित किया जाने लगा। यही नहीं तो इस्लामी आतंकवाद के समानान्तर एक हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा को पुष्ट करने के लिये हिन्दूवादी संगठनों के एक व्यापक नेटवर्क की बात की जाने लगी जो सुनियोजित ढंग से आतंकवाद फैलाने के लिये उसी प्रकार कार्य कर रहे हैं जैसे सिमी या अन्य इस्लामी आतंकवादी संगठन। इसके लिये देश के कुछ जाने माने टीवी चैनलों ने तो प्रचार का एक अभियान चलाया है और अपनी झूठी और खोखली दलीलों के द्वारा सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं कि हिन्दूवादी संगठनों के प्रयासों से देश में आतंकवाद का एक नेटवर्क चल रहा है जिसमें महाराष्ट्र का एक सैन्य स्कूल बम बनाने का प्रशिक्षण दे रहा है। सीएनएन- आईबीएन ने कुछ दिनों पहले इसे खोजी पत्रकारिता का नाम देकर कुछ वर्षों पूर्व नान्देड में हुए बम विस्फोट से लेकर पिछले माह कानपुर में हुए बम विस्फोट तक पूरे घटनाक्रम को एक सुनियोजित नेटवर्क का हिस्सा बताकर हिन्दू आतंकवाद को मालेगाँव से पहले ही पुष्ट कर दिया था।

मालेग़ाँव के मामले में एक साध्वी सहित कुछ लोगों की गिरफ्तारी के मामले पर भी कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के समाचार चैनल पर जिस तरह समाचार से अधिक कांग्रेस का एजेण्डा चलाया जा रहा है उससे स्पष्ट है कि यह पूरा मामला केवल जाँच एजेंसियों तक सीमित नहीं है और इसे लेकर एक प्रकार का प्रचार युद्ध चलाया जा रहा है। जिस प्रकार न्यूज 24 ने साध्वी की गिरफ्तारी के साथ ही चैनल पर हिन्दू आतंकवाद बनाम इस्लामी आतंकवाद की बहस चलायी और सभी समाचार चैनलों मे अग्रणी भूमिका निभाकर स्वयं ही न्यायाधीश बन कर फैसला सुना दिया उससे स्पष्ट है कि यह पूरा खेल कांग्रेस के इशारे पर हो रहा है।

एंटी टेररिस्ट स्कवेड अभी तक जिन तथ्यों के साथ सामने आया है उस पर कुछ प्रश्न खडे होते हैं। आखिर अभी तक साध्वी और उनके साथ गिरफ्तार लोगों के ऊपर मकोका के तहत मामला क्यों दर्ज नहीं किया गया है और यह मामला भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत ही क्यों बनाया गया है जबकि आतंकवादियों के विरुद्ध मकोका के अंतर्गत मामला बनता है। इससे स्पष्ट है कि संगठित अपराध की श्रेणी में यह मामला नहीं आता। आज एक और तथ्य सामने आया है जो प्रमाणित करता है कि मालेगाँव विस्फोट में आरडीएक्स के प्रयोग को लेकर महाराष्ट्र पुलिस और केन्द्रीय एजेंसियों के बयान विरोधाभासी हैं। महाराष्ट्र पुलिस का दावा है कि वह घटनास्थल पर पहले पहुँची इस कारण उसने जो नमूने एकत्र किये उसमें आरडीएक्स था तो वहीं महाराष्ट्र पुलिस यह भी कहती है कि विस्फोट के बाद नमूनों के साथ छेड्छाड हुई तो वहीं केन्द्रीय एजेंसियाँ यह मानने को कतई तैयार नहीं हैं कि इस विस्फोट में आरडीएक्स का प्रयोग हुआ उनके अनुसार इसमें उच्चस्तर का विस्फोटक प्रयोग हुआ था न कि आरडीएक्स। इसी के साथ केन्द्रीय एजेंसियों ने स्पष्ट कर दिया है कि मालेग़ाँव और नान्देड तथा कानपुर में हुए विस्फोटों में कोई समानता नहीं है। अर्थात केन्द्रीय एजेंसियाँ इस बात की जाँच करने के बाद कि देश में हिन्दू आतंकवाद का नेटवर्क है इस सम्बन्ध में कोई प्रमाण नहीं जुटा सकी हैं। अब क्या सीएनएन-आईबीएन अपने दुष्प्रचार के लिये क्षमा याचना करेगा?

साध्वी के मामले में एटीएस के अनेक दावे कमजोर ही हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि महाराष्ट्र सरकार और केंन्द्र सरकार की रुचि इस विषय़ में अधिक थी कि मालेगाँव विस्फोट के तार किसी न किसी प्रकार हिन्दूवादी संगठनों से जुडें और यह सिद्ध किया जा सके कि ये संगठन आतंकवाद का एक नेटवर्क चला रहे हैं और इसी आधार पर इन संगठनों को प्रतिबन्धित कर मुस्लिम समाज को यह सन्देश दिया जा सके कि हमें आपकी चिंता है और हम आतंकवाद को लेकर संतुलन की राजनीति करते हुए सेकुलरिज्म के सिद्धांत का पालन कर रहे हैं। यह अत्यंत हास्यास्पद स्थिति सरकार और जाँच एजेंसियों के लिये है कि वे अब तक साध्वी और उनके साथियों को लेकर आधे दर्जन से अधिक संगठनों के नाम गिना चुके हैं परंतु अभी तक एक भी ऐसा ठोस प्रमाण सामने नहीं ला सके हैं कि इन संगठनों का आतंकवादी गतिविधियों में कोई हाथ है। पहले हिन्दू जागरण मंच का सदस्य बताया गया, फिर दुर्गा वाहिनी, फिर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद , फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाने वाला बताया गया अब पुलिस कह रही है कि इन्होंने अलग संगठन बनाया था। एटीएस ने भोपाल और ग्वालियर में सभी सम्बन्धित संगठनों के लोगों से पूछताछ की जो साध्वी के निकट थे परंतु अभी तक पुलिस को ऐसा कोई साक्ष्य हाथ नहीं लगा है जो यह सिद्ध कर सके कि हिन्दूवादी संगठन आतंकवाद का प्रशिक्षण देते हैं या फिर आतंकवादी नेटवर्क चला रहे हैं।

एटीएस ने साध्वी और उनकी तीन साथियों को इस आधार पर गिरफ्तार किया है कि विस्फोट में प्रयुक्त हुई मोटरसाइकिल साध्वी के नाम थी और साध्वी ने विस्फोट से पूर्व साथी आरोपियों के साथ करीब सात घण्टे मोबाइल पर बात की थी जो कि प्रमाण है। अब ये प्रमाण कितने ठोस हैं इसका पता तो न्यायालय में चार्जशीट दाखिल होने पर लग जायेगा। लेकिन इस पूरे अभियान से एक बात निश्चित है कि हिन्दू आतंकवाद का आभास सृजित करने का प्रयास कांग्रेस उसके सहयोगी दल और उसके सहयोगी टीवी चैनल ने किया है और इस प्रचार युद्ध में अपनी पीठ भले ही ठोंक लें परंतु जिस प्रकार आतंकवाद की लडाई को कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने भोथरा करने का प्रयास किया है वह अक्षम्य अपराध है।

कांग्रेस के लिये मीडिया प्रबन्धन करने वालों के लिये यह एक बुरी खबर है कि ब्लाग पर या विभिन्न समाचार पत्रों में इस घटना पर टिप्पणी करने वालों का तेवर यह बताता है कि इस विषय पर युवा और बुद्धिजीवी समाज जिस प्रकार ध्रुवीक्रत है वैसा पहले कभी नहीं था। कांग्रेस शायद अब भी एक विशेष मानसिकता में जी रही है जहाँ उसे लगता है कि देश उसके बपौती है और देशवासियों के विचारों पर भी उसका नियंत्रण है। इसी भावना के बशीभूत होकर कांग्रेस के एक बडे नेता के न्यूज चैनल न्यूज 24 पर आतंकवाद पर बहस के दौरान कांग्रेसी नेता राशिद अल्वी बार बार बासी तर्क दे रहे थे कि स्वाधीनता संग्राम में कांग्रेस का योगदान रहा है और कुछ दल विशेष अंग्रेजों का साथ दे रहे थे। यह तर्क सुनकर हँसी ही आ सकती है कि एक ओर तो कांग्रेस के राजकुमार तकनीक और युवा भारत की बात करते हैं तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के नेता अब भी स्वाधीनता पूर्व मानसिकता में जी रहे हैं। आज सूचना क्रांति के बाद लोगों को यह अकल आ गयी है कि वे वास्तविकता और प्रोपेगेण्डा में विभेद कर सकें। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की गिरती इमारतों के बाद समस्त विश्व में इस्लामी आतंकवाद को लेकर जो बहस चली है उसके बाद किसी भी युवक को यह बताने की आवश्यकता नहीं है को आतंकवाद का धर्म, स्वरूप और उसकी आकाँक्षायें क्या है? आज शायद कांग्रेस और उसके सहयोगी भूल गये हैं कि देश की 60 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या 30 या उससे नीचे आयु की है और उसने 1990 के दशक के परिवर्तनों के मध्य अपनी को जवान किया है। उसने आर्थिक उदारीकरण देखा है, सूचना क्रांति के बाद विश्व तक अपनी पहुँच देखी है, उसने कश्मीर से जेहाद के नाम पर भगाये गये हिन्दुओं की त्रासदी देखी है और देखा है राम जन्मभूमि आन्दोलन जिसने भारत की राजनीति की दिशा बदल दी।

आज वही पीढी निर्णायक स्थिति में है जिसके विचार अपने से पहली की पीढी के बन्धक नहीं है। इस पीढी ने अपनी पिछली पीढी के विपरीत सब कुछ अपने परिश्रम से खडा किया है और इसलिये उसे स्वयं पर भरोसा है और वह व्यक्ति के विचारों के आधार पर उसका आकलन करती है न कि किसी खानदान का वारिस होने के आधार पर।

समाज में जो मूलभूत परिवर्तन हुआ है उसके प्रति पूरी तरह लापरवाह कांग्रेस और उसके सेक्यूलर सहयोगी हिन्दू आतंकवाद का आभास सृजित कर इसका आरोप हिन्दू संगठनों पर मढना चाहते हैं परंतु शायद वे लोग भूल जाते हैं कि हिन्दुत्व का विचार केवल किसी संगठन तक सीमित नहीं है। इसका सीधा सम्बन्ध युवा भारत के सपने से है। आज देश विदेश में ऐसे लोगों की संख्या अत्यंत नगण्य है जो इस्लामी आतंकवाद को संतुलित करने के लिये हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा का समर्थन करेंगे। इसका उदाहरण हमें पिछले गुजरात विधानसभा में मिल चुका है जब कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी द्वारा गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी को मौत का सौदागर कहने और कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा हिन्दू आतंकवाद की बात करने के कारण इस पार्टी को मुँह की खानी पडी। एक बार फिर चुनावों से पहले कांग्रेस हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा को सृजित कर रही है। क्योंकि कांग्रेस को लगता है कि देश में हिन्दुओं का एक बडा वर्ग है जो उसकी सेक्युलरिज्म की परिभाषा से सहमत है। कांग्रेस ऐसे हिन्दुओं और मुसलमानों को साधने के प्रयास में एक खतरनाक खेल खेल रही है जिसका परिणाम देश में साम्प्रदायिक विभाजन के रूप में सामने आयेगा।

मालेगाँव विस्फोट को लेकर जाँच एजेंसियाँ तो अपना कार्य कर रही हैं और शीघ्र ही सत्य सामने आ जायेगा परंतु जिस प्रकार कांग्रेस इस्लामी लाबी के दबाव में आकर कार्य कर रही है वह देश के भविष्य़ के लिये शुभ संकेत नहीं है। क्योंकि हिन्दू आतंकवाद की बात करके कांग्रेस और उसके सहयोगी दल भले ही अस्थाई तौर पर प्रसन्न हो लें परंतु अभी बहस में अनेक प्रश्न उठेंगे और सेक्युलरिज्म का एकांगी स्वरूप, मानवाधिकार संगठनों का अल्पसंख्यक परस्त चेहरा भी बह्स का अंग बनेंगे।

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डिजिटल मीडिया का भविष्य़

Posted by amitabhtri on अक्टूबर 21, 2008

पिछले दिनों दिल्ली में वेब दुनिया से जुडे लोगों के लिये एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का आयोजन हुआ और इंटरनेट और डिजिटल मीडिया से जुडे जिस भी व्यक्ति या संस्थान ने उस अवसर को गँवाया उसने निश्चय ही कुछ गँवाया। 16 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक डिज़िटल एम्पावरमेण्ट फाउण्डॆशन के तत्वावधान में दक्षिण एशिया के स्तर पर मंथन पुरस्कारों का आयोजन किया गया और इसमें तीन दिनों तक पुरस्कार की श्रेणी में शामिल किये गये संस्थानों और व्यक्तियों सहित अनेक गैर सरकारी संगठनों, व्यावसायिक कम्पनियों ने अपने अनुभव लोगों के साथ बाँटे। इस पूरे आयोजन से जो निष्कर्ष मूल रूप में निकल कर आया वह मुख्य रूप से यह था कि डिजिटल युग आ चुका है जो व्यापक स्तर पर परिवर्तन करने जा रहा है और यह परिवर्तन सोच के स्तर से कार्य करने के स्तर सहित जीवन के नय क्षेत्रों को भी प्रभावित करने जा रहा है। पूरे आयोजन में उन लोगों को पुरस्कारों की श्रेणी में शामिल किया गया था जिन्होंने डिजिटल मीडिया में कुछ नये प्रयोग किये हैं और इस श्रेणी में लोकमंच के सहायक शशि सिंह को उनके संयुक्त उपक्रम पोड भारती के लिये सांस्कृतिक और मनोरंजन श्रेणी में चुना गया था जो उन्होंने हिन्दी ब्लागिंग के आरम्भिक पुरोधाओं में से एक देवाशीष चक्रवर्ती के साथ आरम्भ किया है। पोड भारती डिजिटल मीडिया के एक आयाम पोडकास्टिंग का प्रयोग है। हालाँकि पोड भारती को यह पुरस्कार नहीं मिल सका पर दक्षिण एशिया स्तर के किसी आयोजन और भारी प्रतिस्पर्धा के मध्य अपना स्थान बना पाना भी एक विशेष उपलब्धि रही।

तीन दिनों के इस आयोजन में जो कुछ विषय विशेष रूप से उभर कर आये उनमें से एक यह था कि डिजिटल मीडिया को एक प्रभावी और सक्षम माध्यम मान कर प्रशासन जनता के साथ निचले स्तर पर सम्पर्क स्थापित करने के लिये इस माध्यम को विश्व स्तर पर अपनाने को कटिबद्ध हो रहा है। 1990 के दशक से आरम्भ हुई सूचना क्रांति को अब जनोपयोगी बनाने की दिशा में चिंतन आरम्भ हो गया है और डिजिटल विभाजन जो कि साधन सम्पन्न और बिना साधन वालों के मध्य है उसे पाटने का प्रयास किया जा रहा है। तीन दिन के इस कार्यक्रम में जिन भी गैर सरकारी संस्थानों और व्यावसायिक कम्पनियों ने अपने विचार और कार्यक्रमों का उल्लेख किया उससे एक बात स्पष्ट थी कि अब इस तकनीक को हर स्तर पर आगे ले जाने के प्रयास हो रहे हैं और उनमें व्यावसायिक के साथ साथ जनोपयोगी प्रयास भी हैं। डिजिटल मीडिया के विस्तार से सूचना एक उद्योग में परिणत हो जायेगा और सम्भवतः भारत में मनोरंजन के पश्चात सबसे बडा कोई उद्योग पनपने जा रहा है तो वह सूचना उद्योग है।

इस पूरे आयोजन से कुछ उत्साहजनक संकेत भी मिले जैसे कि सूचना के व्यापक सम्भावना वाले उद्योग को देखते हुए विश्व स्तर पर कम्प्यूटर बनाने वाले कम्पनियाँ इस बात पर गम्भीरता से विचार कर रही हैं कि किस प्रकार 100 डालर की राशि वाला कम्प्यूटर लोगों को उपलब्ध कराया जा सके ताकि डिजिटल क्रांति से नीचे स्तर तक भी लोगों को अपने साथ जोडा जा सके और सूचना उद्योग अधिक व्यापक हो सके। इस सम्बन्ध में प्रशासनिक स्तर पर शासन को अधिक पारदर्शी और जनोन्मुख करने के लिये विकासशील देशों की सरकारें अपने आँकडों और डिजिटल स्वरूप देने और गैर सरकारी संगठनों की सहायता से शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी ढाँचों को सशक्त करने के लिये डिजिटल क्रांति की ओर बडी आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। तीन दिन के इस आयोजन मे जिस प्रकार कुछ राज्यों की सरकारों और गैर सरकारी संगठनों ने अपने कार्य दिखाये उससे यह विश्वास किया जा सकता है कि यदि तकनीक का आधारभूत ढाँचा सामान्य लोगों की पहुँच में आ जाये को इस तकनीक के सहारे शिक्षा और स्वास्थ्य की दिशा में अच्छी प्रगति हो सकती है। जैसे आन्ध्र प्रदेश राज्य की ओर से पालिटेक्निक संस्थानों के पाठ्यक्रम को जिस प्रकार 14,000 अध्यापकों ने 100 दिनों के भीतर तैयार कर उसे अधिक सहज और जनोन्मुखी बनाने के साथ एक साथ हजारों अध्यापकों को तकनीक के साथ जोड दिया उससे यह सम्भावना बलवती होती है कि सूचना क्रांति के उपयोग से कुछ क्रांतिकारी परिणाम भी आ सकते हैं। इसी प्रकार कर्नाटक के एक छोटे से गाँव में कुछ बच्चों के साथ प्रयोग हो रहा है कि किस प्रकार गणित के फोबिया से उन्हें मुक्ति दिलाकर विषय को सहज बनाया जा सके। हमारे समक्ष ज्ञान दर्शन और इग्नू का उदाहरण है किस प्रकार तकनीक के उपयोग से शिक्षा को जन जन तक कुछ हद तक पहुँचाया जा सकता है।

डिजिटल मीडिया के भविष्य़ को देखते हुए अनेक व्यावसायिक कम्पनियाँ विज्ञान और गणित जैसे विषयों को चित्रों के द्वारा और अधिक सही ढँग से समझाने के प्रयास में लगी हैं और इस सम्बन्ध में उन्हें डिजिटल क्रांति के दौर में आधारभूत ढाँचों और तकनीक से सस्ते होने और अधिक लोगों तक पहुँच पाने की अपेक्षा है।

पूरे आयोजन में जो एक बात अधिक उत्साहजनक थी वो यह कि अब डिजिटल क्रांति को अपने अपने कारणों से अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने का प्रयास आने वाले दिनों में किया जायेगा और शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और जनता के अधिकारों के लिये कार्य करने वाले संगठनों की माँग सूचना क्रांति के दूसरे चरण में बढने वाली है जब सामग्री या कंटेंट को लेकर व्यापक प्रयास हो रहा है।

तीन दिन के इस आयोजन में पूरा समय इस बात पर दिया गया कि किस प्रकार कंटेंट सृजित किया जाये क्योंकि डिज़िटल मीडिया और सूचना क्रांति के पास सबसे बडा संकट कंटेन को लेकर है क्योंकि तकनीक को लोगों तक पहुँचा कर उसे बाजारोन्मुखी तब तक नहीं बनाया जा सकता जब तक तकनीक प्रयोग करने वाले के लिये कोई उपयोगी जानकारी उस तक न पहुँच पा रही हो। परंतु सूचना क्रांति के इस चरण का सर्वाधिक लाभ यह है कि कंटेन्ट या सामग्री को लेकर सारी मारामारी स्थानीय स्तर तक पहुँचने की है। सूचना क्रांति के इस दूसरे चरण में स्थानीय भाषाओं, स्थानीय संस्कृतियों और अधिक जनसंख्या वाले समूहों का बोलबाला होने वाला है।

डिजिटल मीडिया का नया स्वरूप पत्रकारिता को भी प्रभावित करने वाला है। अब इंटरनेट पर टेलीविजन, मोबाइल पर टेलीविजन के साथ फिल्मों का प्रीमियर भी मोबाइल सेट पर अति शीघ्र ही हो सकेगा। लेकिन इन सबके मध्य डिजिटल मीडिया के समक्ष सबसे बडा संकट अब भी सामग्री का है और विविधता का दावा करने वाले और अपने संसाधनों का बडा अंश सामग्री के लिये व्यय करने वाली बडी बडी कम्पनियाँ भी अभी भी उन्नत सामग्री के अभाव से ग्रस्त हैं और इसका इस बडा कारण अब भी भारत में लेखक या बुद्धिजीवी वर्ग का तकनीक से भागना रहा है। जो लोग तकनीक के प्रसार की इस बात के लिये आलोचना करते हैं कि यह ऊटपटाँग चीजें परोस रहा है उन्हें डिजिटल मीडिया में सामग्री को लेकर छाए इस शून्य का लाभ उठाना चाहिये परंतु अधिकतर लोग तकनीक सीखने के स्थान पर उसे कोसने में अधिक सहजता अनुभव करते हैं। लेकिन आने वाले दिनों में सामग्री का भी एक बडा बाजार बनेगा और साथ ही अनुवाद का भी।

सूचना क्रांति के इस नये दौर में पत्रकारिता का क्या स्वरूप होगा यह भी एक प्रश्न है। आज भी भारत में विशेषकर हिन्दी पत्रकारिता रूढिवादी है और तकनीक को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। 40 से अधिक या 50 के आस पास की अवस्था के पत्रकार अब भी ब्लागिंग और इंटरनेट के मह्त्व को स्वीकार कर पाने का साहस नहीं कर पा रहे हैं और यही कारण है कि अनेक पत्रकार अज्ञानतावश वेब आधारित पत्रकारिता को ड्रायिंग रूम की अनैतिक पत्रकारिता भी कहने में नहीं हिचकते पर शायद वे भूल जाते हैं को वेब केवल एक तकनीकी परिवर्तन है और पत्रकारिता का मूल भाव कि तथ्यों का वास्तविक मूल्याँकन करने की परिपाटी वही है। भारत में तो वेब आधारित पत्रकारिता और ब्लागिंग तो पिछले कुछ वर्षों में आयी है पर पश्चिम में तो यह एक वैकल्पिक पत्रकारिता का स्वरूप ले चुकी है और तथाकथित मुख्यधारा की पत्रकारिता भी इसके सन्दर्भों का हवाला देती है और इसे प्रामाणिक मानती है।

डिजिटल मीडिया के प्रभाव से पत्रकारिता में स्थानीय वैश्विकता की नयी प्रवृत्ति का समावेश होगा अर्थात विश्व के किसी भी कोने में बैठा कोई व्यक्ति अपनी स्थानीयता से जुड सकेगा और साथ ही स्थानीय व्यक्ति विश्व की गतिविधियों से जुड सकेगा। हिन्दी पत्रकारिता इसी परिवर्तन के सन्दर्भ में रूढिवादी है और वह केवल स्थानीय विषयों को उठाने को अधिक समर्पित और जमीन से जुडी आदर्श पत्रकारिता मान कर चलती है। डिजिटल मीडिया के इस दौर में लोगों की वैश्विक पहुँच और आकाँक्षा हो गयी है और इन दोनों में संतुलन बनाने का प्रयास आगे इस युग में हिन्दी पत्रकारिता को करना सीखना होगा। उदाहरण के लिये यदि झारखण्ड और छत्तीसगढ के गाँवों में और बिहार की बाढ की वास्तविकता विदेशों में बैठा भारतीय या देश के अन्य हिस्से में बैठा भारतीय जानना चाहता है तो वहीं भारत का व्यक्ति सूचना क्रांति के चलते विश्व से जुड गया है और वह यह जानने को भी उत्सुक है कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में क्या चल रहा है, या फिर
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कौन से घटनाक्रम हैं जो भारत को प्रभावित करते हैं। हिन्दी पत्रकारिता में अब भी नयी प्रवृत्ति को अपनाने का प्रयास करने के स्थान पर उसकी आलोचना करने की प्रवृत्ति अधिक दिख रही है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हिन्दी पत्रकारिता में नयी पीढी अभी अपना स्थान नहीं बना पायी है।

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दक्षिण एशिया पर अल कायदा का साया

Posted by amitabhtri on अक्टूबर 15, 2008

पाकिस्तान की सूचना मंत्री शेरी रहमान ने जब अपने देश की संसद में इस बात की आशंका व्यक्त की कि अल कायदा, तालिबान के साथ मिलकर अफगानिस्तान और कश्मीर में सक्रिय जेहादी तत्व पाकिस्तान को अस्थिर कर उसका शासन अपने हाथ में लेने का षडयन्त्र रच रहे हैं तो इस सनसनीखेज बयान को भारत में विश्लेषकों द्वारा अधिक महत्व नहीं दिया गया। परंतु यह बात अतयंत महत्व की है और यह बयान उस कठोर वास्तविकता की ओर संकेत करता है जिस ओर पाकिस्तान ही नहीं अफगानिस्तान और भारत सहित सम्पूर्ण दक्षिण एशिया बढ रहा है।

पाकिस्तान की सरकार के एक महत्वपूर्ण मंत्री की ओर से ऐसे बयान आने के पीछे दो तात्कालिक कारण हैं एक तो पिछले माह जिस प्रकार पाकिस्तान की राजधानी के अति सुरक्षा क्षेत्र में प्रधानमंत्री निवास और संसद भवन तक तालिबान और अल कायदा के संयुक्त प्रयासों से एक महत्वपूर्ण होटल को निशाना बना कर उसे पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया और इस प्रयास में लगभग एक टन विस्फोटक का प्रयोग किया गया। यह एक ऐसी घटना थी जो संकेत करती है कि पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन किस प्रकार संसाधन सम्पन्न और संस्थात्मक हो चुके हैं।

इसी के साथ एक और पृष्ठभूमि शेरी रहमान के बयान के पीछे है। अल कायदा का मीडिया प्रकोष्ठ काफी दिनों से चुप था और आतंकवाद और अल कायदा पर पैनी नजर रखने वाले अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ भी इस बात से आश्चर्यचकित थे कि 11 सितम्बर को प्रति वर्ष कर्मकाण्ड के तौर पर वीडियो या आडियो टेप जारी करने वाला अल कायदा इस बार चुप क्यों रहा? इसके पीछे एक प्रमुख कारण यह माना जा रहा था कि अल कायदा का मीडिया प्रकोष्ठ जिसे अल सहाब कहते हैं उसका प्रमुख और अमेरिका का धर्मांतरित नागरिक गदाहन उर्फ अज्जाम अल अमेरिकी इस वर्ष के आरम्भ में पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान में हुए एक बम हमले में मारा गया था जो अमेरिका नीत गठबन्धन सेना ने किया था। उस हमले के बाद अल कायदा के अल सहाब की निष्क्रियता से मान लिया गया कि अल कायदा का प्रचार तंत्र टूट चुका है। परंतु इन आशंकाओं के विपरीत गदाहन ने अल कायदा के सन्देश प्रकाशित करने वाली वेबसाइट पर 4 अक्टूबर को एक सन्देश प्रकाशित किया और इस सन्देश में अफगानिस्तान और पाकिस्तान सहित भारत को भी शामिल करते हुए पूरे दक्षिण एशिया के मुजाहिदीनों का आह्वान करते हुए कहा कि इस पूरे क्षेत्र में जेहाद की गति को तीव्र करें।

इस सन्देश में भारत और कश्मीर का भी उल्लेख किया गया है और क्रूसेडर, यहूदी शत्रुओं के साथ उनके सहयोगियों का उल्लेख करते हुए पाकिस्तान की सरकार और खुफिया एजेंसी पर आरोप लगाया गया है कि वह अमेरिका और उसके सहयोगियों के कहने पर कश्मीर में जेहाद को कमजोर कर रही है। इसके साथ ही काबुल में भी जेहाद को असफल करने का आरोप क्रूसेडर और हिन्दू भारत पर लगाया है। इस पूरे सन्देश में भारत का उल्लेख विशेष रूप से कश्मीर में जेहाद के सन्दर्भ में किया गया है पर कश्मीर के साथ इस बार भारत का अलग से उल्लेख कर हिन्दू भारत पर विजय का यह पहला कदम बताया गया है। सन्देश में पाकिस्तान की कश्मीर सम्बन्धी नीतियों का उल्लेख करते हुए पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन तहरीके तालिबान को सतर्क किया गया है कि पाकिस्तान की सरकार उसे बरगलाकर उसके साथ युद्ध विराम करना चाहती है और इस सम्बन्ध में सरकार का तर्क है कि उत्तर पश्चिमी प्रांत में विद्रोहियों और आतंकवादियों से निपटने में सेना को लगाने से कश्मीर से सेना हटानी पड रही है जिससे कश्मीर का जेहाद प्रभावित हो रहा है। इसलिये तहरीके तालिबान को पाकिस्तान सरकार के साथ किसी भी प्रकार का भी समझौता करने से सावधान किया गया है।

अल कायदा के इस नवीनतम सन्देश में अमेरिका में आई आर्थिक मन्दी का भी उल्लेख किया गया है और इसे जेहाद की बडी विजय मानते हुए मुजाहिदीनों का आह्ववान किया गया है कि यह जेहाद का उचित अवसर है कि जब झूठे देवताओं की पूजा करने वालों से विश्व को मुक्ति दिलायी जा सकेगी और नयी विश्व व्यवस्था के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा।

इस सन्देश में पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ का त्यागपत्र और नये राष्ट्रपति असिफ अली जरदारी का भी उल्लेख है और नये सेनाध्यक्ष परवेज कियानी का भी नाम लिया गया है। परंतु इस सन्देश का जो सबसे मह्त्वपूर्ण पक्ष है वह है पूरे दक्षिण एशिया के लिये जेहाद की बात करना।

वास्तव में यह बात सुन कर आश्चर्य हो सकता है कि शायद अल कायदा ने अपनी प्राथमिकतायें बदल दी हैं और अब मध्य पूर्व, अरब देशों और अमेरिका और यूरोप के स्थान पर उसका निशाना दक्षिण एशिया बन गया है। परंतु ऐसा नहीं है। अल कायदा के मुख्य सरगना ओसामा बिन लादेन ने जब 1998 में इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट की स्थापना की थी और ईसाइयों तथा यहूदियों के विरुद्ध विश्वस्तर पर जेहाद के लिये मुसलमानों का आह्वान किया था तभी से यह संगठन एक सोची समझी केन्द्रित योजना के साथ चल रहा है। अल कायदा ने अपने अंतिम लक्ष्य खिलाफत की स्थापना के लिये और विश्व स्तर पर मध्यकालीन इस्लामिक साम्राज्य प्राप्त करने के लिये सर्वप्रथम अफगानिस्तान में अपना राज्य स्थापित किया फिर संस्थात्मक ढंग से शरियत के शासन को चर्चा का विषय बनाया। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर आक्रमण कर जेहाद का वैश्वीकरण किया और फिर योजनाबद्ध ढंग से समस्त विश्व में स्थानीय स्तर पर इस्लामी राज्य प्राप्त करने के लिये चल रहे आन्दोलनों को एक नेटवर्क के अधीन लाने का प्रयास किया और इस प्रयास में उसे यूरोप अरब और उत्तरी अफ्रीका के अनेक देशों में सफलता भी मिली जहाँ अनेक इस्लामी उग्रवादी संगठन इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट का हिस्सा बन गये।

अफगानिस्तान से भगाये जाने के बाद अल कायदा के शीर्ष नेतृत्व ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर कबाइली क्षेत्रों में शरण ली और दो विशेष योजनाओं पर कार्य आरम्भ किया। एक तो अगले दशक के लिये अल कायदा का नेतृत्व विकसित करना और अफगानिस्तान के बाद दूसरे किसी राज्य की तलाश करना जिस पर नियंत्रण स्थापित कर अपने इस्लामीकरण के एजेण्डे के साथ विचारधारा को भी आगे बढाया जा सके। इस दिशा में काम करते हुए अल कायदा और तालिबान ने पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी प्रांत और अफगानिस्तान के कुछ क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढाना आरम्भ किया और इस दौरान उसकी ओर से आतंकवादी घटनाओं को भी अंजाम दिया जाता रहा। 2005 में स्पेन की राजधानी मैड्रिड में धमाका और फिर 2006 में लन्दन में धमाका करने में यह नेटवर्क सफल रहा। इसके अतिरिक्त अनेक बडे षडयंत्र असफल भी किये जाते रहे। अफगानिस्तान से पाकिस्तान में छुपने के बाद अल कायदा का जेहाद स्पष्ट रूप ले रहा है और अब यह उन अरब देशों के शासकों को भी निशाना बना रहा है जो उसकी नजर में इस्लामी आधार पर शासन नहीं चला रहे हैं।

वास्तव में अल कायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन और अयमान अल जवाहिरी जिस मुस्लिम ब्रदरहुड के संस्थापक सैयद कुत्ब, उसके भाई मोहम्मद कुत्ब और फिलीस्तीनी इस्लामी चिंतक अब्दुल्ला अज्जाम से प्रेरणा लेते हैं उनके जेहाद की व्याख्या पूरी तरह इस्लाम के शुद्धीकरण और शरियत आधारित शासन के लिये युद्धात्मक जेहाद की आज्ञा देता है और इसके लिये उन मुसलमानों के साथ भी जेहाद जायज है जो विशुद्ध इस्लाम के आदेश का पालन नहीं करते। इसी प्रयास का परिणाम है कि पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत में अपना नियंत्रण स्थापित करने के बाद अल कायदा और तालिबान ने पाकिस्तान की सरकार के विरुद्ध जेहाद तीव्र कर दिया है।

अल कायदा ने अपने एजेण्डे के आधार पर जो योजना बनाई है उसके आधार पर वह सफल हो रहा है। अल कायदा न केवल जेहाद के नाम पर विश्व भर के एक बडे वर्ग के मुसलमानों को ईराक, अफगानिस्तान और लड्ने के लिये प्रेरित कर सका है वरन सूचना क्रांति का भरपूर उपयोग कर विश्व स्तर पर मुस्लिम उत्पीडन की एक काल्पनिक अवधारणा का सृजन कर उसे भरपूर प्रचारित भी किया है और इस प्रचार के चलते अल कायदा ने विश्व भर में मुसलमान बुद्धिजीवियो, वामपंथी विचारकों और युवा मुसलमानों के मन में एक वैश्विक चिंतन का बीजारोपण किया है जो स्थानीय समस्याओं को वैश्विक सन्दर्भ से जोड कर मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा का समर्थन करता है।

पाकिस्तान की सरकार की वरिष्ठ मंत्री ने जब जेहादी तत्वों से पाकिस्तान की स्थिरता को खतरा बताया तो इसके पीछे यही भाव छुपा था।

पाकिस्तान में स्थित अल कायदा नेतृत्व के प्रचार का प्रभाव समस्त दक्षिण एशिया पर पड्ने लगा है। भारत में इंडियन मुजाहिदीन ने जिस प्रकार विस्फोटों से पहले ईमेल भेजकर प्रचार का नया हथकण्डा अपनाया था उसकी समानता अल कायदा की इसी रणनीति से की जा सकती है। भारत में पुलिस ने जिस प्रकार साफ़्टवेयर इंजीनियर को इस प्रचार अभियान के सदस्यों के रूप में चिन्हित किया है उससे तो इस बात में सन्देह ही नहीं रह जाता कि पढे लिखे मुस्लिम युवक अल कायदा के विचारों से प्रभावित हो रहे हैं। अपने नवीनतम सन्देश में जिस प्रकार अल कायदा ने दक्षिण एशिया में मुजाहिदीनों को जेहाद के लिये प्रेरित किया है उससे स्पष्ट है कि अल कायदा के निशाने पर अब पूरा दक्षिण एशिया है।
यह पहला अवसर नहीं है जब अल कायदा ने खुलकर जेहाद के सन्दर्भ में भारत, हिन्दू और कश्मीर का उल्लेख किया है। इससे पूर्व ओसामा बिन लादेन और अयमान अल जवाहिरी अनेक बार हिन्दू, भारत और कश्मीर का उल्लेख कर चुके हैं।

समस्त विश्व में जेहाद के आधार पर खिलाफत साम्राज्य का स्वप्न देख रहे अल कायदा की योजनाओं के बारे में कभी समग्र स्तर पर चिंतन नहीं किया गया। विशेष कर भारत में इस विषय पर कभी चिंतन ही नहीं हुआ और पहले 11 सितम्बर 2001 के अमेरिका पर हुए आक्रमण को अल कायदा बनाम अमेरिका का संघर्ष माना गया और इस बात पर अभिमान किया जाता रहा कि भारत का एक भी मुसलमान जेहाद के लिये कभी लड्ने नहीं गया परंतु अल कायदा के प्रयासों से मुस्लिम चिंतन में, उग्रवादी संगठनों की कार्यशैली में और स्थानीय मुस्लिम उग्रवाद के व्यापक जेहादी स्वप्न के साथ जुड कर वैश्विक स्तर पर एजेंडे को लेकर आ रही समानता की अवहेलना की गयी।

पाकिस्तान की सरकार की महत्वपूर्ण मंत्री शेरी रहमान का यह आकलन इस सन्दर्भ में भी ध्यान देने योग्य है कि भारत के प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह के साथ बातचीत में अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज डब्लू बुश ने कहा था कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति असिफ अली जरदारी के ऊपर आतंकवाद के सम्बन्ध में अधिक विश्वास न करें क्योंकि वह अत्यंत कमजोर हैं और आतंकवाद को रोक पाना उनके वश में नहीं है। यह बात पूरी तरह सत्य है और इसका उदाहरण हमारे समक्ष है कि किस प्रकार कश्मीर के मामले पर अमेरिका के दबाव में उन्होंने कुछ और बयान दिया और कश्मीर और पाकिस्तान के दबाव के चलते फिर उस बयान से मुकर गये।

पाकिस्तान की स्थितियाँ इस प्रकार की हैं कि वहाँ कश्मीर में जेहाद का मुद्दा अब हुक्मरानों के हाथ से फिसलकर पूरी तरह जेहादियों के हाथ में आ गया है वह फिर इस्लामी आतंकवादी संगठन हों, पाकिस्तान की सेना के जेहाद परस्त तत्व हों या फिर आईएसआई के जेहादी तत्व सब मिल कर पाकिस्तान में समानांतर शक्ति बन गये हैं। इन तत्वों की अल कायदा और तालिबान से सहानुभूति है और यही कारण है कि पाकिस्तान सरकार आतंकवाद से आधे अधूरे मन से लड रही है।

दक्षिण एशिया में जेहादी तत्वों के मंसूबों को देखते हुए इस पूरे अभियान के लिये नये सिरे से रणनीति बनाने की आवश्यकता है। कुछ लोग इस बात को लेकर अत्यंत उत्साहित हैं कि अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव में यदि बराक ओबामा कि विजय होती है तो वे पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अल कायदा और तालिबान के सफाये के लिये विशेष प्रयास करेंगे परंतु हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिये कि अमेरिका के राष्ट्रपति का प्रयास अपने देश पर पाकिस्तान या अफगानिस्तान की धरती से होने वाले किसी बडे आक्रमण को रोकना होगा न कि दक्षिण एशिया में जेहाद की विचारधारा को पनपने से रोकना होगा। इस कार्य के लिये हमें अब कोई दीर्घगामी रणनीति अपनानी होगी। यदि अल कायदा के प्रचार अभियान को नहीं रोका जा सका तो भारत में मुसलमानों के एक बडे वर्ग को जेहाद में लिप्त होने से नहीं रोका जा सकेगा।

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हम आतंकवाद से नहीं बजरंग दल से लडेंगे

Posted by amitabhtri on अक्टूबर 12, 2008

हम आतंकवाद से नहीं बजरंग दल से लडेंगे
अमिताभ त्रिपाठी

भारत के प्रधानमंत्री द्वारा डा मनमोहन सिंह द्वारा प्रस्तावित राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक को लेकर विवाद सा उठता दिख रहा है। राष्ट्रीय एकता परिषद के एजेण्डे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच वाद विवाद का जो दौर चल रहा है उसमें विपक्ष की ओर से भारतीय जनता पार्टी के नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो प्रश्न उठाया है वह अत्यंत सटीक है। नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में आतंकवाद को एजेण्डे में शामिल न करने पर आश्चर्य व्यक्त किया है। वहीं सत्तारूढ यूपीए के घटकों राष्ट्रीय जनता दल और लोकजनशक्ति ने बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में उठाने की बात की है। इन दोनों ही पक्षों को सुनने के बाद एक बात अत्यंत ही आश्चर्यजनक लगती है कि आखिर राष्ट्रीय एकता परिषद के बैठक बुलाने की आवश्यकता क्यों आन पडी और इसके पीछे असली मंतव्य क्या है?

इस सम्बन्ध में यदि उडीसा के मामले को लेकर पिछले दिनों कैबिनेट की हुई बैठक का सन्दर्भ लिया जाये तो बात कुछ हद तक स्पष्ट हो जाती है। कैबिनेट की बैठक के बारे में जोर शोर से प्रचारित किया गया कि इस बैठक में हिन्दूवादी संगठन बजरंग दल पर प्रतिबन्ध लगाने के सम्बन्ध में कोई अन्तिम निर्णय हो सकता है। कैबिनेट की उस बैठक में इस विषय पर चर्चा भी हुई और कानून मंत्री तथा गृहमंत्री की ओर से बैठक में उपस्थित सदस्यों को बताया गया कि बजरंग दल के विरुद्ध इस बात के पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं कि उस पर प्रतिबन्ध को न्यायालय में न्यायसंगत ठहराया जा सके। अब राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक से पूर्व हिन्दूवादी संगठनों पर प्रतिबन्ध की माँग और देश भर में हो रही इस्लामी आतंकवाद की घटनाओं को चर्चा से परे रखना कुछ विशेष मानसिकता की ओर संकेत करता है।

पिछले अनेक वर्षों से देश में इस्लामी आतंकवाद ताण्डव मचा रहा है और भारत में 2004 के बाद से जितनी भी आतंकवाद की घटनायें या बडे बम विस्फोट हुए हैं उनमें भारत के देशी मुसलमानों का हाथ रहा है और फिर वह सिमी हो या फिर नवनिर्मित इंडियन मुजाहिदीन। आज देश में मुसलमानों की युवा पीढी का एक ऐसा वर्ग निर्मित हो गया जो कुरान और अल्लाह का हवाला देकर निर्दोष हिन्दुओं को मूर्ति पूजा करने की सजा दे रहा है और इस विस्फोटों को अल्लाह के लिये किया जाने वाला जेहाद बता रहा है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि भारत सरकार और देश के राजनीतिक दलों की इस आधार पर समीक्षा की जाये कि वे इस नयी उभरती समस्या के समाधान के लिये कितने उद्यत हैं। दुर्भाग्यवश जब हम इस सम्बन्ध में सोचते हैं तो हमें अत्यंत निराशा का सामना करना पडता है। आतंकवाद की इस पूरी समस्या से लड्ने के लिये एक समन्वित रणनीति अपनाने के स्थान पर इसे वोट बैंक के तराजू में तोला जा रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में देश में आतंकवादियों की रणनीति और प्रेरणा दोनों में अंतर आया है। अभी कुछ वर्षों पूर्व तक हमारे राजनेता, पत्रकार और सुरक्षा विशेषज्ञ इस बात की दुहाई देते नहीं थकते थे कि भारत के मुसलमान अत्यंत सहिष्णु हैं और सूफी परम्परा के हैं इस कारण विश्व भर में जेहाद के नाम पर चल रहे इस्लामवादी आन्दोलन का प्रभाव भारत के मुसलमानों पर नहीं पडेगा और भारत निश्चय ही मध्य पूर्व में इजरायल के विरुद्ध चल रहे आतंकवाद या इंतिफादा से पूरी तरह असम्पर्कित रहेगा। यही कारण है कि भारत का बौद्धिक समाज और राजनीतिक नेतृत्व 11 सितम्बर को अमेरिका पर हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमण के बाद भी इस अपेक्षा में बैठा रहा कि भारत में मुसलमानों के साथ होने वाले व्यवहार, सेक्युलरिज्म के प्रति उनकी समझ और लोकतन्त्र में उनकी आस्था और नरमपंथी इस्लाम की उनकी परम्परा के चलते इस वैश्विक जेहादी आन्दोलन के प्रति उनका झुकाव नहीं होगा।

इसी भावना के चलते 2004 से पहले तक भारत में होने वाले आतंकवादी आक्रमणों के लिये पडोसी पाकिस्तान के कुछ इस्लामी आतंकवादी संगठनों और खुफिया एजेंसी आईएसाआई को दोषी ठहराया जाता था और यह बात तथ्यात्मक भी थी कि सीमा पार से लोग आतंकवादी घटनाओं के लिये भारत आते थे और उन्हें स्थानीय स्तर पर कुछ सहयोग मिलता था परंतु योजना से क्रियान्वयन तक सभी कुछ सीमा पार के तत्वों का होता था। परंतु अचानक 2004 के बाद भारत में सीमा पार के इस आतंकवाद ने इस्लामी आतंकवाद का स्वरूप ग्रहण कर लिया और भारत स्थित अनेक इस्लामी संगठनों ने पिछले अनेक वर्षों से चल रहे इस्लामी आन्दोलन को आतंकवाद में परिवर्तित कर दिया और सिमी तथा इंडियन मुजाहिदीन जैसे संगठन खुलकर आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने लगे।

आज देश के समक्ष यह अत्यंत बडी चुनौती है कि इस समस्या के मूल को समझकर उसका समाधान तलाशा जाये। इस लेखक ने अपने अनेक पिछले आलेखों में इस बात का उल्लेख किया है कि विश्व स्तर पर जेहाद के नाम पर एक इस्लामवादी आन्दोलन चलाया जा रहा है जिसकी प्रेरणा समस्त विश्व में समय समय पर जेहाद के सन्दर्भ में इस्लाम की व्याख्या करते हुए विश्व पर इस्लामी सर्वोच्चता स्थापित करने के लिये संचालित हुए आन्दोलनों से ली गयी है। भारत में ऐसे इस्लामी आन्दोलनों के प्रयास 18वीं शताब्दी से ही होते रहे हैं। इसी प्रकार मध्य पूर्व और अरब देशों में 18वीं शताब्दी में वहाबी आन्दोलन , फिर बीसवीं शताब्दी में मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन जिसकी नींव सैयद कुत्ब ने रखी और उनकी भाई मुहम्मद कुत्ब ने उस परम्परा को आगे बढाते हुए उस विचारधारा को आगे बढाया और उसी परम्परा का आखिरी नाम फिलीस्तीन का अब्दुल्ला अज़्ज़ाम है जिसकी प्रेरणा से आज अल कायदा और ओसामा बिन लादेन का विश्वव्यापी जेहादी इस्लामी आतंकवादी आन्दोलन चल रहा है।

भारत में इस सन्दर्भ में जेहाद का अध्ययन करने का कभी प्रयास नहीं हुआ। जिस समय ओसामा बिन लादेन ने इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट की स्थापना कर ईसाइयों और यहूदियों फिर हिन्दुओं के विरुद्ध जेहाद की घोषणा भी नहीं की थी उससे बहुत पहले भारत के इस्लामी संगठन सिमी ने 1986 में भारत को मुक्त कराकर इसे इस्लामी राष्ट्र का स्वरूप देने का संकल्प करते हुए सम्मेलन आयोजित किया था। आज यही संकल्प वैश्विक जेहाद के साथ जुड गया है जो विश्व स्तर पर शरियत और कुरान पर आधारित नयी विश्व व्यवस्था की स्थापना करना चाहता है। आज भारत में इस बात पर चर्चा करने का प्रयास ही नहीं हो रहा है कि अल कायदा और ओसामा बिन लादेन के विचारों से प्रभावित होने वाले मुस्लिम युवकों को इस विचारधारा से अलग थलग कैसे किया जाये। इंडियन मुजाहिदीन के मीडिया प्रकोष्ठ के लोगों के सामने आने के बाद यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि भारत में मुसलमानों का एक वर्ग तेजी से जेहाद के विचारों से प्रभावित हो रहा है। आज अत्यंत दुर्भाग्य का विषय है कि जिस प्रकार यह विचार तेजी से मुस्लिम युवकों में फैल रहा है और बडे सम्पन्न युवक जेहाद के नाम पर अपने ही देश के लोगों का खून बहाने को अपना धर्म मान बैठे हैं तो ऐसे में आश्चर्य नहीं कि आने वाले दिनों में हमें मध्यपूर्व के देशों और अफगानिस्तान और पडोसी पाकिस्तान की भाँति मानव बम के जरिये होते विस्फोट देखने को मिलें।

आज जब समस्त विश्व में इस बात पर विचार हो रहा है कि जेहाद के इस वैश्विक आन्दोलन को सभ्य समाज और वर्तमान विश्व व्यवस्था के विरुद्ध एक युद्ध माना जाये और इस सम्बन्ध में विभिन्न देशों में इस बात के प्रयास हो रहे हैं कि जेहाद के इस आन्दोलन से सामान्य शांतिप्रिय मुस्लिम समुदाय को किस प्रकार अलग थलग रखते हुए जेहाद की इस विचारधारा को वैचारिक स्तर पर परास्त किया जाये और इस सम्बन्ध में मुस्लिम समुदाय को उत्तरदायी बनाने के भी प्रयास हो रहे हैं तो वहीं भारत में अब भी इस समस्या को वोट बैंक की राजनीति से जोड्कर इसके समाधान के किसी भी प्रयास को अवरुद्ध किया जा रहा है।

इस सम्बन्ध में सबसे बडा उदाहरण पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में जामिया नगर में बाटला हाउस में आतंकवादियों के साथ हुई पुलिस की मुठभेड के बाद उसे फर्जी सिद्ध करने को और अपने ही साथी पुलिसकर्मी को मरवा देने के आरोप दिल्ली पुलिस पर लगे। यह आरोप देश की प्रमुख सेक्युलर कही जाने वाली पार्टियों ने लगाये और इस मुठभेड की न्यायिक जाँच की माँग तक कर डाली।

यही नहीं तो देश का ध्यान इस्लामी आतंकवाद की समस्या से हटाने के गैर जिम्मेदाराना और दूरगामी स्तर पर खतरनाक परिणामों से परिपूर्ण प्रयास के अंतर्गत देश में हिन्दू आतंकवाद का एक समानांतर आभास विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है और राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक उसी आभास को वास्तविक स्वरूप देने का सुनियोजित प्रयास है। इस्लामी आतंकवाद के समानांतर हिन्दू आतंकवाद और सिमी के समानांतर बजरंग दल का आभासी दृष्टिकोण कितना खोखला है इसका पता इसी बात से चलता है कि अब तक हिन्दू आतंकवाद जैसी किसी अवधारणा को सिद्ध करने के लिये कोई कानूनी साक्ष्य सरकार के पास नहीं है और न ही बजरंग दल को प्रतिबन्धित करने के लिये ही प्रमाण हैं। फिर यह प्रयास क्यो? केवल मुस्लिम वोट बैंक को संतुष्ट रखने का प्रयास और देशवासियों का ध्यान इस्लामी आतंकवाद से हटाने के लिये।

परंतु यह दृष्टिकोण कितना घातक है इसका पता हमें बाद में चलेगा। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार घाटी से हिन्दुओं को योजनाबद्ध ढंग से भगाने के इस्लामी एजेंडे को लम्बे समय तक कुछ गुमराह नौजवानों का उग्रवाद कहा जाता रहा। आज उसी प्रकार भारत में इस्लामी आतंकवाद को 1992 में बाबरी ढाँचा के ध्वँस से उपजा मान कर प्रचारित किया जा रहा है। भारत के राजनीतिक दल और बौद्धिक समाज के लोग जिस प्रकार इस्लामी आतंकवाद का समाधान करने और जेहाद की वैश्विक विचारधारा से देश के मुसलमानों को जुड्ने से रोकने के लिये कोई ठोस रणनीति अपनाने के स्थान पर मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा को प्रोत्साहन दे रहे हैं, आतंकवादियों के मानवाधिकार के नाम पर पुलिस को कटघरे में खडा कर रहे हैं, आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराने के लिये तर्क देर रहे हैं उससे जेहाद के आधार पर चल रहे इस इस्लामवादी आन्दोलन को और सहारा ही मिलेगा और यह सशक्त हो जायेगा।

जिस प्रकार राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में आतंकवाद के विषय को एजेण्डे में नहीं लिया गया है और कर्नाटक और उडीसा की घटनाओं का आश्रय लेकर बजरंग दल को निशाने पर लिया जा रहा है उससे तो यही लगता है कि इस्लामी आतंकवाद से लड्ना सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। आज देश के समक्ष जिस प्रकार इस्लामी आतंकवाद एक चुनौती बन कर खडा है ऐसे में क्या बजरंग दल पर प्रतिबन्ध लगाने से इस समस्या का समाधान हो जायेगा और देश में जेहाद की विचारधारा से प्रभावित हो रहे मुस्लिम युवक जेहाद करना छोड देंगे। ऐसा बिलकुल भी नहीं है और यह बात कांग्रेस भी जानती है और उसके सहयोगी दल भी जानते हैं फिर भी देश में एक खतरनाक खेल खेला जा रहा है देश में मानव बमों की फैक्ट्री तैयार होने का अवसर दिया जा रहा है और प्रतीक्षा की जा रही है कि कब भारत इजरायल, अफगानिस्तान, इराक और पाकिस्तान बन जाये?

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