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इजरायल की निन्दा क्यों?

Posted by amitabhtri on जनवरी 7, 2009

इजरायल ने गाजा पट्टी में हमास पर आक्रमण किया नहीं कि समस्त विश्व एकजुट होकर इस देश की निन्दा करने लगा। विश्व की सर्वोच्च विधिक संस्था में संयुक्त राष्ट्र संघ में इजरायल की निन्दा के प्रस्ताव पारित किये जाने लगे और हर ओर से प्रयास होने लगा कि किसी प्रकार हमास और इजरायल के मध्य युद्ध विराम हो जाये। भारत सरकार भी इजरायल की निन्दा करने में पीछे नहीं रही और विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक रूप से इजरायल को आक्रांता की संज्ञा देने में कोई हिचक नहीं दिखाई। लेकिन विश्व की इजरायल के विरुद्ध प्रतिक्रिया के पीछे अनेक प्रश्न खडे होते हैं जिनका संतोषजनक उत्तर अवश्य मिलना चाहिये।

इजरायल की निन्दा करने की भारत की पुरानी परम्परा रही है और भारत ने इजरायल के निर्माण की प्रक्रिया में भी फिलीस्तीन के विभाजन की शर्त पर इजरायल के निर्माण का विरोध किया था और इसके बाद भारत ने आधिकारिक रूप से अरब इजरायल संघर्ष में अरब देशों के साथ खडे होने का निर्णय लिया और इजरायल के हर उस कार्य की निन्दा की जो उसने अपनी आत्मरक्षा में किया। इजरायल के साथ भारत की नीति सदैव दोहरी रही है। एक ओर तो अरब देशों की सहानुभूति प्राप्त करने के लिये, इस्लामी उम्मा के असंतुष्ट हो जाने के भय से और भारत में स्थित मुस्लिम समाज को तुष्ट करने के लिये भारत सरकार सदैव अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इजरायल की निन्दा करती रही तो वहीं अनेक रणनीतिक कारणों से इजरायल को साधने के प्रयास भी गैर सरकारी स्तर पर चलते रहे। वैसे तो भारत और इजरायल के मध्य कूटनीतिक स्तर पर सम्बन्ध 1992 में पी.वी.नरसिम्हाराव की सरकार में आरम्भ हुए परंतु खुफिया और सामाजिक स्तर पर दोनों देशों के मध्य सम्बन्ध 1965 से ही आरम्भ हो गया था। इजरायल को लेकर भारत सदैव दुविधा का शिकार रहा है और इसी कारण 1992 के बाद भी इजरायल की निन्दा का दौर चलता रहा है।

अब यदि इजरायल के हमास पर किये गये वर्तमान आपरेशन पर दृष्टि डालें तो कुछ प्रश्न उभरते हैं। गाजा में हमास पर इजरायल की कार्रवाई के बाद सभी विश्लेषकों ने एक स्वर से इजरायल की कार्रवाई को बर्बर कहना आरम्भ कर दिया परंतु 1948 में अपने जन्म से लेकर आज अतक इजरायल जिस स्थिति का सामना कर रहा है उस सन्दर्भ में विश्लेषकों की राय पूरी तरह एकतरफा लगती है जो इस धारणा पर आधारित है कि इजरायल अरब संघर्ष में स्वाभाविक सहानुभूति अरब देशों या फिलीस्तीनियों के प्रति होनी चाहिये। राजनीतिक रूप से सही होने की परम्परा, छ्द्म उदारवाद और सेक्युलर दिखने की होड में इजरायल की निन्दा तथ्यों के विश्लेषण के बिना की जाती है। 1948 से लेकर आजतक इजरायल ने अरब देशों के साथ जो संघर्ष किये हैं उसकी पृष्ठभूमि जानने के लिये इतिहास में जाना होगा। 1924 में ओटोमन साम्राज्य को समाप्त कर ब्रिटिश ने इस्लामी साम्राज्यवाद की धुरी खिलाफत संस्था को ध्वस्त कर दिया और उसके बाद इस साम्राज्य को अनेक भागों में विभक्त कर मध्य पूर्व में अनेक नये देशों का निर्माण हुआ और इससे पूर्व 1917 में ब्रिटिश साम्राज्य ने विश्व भर के यहूदियों को इजरायल नामक नया देश देनी की उनकी माँग को सिद्धांत रूप में स्वीकार कर लिया था। इसके बाद फिलीस्तीन में यहूदियों को बसने की छूट दे दी गयी और द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत इजरायल राज्य के निर्माण का विषय संयुक्त राष्ट्र संघ को हस्तांतरित कर दिया गया जिसने अनेक बैठकों के बाद इस क्षेत्र का विभाजन स्वीकार कर इजरायल को यहूदियों के नये राज्य के रूप में स्वीकार कर लिया और 1948 में इजरायल का जन्म हुआ। इजरायल के जन्म से पूर्व फिलीस्तीन में यहूदियों के बसने की प्रक्रिया में भी फिलीस्तीनी मुसलमानों और यहूदियों में खूनी झडप होती थी और 1940 के दशक में तो यहूदियों के विरुद्ध आतंकवाद का अभियान चलाया गया। 1948 में इजरायल के जन्म के साथ ही उसे अरब देशों के प्रतिरोध का सामना करना पडा और इजरायल को तत्काल युद्ध लड्ना पडा। इसके बाद जितने भी युद्ध हुए उसमें इजरायल के अस्तित्व को स्वीकार न करने की जिद और उसका अस्तित्व समाप्त करने प्रयास हुआ। 1969 में जब इजरायल ने अरब की सभी सेनाओं को जो मिस्र के नेतृत्व में इजरायल से युद्दरत थी उन्हें इजरायल ने मात्र 6 दिनों में परास्त कर दिया तो अरब देशों और इजरायल के मध्य सम्बन्धों में नया मोड आया और मिस्र ने इजरायल के साथ सन्धि की।

वास्तव में इजरायल और फिलीस्तीन के मध्य समस्या को दो देशों के मध्य समस्या के रूप में देखा जाता और उसे राज्यक्षेत्र के विवाद से जोड्कर देखा जाता है। यह एक गलत धारणा है वास्तव में इस संघर्ष का मूल कहीं अधिक गहरा और जटिल है। मध्य पूर्व में पिछले साठ दशक में जितने भी इस्लामवादी आन्दोलनों ने जन्म लिया है उनके मूल में एक ही प्रेरणा रही है कि जेरुशलम पर नियंत्रण को लेकर अनेक शताब्दियों तक क्रुसेड और जिहाद चलता रहा (क्योंकि तीनों ही सेमेटिक धर्म इस्लाम, ईसाइयत और यहूदी तीनों ही इसे अपने लिये पवित्र मानते हैं) और अंत में पश्चिमी शक्तियों ने यहूदियों के साथ मिलकर एक षड्यंत्र कर जेरुशलम का स्थान यहूदियों को दे दिया और इस प्रक्रिया में उन्होंने इस्लाम की एकता का आधार रही खिलाफत संस्था को नष्ट कर दिया। खिलाफत को नष्ट कर इस्लामी एकता को बिखेर दिया गया और जिस इस्लाम में नेशन स्टेट की कल्पना नहीं थी उसे छोटे छोटे देशों में बाँट दिया गया और इस्लाम के पवित्र स्थल अरब और मक्का मदीना में ऐसी शक्तियाँ सत्ताशीन हो गयीं जो पश्चिमी देशों की कठपुतली सरकारें हैं और वे इस्लाम और शरियत के अनुसार शासन नहीं चला रही हैं। इस भावना के चलते मध्य पूर्व में इस्लामवादी आन्दोलनों का जन्म हुआ जो जिहाद का सहारा लेकर इसे वैश्विक इस्लामी आन्दोलन बना रहे हैं।

इजरायल और हमास के वर्तमान संघर्ष को यदि इस पृष्ठभूमि में देखें तो कुछ प्रश्न उठते हैं। विश्व के जो देश इजरायल की निन्दा करते हैं उन्हें अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये कि क्या वे इजरायल के जन्म को अवैध मानते हैं और यदि ऐसा है तो उन्होंने इजरायल को मान्यता क्यों दे रखी है क्योंकि मुस्लिम देश उसे स्वीकार नहीं करते और इसी कारण उसे मान्यता नहीं दे रखी है। इसी कारण संयुक्त राष्ट्र संघ सहित सभी देशों को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये कि क्या वे इजरायल को खिलाफत के अवशेषों पर निर्मित मानते हैं और इसी कारण फिलीस्तीन और अरब देशों से सहानुभूति रखते है। क्योंकि आत्म रक्षा में इजरायल द्वारा की गयी कार्रवाई की निन्दा करना उसके अस्तित्वमान रहने के अधिकार से उसे वंचित करना है। इसलिये जो भी देश, मीडिया, विचारक और लेखक या विश्लेषक़ इजरायल की निन्दा करते हैं उन्हें छ्द्म उदारवाद और छवि निर्माण के प्रयासों से बाहर आकर इस समस्या के मूलभूत विचारों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये।

जहाँ तक हमास के विरुद्ध इजरायल के प्रतिरोध का प्रश्न है तो इजरायल ने एक बार फिर यह कदम अपने नागरिकों की रक्षा में उठाया है। हमास ने गाजा पट्टी में अपनी सरकार स्थापित करने के बाद भी इजरायल को नष्ट करने के अपने मूलभूत उद्देश्य को छोडा नहीं और पिछले अनेक वर्षों से इजरायल के भीतर राकेट दागकर निर्दोष नागरिकों को अपना निशाना बनाया। इजरायल ने अपने बेहतर प्रयासों से नागरिकों की रक्षा के प्रयास किये और राकेट की चेतावनी के लिये ठोस प्रयास किये जिससे इन राकेट हमलों में निर्दोष नागरिक अधिक मात्रा में नहीं मरे लेकिन इजरायल के इस प्रयास से हमास का आशय और अपराध कम नहीं हो जाता। इजरायल के विरुद्ध आरोप लगाया जा रहा है कि उसने गाजा में निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाया लेकिन इन आरोपों की चर्चा करते हुए भी लोग उसी भावुकता का शिकार हो जाते हैं जिसके चलते उनकी स्वाभाविक सहानुभूति फिलीस्तीन या अरब देशों के प्रति रहती है। यह कोई पहला अवसर नहीं है इससे पूर्व 2000-1 में जब यासिर अराफात ने इजरायल के विरुद्ध एक प्रकार का आतंकवादी आन्दोलन इंतिफादा के रूप में घोषित कर दिया था तो भी यासिर अराफात की आलोचना नहीं की गयी थी और इजरायल के प्रतिरोध की तत्काल निन्दा आरम्भ कर दी गयी थी।

वास्तव में इजरायल और फिलीस्तीन का संघर्ष पूरी तरह धारणागत छवि युद्ध का शिकार हो गया है। एक ओर तो आतंकवाद के प्रतिरोध और खुफिया एजेंसियों की सन्नद्धता को लेकर अनेक देश इजरायल की विशेषज्ञता का लाभ उठाना चाहते हैं वहीं जब इजरायल के आत्म रक्षा का विषय आता है तो उसकी निन्दा आरम्भ हो जाती है। व्यावहारिक विवशताओं और छवि खराब होने के भय से इस पूरे संघर्ष की वस्तुनिष्ठ व्याख्या का साहस कोई भी नहीं करता। यह छद्म उदारवाद और सेक्युलरिज्म के एकाँगी स्वरूप का सबसे बडा उदाहरण है। एक ओर तो इस्लामवादी और वामपंथी यहूदियों के विरुद्ध षड्यंत्रकारी सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं और आरोप लगाते हैं कि कुछ अदृश्य हाथों से वे समस्त विश्व पर शासन कर रहे हैं लेकिन बिडम्बना है कि जब इजरायल फिलीस्तीन के संघर्ष का विषय आता है तो इस्लामवादियों का जनसम्पर्क अधिक सफल होता दिखता है। आज समय आ गया है कि छद्म उदारवाद का चोला छोडकर छवि निर्माण की चिंता के बिना इजरायल फिलीस्तीन संघर्ष के मूल कारण पर चर्चा की जाये क्योंकि इस समस्या का एक ही समाधान है कि इजरायल के पडोसी यह जान जायें कि वे आतंकवाद या सैन्य तरीकों से इतिहास के हिसाब नहीं चुका सकते और इजरायल एक वास्तविकता है जो उनके मध्य रहेगा। इजरायल की विजय केवल इस क्षेत्र में शांति स्थापित नहीं करेगी वरन उन इस्लामवादी आन्दोलनों और देशों को हतोत्साहित करेंगी जो वर्तमान को अस्वीकार कर भूतकाल में जीना चाहते हैं और एक काल्पनिक विश्व का निर्माण प्रछन्न युद्ध और आतंकवाद के सहारे करना चाहते हैं।

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12 Responses to “इजरायल की निन्दा क्यों?”

  1. zikr said

    yahudi jagran manch khol le beta.
    waise ab israel gaya to tujhe bhi jana hoga , phir mat darna…

    muslim tustikaran.???
    bharat muslim desh hai beta abaadi ke lihaj se dusra hai duniya mein….

    OM SHANTI MITE TERI BHRANTI YA AAYE KRANTI
    AUR UD JAYE TERI KANTI.

  2. suhail said

    aap ka lekho ko ped ker legta he ke apko israyel se selry milti he her mhine shayed?
    or kisi muslim ne apko nokri se nikal diya.

  3. Lightning2 said

    Hi Amitabh
    I had suggested You to do a Kinda Advertisment of this Very Good Pro-India website on TV Channels or Websites or Newspapers
    stating that its has
    1.Facility of Instant Comment posting
    2.Pro- India
    3.Non biased towards any Political party

    apart Many Regions of India can not read or write Hindi Properly, thus Convert this WEbsite into ENGLISH DEFAULT with Hindi as Option

    News update also has Time Lag here , Not a comprehensive Newssite but that issue can be sorted later
    Thanks

  4. safat said

    इज़राईल की निन्दा इसलिए कि
    (1) इज़राइल मानवता का शत्रु है
    (2) सम्पूर्ण संसार को अपने क़बजें में करने का सपना देथता है।
    (3) दूसरों की धरती छीन कर अपनी हुकूमत बनाया हुआ है।
    क्या आपको प्रमाण चाहिए?
    हम सब बड़े भोले भाले हैं। ज़रा सन 1897 इसवी में सुईज़र-लैंड में आयोजित यहूदि विश्व सम्मेलन में जो Protokol zion main के नाम से जो पालिसीयाँ पास हुईं हैं शायद उनको उठा कर आपने देखा नहीं। इज़राईल मात्र मुसलमानों का शत्रु नहीं मानवता का शत्रु है उन्हों ने अपने प्रोटोकोल में स्पष्ट किया है कि हम सम्पूर्ण संसार को अपना दास बनाना चाहते हैं। सारे मनुष्य कुत्ते और बिल्ली के समान हैं जो हमारी सेवा के लिए पैदा किए गए हैं। यह है यहूद की आस्था जिसमें आप भी आते हैं ।
    दूसरी बात यह कि अरब में इज़राइल का क्या रखा था? 1267 इसवी से पहले तक एक यहूदी भी फलस्तिन में नहीं था. लेकिन उनकी पलानिंग बहुत ऊंची है इसी लिए फलस्तिनियों की धरती पर उन्हों ने क़बज़ा जमाया अपना राज चलाना आरम्भ किया और आज उन्हीं के खूनों से होली खेल रहे हैं । उस से बढ़ कर आतंकवाद कौन हो सकता है?
    मेरे मित्र ज़रा यहूद की इतिहास पढ़ कर देखें फिर उनका समर्मथन करते हैं या क्या पता बाद में चलेगा।

  5. safat alam said

    इज़राईल की निन्दा इसलिए कि
    (1) इज़राइल मानवता का शत्रु है
    (2) सम्पूर्ण संसार को अपने क़बजें में करने का सपना देथता है।
    (3) दूसरों की धरती छीन कर अपनी हुकूमत बनाया हुआ है।
    क्या आपको प्रमाण चाहिए?
    हम सब बड़े भोले भाले हैं। ज़रा सन 1897 इसवी में सुईज़र-लैंड में आयोजित यहूदि विश्व सम्मेलन में जो Protokol zion main के नाम से जो पालिसीयाँ पास हुईं हैं शायद उनको उठा कर आपने देखा नहीं। इज़राईल मात्र मुसलमानों का शत्रु नहीं मानवता का शत्रु है उन्हों ने अपने प्रोटोकोल में स्पष्ट किया है कि हम सम्पूर्ण संसार को अपना दास बनाना चाहते हैं। सारे मनुष्य कुत्ते और बिल्ली के समान हैं जो हमारी सेवा के लिए पैदा किए गए हैं। यह है यहूद की आस्था जिसमें आप भी आते हैं ।
    दूसरी बात यह कि अरब में इज़राइल का क्या रखा था? 1267 इसवी से पहले तक एक यहूदी भी फलस्तिन में नहीं था. लेकिन उनकी पलानिंग बहुत ऊंची है इसी लिए फलस्तिनियों की धरती पर उन्हों ने क़बज़ा जमाया अपना राज चलाना आरम्भ किया और आज उन्हीं के खूनों से होली खेल रहे हैं । उस से बढ़ कर आतंकवाद कौन हो सकता है?
    मेरे मित्र ज़रा यहूद की इतिहास पढ़ कर देखें फिर उनका समर्मथन करते हैं या क्या पता बाद में चलेगा।

  6. wali ullah said

    ब्रिटिश हुकूमत को यकीन हो चला था की इस्लामी व्यवस्था को ख़त्म किए बगैर हमारा साम्राज्य कायम नहीं रह सकता ..इसका बाहर से मुकाबला करने से बेहतर ये है कि इस्लाम को अन्दर से ही ढहा दिया जाए . ये तभी हो सकता था जबकि इस्लाम की मुक़म्मल तालीम हो . ये काम मदरसों के ज़रिये से आसानी से हो सकता था इसलिए सब से पहले ब्रिटेन के दूर दराज़ इलाकों में कुछ मदरसे खोले गए . जिन के तालिब-ए-इल्म [तालिबान] ब्रिटिश जासूस थे जो इन मदरसों से इस्लामी तालीम और तहजीब सीख कर अरब देशों की इस्लामी दर्सगाहों और मदरसों में घुस गए .
    ये जासूस जहाँ एक ओर अपने मिशन के तौर पर इस्लामी तालीम को तोड़ मरोड़ और बदल कर अपने द्वारा संपादित एक नया मज़हब बना कर दीन ए इस्लाम को उसके अन्दर से ही ख़त्म करने में लग गए दूसरी ओर अरबों में फूट डाल कर उन्हें मिटाने का बीड़ा भी उठाया .जासूस हम्फ्रे से लेकर कर्नल लारेंस तक ने अपने को सौंपा गया काम बखूबी अंजाम दिया .
    अरब के नज्द इलाके में इन्हे दो अति महत्वकांक्षी शेख मिल गए . एक , शेख मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब दूसरा मुहम्मद बिन सऊद था .जो कि ‘मुहम्मदीन’ के नाम से जाने गए . ये वही नज्द था जहाँ पैगंबर-ए-इस्लाम [ सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम ] के खिलाफ शत्रुता उनके वक़्त से ही पाई जाती थी . ब्रिटिश जासूसों ने इन दोनों शेखों से अपनी दोस्ती बढ़ाई .और उनका विश्वास जीत लिया . जासूस हम्फ्रे ने मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब को नए मज़हब का अलमबरदार और शेख मुहम्मद बिन सऊद में अरब हुक्मरान बनने की लालच पैदा की और उसे अपनी खुफिया मदद से परवान चढाया और अपने मिशन की हिकमत-ए-अमली के तहत इन दोनों शेखों को एक दुसरे का मददगार बना दिया जिससे आगे चल कर उनकी मंशा के मुताबिक वहाबी मज़हब [नजदी इस्लाम ] और सउदी अरब की नीव पड़ी .
    इसके बाद इन जासूसों के सामने मुख्य उद्देश्य ये था कि आगे चलकर अरब फिर से उनके [ब्रटिश साम्राज्य के ] खिलाफ संगठित न हो पाएं और फिर से अरब ताक़तवर न बनने पाएं . इसके लिए अरब की नई पीढी को इस अपने द्वारा संपादित वहाबी मज़हब के ज़रिये जिहाद के नाम पर आतंकवाद के रास्ते पर धकेल दिया .उनकी मंशा के मुताबिक उस्मानी खिलाफत के विरुद्ध शुरू किया गया यह प्रायोजित जिहाद आगे चल कर हिंदुस्तान में सिखों , मराठों एवं पठानों के खिलाफ भी प्रायोजित किया गया और फिर सोवियत रूस को भी इसका निशाना बनाया गया . आज भी अरब के नवजवान बड़े बड़े इस्लामी संगठन बना कर ब्रिटिश , इस्राइल और अमेरिकी जासूसों कि निगरानी में उनकी मंशा के मुताबिक जिहाद करते हैं और नष्ट हो जाते हैं.. येही वजह है कि जब से ये जासूसों के मदरसे और आतंक की नर्सरियां कायम हुयी हैं तब से आज तक [ लगभग तीन सौ साल] से कोई भी अरब देश महाशक्ति बनकर नहीं उभर पाया .यह प्रायोजित जिहाद . जिसे इस्लामी आतंकवाद का नाम दिया जा रहा है नई विश्व व्यवस्था [new word order ] विशेषकर अमेरिका ब्रिटेन और इस्राइल के लिए सेफ्टी वाल्व का काम कर रहा है .क्योंकि उन्हें डर है अरबों की उर्जा को यदि इस तरह से नष्ट नही किया गया तो वे उनके द्वारा बनाई गई नई विश्व व्यवस्था के लिए खतरा बन जायेंगे.

  7. त्रिपाठी जी आपने जो भी लिखा है सही लिखा है

  8. mohammad arshad khan said

    only few words for the the bloger ……look inside your belive and define your lord ….or god. and comment waiting for your defination…………..may possble you come to conclusion of your dilema……

  9. bharat kumar said

    agree with u

  10. Excellent analysis. I salute your courage & brain. Please keep it up for sake of humunaity. Best of luck.

  11. harish said

    इस्लाम एक महान ऒर उदारवादी धर्म हॆ। इसकी शिक्षा मानव को मानव से प्रेम ब सहयोग का व्यवहार करना सिखाती हॆं। लेकिन कुछ समुह व वर्ग ऎसे भी हॆं जो कि इस्लाम की महान शिक्षा व धार्मिक विचारो की व्याख्या अपने निजी हितो को ध्यान में रखते हुऎ करते हॆं। अमरीका ऒर इजराइल के विरुध जेहाद व धार्मिक युद्ध का प्रचार करना इन दोनो देशो की हर गतिविधियों को इस्लाम के विरुध साबित करना अम्ररीका व इजराइल को हर समाजिक, राजनॆतिक एव धार्मिक बुराईयों का प्रतिक बताना कुछ ऎसी बाते हॆं जिनका प्रचार व प्रसार इस्लामिक दुनिया मे कुछ खास हितो व स्वार्थो को ध्यान में रख किया जाता हॆ। इस्लामिक दुनिया के समाज को उदारवादी व अतिवादी धड़ो में बांट कर राजनॆतिक शक्ति प्राप्त करना अल-कायदा जॆसे चरमपंथी संगठनो का लक्ष्य रहा हॆ। ऎसे संगठन अरब-इजराइल विवाद इराक ऒर अफ़गानिस्तान युद्ध का प्रचार कुछ इस तरह करते हॆं जिससे कि इस्लामिक राष्ट्रो व समाजो में अमरीका ऒर इजराइल की छवी एक आक्रमक ऒर हिंसक देशो की बन जाए। मुस्लिम नॊजवानो के भीतर इन दोनो देशो के प्रति घॄणा पॆदा करना अल-कायदा का मकसद हॆ ताकि ऎसे संगठन मुसलिम नॊजवानो को भ्रमित कर उनका प्रयोग अपने आतंकवादी अभियानो में कच्चे माल की तरह कर सकें।

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