हिंदू जागरण

हिंदू चेतना का स्वर

इस्लामी आतंकवाद का नया आयाम

Posted by amitabhtri on सितम्बर 25, 2008

पिछले दिनों 13 दिसम्बर को दिल्ली में इंडियन मुजाहिदीन द्वारा किये गये बम विस्फोटों के बाद आतंकवादियों की तलाश में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अनेक स्थानों पर पुलिस ने छापेमारी की और दक्षिणी दिल्ली के जामिया नगर क्षेत्र में एल-18 के एक फ्लैट में मुठभेड में कुछ आतंकवादियों को मार गिराया और एक को गिरफ्तार किया। इस मुठभेड और गिरफ्तारी के बाद अनेक सनसनीखेज रह्स्योद्घाटन हुए और मुठभेड के बाद कथित मकान की देखरेख कर रहे अब्दुर्ररहमान और उनके पुत्र जियाउर्ररहमान ने कुछ टीवी चैनलों पर आकर इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस को घेरने की कोशिश की और मारे गये आतंकवादियों के सम्बन्ध में मकान पर किराये लेने की औपचारिकता पूरी करवाने में पुलिस की लापरवाही सिद्ध कर स्वयं को इस पूरे मामले से अनभिज्ञ दिखाने की चेष्टा की। लेकिन दिल्लीवासियों सहित पूरे देश को तब आश्चर्य हुआ जब मकान की रखवाली करने वाले अब्दुर्रहमान और उनके पुत्र जियाउर्रहमान को पुलिस ने इस पूरे षडयंत्र में बराबर का साझीदार बताया तथा और तो और जो जियाउर्ररहमान अत्यंत भोले भाले अन्दाज में टीवी चैनल को बता रहा था कि मारे गये आतंकवादियों को वह जानता नहीं था उसके बारे में दिल्ली पुलिस ने बताया कि उसने दिल्ली में अनेक स्थान पर बम भी रखने में सहयोग किया और आतंकवादियों को हर प्रकार का रणनीतिक सहयोग भी उपलब्ध कराया। जब पुलिस की जांच आगे बढी तो पाया गया कि जियाउर्रहमान के साथ एक शकील भी आतंकवाद के इस षडयंत्र में शामिल है और ये दोनों ही दिल्ली के अत्यंत प्रतिष्ठित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्र हैं।

इन छात्रों के आतंकवादी गतिबिधियों में लिप्त होने के आरोप में पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया प्रशासन की पहली प्रतिक्रिया आयी कि इन छात्रों को विश्वविद्यालय से निलम्बित कर दिया गया है लेकिन इस निर्णय के उपरांत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मुशीरुल हसन ने घोषणा की कि विश्वविद्यालय की ओर से तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जा रहा है जो आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार छात्रों को हर प्रकार की सहायता उपलब्ध करायेगी ताकि उनके आरोप सिद्ध होने से पहले तक कानूनी सहायता प्राप्त हो। इसके साथ ही कुलपति महोदय ने पूरे विषय को एक भावनात्मक मोड दिया और छात्रों को सम्बोधित करते हुए कहा कि यह संकट का अवसर है और इससे हम सबको मिलकर लड्ना है। कुलपति ने पुलिस को निशाना बनाया और कहा कि सभी को पता है कि पुलिस कैसे जांच करती है। प्रोफेसर मुशीरुल हसन जो कि देश के सेकुलर पंथियों में एक उदारवादी मुसलमान और श्रेष्ठ बुद्धिजीवी के रूप में स्थान रखते हैं और देश की अधिकाँश समस्यायों के पीछे संघ परिवार और हिन्दू आन्दोलन को देखते हैं उन्होंने इस पूरे मामले में मीडिया को भी घेरा और कहा कि वह रिपोर्टिंग के लिये उडीसा, कर्नाटक और गुजरात जाये। कुलपति द्वारा जामिया मिलिया इस्लामिया के दो छात्रों के आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोपी होने के बाद इसे एक संक़ट सिद्ध कर देने से विश्वविद्यालय के छात्रों ने आतंकवाद के आरोपी छात्रों की कानूनी सहायता के लिये सहायता कोष एकत्र करना आरम्भ कर दिया है। विश्वविद्यालय ने आतंकवाद के आरोपी छात्रों की सहायता के लिये जो तीन सदस्यीय समिति गठित की है उसमें शामिल किये गये लोगों की छवि प्रायः उदारवादी मुसलमानों की रही है जो जिहाद को आत्मसंघर्ष के रूप में परिभाषित करते रहे हैं और जिहाद के नाम पर आतंकवाद करने की आलोचना करते आये हैं।

जामिया प्रशासन द्वारा आतंकवाद के आरोप में पकडे गये अपने दो छात्रों के सम्बन्ध में लिये गये निर्णय के अनेक निहितार्थ हैं।

इस्लामी आतंकवाद के सम्बन्ध में अब यह तर्क पुराना हो गया है कि यह कुछ गुमराह नौजवानों का काम है जो किसी उत्पीडन या बेरोजगारी के चलते ऐसा कर रहे हैं। इसके साथ ही आतंकवादियों के पक्ष में मुस्लिम समाज सहित तथाकथित सेकुलरपंथियों का खुलकर सामने आना एक सामान्य बात हो गयी है। और तो और अब आतंकवादियों के समर्थन में पुलिस को अपराधी बनाना और उसके प्रयासों को झूठा सिद्ध करना साथ उसके द्वारा पकडे गये लोगों को निर्दोष सिद्ध करने के लिये आक्रामक बौद्धिक प्रयास चलाना भी इस्लामी आतंकवाद का नया आयाम है। इसके अतिरिक्त एक अन्य आयाम यह जुडा है कि देश के अत्यंत श्रेष्ठ बौद्धिक लोग इस्लामी आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराने के लिये मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा सृजित करने में अपनी बौद्धिक क्षमता का उपयोग कर रहे हैं। अनेक ऐसे लेखक मिल जायेंगे जो अत्यंत परिश्रम पूर्वक यह प्रयास कर रहे हैं कि भारत राज्य की व्यवस्था में मुस्लिम उत्पीडन और भेदभाव को स्थापित किया जाये ताकि इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप इस्लामी आतंकवाद को न्यायसंगत सिद्ध किया जा सके।

प्रोफेसर मुशीरुल हसन का इस प्रकार आतंकवाद के आरोपियों के पक्ष में खुलकर आना और पुलिस को अपराधी सिद्ध कर आतंकवादियों को निर्दोष घोषित करना अनेक प्रश्न खडॆ करता है। मुशीरुल हसन वही व्यक्ति हैं जिन्होंने कुछ महीनों पूर्व देश के कुछ कुलपतियों के प्रतिनिधिमण्डल के साथ इजरायल की यात्रा की थी और इजरायल के सम्बन्ध में देश में अधिक मुस्लिम समझ बढाने की दिशा में प्रयास करने का आश्वासन इजरायल को दिया था। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि मुशीरुल हसन इस कदर इस्लामवादी नहीं हैं कि वे इजरायल को देखना भी पसन्द न करें फिर ऐसे अपेक्षाकृत बुद्धिजीवी मुसलमान का देश के विरुद्ध आक्रमण की घोषणा करने वाले संगठन इंडियन मुजाहिदीन के सदस्यों की खुलकर वकालत के क्या मायने है?
इस विषय को समझने के लिये हमें अनेक सन्दर्भों को समझना होगा। जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना भारत के प्रमुख इस्लामी संगठन दारूल उलूम देवबन्द के प्रमुख सदस्य ने स्थापित किया था और पहले यह अलीगढ में था और कुछ वर्षों बाद यह दिल्ली आया। दारूल उलूम देवबन्द एक ऐसी कट्टरपंथी विचारधारा का पोषक है जिसमें से तालिबान और उसके प्रमुख मुल्ला उमर जैसे लोग पैदा हुए हैं। कुछ महीनों पहले दारूल उलूम देवबन्द ने अनेक आतंकवाद विरोधी सम्मेलन आयोजित कर आतंकवाद और इस्लाम को असम्पृक्त करने का प्रयास भी किया परंतु इस सभी सम्मेलनों में जिस प्रकार सशर्त ढंग से आतंकवाद की निन्दा की गयी उससे स्पष्ट है कि इस्लामी आतंकवाद को इस्लाम से असम्पृकत रखते हुए भी मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा के आधार पर उसका समर्थन करने का व्यापक षड्यंत्र रचा जा रहा है।

वास्तव में समस्त विश्व में इस्लामवाद एक आन्दोलन के रूप में चलाया जा रहा है जिसका मूलभूत उद्देश्य वर्तमान विश्व व्यवस्था को ध्वस्त कर नयी विश्व व्यवस्था का निर्माण करना है जो कुरान और शरियत पर आधारित है और इसे प्राप्त करने के लिये राज्य को आतंकित कर उसके संस्थानों को ध्वस्त करना इनकी कार्ययोजना है।

विश्व स्तर पर एक बडा परिवर्तन आया है कि 1991 में सोवियत रूस के विघटन के बाद वामपंथी विचार के लोग पूरी तरह असहाय और अप्रासंगिक हो गये और उनके लिये पूँजीवाद और अमेरिका को पराजित करना असम्भव लगने लगा और इसी कारण समस्त विश्व के वामपंथियों ने आर्थिक चिंतन के साथ ही इस्लाम के प्रति भी सहानुभूति दिखानी आरम्भ कर दी और धीरे धीरे इजरायल और फिलीस्तीन का विवाद उनके एजेण्डे में ऊपर आ गया। इस प्रक्रिया में वामपंथ इस्लामवादी आन्दोलन और मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा को समर्थन देने लगा और समस्त विश्व की समस्याओं के मूल में अमेरिका और इजरायल को रख दिया गया। आज समस्त विश्व में इस्लामवाद के नयी विश्व व्यवस्था के निर्माण और कुरान तथा शरियत पर आधारित व्यवस्था विश्व पर लादने के प्रयासों के समर्थन में मुस्लिम उत्पीडन के तर्क वामपंथी चिंतकों द्वारा ही तैयार किये जा रहे हैं फिर वह नोम चोम्सकी हों या विलियम ब्लम।

11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमण के बाद विश्व भर के वामपंथियों को यह विश्वास हो गया कि जो काम स्टालिन, लेनिन और माओ नहीं कर सके वह काम इस्लामी आतंकवादी कर ले जायेंगे और इनकी सहायता से अमेरिका को पराजित किया जा सकता है।

जिस प्रकार विश्व भर के वामपंथियों ने 11 सितम्बर को अमेरिका पर हुए आक्रमण के उपरांत खुलकर इस्लामी आतंकवादियों का समर्थन करना आरम्भ कर दिया है वही रूझान अब भारत में भी देखने को मिल रहा है। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुए आक्रमण को लेकर भारत में वामपंथियों और उनके सहयोगी सेकुलरपंथियों ने इसे अल कायदा और अमेरिका के बीच का संघर्ष बताया और साथ ही साथ वैश्विक स्तर पर इस्लामवाद का समर्थन करते हुए लेख लिखे, धरना प्रदर्शन किया और तो और आज से चार वर्ष पूर्व केरल में हुए विधानसभा चुनावों में वामपंथियों ने फिलीस्तीनी नेता और इंतिफादा में हजारों यहूदियों को आत्मघाती आक्रमणों मे मरवाने वाले यासिर अराफात के चित्र को लेकर और आईए ई ए में ईरान के विरुद्ध भारत सरकार के मतदान को चुनाव का मुद्दा बनाया और कांग्रेस को बुरी तरह पराजित किया। ऐसे कम ही अवसर भारतीय लोकतंत्र में होंगे जब विदेश नीति को साम्प्रदायिकता के साथ जोडा गया और मुस्लिम वोट प्राप्त किया गया।

इसके बाद जब डेनमार्क में इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद का कार्टून प्रकाशित किया गया तो वामपंथियों ने अनेक सेकुलरपंथियों के साथ मिलकर इस्लामवादियों का साथ दिया और सड्कों पर उतर कर अनेक स्थानों पर हिंसा का मार्ग प्रशस्त किया। इसी प्रकार जब अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने जब भारत की यात्रा की तो वामपंथियों और सेकुलरपंथियों ने इस्लामवादियों के साथ मिलकर देश में अनेक स्थानों पर बडी बडी रैलियाँ कीं और आगंतुक राष्ट्रपति को संसद का संयुक्त सत्र संसद भवन में सम्बोधित नहीं करने दिया और सांसदों को दिल्ली में अन्य किसी स्थान पर एकत्र करना पडा।

इन सभी घटनाक्रमों में केवल एक बात सामान्य रही कि सभी मामलों में इस्लामवादियों के एजेण्डे का समर्थन भारत के वामपंथियों और सेकुलर पंथियों ने किया।

जिस समय अमेरिका पर आक्रमण हुआ या फिर यूरोप के देश इस्लामी आतंकवाद का शिकार हुए तो भारत में वामपंथी और सेकुलरपंथी इसे पश्चिम के अन्याय के विरुद्ध इस्लामवादियों की प्रतिक्रिया बताकर भारत को इस्लामी आतंकवाद से लड्ने की तैयारी करने से रोकते रहे और इस बात की प्रतीक्षा करते रहे कि भारत में इस्लामी आतंकवादी कब भारत के राज्य को चुनौती देते हैं और जब 2004 के बाद से भारत में देशी मुसलमानों द्वारा आतंकवादी घटनायें की जानें लगीं तो इनके पक्ष में यह वर्ग खुलकर सामने आने लगा। 2001 में जो लोग जिहाद को आत्मसंघर्ष सिद्ध कर रहे थे अब वे मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा के समर्थन में आ गये हैं और राज्य तथा पुलिस को उत्पीडक सिद्ध कर आतंकवादी घटनाओं को न्यायसंगत ठहरा रहे हैं। ऐसा इसलिये हुआ है कि देश में वामपंथियों और सेकुलरपंथियों को विश्वास हो गया है कि इंडियन मुजाहिदीन जैसे इस्लामी संगठन राज्य को चुनौती देने में सक्षम हैं और वे उनके लक्ष्य में सहायक हैं। प्रोफेसर मुशीरुल हसन जैसे लोग इसी भावना के वशीभूत होकर आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार अपने विश्वविद्यालय के छात्रों का समर्थन कर रहे हैं जिनकी दृष्टि में भारत में सेकुलरिज्म का संतुलन बनाये रखने के लिये आवश्यक है कि देश पर हिन्दू संगठनों का वर्चस्व कम हो और यह काम इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठन ही कर सकते हैं तभी उन्होंने उडीसा और कर्नाटक में चर्च और ईसाइयों पर हुए हमलों को देश के सेकुलर ताने बाने के लिये खतरा बताते हुए विहिप और बजरंग दल को कोसा परंतु 13 दिसम्बर को दिल्ली पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद उसकी निन्दा करना भी उचित नहीं समझा और बाद में मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा के सहारे आतंकवाद और आतंकवादियों का समर्थन करने लगे।

इस्लामी आतंकवाद के इस नये आयाम को इसी सन्दर्भ में समझने की आवश्यकता है। इस्लामी आतंकवाद को सही ढंग से समझने के लिये आवश्यक है कि इसके मूलस्रोत और मूल प्रेरणा को समझा जाये। आज जो भी शक्तियाँ भारत में व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर हिंसक गतिविधियों में लिप्त हैं उन सभी शक्तियों के आपस में गठजोड करने की पूरी सम्भावना है और इसका उदाहरण हमें मिल भी चुका है जब अमरनाथ में भूमि प्राप्त करने के आन्दोलन के समय माओवादियों ने पहली बार कश्मीर में इस्लामी आतंकवादियों का समर्थन करने की घोषणा करते हुए कश्मीर के संघर्ष में अपना सहयोग देने का वचन दिया और कश्मीर की स्वतंत्रता का समर्थन किया। इससे पहले मई माह में केरल में इस्लामी आतंकवादियों और नक्सलियों की पहली संयुक्त बैठक हुई थी और साम्राज्यवाद, राज्य आतंकवाद और हिन्दू फासीवादियों से एक साथ लड्ने का संकल्प व्यक्त किया गया था। यह एक नये ध्रुवीकरण का संकेत है जिसमें वर्तमान व्यवस्था के स्थान पर एक काल्पनिक विश्व व्यवस्था स्थापित करने में प्रयासरत शक्तियाँ एक साथ आ रही हैं और इन सभी को इस्लामी आतंकवादी अपने सहयोगी दिखायी दे रहे हैं। इस्लामी आतंकवाद का मुकाबला करने के लिये राज्य को तो कठोर कदम उठाने ही होंगे विचारधारा के स्तर पर हो रहे ध्रुवीकरण को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध विचारधारा के स्तर पर समान शक्तियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साथ लाया जाये।

Advertisements

Posted in Uncategorized | 5 Comments »

कैसे लडें जिहाद से?

Posted by amitabhtri on सितम्बर 21, 2008

भारत जिहाद नामी इस्लामी आतंकवाद से पिछले दो दशक से लड रहा है परंतु इसका वैश्विक स्वरूप विश्व के समक्ष 11 सितम्बर 2001 के साथ आया। जिन दिनों भारत इस्लामी आतंकवाद से लड रहा था उन दिनों अमेरिका सहित पश्चिमी विश्व के लोग भारत में कश्मीर केन्द्रित आतंकवाद को स्वतंत्रता की लडाई मान कर हाथ पर हाथ धरे बैठे थे। लेकिन क्या भारत ने कभी अपने देश में चल रहे आतंकवाद को परिभाषित कर उससे लड्ने की कोई रणनीति अपनाई? कभी नहीं? इसके पीछे दो कारण हैं। एक तो इस समस्या को वैश्विक परिदृश्य में कभी देखने का प्रयास नहीं हुआ और दूसरा इस आतंकवाद के विचारधारागत पक्ष पर कभी ध्यान नहीं दिया गया। भारत में आतंकवाद के लिये सदैव पडोसी देश को दोषी ठहरा कर हमारे नेता अपने दायित्व से बचते रहे और तो और आतंकवाद के इस्लामी पक्ष की सदैव अवहेलना की गयी और मुस्लिम वोटबैंक के डर से इसे चर्चा में ही नहीं आने दिया गया।

भारत ने जिहाद प्रेरित इस इस्लामी आतंकवाद से लड्ने के तीन अवसर गँवाये हैं। पहली बार जब 1989 में इस्लाम के नाम पर पकिस्तान के सहयोग से कश्मीर घाटी में हिन्दुओं को भगा दिया गया तो भी इस समस्या के पीछे छुपी इस्लामी मानसिकता को नहीं देखा गया। यह वह अवसर था जब राजनीतिक इच्छाशक्ति के द्वारा हिन्दुओं के पलायन को रोककर जिहाद को कश्मीर में ही दबाया जा सकता था। वह अवसर था जब पाकिस्तान के विरुद्ध कठोर कार्रवाई कर जिहाद के इस भयावह स्वरूप से भारत को बचाया जा सकता था। इसके बाद दूसरा अवसर हमने 1993 में गँवाया जब जिहाद प्रेरित इस्लामी आतंकवाद कश्मीर की सीमाओं से बाहर मुम्बई पहुँचा। इस अवसर पर भी इस घटना को बाबरी ढाँचे को गिराने की प्रतिक्रिया मानकर चलना बडी भूल थी और यही वह भूल है जिसका फल आज भारत भोग रहा है। तीसरा अवसर 13 दिसम्बर 2001 का था जब संसद पर आक्रमण के बाद भी पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गयी। यह अंतिम अवसर था जब भारत में देशी मुसलमानों को आतंकवाद की ओर प्रवृत्त होने से रोका जा सकता था। इस समय तक भारत में आतंकवाद का स्रोत पाकिस्तान के इस्लामी संगठन और खुफिया एजेंसी हुआ करते थे और भारत के मुसलमान केवल सीमा पार से आने वाले आतंकवादियों को सहायता उपलब्ध कराते थे। इसके बाद जितने भी आतंकवादी आक्रमण भारत पर हुए उसमें भारत के जिहादी संगठन लिप्त हैं।

अब देखने की आवश्यकता है कि चूक क्यों हुई? एक तो भारत में 1989 के बाद उत्पन्न हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कभी वैश्विक सन्दर्भ में जिहाद और इस्लाम को समझने का प्रयास नहीं किया गया।

आज वैश्विक स्तर पर हम जिस जिहाद की धमक देख रहे हैं या जिस अल कायदा का स्वरूप हमारे समक्ष है वह एक शताब्दी के आन्दोलन का परिणाम है। बीसवीं शताब्दी में मिस्र नामक देश में मुस्लिम ब्रदरहुड नामक उग्रवादी मुस्लिम संगठन का निर्माण हुआ और यह इसे वैचारिक पुष्टता प्रदान करने वाले मिस्र के सैयद कुत्ब थे। जिन्हें 19966 में तत्कालीन राष्ट्रपति ने मिस्र सरकार को अपदस्थ करने के षडयंत्र को रचने के आरोप में मृत्युदण्ड दे दिया था। सैयद कुत्ब ने नये सन्दर्भ में जिहाद की अवधारणा दी और इस्लाम की राजनीतिक भूमिका निर्धारित की। उन्होंने उम्मा को सक्रिय करने और जाहिलियत का सिद्धांत दिया। सैयद कुत्ब के अनुसार इस्लाम का शरियत और क़ुरान आधारित विशुद्ध शासन समय की माँग है और इसके लिये जिहाद द्वारा राज्य के शासन अपने हाथ में लेना इसका तरीका है। कुत्ब के जाहिलियत के सिद्धांत के अनुसार जो इस्लामी देश पश्चिम के देशों के हाथ की कठपुतली हैं उनके विरुद्ध भी जिहाद जायज है। कल पाकिस्तान में हुआ विस्फोट इसी सिद्धांत के अनुपालन में किया गया है। सैयद कुत्ब ने पश्चिम की संस्कृति को अनैतिक और जाहिल करार दिया और इसके विरुद्ध जिहाद का आह्वान किया। सैयद कुत्ब की मृत्यु के उपरांत उनके भाई मोहम्मद कुत्ब ने उनके साहित्य को आगे बढाया। उन पर पुस्तकें और टीका लिखीं और अयमान अल जवाहिरी तथा ओसामा बिन लादेन जैसे अल कायदा के प्रमुखों के लिये प्रेरणास्रोत बने।

आज भारत में जब इस्लामी आतंकवाद और जिहाद की बात होती है तो इसे 1992 के राम मन्दिर आन्दोलन से जोड कर इस्लामी प्रतिक्रिया मान लिया जाता है। परंतु यह बात दो बातों को प्रमाणित करती है। या तो लोग अनभिज्ञ हैं या फिर जान बूझकर झूठ बोलते हैं। 1991 से वैश्विक स्तर पर जिहाद में एक नया परिवर्तन आया था और ओसामा बिन लादेन ने इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट की स्थापना की दिशा में कदम बढा लिया था। 1993 में इस फ्रंट की ओर से पहली बार एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर हुए और ईसाइयों तथा यहूदियों के विरुद्ध जिहाद का आह्वान किया गया। इस आह्वान के बाद विश्व में पश्चिम के अनेक प्रतिष्ठानों पर आक्रमण होने लगे।

अल कायदा का जिहादवाद कुछ सिद्धांतों को लेकर चल रहा था और उसमें एक प्रमुख सिद्धांत था मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा। उनके जिहाद का कारण विश्व में शरियत और कुरान के आधार पर एक नयी विश्व व्यवस्था का निर्माण करना और मुस्लिम उत्पीडन का बदला लेना। इस विचारधारा ने समस्त विश्व के मुसलमानों को बडी तेजी से अपनी ओर आकर्षित किया और एक दशक में अल कायदा का जिहादवाद अनेक विचारधाराओं के समाधान के रूप में देखा जाने लगा और खिलाफत संस्था के पुनर्जीवित होने का स्वप्न सभी देखने लगे।

अल कायदा के विकास को इस सन्दर्भ में समझने की आवश्यकता है कि वह विश्व भर के मुसलमानों के एक बडे वर्ग के लिये अनेक समस्याओं के समाधान के रूप में जिहाद को प्रस्तुत करता है।

आज भारत में भी मुस्लिम समाज का कोई न कोई वर्ग विश्व पर इस्लामी शासन की स्थापना के स्वप्न के अंश के रूप में भारत को भी इस्लामी शासन के अंतर्गत लाने की सोच रखता है। आज हमें इस पूरे जिहादवाद को समझना होगा कि यह अब किसी एक संगठन या नेतृत्व द्वारा प्रेरित नहीं है और इसमें प्रत्येक देश के इतिहास और सोच के सन्दर्भ में इसकी व्याख्या हो रही है। लेकिन इंडियन मुजाहिदीन पूरी तरह अल कायदा की सोच और तकनीक पर काम कर रहा है। उसके आक्रमण और मीडिया प्रबन्धन में यह झलक देख चुके हैं। 15 वर्ष पूर्व यदि अल कायदा ने अमेरिका और पश्चिम तथा पश्चिम के हाथ की कठपुतली बने अरब देशों का विषय उठाया था तो इंडियन मुजाहिदीन पूरी तरह भारत के मुसलमानों से जुडे विषय उठा रहा है। परंतु मूल सिद्धांत एक ही है मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा से आम मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करना और जिहाद द्वारा इस्लामी राज्य स्थापित करने की चेष्टा। पिछले कुछ वर्षों में विश्वस्तर पर वामपंथी भी पूँजीवाद के प्रतीक अमेरिका के विरुद्ध अपनी लडाई में जिहादवादी इस्लामवादी आतंकवादियों को अपना सहयोगी मान कर चल रहे है यही तथ्य भारत में नक्सलियों और माओवादियों के साथ भी है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि भारत में व्यवस्था परिवर्तन का आन्दोलन चलाने वाले भी जाने अनजाने जिहादवादियों के तर्कों का समर्थन करते दिखते हैं।

आज प्रश्न यह है कि इस जिहाद से मुक्ति कैसे मिले? भारत में यह समस्या अत्यंत जटिल है क्योंकि भारत में हिन्दू मुस्लिम सम्बन्धों की कटुता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है और इस बात की आशंका है कि जिहाद की वर्तमान अवधारणा धार्मिक विभाजन को अधिक प्रेरित कर सकती है। जिहाद से लड्ने के लिये राज्य स्तर पर और सामाजिक स्तर पर रणनीति बनानी पडेगी। यह काम किसी भी प्रकार तुष्टीकरण से सम्भव नहीं है और इसका एकमात्र उपाय व्यापक जनजागरण है। व्यापक स्तर पर इस्लाम पर बहस हो। इस्लाम और इस्लामी आतंकवाद के आपसी सम्बन्धों पर बह्स से बचने के स्थान पर इस विषय पर बह्स की जाये और मुसलमानों को अपनी स्थिति स्पष्ट करने को बाध्य किया जाये। यदि मुसलमान आतंकवाद के साथ नहीं हैं तो पुलिस को अपना काम करने दें और जांच में या आतंकवादियों के पक़डे जाने पर मुस्लिम उत्पीडन का रोना बन्द करें। आज देश में प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्व का विकास रोकने क दायित्व मुसलमानों पर है हिन्दुओं पर नहीं। यदि क़ुरान आतंकवाद की आज्ञा नहीं देता और देश के मुसलमान जिहाद से सहानुभूति नहीं रखते तो उन्हें इसे सिद्ध करना होगा अपने आचरण से। अन्यथा इस समस्या को धार्मिक संघर्ष का रूप लेने से कोई नहीं रोक सकता।

Posted in Uncategorized | 2 Comments »

वैश्वीकरण और पत्रकारिता

Posted by amitabhtri on अगस्त 30, 2008

राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन के राष्ट्रीय संयोजक श्री के.एन.गोविन्दाचार्य की पहल पर नई दिल्ली स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब में वैश्वीकरण का पत्रकारिता पर प्रभाव व हमारी परम्परा नामक परिसंवाद आयोजित किया गया जो वास्तव में परिसंवाद से अधिक संगोष्ठी होकर रह गया। दिन भर के इस कार्यक्रम में अनेक नामी गिरामी पत्रकारों ने भाग लिया। इनमें प्रसिद्ध पत्रकार और जनसत्ता के संपादक प्रभाष जोशी, ई टी वी दिल्ली के प्रमुख एन.के.सिंह, प्रथम प्रवक्ता पत्रिका के संपादक और पूर्व में जनसत्ता से जुडे रहे रामबहादुर राय और जी न्यूज के सलाहकार संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रमुख नाम थे। कार्यक्रम के प्रथम सत्र में प्रभाष जोशी ने उद्घाटन सत्र में पूरे विषय की भाव भूमि रखी और तय हो गया कि वर्तमान परिस्थितियों में पत्रकारिता के मूल्यों से लेकर वैश्वीकरण के बढते प्रभावों के बीच बदलते जीवन मूल्यों और बदलते सामाजिक ताने बाने पर विचार होगा और कमोवेश हुआ भी यही। परंतु इस पूरे लेख में तीन वक्ताओं के इर्द गिर्द पूरे विषय को समेटने का प्रयास होगा और यह प्रयास भी होगा कि उनके विचारों की समीक्षा और समालोचना भी हो सके।

प्रभाष जी ने अपने पूरे सम्बोधन में दो प्रमुख विषयों को स्पर्श किया एक तो यह कि भारत में पत्रकारिता बाजारमूलक हो गयी है और इसका उद्देश्य मुनाफा कमाना हो गया है और अब यह लोकहित से सरोकार रखने के स्थान पर ब्राण्ड निर्माण के कार्य में लिप्त हो गयी है। दूसरा विषय जो वयोवृद्ध पत्रकार ने उठाया वह था सम्पादकों के स्तर में आ रही गिरावट इस सम्बन्ध में उन्होंने स्वाधीनता आन्दोलन का उदाहरण दिया कि किस प्रकार अंग्रेजों के आगे झुकने के स्थान पर स्वदेश में आठ सम्पादकों ने काला पानी की सजा झेलना अधिक पसन्द किया।

कार्यक्रम में दूसरे प्रमुख वक्ता जिन्होंने कुछ समग्रता में विषयों को स्पर्श किया वह थे राम बहादुर राय जिन्होंने पत्रकार से अधिक एक आन्दोलनकारी की भाँति अपने विचार रखे और वर्तमान समस्याओं के मूल में भारतीय संविधान को देखा।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन के राष्ट्रीय संयोजक के.एन. गोविन्दाचार्य ने जब अपने विचार रखे तो यह स्पष्ट हो गया कि यह कार्यक्रम उनके देश व्यापी आन्दोलन को एक हिस्सा है जिसके मूल में विचार यह है कि वे अपने विचार को अधिक प्रासंगिक और क्रियाशील कैसे बना सकते हैं? के.एन. गोविन्दाचार्य ने कोई नई बात नहीं रखी और वैश्वीकरण के दुष्प्रभावों वाले कैसेट को फिर से रिप्ले कर दिया फिर भी उन्हें पहली बार सुनने वालों के लिये यह नया था और सार्थक भी था। श्री गोविन्दाचार्य ने कुछ बातें कहीं कि वर्तमान व्यवस्था कुछ देशी और विदेशी शक्तियों के हित साधती है इसलिये इसे बदलना आवश्यक है यह बदलाव सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तीनों स्तर पर होना चाहिये। गोविन्दाचार्य की अधिक मह्त्वपूर्ण बात यह रही कि आने वाली पीढी के सुखद भविष्य को सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार कुछ न कुछ अवश्य करे और क्रियाहीन होकर हारकर न बैठे।

इस आलेख में केवल तीन वक्ताओं की बात इसलिये की गयी है कि इस संगोष्ठी के पीछे का जो चिंतन है वह इन तीन वक्ताओं के विचारों में ही ढूँढा जा सकता है क्योंकि ये तीनों ही एक विचारधारा के लोग हैं, तीनों ही 1977 के जयप्रकाश नारायण आन्दोलन से प्रभावित लोग हैं साथ ही उसके सूत्रधार भी रहे हैं, तीनों के व्यक्तित्व में 1975 के आपातकाल और उसके प्रतिरोध के संस्मरण हैं और कुछ हद तक ये तीनों लोग अब भी उस दौर से बाहर नहीं आ पाये हैं और उसी तर्ज पर एक और समग्र क्रांति की प्रतीक्षा और प्रयास में हैं।

प्रभाष जोशी ने अपने पत्रकारिता जीवन की सबसे बडी उपलब्धि बताई कि अब भी वे अपने ही हाथ से लिखते हैं, उनकी लेखनी में कोई कलम नहीं लगती और एक बार में ही वे लिख जाते हैं और ऐसा सीधा लिखते हैं कि लोग उसे फोटो स्टेट तक कह जाते हैं। यह उपलब्धि कुछ बातों की ओर संकेत करती है इसमें कहीं न कहीं पत्रकारिता में विकसित हो रही नयी तकनीकों का पर व्यंग्य और इन नयी तकनीकों के आत्मसात न होने की जिद है। प्रभाष जी अपनी बातें साहित्यिक अन्दाज में लाक्षणिक अन्दाज में भी कहते हैं और उनका यह विचार उनकी इसी धारा का प्रतिनिधि है। प्रभाष जी के इस वक्तव्य से वैश्वीकरण से पत्रकारिता में आ रहे दो बदलावों की ओर संकेत जाता है एक तो बाजारोन्मुख पत्रकारिता और दूसरा तकनीक प्रधान पत्रकारिता। बाजारोन्मुख पत्रकारिता वैश्वीकरण के पूरे व्याकरण की ओर संकेत करती है जिसमें व्यापक बहस की गुंजायश है कि क्या वैश्वीकरण के चलते मूल्यों में बदलाव आ रहा है। दूसरा बदलाव तकनीक का है। यही दोनों बदलाव पिछले कुछ वर्षों में पूरे समाज में भी देखने को मिल रहे हैं कि मूल्यों में और तकनीक के स्तर पर बदलाव आया है।

अब इसमें प्रश्न यह है कि इन परिस्थितियों में क्या हो सकता है? सहज है कि तकनीक को अपनाया जाये और मूल्यों के बदलाव के कारणों पर विचार हो। अपने पूरे व्याख्यान में प्रभाष जी ने समस्यायें गिनाईं पर अपने स्तर से कोई समाधान नहीं सुझाया।

इसके पीछे प्रमुख कारण यह है कि तीनों ही लोग यानी प्रभाष जी , राम बहादुर राय जी और और गोविन्दाचार्य जी इस पूरी समस्या को एक आर्थिक ईकाई के रूप में ले रहे हैं और समाधान के मूल में व्यवस्थागत परिवर्तन को मानकर चल रहे हैं परंतु इस समस्या के मूल में और समाधान में आस्थागत पक्ष को छोड दिया गया है जो कि वैश्वीकरण से मुक्ति का मंत्र है। वर्तमान सन्दर्भ में आस्था को जिस प्रकार साम्प्रदायिकता से जोडकर उस पर बहस से बचने का प्रयास हो रहा है उससे ही सारी समस्या है।

परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है जो विचार समाज के बदलते स्वरूप के साथ अपने को आत्मसात नहीं करता वही कट्टरपंथी या फण्डामेंटलिस्ट कहा जाता है इसी कारण यदि आज प्रछन्न भोगवादी संस्कृति वैश्वीकरण के मूल में समाज में अपनी पकड बना रही है तो इसके पीछे हमारे द्वारा ही प्रदान की गयी शून्यता है जो हमने तथाकथित सेकुलरिज्म के नाम पर आस्था और धर्म को छोडकर समाज को प्रदान की है। आज कोई भी पत्रकार अपने जीवन में हिन्दू संस्कृति के मूल्यों, परम्पराओं और मान्यताओं के आधार पर आचरण नहीं कर सकता क्योंकि ऐसा करने पर उसे तथाकथित कुलीन बिरादरी का प्रमाणपत्र नहीं मिलेगा और उसके लिये सेकुलर होने का अर्थ धर्मविरोधी होना ही है। यही बात हर बौद्धिक व्यक्ति के सम्बन्ध में भी लागू होती है। अपनी आस्थाओं को छोडकर हमने समाज में एक शून्यता का वातावरण दिया जिसकी पूर्ति आज वैश्वीकरण के विचार और आचरण से हो रही है।

रामबहादुर राय जी ने देश की सभी समस्याओं का कारण भारत के संविधान को बताया परंतु यह भी स्थाई समाधान नहीं है आखिर कौन सा संविधान देश में आयेगा और वह संविधान किस मात्रा में वर्तमान संविधान से भिन्न होगा। क्या आज यह साहस किसी में है कि वह स्वामी विवेकानन्द की भाँति अमेरिका की छाती पर चढकर उसके धर्म की सारहीनता सिद्ध कर सके और उसे बता सके कि वैश्वीकरण का विचार स्वतंत्रता और समानता के भाव का विरोधी है। आज वैश्वीकरण के विरोध के नाम पर नये विचारों और नयी तकनीक से आतंक और पलायन का भाव रखने वाले लोग बडी मात्रा में इस आवाज में शामिल हो रहे हैं जिससे यह पूरा अभियान एक विभ्रम की स्थिति का निर्माण कर रहा है। वैश्वीकरण एक आधुनिक धर्म है जो सेकुलरिज्म के नाम पर नास्तिक और आस्थाहीन होने की प्रवृत्ति का परिणाम है। परंतु आज वैश्वीकरण के नाम पर चल रही बहस को पूरी तरह आर्थिक आधार पर चलाया जा रहा है और इसके समाधान भी आर्थिक और राजनीतिक आधार पर खोजे जा रहे हैं ऐसे में इस पूरे आन्दोलन के एक विचारधारा विरोधी दूसरी विचारधारा हो जाने के अवसर अधिक हैं।

श्री गोविन्दाचार्य जी ने अपने पूरे वक्तव्य में वैश्वीकरण के समाधान के रूप में लोभ, मोह और क्रोध से परे रहने की बात की परंतु यह तो तभी सम्भव है जब जीवन में आस्था और साधना हो और इसके लिये आवश्यक है कि नयी पीढी का जीवन धर्म प्रेरित हो और बहस इस बात पर हो कि समाज के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म का शासन हो और इस क्रम में सेकुलरिज्म की पश्चिमी अवधारणा और धर्म की भारत की परम्परा पर बहस हो। गोविन्द जी की बात से स्पष्ट था कि वे समाज में बढ्ती सामाजिक संवेदनहीनता हो अनुभव कर रहे हैं पर इसका भाव तो तभी आयेगा जब जीवन में धर्म होगा। आज विश्व के सभी प्रयोग असफल हो चुके हैं और वैश्वीकरण विचार के रूप में एक अंतिम पश्चिमी प्रयास है पर हमें याद रखना चाहिये कि इसमें तकनीक भी एक पक्ष है है और मार्केटिंग भी एक तकनीक है और वैश्वीकरण के इस पक्ष को स्वीकार करना चाहिये और इसके विचार से उपजी प्रछन्न भोगवादी संस्कृति को अपने धर्म के शस्त्र से काटना चाहिये।

Posted in Uncategorized | टैग की गईं: , , , , | Leave a Comment »

क्या हिन्दुओं का धैर्य जबाब दे रहा है?

Posted by amitabhtri on अगस्त 22, 2008

अपने विद्यालय के दिनों में मैने एक कहानी पढी थी जिसकी शिक्षा यह थी कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक है जहाँ से दूसरे की नाक आरम्भ होती है। अचानक यह कहानी पिछले दिनों तब याद आ गयी जब एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में कश्मीर को लेकर एक विशेष परिचर्चा आयोजित की गयी और उसका विषय था कि क्या अब कश्मीर आजादी के लिये तैयार है? इस कार्यक्रम की महिला प्रस्तोता ने देश के तीन तथाकथित उदारवादी लेखकों को इस सम्बन्ध में उद्धृत किया और वे लेखक है देश के अग्रणी अंग्रेजी समाचार पत्र के सम्पादक वीर सांघवी, एक और प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक में साप्ताहिक स्तम्भ लिखने वाले स्वामीनाथन अय्यर और प्रसिद्ध लेखिका अरुन्धती राय। इन तीनों ने एकस्वर से कहा कि अब समय आ गया है कि कश्मीर को आजाद कर दिया जाये क्योंकि बन्दूक के बल पर भारत सरकार इस राज्य को अपने पास नहीं रख सकती। टीवी पर कार्यक्रम देखकर और इन तीन तथाकथित बुद्धिजीवियों के विचार देखकर मन में एक ही प्रश्न उठ रहा था कि जम्मू में जो कुछ हो रहा है कहीं उस ओर से ध्यान हटाकर पूरे आन्दोलन पर एक दबाव बनाने के किसी बडे प्रयास का हिस्सा तो नहीं हैं ऐसे बयान। ऐसा सोचने के पीछे कुछ कारण हैं। जम्मू का विषय पूरी तरह भिन्न है और यह आन्दोलन किसी भी प्रकार मुस्लिम विरोधी या कश्मीर विरोधी नहीं है। इस आन्दोलन को धार्मिक आधार पर और पाकिस्तान के समर्थन में ध्रुवीक्रत करने का प्रयास कुछ देश विरोधी तत्व और पाकिस्तान परस्त तत्व कर रहे हैं और इस कार्य में उनका सहयोग लोकतंत्र और उदारवाद के नाम पर वे बुद्धिजीवी कर रहे हैं जिनका पिछला रिकार्ड भी किसी भी प्रकार देश में राष्ट्रवाद का विरोध करना रहा है। इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के सन्दर्भ में ही मुझे अपने बचपन में पढी कहानी की शिक्षा याद आ गयी। कश्मीर भारत की नाक है जो न केवल भारत का अभिन्न अंग है वरन वह एक बिन्दु है जो भारत के विभाजन के उपरांत भी देश में सही मायनों में पंथ निरपेक्षता की गारण्टी देता है और भारत की उस इच्छाशक्ति को प्रदर्शित करता है जो कश्मीर के निर्माण के बाद से ही उस पर धार्मिक आधार पर दावा करने वाली पाकिस्तानी मानसिकता को कुचलती रही है। आज उसी कश्मीर पर फिर सवाल उठाये जा रहे हैं तो क्या वास्तव में कश्मीर में कोई संकट है। निश्चित रूप से संकट है और आज जम्मू में जो भी आन्दोलन चल रहा है वह उसी समस्या की भयावहता की ओर संकेत करता है।

दुर्भाग्य का विषय है कि हमारे राजनेता और तथाकथित उदारवादी बुद्धिजीवी इस पूरी समस्या के मूल में झाँकने का प्रयास नहीं करते। जम्मू के आन्दोलन को भूमि का विवाद बताया जा रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है यह अस्तित्व की लडाई और अपने ही देश में बहुसंख्यक होकर भी असुरक्षा के भाव में जी रहे हिन्दुओं की हुँकार है। जम्मू में पूरा आन्दोलन देखने में तो एक भूमि विवाद लगता है पर यह जम्मू और कश्मीर के बीच पिछले साठ वर्षों से हो रहे विभेद और कश्मीरियत के नाम पर पूरे क्षेत्र के इस्लामीकरण के विरोध में मुखर आवाज है।

जम्मू में अमरनाथ की तीर्थ यात्रा को सुचारू रूप से संचालित करने के लिये जब अमरनाथ श्राइन बोर्ड को कुछ एकड की भूमि अस्थाई निर्माण के लिये पूरी सरकारी खानापूरी के बाद दी गयी तो इसे लेकर कश्मीर में देश विरोधी और पाकिस्तान परस्त तत्वों ने गलत प्रचार किया कि यह कश्मीर की भूजनाँकिकी बिगाड्ने का प्रयास है ताकि बाहर से लाकर लोगों को यहाँ बसाया जा सके। अस्थाई निर्माण के लिये दी जाने वाली भूमि के लिये इन तत्वों ने कहा कि यह धारा 370 का उल्लंघन है। इस झूठ के आधार पर कश्मीर के लोग सड्कों पर उतरे और पूरे राज्य में हिन्दुओं को 1989 का वह समय याद आ गया जब कुछ ही दिनों के नोटिस पर पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के उकसाने पर घाटी में जेहाद के स्वर गुंजायमान हुए थे और अपना सब कुछ छोड्कर 3 लाख से भी अधिक हिन्दुओं को अपने ही देश में शरणार्थी होने को विवश होना पडा। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने के मामले में कश्मीर में जिस प्रकार कट्टरपंथियों के आह्वान पर लोग सड्कों पर उतरे उससे एक बार फिर जम्मू के जिहादीकरण का भी खतरा उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था।

जम्मू के इस पूरे आन्दोलन को दो सन्दर्भों में समझने की आवश्यकता है। एक तो यह आन्दोलन स्थानीय विषय को लेकर जम्मू के लोगों में जमीन अमरनाथ श्राइन बोर्ड से जमीन वापस लेने के कारण इस अन्याय को लेकर उत्पन्न विक्षोभ का परिणाम था परंतु इस विषय से समस्त देश के हिन्दुओं का भाव जुड गया और पूरे देश में तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हो रहे मुस्लिम तुष्टीकरण के नग्न प्रदर्शन और एक प्रकार से इसके राजनीतिक शिष्टाचार बन जाने की हिन्दुओं की पीडा ने इस विषय के साथ पूरे देश को जोड दिया।

आधुनिक भारत के इतिहास में यह पहला अवसर है जब किसी स्वतःस्फूर्त आन्दोलन ने इतने लम्बे समय तक निरंतरता का प्रदर्शन किया है और हर बीतते हुए दिन में उसमें और भी प्रखरता आती गयी है। जो लोग इस आन्दोलन को भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रेरित मानकर चल रहे हैं उनके आकलन में भूल है और वे एक बार फिर देश में हो रहे परिवर्तन को या तो भाँप नहीं पा रहे हैं या फिर उन्हें हिन्दुओं के स्वभाव को लेकर कुछ गफलत है। जम्मू के आन्दोलन को जो भी सामयिक सन्दर्भ में इसकी व्यापकता के साथ अनुभव नहीं कर रहा है वह बडी भूल कर रहा है और दुर्भाग्य से यह भूल हर ओर से हो रही है। जम्मू का आन्दोलन कश्मीरियित के नाम पर हिन्दू विहीन घाटी और इस्लामीकरण के लिये मार्ग प्रशस्त करती जिहादी मानसिकता के विरुद्ध आन्दोलन है। आज जम्मू अपने अस्तित्व की लडाई लिये सड्कों पर उतरा है जो अपने भाग्य में 1989 का कश्मीर नहीं लिखना चाहता। जम्मू उन घटनाओं की पुनराव्रत्ति नहीं चाहता जो कश्मीर में हुई जब हिन्दुओं के मानबिन्दुओं का एक एक कर नाम बदला जाता रहा, धर्म स्थल बदले जाते रहे और अंत में हिन्दुओं को घाटी छोड्ने पर विवश कर दिया गया। जम्मू में जिस प्रकार अमरनाथ श्राइन बोर्ड को अस्थाई निर्माण के लिये दी जाने वाले जमीन को कश्मीर में अलगाववादियों ने इस्लाम से जोड्कर देखा और इस राज्य से सांसदों ने संसद में घोषणा कर दी कि वे जान दे देंगे पर जमीन नहीं देंगे वह स्पष्ट संकेत था कि अब जम्मू कश्मीर राज्य पर अलगाववादियों और जेहादियों का शासन चलता है जो पाकिस्तान के साथ मिलने का ख्वाब देखते हैं क्योंकि यह उनका अधूरा सपना है जो पाकिस्तान के निर्माण के बाद भी पूरा नहीं हो सका था।

जम्मू का आन्दोलन किसी भी प्रकार साम्प्रदायिक या घाटी विरोधी नहीं था पर जिस प्रकार कश्मीर के अलगाववादी नेता खुलेआम इस्लाम और पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाने लगे और पाकिस्तान का झंडा लहरा कर भारत का राष्ट्रीय ध्वज जलाने लगे वह इन तत्वों को बेनकाब करने के लिये पर्याप्त था। कश्मीर के अलगववादी तत्वों ने एक और झूठ बोला कि जम्मू के लोगों ने नाकेबन्दी कर दी है और कश्मीर के लोगों को अलग थलग किया जा रहा है जबकि सर्वदलीय बैठक में हिस्सा लेने गयी महबूबा मुफ्ती ने भी पाया था कि जम्मू कश्मीर हाईवे पर परिवहन संचालन सामान्य था। फिर ऐसे झूठ क्यों? इस पूरे मामले पर समझौतावादी रूख अपनाने के स्थान पर पूरे मामले को कश्मीर की आजादी से क्यों जोडा जाने लगा? ये कुछ प्रश्न हैं जो जम्मू के आन्दोलन के निहितार्थ की ओर संकेत करते हैं।

जम्मू के आन्दोलन को यदि व्यापक सन्दर्भ में समझने से परहेज किया गया तो पूरे भारत में इस प्रकार के आन्दोलन आरम्भ हो जायेंगे। क्योंकि जम्मू का आन्दोलन एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत करता है कि अब हिन्दुओं का धैर्य जबाब दे रहा है और अपने धार्मिक संस्कारों के चलते उनकी सहजता को उनकी कायरता माना जाने लगा है और जिहादी शक्तियाँ तथा उनकी सहायक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियाँ हिन्दुओं को अपने ही देश में अस्तित्व की लडाई लड्ने को विवश कर रही हैं। संतोष का विषय है कि जम्मू का आन्दोलन अभी तक शांतिपूर्ण है परंतु जिस प्रकार अहमदाबाद और बंगलोर में हुए विस्फ़ोटों के बाद सिमी का रहस्य सामने आया है और भारत के ही मुसलमानों को अपने राज्य और हिन्दुओं का खून बहाते लोग देख रहे हैं ऐसे में इस बात की कल्पना करना मूर्खता ही होगी कि हिन्दुओं का धैर्य असीम है और यह जबाब नहीं दे सकता। अच्छा हो कि हमारे नेता और बुद्धिजीवी जम्मू के आन्दोलन में छुपे रहस्यों और तेजी से समस्त देश में फैल रहे इस आन्दोलन के पीछे छुपी हिन्दुओं की अतीन्द्रिय मानसिकता का समझने का प्रयास करें।

Posted in Uncategorized | टैग की गईं: , , , , | 1 Comment »

सामाजिक सरोकारों से युक्त संत स्वामी अवधेशानन्द गिरि

Posted by amitabhtri on अगस्त 2, 2008

भारत एक धर्मप्राण देश है और इस देश में सर्वाधिक मान्यता संत परम्परा की है। देश की सनातन कालीन परम्परा में जब भी समाज को किसी भी दिशा में मार्गदर्शन की आवश्यकता हुई है तो उसने संत परम्परा की ओर देखा है और समाज को भी कभी निराश नहीं होना पडा। यूँ तो भारत में संतों के मार्गदर्शन की सम्पन्न परम्परा रही है परंतु आधुनिक समय में यदि किसी संत ने भारत के जनमानस और लोगों की अतीन्द्रियों को गहराई से प्रभावित किया है तो वह रहे हैं स्वामी रामक़ृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द। एक ओर रामकृष्ण परमहंस ने दिग्भ्रमित हो रही और अपनी संस्कृति के प्रति हीनभावना के भाव से व्याप्त होकर ईसाइयत की ओर समाधान देख रही बंगाल की नयी पीढी को अपनी साधना और अनुभूति के बल पर हिन्दू धर्म के साथ बाँध कर रखा और फिर उनकी प्रेरणा से नरेन्द्र का स्वामी विवेकानन्द के रूप में अभ्युदय हुआ जिसने पश्चिम की धरती से वेदांत का उद्घोष किया और सदियों से अपनी संस्कृति के प्रति हीनभावना संजोये भारतवासियों को एक सिंह का शौर्य दिया जिसने भारत के स्वाधीनता आन्दोलन और पुनर्जागरण की नींव रखी। स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा से पूरा भारत तेजस्वी, विचारवान और ऊर्जावान नवयुवकों की उर्वरा भूमि बन गया और इस परम्परा ने भारत को ऐसे निष्ठावान और वीर पुरुष दिये जिन्होंने न केवल भारत को वरन समस्त विश्व को नयी राह दिखाई।

आज भारत पुनर्जागरण की उस परम्परा से विमुख हो गया है और सर्वत्र निराशा का वातावरण सा छाता जा रहा है। जहाँ भी देखो निराशा, टूटन और अविश्वास है ऐसे में अवतारवादी मान्यता का यह देश एक बार फिर ईश्वर के अवतरण की प्रतीक्षा कर रहा है लेकिन क्या स्वामी विवेकानन्द ने यही पराक्रम और पुरुषार्थ बताया था। निश्चित रूप से नहीं उन्होंने हिन्दू धर्म की उस विलक्षण और उदात्त परम्परा का बोध कराया था जो नर के नारायण बनने की प्रक्रिया में विश्वास करती है। जो कहती है कि इस शरीर में वही परमात्मा वास करता है जो सृष्टि का संचालक भी है। आज इसी उदात्त परम्परा का ध्यान रखते हुए हमें अपने बीच में ही उन प्रेरणा पुरुषों को ढूँढना होगा जो देश के इस निराशा, व्याकुलता और पराजित की सी मानसिकता के धुन्ध को छाँट कर समाज को नयी दिशा दे सकें। क्या देश में संतों की इस विशाल परम्परा में ऐसा कोई संत नहीं दिखता जो सामाजिक सरोकार से जुडा हो, जिसकी दृष्टि इतनी व्यापक हो कि हिन्दू धर्म को वैश्विक परिदृश्य में देख सके और भारत ही नहीं वरन समस्त विश्व की समस्या का समाधान सुझा सके। इस लेखक ने अपनी अल्पबुद्धि के आधार पर ऐसे संत को ढूँढ निकाला है।

अभी पिछ्ले दिनों गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हरिद्वार में जूना अखाडा के आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। यह मुलाकात कुछ संयोग पर आधारित थी और उस दिन के बाद अनेक अवसरों पर काफी लम्बे अंतराल बिताने का अवसर उनके साथ प्राप्त हुआ। हरिद्वार में अपने आश्रम में उन्होंने गुरू पूर्णिमा के इस अवसर पर इजरायल के भारत के उप राजदूत और नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री कृष्ण प्रसाद भट्टराई को भी आमंत्रित किया था। यह पहला उदाहरण है जो उनकी व्यापक दृष्टि की ओर संकेत करता है। इजरायल के उच्चायुक्त को बुलाने के पीछे उनका उद्देश्य उस संकल्प को आगे बढाना था जो उन्होंने इस वर्ष के आरम्भ में इजरायल की यात्रा में प्रथम हिन्दू-यहूदी सम्मिलन के अवसर पर लिया था। इजरायल की निर्मिति के साठ वर्षों के उपलक्ष्य में इस देश ने एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया था और उस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व स्वामी जी ने किया था। इस सम्मेलन में भाग लेने के बाद स्वामी जी को इजरायल के प्रति लगाव उत्पन्न हुआ है और इसी का परिणाम है कि वे अनेक ऐतिहासिक समानताओं की पृष्ठभूमि में भारत और इजरायल की रणनीतिक और सांस्क़ृतिक मित्रता के लिये सामाजिक स्तर पर दोनों देशों में व्यापक समझ विकसित करना चाहते हैं। इसी पहल के पहले चरण के रूप में उन्होंने अपने श्रृद्धालुओं के मध्य इजरायल के उच्चायुक्त को बोलने का अवसर दिया और ऐसा पहला अवसर था जब सामान्य भारतवासियों के मध्य इजरायल के किसी प्रतिनिधि ने अपने देश की भावनायें प्रकट की। देखने में या सुनने में यह सामान्य घटना भले ही लगे परंतु इस विचार के पीछे के विचार को समझने की आवश्यकता है।

स्वामी अवधेशानन्द गिरि में अनेक सम्भावनायें दिखती हैं और ऐसी सम्भावनाओं के पीछे कुछ ठोस कारण भी हैं। पिछले कुछ दिनों में स्वामी जी को काफी निकट से देखने का और उन्हें परखने का अवसर भी मिला। देश के एक प्रसिद्ध अखाडे के प्रमुख होते हुए भी उनकी सोच सामान्य कर्मकाण्ड, पीठ को बढाने या फिर शिष्य़ परम्परा के विकसित होने में ही सारी ऊर्जा लगा देने के बजाय उनका ध्यान समाज, राष्ट्र और मानवता के कल्य़ाण के लिये ही अधिक रहता है। अनेक अवसरों पर उनसे बात करने और कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर उनसे चर्चा का अवसर मिला और इस अवसर में अनेक ऐसी बातें पता लगीं जो संत के एक सामाजिक सरोकार के पक्ष को प्रस्तुत करती है।

स्वामी अवधेशानन्द गिरि का जो सर्वाधिक योगदान समाज को है उसकी कथा झाबुआ से आरम्भ होती है। मध्य प्रदेश का एक अत्यंत पिछडा क्षेत्र जिसमें पानी का इतना अभाव है कि लोग छ्ह महीनों के लिये यह क्षेत्र छोडकर चले जाते है और अपने पीछे अपने मवेशियों को निस्सहाय छोड जाते हैं। स्वामी जी को इस क्षेत्र की इस समस्या के बारे में पाँच वर्ष पहले पता चला और उसी समय उन्होंने यहाँ एक प्रकल्प आरम्भ किया कि किस प्रकार यहाँ जलाभाव की स्थिति से निबटा जाये और इसके लिये बडे पैमाने पर शोध और अनुसन्धान हुए और पिछले पांच वर्षों में इस क्षेत्र की काया बदल गयी और अब यह क्षेत्र सोच भी नहीं सकता कि कभी यहाँ जल का अभाव था। लेकिन स्वामी जी का संकल्प इससे भी आगे है। इस क्षेत्र में शिक्षा और स्वालम्बन के प्रयास भी हो रहे हैं। अब इस संकल्प की चरम परिणति यह है कि इस क्षेत्र के लोग आदर्श व्यक्ति बन सकें और प्रत्येक दृष्टि से आत्मनिर्भर हों। इस क्षेत्र में किये गये प्रयासों का परिणाम है कि अब इस क्षेत्र में आक्रामक गति से हो रहा धर्मांतरण भी रुक गया है क्योंकि इस क्षेत्र में आस्था और श्रृद्धा जगाने के लिये लोगों के घरों में शिवलिंग की स्थापना की गयी और अनेक अद्भुत यज्ञ कराये गये।

स्वामी अवधेशानन्द गिरि में अधिक सम्भावनायें इस कारण दिखती हैं कि उन्होंने विश्व के समक्ष और भारत के समक्ष प्रस्तुत चुनौतियों को सही सन्दर्भ में लिया है। उनकी दृष्टि में विश्व में एक प्रवृत्ति तेजी से बढ रही है और वह है भण्डारण की प्रवृत्ति या अधिक से अधिक अपने अधिकार में वस्तुओं को ले लेने की प्रवृत्ति। लेकिन इसके लिये कुछ महाशक्तियों को दोष देने या प्रवचन तक सीमित रहने के स्थान पर उन्होंने इसका एक समाधान भी खोजा है। यह समाधान उनके स्वप्निल प्रकल्प अवधेशानन्द फाउण्डॆशन में है। कुल 130 एकड की परिधि का प्रस्तावित यह प्रकल्प वास्तव में अपने सांस्कृतिक बीजों के संरक्षण का महासंकल्प है। इस फाउण्डॆशन के द्वारा भारत की बहुआयामी संस्कृति का वास्तविक दर्शन हो सकेगा। विशुद्ध सांस्क़ृतिक परिवेश में, प्रकृति की छाँव में पर्यावरण के प्रदूषण से रहित विचार, अन्न और संस्कार प्राप्त शिशु जब युवक युवती बन कर यहाँ से निकलेंगे तो वे भारत की संस्कृति के ऐसे प्रचारक होंगे जो अपने-अपने क्षेत्रों में एक बहुमूल्य रत्न होंगे। यह फाउण्डेशन यहाँ निर्मित होने वाले बच्चों को इस बात के लिये प्रेरित करेगा कि वे अपनी संस्कृति के मूल्यों, भाषा, भूषा, भोजन के संरक्षण के साथ ही विश्व की परिस्थितियों, भाषा और संस्कृतियों से भी पूरी तरह भिज्ञ हों। निश्चय ही यह संकल्प हमें स्वामी विवेकानन्द के संकल्प की याद दिलाता है जिन्होंने निष्ठावान, चरित्रवान और संस्कृतिनिष्ठ युवकों के निर्माण को सभी समस्याओं का समाधान बताया था। यहाँ तक कि जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार ने भी देश की समस्याओं की ओर देखा तो उन्हें चरित्र निर्माण में ही राष्ट्र निर्माण का समाधान दिखा।

स्वामी अवधेशानन्द गिरि का यह संकल्प और यह प्रयास उन्हें सामान्य प्रवचन या समस्त बुराइयों के लिये पश्चिम की संस्कृति को दोष देते रहने के दायरे से बाहर लाकर व्यापक दायरे में लाता है जहाँ से वे राष्ट्र के भविष्य़ को भी सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहे है। स्वामी अवधेशानन्द गिरि के इस विशाल संकल्प की तुलना वर्तमान समय में किसी संकल्प से की जा सकती है तो वह स्वामी रामदेव के पतंजलि योगपीठ है। जिस प्रकार स्वामी रामदेव ने महर्षि पतंजलि की परम्परा को आगे बढाकर भारत की लुप्तप्राय हो रही चिकित्सा पद्धति और योग परम्परा को नवजीवन प्रदान कर भारत की प्राचीन संस्कृति का सातत्य प्रवाहमान किया ठीक उसी प्रकार स्वामी अवधेशानन्द गिरि भारत के संस्कारों और मूल्यों का बीज सुरक्षित रखने का गुरुतर कार्य करने जा रहे हैं। संकल्पों की इस समानता के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना अतिशियोक्ति नहीं होगी कि शायद यही महापुरुष सामाजिक सरोकार से जुडे वे संत हैं जो न केवल भारत वरन समस्त विश्व को नयी दिशा देने जा रहे हैं।

स्वामी अवधेशानन्द गिरि एक व्यावहारिक संत हैं जो परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालना जानते हैं और जटिल कर्मकाण्डों और आनुष्ठानिक संत होने के बाद भी विदेशों में अपनी लोकप्रियता अपनी गरिमा के साथ बनाये रख सके हैं। विदेश के अनेक देशों का दौरा वे इस विचार के साथ कर रहे हैं कि विदेश में बसे हिन्दुओं को सन्देश दे सकें कि उन्हें भारत को पितृऋण भी चुकाना है केवल डालर का निवेश करने से अपनी मातृभूमि के प्रति उनका कर्तव्य समाप्त नहीं हो जाता उन्हें इससे भी अधिक कुछ करने की आवश्यकता है। यह भी एक दैवीय योग है कि जब स्वामी विवेकानन्द ने पश्चिम की धरती से वेदांत का उद्घोष किया था तो उस समय भी भारत घोर निराशा के वातावरण में था और विश्व संकीर्ण साम्प्रदायिक तनाव की दहलीज पर था और आज भी देश और विश्व में कमोवेश वही स्थिति है। धर्म के नाम पर खून की नदियाँ बह रही हैं और क्रूरता, बर्बरता तथा पाशविकता को धर्म का दायित्व बताया जा रहा है। ऐसी स्थिति में विश्व को आध्यात्म रूपी ताजा हवा का झोंका चाहिये।

स्वामी अवधेशानन्द गिरि अपने संकल्पों , विचारों और प्रयासों से एक सुखद भविष्य का दर्शन कराते हुए दिखते हैं साथ ही उनकी ऊर्जा और सामाजिक सरोकार के प्रति उनकी उद्विग्नता उन्हें अनेक समस्याओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत करती है।

Posted in Uncategorized | Leave a Comment »

भारत के जिहादीकरण का खतरा

Posted by amitabhtri on जुलाई 27, 2008

भारत में पिछले 20 वर्षों के इस्लामी आतंकवाद के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब चौबीस घण्टे के भीतर दो प्रमुख शहरों में विस्फोट हुए। पहले 25 जुलाई को बंगलोर में कम क्षमता वाले सात श्रृखलाबद्ध विस्फोट हुए और फिर एक दिन बाद गुजरात की राजधानी अहमदाबाद को निशाना बनाया गया। बंगलोर के विस्फोट में जहाँ केवल एक महिला की मृत्यु हुई और कोई एक दर्जन लोग घायल हुए तो वहीं अहमदाबाद में कम क्षमता वाले विस्फोटों के बाद भी 39 लोगों के मारे जाने और 100 से अधिक लोगों के घायल होने का समाचार है।

बंगलोर में हुए विस्फोट को लेकर अधिक चिंतित सरकारें दिखी नहीं और कुछ समाचार पत्रों ने तो इसे आपराधिक गतिविधि तक की संज्ञा दे डाली। बंगलोर में हुए विस्फोट की गुत्थी सुलझ पाती इससे पहले अहमदाबाद में विस्फोट कर आतंकवादियों ने अपनी मंशा प्रकट कर दी। बंगलोर और फिर अहमदाबाद में हुए विस्फोट कुछ समानतायें दर्शाते हैं। ये विस्फोट नवम्बर 2007 में उत्तर प्रदेश में कुछ न्यायालय परिसर में हुए विस्फोट के समान ही हैं। पिछ्ले वर्ष उत्तर प्रदेश में हुए विस्फोट के बाद 13 मई को जयपुर में हुए विस्फोट और अब बंगलोर और अहमदाबाद में विस्फोटों में बडी समानता है। इन सभी विस्फोटों में साइकिल का प्रयोग हुआ, बम रखने के लिये टिफिन या प्रेशर कुकर का प्रयोग हुआ और इन सभी विस्फोटों में अमोनियम नाइट्रेट, नुकीले पदार्थो और जिलेटिन छडों का प्रयोग किया गया है। यह समानता कुछ संकेत देती है। एक तो यह कि अब अधिकतर विस्फोटों को अंजाम भारत में स्थानीय मुसलमान दे रहा है और बम की सामग्री या विस्फोटकों के निर्माण के लिये उसे पाकिस्तान की आई.एस.आई पर निर्भर नहीं होना पड रहा है अर्थात अब इन विस्फोटों को करने के लिये आर.डी.एक्स का आयात आवश्यक नहीं है। यह रूझान कुछ खतरनाक संकेत देता है। एक तो यह कि भारत सरकार का यह दावा बेमानी सिद्ध होता है कि सभी आतंकवादी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई या लश्कर और जैश का हाथ है और यह दावा कि भारत में मुसलमान वैश्विक जिहादी नेटवर्क से न तो जुडा है और न ही उस भाव से प्रभावित है।

बंगलोर में हुए विस्फोट की जिम्मेदारी तो किसी संगठन ने नहीं ली है परंतु अहमदाबाद में हुए विस्फोट की जिम्मेदारी उस इण्डियन मुजाहिदीन नामक अप्रचलित आतंकवादी संगठन ने ली है जो पहली बार चर्चा में तब आया था जब पिछले वर्ष नवम्बर में उत्तर प्रदेश में हुए विस्फोटों की जिम्मेदारी लेते हुए ईमेल मीडिया के लोगों को भेजा था। इसी संगठन ने जयपुर विस्फोटों की जिम्मेदारी लेते हुए जिहाद का एक घोषणा पत्र ही मीडिया को जारी किया। एक बार फिर जब इस संगठन ने अहमदाबाद में हुए विस्फोटों की जिम्मेदारी ली है और इसे गुजरात में हुए दंगों का प्रतिशोध बताया है तो पूरी स्थिति पर पुनर्विचार करने का अवसर आ गया है।

पिछले वर्ष नवम्बर में जब इण्डियन मुजाहिदीन ने उत्तर प्रदेश के अनेक न्यायालयों में श्रृखलाबद्ध विस्फोट किये थे तो इसका कारण घटना के कुछ दिन पूर्व जैश-ए-मोहम्मद के कुछ आतंकवादियों की लखनऊ में हुई गिरफ्तारी तथा मुम्बई बम काण्ड के आरोपियों के रूप में मुसलमानों को अधिक मात्रा में सजा देना साथ ही पिछ्ले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में हुए आतंकवादी आक्रमणों के आरोपी आतंकवादियों के पक्ष में पैरवी करने से वकीलों के इंकार करना माना गया था। यह एक ऐसा आतंकवादी आक्रमण था जो रणनीतिक दृष्टि से एक दम नया प्रयोग था और सीधे-सीधे न्यायपालिका को निशाना बनाया गया था। इसी प्रकार जयपुर में 13 मई को हुए विस्फोट के बाद इण्डियन मुजाहिदीन ने एक बार फिर विस्फोटों की जिम्मेदारी लेते हुए जिहाद का घोषणा पत्र मीडिया को भेजा और पहली बार हिन्दुओं की पूजा पद्धति के चलते उनको निशाना बनाने और इस्लामी उम्मा के साथ ही विदेश नीति और मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा की बातें की। एक बार फिर इस संगठन ने गुजरात के दंगों का प्रतिशोध लेने की बात कर भारत के मुसलमानों की सहानुभूति लेने का प्रयास किया है और जिहाद को चर्चा में लाने में सफलता प्राप्त की है। समाचारों के अनुसार इण्डियन मुजाहिदीन ने जिस प्रकार राजस्थान और मध्य प्रदेश सरकार को चेतावनी दी है कि वह सिमी के कार्यकर्ताओं को छोड दे अन्यथा अपने राज्यों मे आतंकवादी आक्रमणों के लिये तैयार रहे वह भी एक खतरनाक संकेत है और यह राज्य और प्रशासन पर दबाव डालने और अपनी माँगें मनवाने के साथ ही मुस्लिम जिहादी तत्वों की सहानुभूति प्राप्त कर अधिक भर्ती के लिये नये मुसलमानों को प्रेरित करने का प्रया भी है।

इण्डियन मुजाहिदीन ने जो सदेश मीडिया को भेजा है उसमें बाम्बे स्टाक एक्स्चेंज को निशाना बनाने और अग्रणी उद्योगपति मुकेश अम्बानी को भी निशाने पर लेने की बात की है। बंगलोर में जिस प्रकार विस्फोट हुए और मुम्बई में स्टाक एक्सचेंज सहित मुकेश अम्बानी पर भी आक्रमण करने की बात इस्लामी आतंकवादी संगठनों ने की है उसके अपने निहितार्थ हैं। जयपुर में हुए विस्फोट के बाद इस संगठन ने जो सन्देश मीडिया को भेजा था उसमें यह भी कहा था कि मुस्लिम विरोधी सरकारों और राजनीतिक दलों को धन और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का परिणाम उद्योगपतियों और आम जनता को ऐसे विस्फोटो के रूप में भुगतना पडेगा।

जयपुर में भयानक विस्फोटों के बाद जिस प्रकार दो माह से कम समय में इस्लामी आतंकवादियों ने चौबीस घण्टे के भीतर देश के दो आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न शहरों को निशाना बनाया है उससे स्पष्ट है कि खतरा अब पडोसी देश से नहीं वरन भारत के भीतर ही एक मुस्लिम वर्ग से है जो वैश्विक जिहाद से जुड गया है और कभी भी कहीं भी आक्रमण या विस्फोट करने की क्षमता रखता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इस समस्या को सही सन्दर्भ में देखा जाये और इसे देश पर आक्रमण मान कर अपने शत्रुओं की पहचान कर ली जाये।

देश में इस्लामी आतंकवाद की परम्परा रही है और इसके प्रति सरकारों और बुद्धिजीवियों के शुतुरमुर्गी रवैये की परम्परा भी रही है। आज भी जब यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है कि पिछले चार वर्षों में भारत में जितने भी विस्फोट हुए हैं उसमें सिमी और स्थानीय मुस्लिम समुदाय का सक्रिय योगदान रहा है फिर भी हमारी सरकार बिना कोई प्रमाण लाये लश्कर, जैश और आई.एस.आई के मत्थे दोष मढ देती है। यह बात किसी को भी आश्चर्यजनक लग सकती है कि भारत में आतंकवादी गतिविधियों में पाकिस्तान को दोषी कैसे न माना जाये पर अब भारत के जिहादीकरण का खतरा उत्पन्न हो गया है और हमने 13 दिसम्बर 2001 को संसद पर हुए आक्रमण के बाद पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कार्रवाई न करके एक बडा अवसर खो दिया था अब भारत में आतंकवाद का व्याकरण बदल गया है और भारत में विस्फोटों के लिये पाकिस्तान को हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है अब भारत में मुसलमानों का एक बडा वर्ग जिहाद से प्रेरित है और वह स्वयं भारत के विरुद्ध जिहाद में लिप्त है। यह जिहाद पूरी तरह वैश्विक जिहादवाद से प्रेरित है और मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा, अमेरिका और इजरायल के साथ भारत की बढ्ती निकटता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुरान और शरियत के आधार पर एक काल्पनिक विश्व व्यवस्था के निर्माण का संकल्प इस जिहादवाद को प्रेरित कर रहा है और इस विचार से प्रभावित होने वाले मुसलमानों की संख्या निरंतर बढ रही है।

एक अजीब विडम्बना है कि देश में कुछ प्रमुख इस्लामी संगठनों ने पिछ्ले कुछ महीनों में इस्लामी आतंकवाद की निन्दा और इसे इस्लाम से पूरी तरह असम्पृक्त करने के प्रयास किये हैं। इस क्रम में देश के प्रमुख इस्लामी संगठनों ने अलग-अलग प्रयासों के द्वारा कई बार आतंकवाद विरोधी सम्मेलन तक आयोजित किये परंतु इन सम्मेलनों के बाद से इस्लामी आतंकवादी घटनाओं में तीव्रता आ गयी है। आखिर ऐसे प्रयासों का क्या लाभ जो आतंकवादी घटनायें रोकने में असफल है। ऐसे प्रयासों को गम्भीरता पूर्वक आतंकवाद रोकने के प्रयास के बजाय इस्लाम की छवि को ठीक करने और मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा को न्यायसंगत ठहराने के प्रयासों के रूप में अधिक लेने की आवश्यकता है।

इस्लामी आतंकवाद की इस परिपाटी का नया आयाम हमारे समक्ष सामने आ रहा है जब आतंकवाद का नया गुरुत्व केन्द्र दक्षिण एशिया बनता जा रहा है। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुए विनाशकारी आक्रमण के पश्चात अमेरिका ने बौद्धिक और प्रशासनिक तौर पर इस समस्या को नये सन्दर्भ में लिया और इसे एक युद्ध माना यही तथ्य यूरोप के विषय में भी सत्य है और यही कारण है कि मैड्रिड और लन्दन में हुए विस्फोटों के बाद ये देश भी आतंकवादी घटनाओं में अपने निर्दोष लोगों की जान बचाने में सफल रहे हैं। इसके विपरीत हमारा देश प्रत्येक तीन महीने में सैकडों लोगों की जान दाँव पर लगाता है पर इस समस्या को एक आपातकालीन स्थिति मानकर उस प्रकार की नीतियाँ नहीं बनाता। आश्चर्य तो तब होता है जब आतंकवाद प्रतिरोध के विशेषज्ञ बी रमन जैसे लोग भी मान लेते हैं कि भारत की सरकार को मुसलमानों को विश्वास दिलाना चाहिये कि न्याय व्यवस्था में उनके साथ न्याय होगा। साथ ही वे यह ही स्वीकार करते हैं कि भारत इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिका जैसा जवाब नहीं दे सकता क्योंकि भारत मुस्लिम पडोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से घिरा है और भारत में मुसलमान 15 प्रतिशत से अधिक है और कुलमिलाकर इन देशों में मुस्लिम जनसंख्या 57 प्रतिशत होती है। बी रमन के विश्लेषण से यही निष्कर्ष निकलता है कि वह भी मानते हैं कि इस्लामी आतंकवाद एक विचारधारागत विषय है जिसके साथ इस दक्षिण एशिया का मुसलमान बडी मात्रा में जुडा है। आज आवश्यकता है कि इस समस्या से मुँह चुराने के स्थान पर इस पर बहस हो और आतंकवाद के इस्लामी स्वरूप और इस्लामी प्रेरणा के कारणों को जानने के साथ ही इसकी महत्वाकाँक्षा को दबाया जाये।

Posted in Uncategorized | टैग की गईं: , , , , | 3 Comments »

भारत के इस्लामीकरण का खतरा

Posted by amitabhtri on जून 30, 2008

अभी कुछ दिनों पूर्व जब मैंने अपने एक मित्र और नवसृजित राजनीतिक आन्दोलन युवादल के राष्ट्रीय संयोजक विनय कुमार सिंह के साथ पश्चिम बंगाल की यात्रा की तो भारत पर मँडरा रहे एक बडे खतरे से सामना हुआ और यह खतरा है भारत के इस्लामीकरण का खतरा। पश्चिम बंगाल की हमारी यात्रा का प्रयोजन हिन्दू संहति के नेता तपन घोष सहित उन 15 लोगों से मिलना था जिन्हें 12 जून को हिन्दू संहति की कार्यशाला पर हुए मुस्लिम आक्रमण के बाद हिरासत में ले लिया गया था। तपन घोष को गंगासागर और कोलकाता के मध्य डायमण्ड हार्बर नामक स्थान पर जेल में रखा गया था। हम अपने मित्र के साथ 23 जून को कोलकाता पहुँचे और दोपहर में पहुँचने के कारण उस दिन तपन घोष से मिलने का कार्यक्रम नहीं बन सका और हमें अगली सुबह की प्रतीक्षा करनी पडी। अगले दिन प्रातः काल ही हमने सियालदह से लोकल ट्रेन पकडी और डायमण्ड हार्बर के लिये रवाना हो गये। कोई दो घण्टे की यात्रा के उपरांत हम अपने गंतव्य पर पहुँचे और जेल में तपन घोष सहित सभी लोगों से भेंट हुई जिन्हें अपने ऊपर हुए आक्रमण के बाद भी जेल में बन्द कर दिया गया था। जेल में हुई भेंट से पूर्व जो सज्जन हमें तपन घोष से मिलाने ले गये थे उन्होंने बताया कि हिन्दुओं का विषय उठाने के कारण उन्हें भी जेल में महीने भर के लिये बन्द कर दिया गया था परंतु उन्होंने जेल के अन्दर की जो कथा सुनाई उससे न केवल आश्चर्य हुआ वरन हमें सोचने को विवश होना पडा कि भारत के इस्लामीकरण का मार्ग प्रशस्त हो रहा है।

भारत के इस्लामीकरण की सम्भावना व्यक्त करने के पीछे दो कारण हैं जो स्थानीय तथ्यों पर आधारित हैं। एक तथ्य तो यह कि 12 जून को जो आक्रमण हिन्दू संहति की कार्यशाला पर हुआ उसमें अग्रणी भूमिका निभाने वाले व्यक्ति का नाम इस्माइल शेख है जिसका गंगासागर क्षेत्र में दबदबा है और यही व्यक्ति आस पास के क्षेत्रों में जल की आपूर्ति कर करोडों रूपये बनाता है पर बदले में इसकी शह पर गंगासागर से सटे क्षेत्रों में खुलेआम गोमांस की बिक्री होती है। एक ओर जहाँ देश के अन्य तीर्थ स्थलों में गोमांस की बिक्री निषिद्ध है वहीं यह क्षेत्र इसका अपवाद है क्योंकि पूरे गंगासागर में मस्जिदों का जाल है और इस्माइल शेख की दादागीरी है। रही सही कसर कम्युनिष्ट सरकार ने पूरी कर दी है और यहाँ तीर्थ कर लगता है। गंगासागर में प्रवेश करने के बाद आंखों के सामने मुगलकालीन दृश्य उपस्थित हो जाता है और ऐसा प्रतीत होता है मानों इस्लामी क्षेत्र में हिन्दू अपने लिये तीर्थ की भीख माँग रहा है।

इससे पूर्व जब लोकमंच पर इस घटना के सम्बन्ध में लिखा गया था तो आशंका व्यक्त की गयी थी कि यह पहला अवसर है जब पश्चिम बंगाल में कम्युनिष्ट और इस्लामवादियों ने मिलकर किसी हिन्दू तीर्थ पर आक्रमण किया है। पश्चिम बंगाल की यात्रा के बाद यह आशंका पूरी तरह सत्य सिद्ध हुई जब कोलकाता से गंगासागर तक पड्ने वाले क्षेत्रों की भूजनांकिकीय स्थिति के बारे में लोगों ने बताया। कुछ क्षेत्र और जिले तो ऐसे हैं जहाँ दस वर्षों में जनसंख्या की वृध्दि की दर 200 प्रतिशत रही है। कभी कभार कुछ जिलाधिकारियों या आईएएस अधिकारियों ने अपनी ओर से अपने क्षेत्र की जनसंख्या का हिसाब कर लिया और जिन लोगों ने इस विषय़ में अधिक रुचि दिखाई उनका स्थानांतरण कर दिया गया। फिर भी भगोने के एक चावल से पूरे चावल का अनुमान हो जाता है और उस अनुमान के आधार पर कहा जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में इस समय जनसंख्या का अनुपात पूरी तरह बिगड गया है और इसका सीधा असर इस्लामवादियों की आक्रामकता में देखा जा सकता है।

मुस्लिम घुसपैठियों की जनसंख्या से जहाँ एक ओर इस राज्य के इस्लामीकरण का खतरा उत्पन्न हो गया है वहीं कम से 1 करोड हिन्दू इस राज्य में ऐसा है जिसे देश या राज्य के नागरिक का दर्जा नहीं मिला है, एक ओर जहाँ बीते दशकों में बांग्लादेशी घुसपैठियों का स्वागत इस राज्य में राजनीतिक दलों ने दोनों हाथों में हार लेकर किया है वहीं 1971 के बाद से बांग्लादेश से आयए हिन्दुओं का नाम भी मतदाता सूची में नहीं है और यदि उन्हें नागरिक का दर्जा दिया भी गया है तो पिता का नाम हटा दिया गया है। इस पर तीखी टिप्पणी करते हुए एक बंगाल के हिन्दू ने कहा कि हमें तो सरकार ने “हरामी” बना दिया और बिना बाप का कर दिया। लेकिन इस ओर किसी भी राजनीतिक दल का ध्यान नहीं जाता। यही नहीं तो एक बडा खतरा यह भी है कि मुस्लिम घुसपैठी न केवल मतदाता सूची में अंकित हैं, या उनके पास राशन कार्ड है उन्होंने अपना नाम भी हिन्दू कर लिया है और सामान्य बांग्लाभाषियों के साथ घुलमिल गये हैं। यह इस्लामी आतंकवादियों और इस्लामवादियों के सबसे निकट हैं जो कभी भी राज्य की सुरक्षा और धार्मिक सौहार्द के लिये खतरा बन सकते हैं।

ऐसा नहीं है कि इस असहिष्णुता का असर देखने को नहीं मिल रहा है। जेल में एक माह बिता चुके एक हिन्दू नेता ने बताया कि डायमण्ड हार्बर जेल में 7 नं. की कोठरी ऐसी है जिसमें केवल मुसलमान कैदी हैं और उन्होंने अपनी कोठरी के एक भाग को कम्बल से ढँक रखा है और उसे “ कम्बल मस्जिद” का नाम दे दिया है। इस क्षेत्र के आसपास के स्नानागार और शौचालय में काफिरों को जाने की अनुमति नहीं है तो यही नहीं हिन्दुओं को ये लोग इस कदर परेशान करते हैं कि उन्हें शौचालय में अपने धर्म के विपरीत दाहिने हाथ का प्रयोग करने पर विवश करते हैं। मुस्लिम कैदियों की एकता और जेल के बाहर उनकी संख्या देखकर जेल प्रशासन भी उनकी बात मानने और उन्हें मनमानी करने देने के सिवा कोई और चारा नहीं देखता।

पश्चिम बंगाल में जिन दिनों हम यात्रा पर थे उन्हीं दिनों जम्मू कश्मीर में अमरनाथ यात्रा को लेकर चल रहे विवाद के बारे में भी सुना। जेल में तपन घोष से मिलने के बाद जब हम किसी घर में भोजन कर रहे थे तो टेलीविजन पर अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने के मामले पर चल रहे विरोध प्रदर्शन पर कश्मीर घाटी के पूर्व आतंकवादी और जेकेएलएफ के प्रमुख यासीन मलिक का बयान आ रहा था कि अमरनाथ यात्रा का प्रबन्धन पिछले अनेक वर्षों से मुस्लिम हाथों में है और इसकी रायल्टी से कितने ही मुस्लिम युवकों को रोजगार मिलता है। कितना भोंडा तर्क है यह कि हिन्दू तीर्थ यात्रा का प्रबन्धन मुस्लिम हाथों में हो क्या ये मुसलमान अजमेर शरीफ का प्रबन्धन, वक़्फ बोर्ड का प्रबन्धन, हज का प्रबन्धन हिन्दू हाथों में देंगे तो फिर अमरनाथ यात्रा का प्रबन्धन मुस्लिम हाथों में क्यों क्योंकि कश्मीर मुस्लिम बहुल है और मुस्लिम कभी सद्भाव से रहना जानता ही नहीं।

अमरनाथ यात्रा को लेकर जो विवाद श्राइन बोर्ड को राज्यपाल द्वारा दी गयी जमीन से उठा था उसकी जडें काफी पुरानी हैं। 2005 में भी जब तत्कालीन राज्यपाल ने अमरनात यात्रा की अवधि बढाकर 15 दिन से दो माह कर दी थी तो भी तत्कालीन पीडीपी मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने इसका विरोध कर इस प्रस्ताव को वापस यह कहकर किया था कि प्रदूषण होगा और सुरक्षा बलों को यात्रा में लगाना पडेगा जिससे कानून व्यवस्था पर असर होगा। बाद में सहयोगी कांग्रेस के दबाव के चलते मुफ्ती को झुकना पडा था और यात्रा की अवधि बढ गयी थी। इसी प्रकार मुख्यमंत्री रहते हुए मुफ्ती ने राज्यपाल एस.के.सिन्हा के कई निर्णयों पर नाराजगी जतायी थी। मुफ्ती ने कुछ महीने पूर्व जम्मू कश्मीर में पाकिस्तानी मुद्रा चलाने का भी सुझाव दिया था तो पीडीपी की अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती तो खुलेआम पाकिस्तान की भाषा बोलती हैं। ऐसे में अमरनाथ यात्रा को लेकर हुआ विवाद तो बहाना है असली निशाना तो कश्मीर का इस्लामीकरण है। कश्मीर का इस्लामीकरण पूरी तरह हो भी चुका है कि वहाँ की सरकार ने घुट्ने टेक दिये और इस्लामी शक्तियों की बात मान ली। परंतु कश्मीर में हुए इस विरोध और सरकार को झुका लेने के इस्लामी शक्तियों के अभियान के अपने निहितार्थ है और ऐसे ही प्रयास स्थानीय विषयों को लेकर प्रत्येक मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में होंगे। पश्चिम बंगाल, असम, बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र अब अगले निशाने पर होंगे जब वहाँ से एक और पाकिस्तान की माँग उठेगी। इससे पूर्व कि भारत के इस्लामीकरण का मार्ग प्रशस्त हो और देश धार्मिक आधार पर कई टुकडों में विभाजित हो जाये हमें अपनी कुम्भकर्णी निद्रा त्याग कर इस्लाम के खतरे को पहचान लेना चाहिये जो अब हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।

Posted in Uncategorized | टैग की गईं: , , | 9 Comments »

गंगासागर की घटना से उभरे कुछ प्रश्न

Posted by amitabhtri on जून 21, 2008

दिनाँक 12 जून को पश्चिम बंगाल के सुदूर क्षेत्र में एक ऐसी घटना घटी जो सामान्य लोगों के लिये सामान्य नहीं थी पर उस राज्य के लिये सामान्य से भी सामान्य थी। हिन्दू संहति नामक एक हिन्दू संगठन द्वारा “वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिवेश” विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया और उस कार्यशाला पर कोई 6,000 की मुस्लिम भीड ने आक्रमण कर दिया और इस कार्यशाला में शामिल सभी 180 लोगों पर पत्थर और गैस सिलिंडर फेंके। इस घटना में अनेक लोग घायल भी हुए और यहाँ तक कि जो 10 पुलिसवाले कार्यशाला में फँसे लोगों को बचाने आये उनकी जान के भी लाले पड गये। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार यह भीड प्रायोजित थी और कुछ स्थानीय कम्युनिष्ट कैडर द्वारा संचालित थी। लोगों का कहना है कि एक स्थानीय कम्युनिष्ट नेता जो अभी हाल में सम्पन्न हुए पंचायत चुनावों में पराजित हो गये हैं उन्होंने इस पूरे मामले को साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास किया और स्थानीय मुसलमानों को भडकाने और एकत्र करने में सक्रिय भूमिका निभाई।

आसपास के लोगों का कहना है कि मामला ऐसे आरम्भ हुआ कि कार्यशाला में भाग लेने आये प्रतिभागी गंगासागर से स्नान करके कार्यशाला आटो से लौट रहे थे और उत्साह में नारे लगा रहे थे। आटो चलाने वाला मुस्लिम समुदाय से था और उसे भारतमाता की जय, वन्देमातरम जैसे नारों पर आपत्ति हुई और उसने आटो में बैठे लोगों से नारा लगाने को मना किया साथ ही यह भी धमकी दी कि, “ तुम लोग ऐसे नहीं मानोगे तुम्हारा कुछ करना पडेगा” इतना कहकर वह स्थानीय मस्जिद में गया और कोई दस लोगों की फौज लेकर कार्यशाला स्थल वस्त्र व्यापारी समिति धर्मशाला में ले आया। इन लोगों ने कार्यशाला में जबरन प्रवेश करने का प्रयास किया तो दोनों पक्षों में टकराव हुआ और यह हूजूम चला गया। कुछ ही समय के उपरांत हजारों की संख्या में मुस्लिम समुदाय और कम्युनिष्ट कैडर मिलाकर एकत्र हो गया और कार्यशाला को घेर लिया तथा पत्थर और जलता गैस सिलिंडर कार्यशाला के अन्दर फेंकना आरम्भ कर दिया।

कार्यशाला और भीड के बीच कुछ घण्टों तक युद्ध का सा वातावरण रहा और कार्यशाला में अन्धकार था जबकि भीड प्रकाश में थी। भीड अल्लाहो अकबर का नारा माइक से लगा रही थी। कार्यशाला के प्रतिरोध के चलते भीड को कई बार पीछे की ओर भागना पडा। इस संघर्ष के कुछ देर चलते रहने के बाद दस पुलिसकर्मी आये और उनके भी जान के लाले पड गये। पुलिस टीम का प्रमुख तो प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बंगाली में कह रहा था कि, “ बचेंगे भी कि नहीं” ।

घटनाक्रम किस प्रकार समाप्त हुआ किसी को पता नहीं। पुलिस के हस्तक्षेप से या स्वतः भीड संघर्ष से थक गयी यह स्पष्ट नहीं है। परंतु बाद में पुलिस से एकतरफा कार्रवाई की और भीड को साक्षी बनाकर हिन्दू संहति के प्रमुख तपन घोष पर अनेक धाराओं के अंतर्गत मुकदमा लगा दिया और गैर जमानती धाराओं में जेल भेज दिया। जिस प्रकार पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई की उससे इस पूरे मामले के पीछे राजनीतिक मंशा और नीयत स्पष्ट है।

इस पूरे घटनाक्रम से कुछ मूलभूत प्रश्न उभरते हैं। जिनका उत्तर हमें स्वयं ढूँढना होगा। एक तो यह घटना मीडिया पर बडा प्रश्न खडा करती है और दूसरा देश में हिन्दुत्व के विरोध में संगठित हो रही शक्तियों पर। गंगासागर जैसे हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थस्थल पर इतना विशाल साम्प्रदायिक आक्रमण हुआ और तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया संवेदनशून्य बना रहा है। आखिर क्यों? इसके पीछे दो कारण लगते हैं।

एक तो पश्चिम बंगाल में कम्युनिष्टों के खूनी इतिहास को देखते हुए यह कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं थी क्योंकि इसमें कोई मृत्यु नहीं हुई थी। दूसरा इस विषय को उठाने का अर्थ था कि किसी न किसी स्तर पर इस पूरे मामले की समीक्षा भी करनी पड्ती और इस समीक्षा में पश्चिम बंगाल में उभर रहे हिन्दुत्व का संज्ञान भी लेना पडता जिसके लिये भारत का मीडिया तैयार नहीं है।

तो क्या माना जाये कि मीडिया अब यथास्थितिवादी हो गया है और वामपंथ का सैद्धांतिक विरोध करने को तैयार नहीं है। या फिर यह माना जाये कि देश में अब उस स्तर की पत्रकारिता नहीं रही जो किसी परिवर्तन की आहट को पहचान सके। यही भूल भारत की पत्रकारिता ने 2002 में गोधरा के मामले को लेकर भी की थी और सेकुलरिज्म के चक्कर में जनता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति को भाँप न सकी थी। देश में हिन्दू- मुस्लिम समस्या बहुत बडा सच है और इससे मुँह फेरकर इसका समाधान नहीं हो सकता। शुतुरमुर्ग के रेत में सिर धँसाने से रेत का तूफान नहीं रूकता और न ही कबूतर के आंख बन्द कर लेने से बिल्ली भाग जाती है। आज भारत का मीडिया अनेक जटिल राष्ट्रीय मुद्दों पर पलायनवादी रूख अपना रहा है। इसका सीधा प्रभाव हमें मीडिया के वैकल्पिक स्रोतों के विकास के रूप में देखने को मिल रहा है।

गंगासागर में हुई इस घटना का उल्लेख किसी भी समाचारपत्र ने नहीं किया परंतु अनेक व्यक्तिगत ब्लाग और आपसी ईमेल के आदान प्रदान से यह सूचना समस्त विश्व में फैल गयी और लोगों ने पश्चिम बंगाल में स्थानीय प्रशासन को हिन्दू संहति के नेता तपन घोष की कुशल क्षेम के लिये सम्पर्क करना आरम्भ कर दिया। परंतु यह विषय भी अंग्रेजी ब्लागिंग तक ही सीमित रहा और इस भाषा में जहाँ यह विषय छाया रहा वहीं हिन्दी ब्लागिंग में इसके विषय में कुछ भी नहीं लिखा गया। हिन्दी ब्लागिंग में अब भी काफी प्रयास किये जाने की आवश्यकता और मीडिया का विकल्प बनने के लिये तो और भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है। लेकिन जिस प्रकार अंग्रेजी ब्लागिंग जगत ने तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया की उपेक्षा के बाद भी गंगासागर में आक्रमण के विषय को अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया उससे यह बात तो साफ है कि मुख्यधारा के मीडिया अनुत्तरदायित्व और पलायनवादी रूख से उत्पन्न हो रही शून्यता को भरने के लिये ब्लागिंग पत्रकारिता की विधा के रूप में विकसित हो सकती है और इसके सम्भावनायें भी हैं।

गंगासागर में हिन्दू मुस्लिम संघर्ष या जिहादी आक्रमण से एक और गम्भीर प्रश्न उभर कर सामने आया है और वह है इस्लामवादी-वामपंथी मिलन का। गंगासागर की घटना के आसपास ही समाचारपत्रों में समाचार आया था कि केरल राज्य में माओवादियों और इस्लामवादियों ने बैठक कर यह निर्णय लिया है कि वे तथाकथित “ राज्य आतंकवाद”, “ साम्राज्यवाद” और हिन्दूवादी शक्तियो” के विरुद्ध एकजुट होकर लडेंगे। गंगासागर में हिन्दू कार्यशाला पर हुआ मुस्लिम- कम्युनिष्ट आक्रमण इस गठजोड का नवीनतम उदाहरण है। गंगासागर पर आक्रमण के अपने निहितार्थ हैं। यह तो निश्चित है कि इतनी बडी भीड बिना योजना के एकत्र नहीं की जा सकती और यदि यह स्वतः स्फूर्त भीड थी तो और भी खतरनाक संकेत है कि हिन्दू तीर्थ पर आयोजित किसी हिन्दू कार्यशाला पर आक्रमण की खुन्नस काफी समय से रही होगी। जो भी हो दोनों ही स्थितियों में यह एक खतरे की ओर संकेत कर रहा है।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है किसी भी समुदाय या संगठन को देश की वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर विचार विमर्श का अधिकार है और यदि इस अधिकार को आतंकित कर दबाने का प्रयास होगा और राजसत्ता उसका समर्थन करेगी तो स्थिति कितनी भयावह होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। गोधरा के सम्बन्ध में ऐसी स्थिति का सामना हम पहले कर भी चुके हैं फिर भी कुछ सीखना नहीं चाहते।

आज देश के सामने इस्लामी आतंकवाद अपने भयावह स्वरूप में हमारे समक्ष है अब यदि उसका रणनीतिक सहयोग देश के एक और खतरे माओवाद और कम्युनिज्म के नवीनतम संस्करण से हो जाता है तो उसका प्रतिकार तो करना ही होगा। यदि प्रशासन और सरकार या देश का बुद्धिजीवी समाज या फिर मीडिया जगत इस रणनीतिक सम्बन्ध की गम्भीरता को समझता नहीं तो इसकी प्रतिरोधक शक्तियों का सहयोग सभी को मिलकर करना चाहिये। अच्छा हो कि गंगासागर से उभरे प्रश्नों का ईमानदार समाधान करने का प्रयास हम करें।

Posted in Uncategorized | टैग की गईं: , , , | 2 Comments »

बराक ओबामा की उम्मीदवारी

Posted by amitabhtri on जून 10, 2008

अमेरिका में राष्ट्रपति पद के प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया लगभग पूर्ण हो चुकी है और यह तय हो गया है कि रिपब्लिकन और डेमोक्रेट की ओर से क्रमशः प्रत्याशी कौन होगा। रिपब्लिकन की ओर से जान मैक्केन का नाम काफी पहले ही घोषित हो गया था और डेमोक्रेट में काँटे की टक्कर चल रही थी कि बराक ओबामा और हिलेरी क्लिंटन के बीच कौन बाजी मार ले जाता है। अंततोगत्वा अफ्रीकी अमेरिकी समुदाय के बराक ओबामा को डेमोक्रेट प्रत्याशी बनने में सफलता प्राप्त हुई। बराक ओबामा के प्रत्याशी बनने की सम्भावनाओं के मध्य ही अनेक कथायें सामने आ रही थीं। अब जबकि बराक ओबामा अमेरिका में अश्वेत होकर भी देश के सर्वोच्च पद के लिये चुनाव लड्ने जा रहे हैं तो इस रूझान के अनेक अंतरराष्ट्रीय मायने भी हैं। एक ओर इसे अमेरिका में ऐंग्लो सेक्शन समुदाय के वर्चस्व के समापन का आरम्भ तक भी मान कर चला जा रहा है तो वहीं इसे लेकर विश्व में अमेरिका पूँजीवादी प्रभुत्व के लिये भी एक चुनौती मानकर चला जा रहा है। भारत के लोगों की अमेरिका की राजनीति में प्रत्यक्ष कोई भूमिका नहीं है परंतु इस बार भारत में अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर जिज्ञासा काफी प्रबल है।

जब अमेरिका में दो प्रमुख दलों की ओर से प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया चल रही थी उसी समय से भारत में बराक ओबामा को लेकर काफी उत्साह का वातावरण था। अब जबकि यह निश्चित हो गया है कि ओबामा नवम्बर के चुनाव में रिपब्लिकन जान मैक्केन को टक्कर देंगे तो ओबामा के सम्बन्ध में दंतकथाओं का सिलसिला तेज हो गया है।

भारत मूल रूप से एक भावुक देश है और यहाँ के लोग कुछ सूचनाओं की गहराई में गये बिना सामने वाले के साथ स्वयं को भावना के स्तर पर जोड लेते हैं। ऐसा ही भारत में कुछ वर्गों के साथ ओबामा के सम्बन्ध में हो रहा है। भारत के समाचार पत्रों में जब यह समाचार आया कि ओबामा ने अपने पूरे अभियान में कुछ प्रतीक अपने साथ रखे और उसमें हनुमान जी का लाकेट भी था तो इसे भावुकता के साथ लिया गया। लेकिन क्या यह उचित है कि अमेरिका जैसे देश के राष्ट्रपति के चुनाव की समीक्षा अपने राष्ट्रीय हितों और अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य में करने के स्थान पर भावुकता के आधार पर की जाये। वैसे जहाँ तक ओबामा के अपने साथ हनुमान जी के लाकेट को रखने का प्रश्न है तो उन्होंने इसे अमेरिका की प्रसिद्ध पाप गायिका मैडोना के साथ रख रखा था। इस विषय पर जब मैंने अमेरिका में रहने वाले भारतीयों से प्रश्न किया तो उन्होंने कहा कि इस विषय को भावना से जोडना कतई उचित नहीं होगा क्योंकि इसे ओबामा का हिन्दू धर्म के प्रति लगाव नहीं वरन पश्चिम में एंटीक पीस रखने के शौक से जोड्कर देखना चाहिये।

इसी प्रकार भारत के समाचार पत्रों में इस आशय के समाचार भी प्रकाशित हुए कि ओबामा के पूरे अभियान में महात्मा गान्धी उनके प्रेरणास्रोत रहे। यहाँ भी यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि पश्चिम में गान्धीजी को मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मण्डॆला जैसे अश्वेत उद्धारकों के साथ रंगभेद के विरुद्ध उनके अभियान के लिये खडा किया जाता है और इसके पीछे भी ओबामा के भारत के प्रति लगाव की भावना देखना जल्दबाजी होगी।

बराक ओबामा के प्रति एक भारतवासी का दृष्टिकोण क्या होना चाहिये। मेरी दृष्टि में विशुद्ध व्यावहारिक कि ओबामा के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने से विश्व राजनीति किस दिशा में जायेगी और भारत का इस पर क्या प्रभाव होगा। इस कसौटी पर कसते समय एक ही विचार ध्यान में आता है कि अमेरिका इस समय युद्ध की स्थिति में है उस युद्ध के साथ चाहे अनचाहे सभी देशों का हित जुड गया है और भारत का हित तो विशेष रूप से। यह युद्ध है इस्लामवाद के विरुद्ध युद्ध।

11 सितम्बर 2001 को अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आक्रमण के बाद अमेरिका ने इस्लाम के नाम पर कट्टरपंथी रास्ता अपनाने वाली शक्तियों को अपने निशाने पर लिया और आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध को लेकर अमेरिका की नीति उचित रही अनुचित यह तो अलग चर्चा का विषय है पर इस युद्ध को लेकर आज विश्व में ऐसी स्थिति निर्मित हो चुकी है कि इस युद्ध में कोई भी तटस्थ नहीं रह सकता।

विशेषकर भारत अपनी विशेष परिस्थितियों के कारण तो बिलकुल भी तटस्थ नहीं रह सकता। इसलिये इस पृष्ठभूमि में बराक ओबामा का विश्लेषण करने की आवश्यकता है। बराक ओबामा ने विदेश नीति के सम्बन्ध में जो बातें कही हैं उनमें एक तो यह कि वे इराक से अमेरिकी सेनाओं को तत्काल वापस बुला लेंगे और दूसरा वे ईरान के राष्ट्रपति के साथ आमने सामने बैठकर बात करेंगे। इन दोनों ही बयानों से स्पष्ट है कि बुश की आक्रामक विदेश नीति को बदलना चाहते हैं। परंतु इन दोनों ही स्थितियों में कोई भी एकपक्षीय कदम घातक होगा। यदि आज इराक को इस स्थिति में छोड्कर अमेरिका चला जाता है तो वहाँ का प्रशासन किसी भी प्रकार इराक को सम्भाल पाने की स्थिति में नहीं होगा और पाकिस्तान और अफगानिस्तान की भाँति इराक भी अल कायदा और तालिबान का नया अड्डा बन जायेगा जो कि पाकिस्तान के कबायली क्षेत्रों में पहले से ही पुनः संगठित हो चुके अल कायदा को नया जीवन प्रदान करने जैसा होगा।

इसी प्रकार एक बडा प्रश्न ईरान का है जिस पर किसी का ध्यान अभी नहीं जा रहा है। जिस प्रकार ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने बार बार इजरायल को विश्व के मानचित्र से मिटाने या इसे समाप्त करने की बात दुहराई है वह अब लफ्फाजी के स्तर से आगे जाकर माथे पर चिंता की लकीरें डालने लगी है। जिन लोगों को अभी अहमदीनेजाद के बयानों का निहितार्थ समझ में नहीं आता उन्हें पूरे इस्लामवादी आन्दोलन का स्वरूप समझना चाहिये। इस्लामवादी आन्दोलन की मूल प्रेरणा और इस्लामवादी आतंकवाद का पूरा ताना बाना इजरायल- फिलीस्तीनी संघर्ष और मुस्लिम भूमि पर पश्चिमी देशों द्वारा थोपा गये यहूदी देश की अवधारणा के इर्द गिर्द बुना गया है। अहमदीनेजाद जो कि स्वयं एक कट्टरपंथी इस्लामवादी की श्रेणी में आते हैं और शिया परम्परा के अनुसार बारहवें पैगम्बर या महदी के अवतरण में विश्वास करते हुए स्वयं में कुछ चमत्कारिक शक्तियों का अंश देखकर एक विशिष्ट चिंतन पर चलते हैं इजरायल के विरुद्ध अपने बयानों के निहितार्थ समझने को विवश करते हैं।

अहमदीनेजाद ने पिछ्ले वर्ष अमेरिका के राष्ट्रपति को और फिर जर्मनी की चांसलर को एक खुला पत्र लिखकर अपने उद्देश्य स्पष्ट कर दिये थे कि वे अमेरिका विरोधी और पश्चिम विरोधी धरातल पर विश्व की अनेक शक्तियों को एकत्र करना चाहते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिटलर द्वारा यहूदियों के व्यापक जनसन्हार को एक कपोलकल्पित और गलत इतिहास की संज्ञा देने के लिये ईरान में राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने इतिहासकारों का एक सम्मेलन बुलाया जो इतिहास के इस तथ्य को सत्य नहीं मानते। अहमदीनेजाद का मानना है कि इस कपोलकल्पित ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर यहूदियों ने पश्चिम को बन्धक बना रखा है और उसी का हवाला देकर विशेषाधिकार प्राप्त किये हैं। ईरान के राष्ट्रपति के ये प्रयास उनके इस्लामवादी आन्दोलन के नेता बनने की उनकी महत्वाकांक्षाओं की ओर संकेत तो करते ही हैं विश्व स्तर पर वामपंथ और इस्लामवाद के गठजोड की कडी बनते भी दिखते हैं। ऐसी परिस्थिति में बराक ओबामा का फिलीस्तीन के प्रति नरम रूख अपनाना विश्व स्तर पर इस्लामवाद प्रतिरोधी शक्तियों को कमजोर करेगा।

इसके अतिरिक्त कुछ और भी कारण है जिन्हें लेकर बराक ओबामा की उम्मीदवारी प्रश्न खडा करती है। बराक ओबामा निश्चित रूप से एक अच्छे वक्ता, लोकप्रिय नेता हैं पर एक प्रशासक के रूप में उनकी क्षमताओं पर सन्देह है। अनेक अवसरों पर बराक ओबामा ने दबाव में आकर अपनी स्थिति बदल दी या उस पर सफाई दे डाली। जैसे अमेरिका के जिस अश्वेत चर्च से वे जुडे थे उस शिकागो के ट्रिनीटी यूनाइटेड चर्च आफ क्राइस्ट के पास्टर जेर्मियाह राइट जूनियर के 11 सितम्बर 2001 के अमेरिका पर आक्रमण सम्बन्धी बयान कि यह अमेरिका के कर्मों का फल है, के बाद ओबामा ने वह चर्च छोड दिया। इसी प्रकार अमेरिका के यहूदियों के समक्ष भावुक भाषण देकर जब उन्होंने जेरुसलम को अविभाजित इजरायल की राजधानी रखने का वादा किया तो फिलीस्तीनी अथारिटी के मोहम्मद अब्बास की आपत्ति के बाद ओबामा यहूदियों के समक्ष कही गयी अपनी बात से मुकर गये। यह ओबामा के कमजोर होने का प्रमाण है।

बराक ओबामा के सम्बन्ध में एक और बात ध्यान देने योग्य है कि उन्होंने भारत के साथ अमेरिका के परमाणु समझौते के सम्बन्ध में सीनेट में जो संसोधन का प्रस्ताव रखा था उसके अनुसार भारत को कोई भी विशेषाधिकार न दिया जाये और भारत को 123 समझौते की परिधि में लाने के लिये उससे सीटीबीटी पर हस्ताक्षर के लिये कहा जाये। अब यदि बराक ओबामा का प्रशासन कार्यभार सम्भालता है तो भारत के ऊपर सीटीबीटी पर हस्ताक्षर और विशेष सहूलियतों का दौर समाप्त हो जायेगा। इसी के साथ कश्मीर के विषय में भी ओबामा की राय जो है उससे पाकिस्तानी प्रोपेगैण्डा के आधार पर कश्मीर विश्व के विभिन्न कूट्नीतिक मंचों पर फिर से प्रमुख विषय बन सकता है क्योंकि बराक ओबामा की राय में अल-कायदा के विरुद्ध पाकिस्तान का सहयोग प्राप्त करने के लिये आवश्यक है कि पाकिस्तान का ध्यान कश्मीर के मामले में न बँटे। ओबामा के इस रूख से कश्मीर में आतंकवादी संगठनों को नया जीवन मिल सकता है और वैश्विक जिहाद को नया आयाम। आज इस विषय पर बहुत ध्यान पूर्वक सोचने की आवश्यकता है कि बराक ओबामा जहाँ एक ओर अमेरिका में आप्रवासियों के लिये सम्भावनायें जगाते हैं वहीं उनका अति वामपंथी और इस्लामवाद के प्रति अपेक्षाकृत नरम होना विश्व के वर्तमान परिदृश्य के लिये नकारात्मक विकास है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अन्ध अमेरिका विरोध के नाम पर कहीं उन शक्तियों के प्रति सहानुभूति न दिखाने लगें जो हमारी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिये गम्भीर खतरा हैं। आर्थिक नीतियों के आधार पर या वैश्व्वीकरण के नाम पर अमेरिका विरोध के नाम पर वामपंथी-इस्लामवादी धुरी का अंग बनने से भी हमें अपने आप को रोकना होगा।

Posted in Uncategorized | Leave a Comment »

आतंकवाद विरोधी मुस्लिम पहल के निहितार्थ

Posted by amitabhtri on जून 1, 2008

31 मई दिन शनिवार, दिल्ली के रामलीला मैदान पर प्रमुख इस्लामी संगठनों की पहल पर एक आतंकवाद विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन एक बार फिर सहारनपुर स्थित प्रसिद्ध मदरसा दारूल उलूम देवबन्द की पहल पर आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में मुख्य रूप से दारूल उलूम देवबन्द, जमायत उलेमा ए हिन्द, जमायत इस्लामी, नदवातुल उलेमा लखनऊ और मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्यों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में देश भर के विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधित्व का दावा किया गया। दारूल उलूम देवबन्द के मुख्य मुफ्ती हबीबुर्रहमान द्वारा तथाकथित फतवे पर हस्ताक्षर किये गये जिसके प्रति सभी उपस्थित लोगों ने सहमति व्यक्त की और इस फतवे के अनुसार किसी भी प्रकार की अन्यायपूर्ण हिंसा की निन्दा की गयी और जेहाद को रचनात्मक और आतंकवाद को विध्वंसात्मक घोषित किया गया। आयोजकों के दावे के अनुसार इस सम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से तीन लाख लोगों ने भाग लिया। सम्मेलन में आने वालों में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लोग शामिल थे।

इससे पूर्व सहारनपुर स्थित प्रमुख इस्लामी शिक्षा केन्द्र और तालिबान के प्रमुख सदस्यों मुला उमर और जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर के प्रेरणास्रोत रहे दारूल उलूम देवबन्द ने 25 फरवरी को भी देश भर के विभिन्न मुस्लिम पंथों के उलेमाओं को आमंत्रित कर आतंकवाद के विरुद्ध फतवा जारी किया था। उस पहल को अनेक लोगों ने ऐतिहासिक पहल घोषित किया था और एक बार फिर रामलीला मैदान पर हुई आतंकवाद विरोधी सभा को एक सकारात्मक पहल माना जा रहा है। परंतु जिस प्रकार फरवरी माह में हुए उलेमा सम्मेलन के निष्कर्षों पर देश में आम सहमति नहीं थी कि ऐसी पहल का इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैला रहे लोगों पर क्या प्रभाव होगा उसी प्रकार का प्रश्न एक बार फिर आतंकवाद विरोधी सम्मेलन से भी उभरता है।

इस सम्मेलन में फतवे की भाषा और वक्ताओं का सुर पूरी तरह उलेमा सम्मेलन की याद दिलाता है। सम्मेलन में पूरा जोर इस बात पर था कि किस प्रकार यह सिद्ध किया जाये कि इस्लाम और पैगम्बर की शिक्षायें आतंकवाद को प्रेरित नहीं करती और इस्लाम एक शांतिपूर्ण धर्म है। इसके साथ एक बार फिर जेहाद को इस्लाम का अभिन्न अंग घोषित करते हुए उसे आतंकवाद से पृथक किया गया। इसमें ऐसा नया क्या है जिसको लेकर इस सम्मेलन या फतवे को ऐतिहासिक पहल घोषित किया जा रहा है। जब से इस्लामी आतंकवाद का स्वरूप वैश्विक हुआ है तब से इस्लामी बुध्दिजीवी और धर्मगुरु इस्लाम को शांतिपूर्ण धर्म बता रहे हैं और जेहाद को एक शांतिपूर्ण आन्तरिक सुधार की प्रक्रिया घोषित कर रहे हैं परंतु उनके कहे का कोई प्रभाव उन आतंकवादी संगठनों पर नहीं हो रहा है जो जेहाद और इस्लाम के नाम पर आतंकवाद में लिप्त हैं। वास्तव में एक बार फिर इस सम्मेलन ने हमारे समक्ष एक बडा प्रश्न खडा कर दिया है कि क्या इस्लामी संगठन, धर्मगुरु या फिर बुद्धिजीवी इस्लामी आतंकवाद का समाधान ढूँढने के प्रति वाकई गम्भीर हैं। उनके प्रयासों की गहराई से छानबीन की जाये तो ऐसा नहीं लगता।

वास्तव में इस्लामी आतंकवाद को एक सामान्य आपराधिक घटना के रूप में जो भी सिद्ध करने का प्रयास करता है वह इसे प्रोत्साहन देता है। इस्लामी आतंकवाद एक वृहद इस्लामवादी आन्दोलन का एक रणनीति है और इस आन्दोलन का उद्देश्य राजनीतिक इस्लाम का वर्चस्व स्थापित करना है। समस्त समस्याओं का समाधान इस्लाम और कुरान में है, विश्व की सभी विचारधारायें असफल सिद्ध हो चुकी हैं और इस्लाम ही सही रास्ता दिखा सकता है, पश्चिम आधारित विश्व व्यवस्था अनैतिकता फैला रही है और उसके मूल स्रोत में अमेरिका है इसलिये अमेरिका का किसी भी स्तर पर विरोध न्यायसंगत है, इस्लामी आतंकवाद जैसी कोई चीज नहीं है यह समस्त विश्व में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार का परिणाम है, आज मीडिया इस्लाम को बदनाम कर रहा है, फिलीस्तीन में मुसलमानों के न्याय हुआ होता तो और इजरायल का साथ अमेरिका ने नहीं दिया होता तो इस्लामी आतंकवाद नहीं पनपता। ऐसे कुछ तर्क राजनीतिक इस्लाम के हैं जो इस्लामवादी आन्दोलन का प्रमुख वैचारिक अधिष्ठान है और इन्हीं तर्कों के आधार पर इस्लाम की सर्वोच्चता विश्व पर स्थापित करने का प्रयास हो रहा है। क्या किसी भी इस्लामी संगठन ने इन तर्कों या उद्देश्यों से अपनी असहमति जताई है। इसका स्पष्ट उत्तर है कि नहीं।

31 मई को रामलीला मैदान में जो तथाकथित आतंकवाद विरोधी रैली हुई उसमें भी जिस प्रकार के तेवर में बात की गयी वह यही संकेत कर रहा था कि इस रैली में मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा को ही प्रोत्साहित किया गया और अमेरिका के विरोध में जब भी वक्ताओं ने कुछ बोला तो खूब तालियाँ बजीं। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि अमेरिका शैतान है या नहीं यहाँ प्रश्न यह है कि एक ओर आतंकवाद को इस्लाम से पृथक कर और फिर इस्लामी आतंकवाद के मूल में छिपी अवधारणा को बल देकर इस्लामी संगठन किस प्रकार आतंकवाद से लड्ना चाहते हैं। किसी तर्क का सहारा लेकर यदि आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराये जाने का प्रयास हो तो फिर आतंकवाद की निन्दा करना एक ढोंग नहीं तो और क्या है। आज बडा प्रश्न जो हमारे समक्ष है वह राजनीतिक इस्लाम की महत्वाकांक्षा और इस्लामवादी आन्दोलन है जो इस्लाम में ही सभी समस्याओं का समाधान देखता है। वर्तमान समय में अंतरधार्मिक बहसों में भाग लेने वाले और ऐसी बहसें आयोजित कराने वाले मुस्लिम बुद्धिजीवी भी आतंकवाद के सम्बन्ध में ऐसी अस्पष्ट भाषा का प्रयोग करते हैं कि उनकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक है। ऐसे ही एक मुस्लिम विद्वान हैं डा. जाकिर नाईक उनके कुछ उद्गार सुनकर कोई भी आश्चर्यचकित हो सकता है। इस सम्बन्ध में कुछ यू ट्यूब के वीडियो प्रस्तुत हैं। जिन्हें देखकर कोई भी सोचने पर विवश हो सकता है कि मुस्लिम बुध्दिजीवी किस प्रकार इस्लामवादी आन्दोलन का अंग हैं और अंतर है तो केवल रणनीति का है। http://www.youtube.com/watch?v=ZMAZR8YIhxI

31 मई के सम्मेलन के सन्दर्भ में जाकिर नाइक का उल्लेख करना इसलिये आवश्यक हुआ कि आज उन्हें एक नरमपंथी और उदारवादी मुसलमान माना जा रहा है जो बहस में विश्वास करता है परंतु उनके भाव स्पष्ट करते हैं कि आज आतंकवाद की समस्या को एक प्रतिक्रिया के रूप में लिया जा रहा है और इसके लिये मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा का सृजन किया जा रहा है। मुस्लिम उत्पीडन की इस अवधारणा का भी वैश्वीकरण हो गया है। एक ओर जहाँ इजरायल और फिलीस्तीन का विवाद समस्त विश्व के इस्लामवादियों के लिये आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराने का सबसे बडा हथियार बन गया है वहीं स्थानीय स्तर पर भी मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा रची जाती है और इसका शिकार बनाया जाता है देश के पुलिस बल और सुरक्षा एजेंसियों को।

रामलीला मैदान में जो भी पहल की गयी उसकी ईमानदारी पर सवाल उठने इसलिये भी स्वाभाविक हैं कि इस सम्मेलन या रैली में एक बार भी इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले वैश्विक और भारत स्थित संगठनों के बारे में इन मुस्लिम धर्मगुरुओं ने अपनी कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की। इन तथाकथित शांतिप्रेमियों ने एक बार भी सिमी, इण्डियन मुजाहिदीन, लश्कर, जैश का न तो उल्लेख किया और न ही उनकी निन्दा की या उनके सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट की। वैसे आज तक ओसामा बिन लादेन के उत्कर्ष के बाद से विश्व के किसी भी इस्लामी संगठन ने उसके सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की और अमेरिका पर किये गये उसके आक्रमण को मुस्लिम उत्पीडन की प्रतिक्रिया या फिर आतंकवादी अमेरिका पर आक्रमण कह कर न्यायसंगत ही ठहराया। सम्मेलन में जयपुर में आतंकवादी आक्रमण में मारे गये लोगों की सहानुभूति में भी कुछ नहीं बोला गया और पूरा समय इसी में बीता कि इस्लाम को आतंकवाद से कैसे असम्पृक्त रखा जाये। ऐसे में एक बडा प्रश्न हमारे समक्ष यह है कि आतंकवाद के विरुद्ध इस युद्ध में हम इन इस्लामी संगठनों की पहल को लेकर कितना आश्वस्त हों कि इससे सब कुछ रूक जायेगा। क्योंकि समस्या के मूल पर प्रहार नहीं हो रहा है।

25 फरवरी को दारूल उलूम देवबन्द ने उलेमा सम्मेलन किया और एक माह के उपरांत ही मध्य प्रदेश में सिमी के सदस्य पुलिस की गिरफ्त में आये और मई की 13 दिनाँक को जयपुर में आतंकवादी आक्रमण हो गया। जुलाई 2006 को मुम्बई में स्थानीय रेल व्यवस्था पर हुए आक्रमण के बाद अब तक 9 श्रृखलाबद्ध सुनियोजित विस्फोट हो चुके हैं और इन सभी विस्फोटों में भारत के मुस्लिम संगठनों और सदस्यों की भूमिका रही है। इससे स्पष्ट है भारत में मुसलमान वैश्विक जेहादी नेटवर्क से जुड गया है और वह मुस्लिम उत्पीडन की वैश्विक और स्थानीय अवधारणा से प्रभावित हो रहा है। जब तक इस्लामी संगठन इस अवधारणा के सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करते और आतंकवाद के स्थान पर आतंकवादी संगठनों के विरुद्ध फतवा नहीं जारी करते उनकी पहल लोगों को गुमराह करने के अलावा और किसी भी श्रेणी में नहीं आती।

इस्लामी आतंकवाद आज इस मुकाम पर पहुँच गया है जहाँ से उससे लड्ने के लिये एक समन्वित प्रतिरोध की आवश्यकता है और ऐसी पहल जो पूरे मन से न की गयी हो या जिसमें ईमानदारी का अभाव हो उससे ऐसी प्रतिरोधक शक्ति कमजोर ही होती है जिसका विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है। हमारे देश की छद्म धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी-उदारवादी लाबी ऐसे प्रयासों को महिमामण्डित कर प्रस्तुत करती है ताकि इस्लामी आतंकवाद के मूल स्रोत, विचारधारा और प्रेरणा पर बह्स न हो सके। ऐसे प्रयासों के मध्य हमें अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है और साथ ही इस पूरी समस्या को एक समग्र स्वरूप में व्यापक इस्लामवादी आन्दोलन के रणनीतिक अंग के रूप में भी देखने की आवश्यकता है।

Posted in Uncategorized | टैग की गईं: , , , | 2 Comments »