हिंदू जागरण

हिंदू चेतना का स्वर

वामपंथी-इस्लामवादी गठजोड

Posted by amitabhtri on अप्रैल 25, 2008

नेपाल में माओवादियों की विजय के उपरांत अनेक प्रकार के विचार सामने आने लगे हैं। भारत में इस विषय पर विभिन्न समाचार पत्रों में जो लेख या सम्पादकीय लिखे जा रहे हैं उससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि नेपाल में माओवादियों की विजय को दो सन्दर्भों में देखा गया हैं। एक विचार के अनुसार नेपाल में माओवादियों की विजय का लाभ उठाकर भारत में वामपंथी उग्रवादियों नक्सलवादियों या फिर माओवादियों को भी मुख्यधारा में शामिल करने के प्रयास करने चाहिये। अनेक बडे समाचार पत्रों ने अपनी सम्पादकीय और लेखों के द्वारा सरकार को सलाह दी है कि नेपाल में माओवादियों की विजय से एक स्वर्णिम अवसर भारत को मिला है कि वह भारत में नक्सलियों को लोकतंत्र का मार्ग अपनाने को प्रेरित करे। इसके अतिरिक्त नेपाल में माओवादियों की विजय को लेकर एक दूसरी विचारधारा भी है जो मानती है कि अब नेपाल भारत की सुरक्षा की दृष्टि से एक बडा खतरा बन जायेगा और भारत का हित इसी में है कि नेपाल में माओवादी हिंसा को नष्ट करने की दिशा में भारत प्रयास जारी रखे और बदली परिस्थितियों में भी राजा को नेपाल में प्रासंगिक बना कर रखे। इन दोनों ही विचारों में से कौन सा विचार आने वाले समय में प्रभावी होने वाला है यह कहने की आवश्यकता नहीं है।

हमारे लेख का विषय यह है कि नेपाल में माओवादियों की विजय का भारत की सुरक्षा पर दीर्घगामी स्तर पर क्या प्रभाव पडने वाला है। अभी हाल के अपने अंक में प्रसिद्ध पत्रिका तहलका ने भारत में नक्सलियों के समर्थक और उनके बौद्धिक प्रवक्ता माने जाने वाले बारबरा राव का एक साक्षात्कार प्रकाशित किया है और इसमें उनसे जानने का प्रयास किया है कि नेपाल में माओवादियों की विजय का भारत के नक्सल आन्दोलन पर क्या प्रभाव पडने वाला है। पूरे साक्षात्कार में बारबरा राव ने अनेक बातें की हैं परंतु जो अत्यंत मह्त्वपूर्ण बात है वह यह कि नेपाल और भारत के माओवादियों के लक्ष्य में मूलभूत अंतर है एक ओर नेपाल के माओवादियों का उद्देश्य जहाँ नेपाल में राजशाही समाप्त कर गणतंत्र की स्थापना था वहीं भारत में नक्सली या माओवादी एक व्यवस्था परिवर्तन या समानांतर राजनीतिक प्रणाली का आन्दोलन चला रहे हैं। इस व्यस्था परिवर्तन के मूल में शास्त्रीय साम्यवादी सोच है कि उत्पादन के साधनों पर सर्वहारा समाज का अधिकार हो। बारबरा राव का मानना है कि अभी यह देखना होगा कि नेपाल का शासन किस प्रकार चलाया जाता है। इस साक्षात्कार से एक बात स्पष्ट होती है कि नेपाल के माओवादियों के प्रति भारत के नक्सली कोई दुर्भाव नहीं रखते जैसा कि भारत में कुछ समाचार पत्रों ने नेपाल में माओवादियों की विजय के बाद समाचारों में लिखा था कि भारत स्थित माओवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आने से नेपाली माओवादियों से खिन्न हैं। बारबरा राव की बातचीत से स्पष्ट है कि भारत स्थित नक्सली या माओवादी नेपाल की परिस्थितियों पर नजर लगाये रखेंगे।

 

भारत में जिस प्रकार नेपाल में माओवादियों की विजय के उपरांत उनको अवसर देने के नाम पर या फिर भारत में नक्सलियों को लोकतांत्रिक बनाने के नाम पर जिस प्रकार माओवादियों की विजय को स्वीकार कराया जा रहा है और उससे भी आगे बढकर भारत सरकार पर एक बौद्धिक दबाव बनाया जा रहा है कि वह माओवादियों को हाथोंहाथ ले इसके बाद भी कि माओवादी नेता प्रचण्ड अपनी विजय के उपरांत दहाड दहाड कर कह रहे हैं कि वे भारत के साथ पुरानी सभी सन्धियाँ भंग कर भारत के साथ नेपाल के सम्बन्धों की समीक्षा नये सन्दर्भ में करेंगे। इस प्रकार भारत विरोधी वातावरण के बाद भी नेपाल में माओवादियों की विजय को भारत के लिये उपयुक्त ठहराने वाले कौन लोग हैं और इसके पीछे इनका उद्देश्य क्या है?

 

यही वह बिन्दु है जो हमें सोचने को विवश करता है और देश में वामपंथी विचारधारा के झुकाव को स्पष्ट करता है। इसमें बात में कोई शक नहीं है कि भारत के बडे समाचार पत्रों में निर्णायक पदों पर वही लोग बैठे हैं जो शीतकालिक युद्ध की मानसिकता के हैं और उस दौर के हैं जब वामपंथी विचारधारा कालेज कैम्पस में फैशन हुआ करती थी। इस विचारधारा को पिछले 25 वर्षों में अनेक उतार चढाव देखने पडे हैं। पहले राम मन्दिर के रूप में हिन्दुत्व आन्दोलन ने फिर सामाजिक न्याय के मण्डल आन्दोलन ने समाज का ध्रुवीकरण इस आधार पर कर दिया कि वामपंथी विचारधारा हाशिये पर चली गयी। ऐसी परिस्थितियों में यही वामपंथी विचार के पत्रकार जातिवादी दलों और हिन्दुत्व विरोधी शक्तियों के साथ चले गये और सेकुलरिज्म के नाम पर एक नया मोर्चा बना लिया जिसका एक साझा कार्यक्रम हिन्दुत्व विरोध था। फिर भी यह विचारधारा पूरी तरह वामपंथ पर आधारित नहीं थी।

 

2000 के बाद समस्त विश्व में एक नया परिवर्तन आया है और वैश्वीकरण के विरुद्ध प्रतिक्रिया और इस्लामी आतंकवाद का उत्कर्ष एक साथ हो रहा है। एक ओर जहाँ वैश्वीकरण के नाम पर सामाजिक असमानता बढ रही है तो वहीं एक वैकल्पिक विश्व व्यवस्था के नाम पर इस्लामवादी शक्तियाँ कुरान और शरियत पर आधारित विश्व व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं। वैश्वीकरण से उपजे सामाजिक असंतुलन के चलते समाज में आन्दोलन के लिये जो वातावरण पनप रहा है उसका कुछ हद तक उपयोग भारत में नक्सली कर रहे हैं। इस प्रकार नक्सलियों के आन्दोलन का सूत्र भी वर्तमान विश्व व्यवस्था का विरोध है और इस्लामवादी पुनरुत्थान आन्दोलन का लक्ष्य भी कुरान आधारित विश्व की स्थापना है। भारत में दोनों ही शक्तियाँ अर्थात नक्सली और इस्लामवादी हिन्दुत्व को साम्प्रदायिक और अपना शत्रु मानती हैं।

 

यह निष्कर्ष मैंने अपने अनुभव के आधार पर निकाला है। आज से कोई दो वर्ष पूर्व मुझे नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ जाने का अवसर मिला और उन हिस्सों में भी जाने का अवसर मिला जो नक्सल प्रभावित या नक्सल प्रभाव वाले हैं। अपनी यात्रा के दौरान नक्सलियों के पूरे कार्य व्यवहार को जानने का अवसर मिला। नक्सलवादी एक समानांतर व्यवस्था पर काम कर रहे हैं। छ्त्तीसगढ जैसे क्षेत्र में जो भौगोलिक दृष्टि से काफी बिखरा है और कुछ गाँवों में तो केवल एक तो घर ही हैं और पिछ्डापन इस कदर है कि इन क्षेत्रों में रहने वाले निवासी देश क्या होता है यह तक नहीं जानते। ऐसे पिछ्डे क्षेत्रों में शिक्षा का बहुत बडा अभियान संघ परिवार के एकल विद्यालय चला रहे हैं जहाँ दूर दराज के घरों में भी आपको भारतमाता के कैलेण्डर मिल जायेंगे। खैर इसके बाद भी नक्सलवादियों का प्रभाव इन क्षेत्रों में बहुत अधिक है और उनके अपने विद्यालय हैं जहाँ वे जनजातिय लोगों के बच्चों को अपने पाठ्यक्रम के आधार पर शिक्षा देते हैं और बच्चों के अभिभावकों को धन भी देते हैं। इन पाठ्यक्रमों के अंतर्गत साम्राज्यवाद और हिन्दुत्व को सहयोगी सिद्ध करते हुए दोनों को समान रूप से शत्रु बताया जाता है। यही नहीं तो नक्सलियों की एक पत्रिका मुक्तिमार्ग  भी इस क्षेत्र से निकलती है जिसमें भी इसी प्रकार के भाव व्यक्त किये जाते हैं। इस अनुभव को पाठकों से बाँटना इसलिये आवश्यक था कि इन चीजों को देखकर दो वर्ष पूर्व जो विचार मेरे मन में आया था और जिसके बारे में उस समय भी मैने लिखा था वह यह कि नक्सलियों का यह भाव एक बडे संकट को जन्म दे सकता है और वह यह कि भारत में और विश्व स्तर पर वामपंथ और इस्लामवाद के समान उद्देश्य होने के कारण किसी स्तर पर आकर वे एक दूसरे के सहयोगी बन सकते है।

 

 नेपाल में माओवादियों की विजय के उपरांत जिस प्रकार की प्रतिक्रिया भारत में तथाकथित बुद्धिजीवियों और पत्रकारों के मध्य हुई है उससे एक आशंका को बल मिलता है कि वामपंथ के थके सिपाही एक बार फिर विश्व स्तर पर साम्राज्यवाद को और भारत में हिन्दुत्व को निशाना बना कर इस्लामवादियों के साथ आ सकते हैं।

 

वैसे वामपंथियों का मुस्लिम साम्प्रदायिकता का सहयोग देने का पुराना इतिहास रहा है और भारत के विभाजन के लिये मुस्लिम लीग को वैचारिक अधिष्ठान प्रदान करने का कार्य वामपंथियों ने ही किया था। भारत में पिछ्ले 25-30 वर्षों से हाशिये पर आ गये वामपंथियों को सुनहरा अवसर 2004 में मिला जब वे केन्द्र में सत्तासीन दल के प्रमुख घटक बने और विदेश नीति सहित अनेक मुद्दों पर वीटो लगाने में सफल रहे। वामपंथियों ने नेपाल में माओवादियों को नेपाल की सत्ता तक लाने में भारत की ओर से मध्यस्थता की और राजतंत्र समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया। कुछ वर्षों पहले भारत के दक्षिणी राज्य केरल में हुए विधानसभा चुनावों में वामपंथियों ने विदेश नीति को मुद्दा बनाकर चुनाव लडा और आई ए ई ए में भारत द्वारा ईरान के विरुद्ध किये गये मतदान को मुस्लिम वोट से जोडा और फिलीस्तीन के आतंकवादी नेता और अनेकों इजरायलियों की हत्या कराने वाले इंतिफादा के उत्तरदायी यासिर अराफात का चित्र लगाकर वोट की पैरवी की। इसी प्रकार अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश की भारत यात्रा के दौरान मुम्बई और दिल्ली में इस्लामवादियों के साथ मिलकर बडी सभायें कीं और अमेरिका के राष्ट्रपति को संसद का संयुक्त सत्र सम्बोधित करने से रोक दिया। डेनमार्क में पैगम्बर मोहम्मद का आपत्तिजनक कार्टून प्रकाशित होने पर यही वामपंथी इस्लामवादियों के साथ सड्कों पर उतरे और केरल में इन्हीं वामपंथियों की सरकार ने कोयम्बटूर बम काण्ड के आरोपी कुख्यात आतंकवादी अब्दुल मदनी को जेल से रिहा करने के लिये विधानसभा का विशेष सत्र आहूत किया। ऐसा काम संसदीय इतिहास में पहली बार हुआ होगा जब विधानसभा के विशेष सत्र द्वारा किसी आतंकवादी को छोड्ने का प्रस्ताव पारित किया जाये।

 

अब जबकि नेपाल की संविधान सभा में विजय के उपरांत माओवादियों के नेता प्रचण्ड ने अपना प्रचण्ड रूप दिखाना आरम्भ कर दिया है और उनका भारत विरोधी एजेण्डा सामने आ रहा है तो स्पष्ट है कि नेपाल में चीन और पाकिस्तान की जुगलबन्दी गुल खिलाने वाली है और इसकी तरफ उन लोगों का ध्यान बिलकुल नहीं जा रहा है जो भारत सरकार को सीख दे रहे है कि नेपाल में माओवादियों की विजय से भारत में नक्सलवादियों को भी लोकतांत्रिक बनाने में सहायता मिलेगी। इस तर्क से सावधान रहने की आवश्यकता है कहीं इस चिंतन के पीछे माओवादियों के सहारे मृतप्राय पडे वामपंथ को जीवित करने का स्वार्थ तो निहित नहीं है। वैसे भी विश्व स्तर पर आज वामपंथी इस्लामवादियों को अपना सहयोगी बनाने में नहीं हिचकते और अमेरिका, इजरायल सहित अनेक विषयों पर उनके सुर में बात करने में तनिक भी परहेज नहीं करते। नेपाल में माओवादियों की विजय को दक्षिण एशिया में इस्लामवादी-वामपंथी गठजोड की दिशा में एक मह्त्वपूर्ण कदम माना जाना चाहिये। आने वाले दिनों में यह गठज़ोड और अधिक मुखर और मजबूत स्वरूप लेगा।

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क्या चाहते हैं आडवाणी ?

Posted by amitabhtri on अप्रैल 24, 2008

आज जब मैं भारतीय जनता पार्टी के शीर्षस्थ नेता और आगामी लोकसभा चुनावों के लिये पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी श्री लालकृष्ण आडवाणी के बारे में कुछ लिखने बैठा हूँ तो निश्चय ही लोगों के मन में जिज्ञासा हो सकती है कि ऐसा मैंने तब क्यों नहीं किया जब अधिकाँश लोग आडवाणी के बारे में लिख रहे थे। जब से लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा माई कंट्री माई लाइफ का विमोचन हुआ है, आडवानी जी खबरों में हैं। पुस्तक को जैसे जैसे लोग पढते गये उसी अनुपात में कुछ नया समाचार उस सम्बन्ध में आता गया। कुल मिलाकर आडवाणी जी स्वयं और उनके सलाहकार जो चाहते थे वह पूरा होता गया और तकरीबन महीने भर खबरों के केन्द्र में आडवाणी बने रहे। इस दौरान कभी भी मेरी इच्छा आडवानी जी पर कुछ लिखने की नहीं हुई। इसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं एक तो मैने स्वयं आडवाणी जी की आत्मकथा पढी नहीं थी और दूसरा मैने आडवाणी जी को कभी क्रांतिकारी और व्यवस्था परिवर्तन का अग्रदूत नहीं माना। आडवाणी एक ऐसे नेता हैं जो कांग्रेस की यथास्थितिवादी व्यवस्था में सत्ता परिवर्तन के एक माध्यम थे जो कुछ वैसा ही है जैसे गर्मी की तपती दोपहरी में शीतल हवा का एक झोंका आ जाता है और मन प्रसन्न हो जाता है। आडवाणी जी को लेकर अपनी इस अवधारणा के चलते आडवाणी की आत्मकथा भी मुझे एक छवि निर्माण के प्रयास से अधिक कुछ नहीं दिखी।

 

आडवाणी जी पर लिखने का कोई प्रयास अब भी नहीं करता यदि पिछ्ले कुछ दिनों में आडवाणी जी द्वारा दिये गये कुछ साक्षात्कार विचलित न करते। पिछ्ले दिनों आडवाणी जी ने भारत के कुछ प्रमुख टी.वी चैनलों को साक्षात्कार दिया और उसके बाद पाकिस्तान के एक प्रमुख समाचार पत्र को साक्षात्कार दिया और दोनों स्थानों पर उन्होंने पाकिस्तान की अपनी यात्रा के दौरान जिन्ना के सम्बन्ध में की गयी अपनी टिप्पणियों को सही ठहराया और फिर दुहराया कि इस विषय पर उन्हें ठीक से नहीं समझा गया और पूरे विचार परिवार( संघ परिवार) ने एक ऐसा स्वर्णिम अवसर गँवा दिया जब मुसलमानों को समझाया जा सकता था कि विचार परिवार इस्लाम विरोधी या मुस्लिम विरोधी नहीं होते हुए भी हिन्दुत्व के प्रति आग्रही है।

 

आडवाणी के ऐसे विचारों से स्पष्ट है कि वह अपनी हिन्दुत्ववादी छवि तोडने के लिये व्यग्र हैं और इसके लिये तरह-तरह के प्रयास कर रहे हैं।

 

आडवाणी जी की इस स्थिति को समझने के लिये यदि हम आडवाणी की आत्मकथा की प्रस्तावना में अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा की गयी उस टिप्पणी का मर्म समझने का यत्न करें तो बात स्पष्ट हो जायेगी जिसमें अटल जी ने कहा था कि आडवाणी को गलत समझा गया और वे अपनी छवि के शिकार हो गये। आडवाणी की यही विवशता है। सोमनाथ से अयोध्या के लिये रथ लेकर चलने वाला आडवाणी किसी क्रांति के लिये नहीं निकला था और उनका उद्देश्य भी काँग्रेस द्वारा अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के चलते हिन्दुओं में पनप रहे असंतोष को राम जन्मभूमि आन्दोलन के प्रतीक के चलते भुनाकर संसदीय व्यवस्था में भाजपा के लिये विपक्ष की भूमिका सृजित करने से अधिक कुछ नहीं था और यही कारण है कि इस आन्दोलन की चरम परिणति के रूप में 6 दिसम्बर 1992 को जब मुगल कालीन ढाँचा ध्वस्त हो गया तो आडवाणी अत्यंत व्यथित हुए और तत्काल इसे अपने जीवन का काला दिन तक घोषित कर दिया। वास्तव में आडवाणी जी बाबरी ढाँचे के ध्वस्त होने हो लेकर अपराध बोध से ग्रस्त हैं और इसे अपने जीवन का पाप मानकर उसके प्रायश्चित के लिये जुटे हैं। कुछ वर्ष पूर्व पाकिस्तान की अपनी यात्रा के दौरान जिन्ना को सेकुलर घोषित करने के पीछे भी उनकी यही मानसिकता काम कर रही थी।

अभी हाल में पाकिस्तान के एक प्रमुख समाचार पत्र डान के साथ साक्षात्कार में आडवाणी ने पुनः वही बातें दुहरायीं कि यदि पाकिस्तान जिन्ना के रास्ते पर चलता तो आज भी सेकुलर रहता और साथ ही उन्होंने अपनी एक काफी पुरानी अवधारणा को भी दुहराया कि आने वाले समय में भारत और पाकिस्तान का एक महासंघ बन सकता है।

 

आडवाणी के इन बयानों के पीछे आपत्तिजनक क्या है? एक तो यह कि जिन्ना के प्रति अपनी बात को वे यह कह कर न्यायसंगत ठहराते हैं कि इससे भाजपा सहित पूरे संघ परिवार के सम्बन्ध में मुसलमानों की सोच बदल जाती अर्थात आडवाणी भी मानते हैं कि भारत का मुसलमान भारत से अधिक पाकिस्तान की परिस्थितियों और घटनाक्रम से प्रभावित होता है। आडवाणी की इस स्वीकारोक्ति से 1990 के दौरान अल्पसंख्यकवाद के विरुद्ध गढे गये उनके ही मुहावरे गलत सिद्ध होते हैं जब भारतीय मुसलमानों की पाकिस्तान के प्रति निष्ठा को आधार बनाकर हिन्दुत्व की धार तेज की जाती थी। इससे एक अर्थ तो यह निकलता है कि आडवाणी देश की समस्याओं के सन्दर्भ में काँग्रेस से भिन्न राय नहीं रखते और अल्पसंख्यकवाद का नारा मात्र वोट के लिये था और इस समस्या के समाधान को लेकर स्वयं आडवाणी भी गम्भीर नहीं हैं।

 

जिन्ना को सेकुलर सिद्ध कर आडवाणी पाकिस्तान की निर्मिति को शाश्वत बना देते हैं और भारत पाकिस्तान की समस्या को और उलझा देते हैं। भारत और पाकिस्तान की समस्या के सम्बन्ध में एक तथ्य पर कभी ध्यान नहीं दिया गया और वह यह कि पाकिस्तान और भारत की समस्या भी काफी कुछ इजरायल और फिलीस्तीन की भाँति है जहाँ एक देश दूसरे देश के अस्तित्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। पाकिस्तान आज भी स्वाधीनता पूर्व की मुस्लिम मानसिकता से ग्रस्त है और समस्त भारत को इस्लामी राष्ट्र के रूप में परिवर्तित करने का स्वप्न देखता है। यदि ऐसा नहीं होता तो भारत को हजारों घाव देने के योजना के आधार पर आतंकवाद को प्रश्रय क्यों देता? वास्तव में इस पूरी समस्या को इस नजरिये से देखने का प्रयास कभी हुआ ही नहीं और न ही उस मानसिकता को जानने का प्रयास किया गया जो भारत के प्रति शाश्वत शत्रुता को पाकिस्तान के अस्तित्व का आधार बनाती है। पाकिस्तान की इसी इस्लामपरक मानसिकता के चलते ही भारत का मुसलमान पाकिस्तान के अधिक निकट अपने को पाता है और इसके बाद भी आडवाणी का जिन्ना को सेकुलर सिद्ध करना और पाकिस्तान के रास्ते मुसलमानों के मध्य अपनी छवि बदलने का प्रयास करना यही प्रमाणित करता है कि या तो आडवाणी समस्याओं को सही सन्दर्भ में नहीं देख पा रहे हैं या फिर वे यथास्थितिवादी नेता हैं जो सत्ता परिवर्तन का माध्यम भर हैं।

 

इस बात की पुष्टि आडवाणी जी की आत्मकथा में इस्लामी उग्रवाद के सम्बन्ध में उनकी धारणा से भी होती है। अपनी आत्मकथा में इस्लामी आतंकवाद के लिये आडवाणी ने इस्लामी उग्रवाद शब्द का प्रयोग किया है और इस समस्या के पीछे एक विचारधारा की प्रेरणा की बात स्वीकार की है परंतु अपनी आत्मकथा के बाद छवि बदलने के अपने प्रयास में किसी भी साक्षात्कार में उन्होंने इस्लामी उग्रवाद या इस्लामी आतंकवाद की चर्चा ही नहीं की। यही नहीं तो राजनेता के रूप में भी आडवाणी जब भी इस्लामी आतंकवाद की चर्चा करते हैं तो इसके पीछे किसी विचारधारा की प्रेरणा सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते। ऐसा शायद वे राजनीतिक दृष्टि से सही होने के लिये या पोलिटिकल करेक्टनेस के कारण नहीं करते। इससे भी यही बात सिद्ध होती है कि आडवाणी यथास्थितिवादी व्यवस्था के लिये उपयुक्त राजनेता हैं जो सत्ता परिवर्तन तो कर सकते हैं परंतु उनसे किसी क्रांतिकारी बदलाव की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

 

आडवाणी स्वयं और उनके सलाहकार उनकी छवि बदलने के कार्य में लग गये हैं और इस प्रयास में वे ऐसे कदम भी उठाते जा रहे हैं जिससे उनके समक्ष अनेक प्रश्न भी खडे होते जा रहे हैं। भारत की संसदीय प्रणाली की व्यवस्था के चलते सम्भव है कि आडवाणी देश के सर्वोच्च पद तक पहुँच भी जायें परंतु उनके नये तेवर से स्पष्ट है कि छ्द्म धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा देने वाला यह राजनेता स्वयं धर्मनिरपेक्षता और छद्म धर्मनिरपेक्षता के मध्य विभाजन नहीं कर पा रहा है।

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सिमी का फैलता जाल

Posted by amitabhtri on अप्रैल 23, 2008

सिमी का फैलता जाल

 

प्रतिबन्धित इस्लामी संगठन स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट आफ इण्डिया या संक्षिप्त रूप में जिसे सिमी के नाम से जाना जाता है अब खुफिया एजेंसियों के लिये काफी बडा सिरदर्द बनता जा रहा है। खुफिया एजेंसियों के अनुसार सिमी ऐसा पहला आतंकवादी संगठन है जिसने देश के अन्दर बडे पैमाने पर देशी आतंकवादियों का नेटवर्क खडा कर लिया है और इन खुफिया एजेंसियों का यह भी मानना है कि यह देश में कार्यरत अनेक मुस्लिम चरमपंथी संगठनों के साथ मिलकर काम ही नहीं कर रहा है वरन उनके साथ मिलकर नेटवर्क को और अधिक व्यापक बना रहा है। यह खुलासा मार्च के महीने में इन्दौर से पकडे गये सिमी के 13 सदस्यों में से एक अमील परवेज के साथ पुलिस की पूछताछ के दौरान हुआ। परवेज ने बताया कि सिमी हैदराबाद स्थित चरमपंथी इस्लामी संगठन दर्सगाह जिहादो शहादत के साथ के साथ काफी निकट से सम्बद्ध है और इसके साथ मिलकर काम कर रहा है।

पूछ्ताछ के दौरान इस रहस्योद्घाटन से स्पष्ट हो गया है कि इस्लामी संगठन मिलकर काम कर रहे हैं और इनका विशेषकर सिमी का व्यापक नेटवर्क देश भर में स्थापित हो चुका है। पुलिस से पूछ्ताछ के दौरान अमील परवेज ने बताया कि दर्सगाह के अध्यक्ष शेख महबूब अली ने उसे मार्शल आर्ट की शिक्षा देने के लिये बुलाया था। इसके बाद पुलिस इस कोण पर भी जाँच कर रही है कि सिमी के देश भर में ऐसे कितने इस्लामी संगठनों के साथ सम्बन्ध हैं। पुलिस की इस बात को स्वीकार कर रही है कि यह तो एक  शुरूआत भर है और ऐसे कितने ही रहस्य अभी आगे खुलने शेष हैं।
 

इससे पूर्व भी हैदराबाद में दर्सगाह की गतिविधियों के बारे में और इसके उग्र स्वरूप के बारे में पहली बार तब पता चला था जब गुजरात के पूर्व मंत्री हरेन पाण्ड्या की हत्या के आरोपी मौलाना नसीरुद्दीन को पुलिस ने पकडा तो दर्सगाह के सदस्यों ने पुलिस पर पथराव कर उसे पुलिस की पकड से छुडाने का प्रयास किया और जबरन पुलिस की गाडी से उसे ले जाने का प्रयास करने लगे। इस घटना के उपरांत पुलिस ने जब भीड को तितर बितर करने के लिये गोली चलाई तो दर्सगाह का कार्यकर्ता मुजाहिद सलीम इस्लाही गोलीबारी में मारा गया।.

 

हैदराबाद के पुलिस आयुक्त ने भी स्वीकार किया कि वे इस संगठन के बारे में जानते हैं और सम्भव है कि सिमी के कुछ पूर्व सदस्य इस संगठन से सम्बद्ध हों। दर्सगाह के सम्बन्ध में उसकी वेबसाइट www.djsindia.org से जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसकी वेबसाइट के अनुसार इस संगठन का उद्देश्य मुस्लिम युवकों  को शारीरिक और मानसिक रूप से सशक्त बनाना और इस हेतु उन्हें प्रशिक्षण देना जो कि सशस्त्र भी हो सकता है। इस संगठन के अनुसार उसका प्रमुख उद्देश्य हिजाब के सिद्धांत को सख्ती से लागू कराना, शरियत, मस्जिद और कुरान की पवित्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करना, स्त्रियों की पवित्रता की रक्षा करना,  इस्लामी सुधार के लिये मार्ग प्रशस्त करना और अंत में इसके उद्देश्य में कहा गया है कि अल्लाह और इस्लाम  की सर्वोच्चता स्थापित करना। लेकिन जिस बात ने खुफिया एजेंसियों को इस संगठन के सम्बन्ध में सर्वाधिक सतर्क किया है वह है इसके प्रशिक्षण की एक व्यवस्था जिसके अंतर्गत हैदराबाद के बाहरी क्षेत्रों में कुछ विशिष्ट लोगों को छांटकर प्रशिक्षण दिया जाता है। परवेज ने पुलिस को बताया कि उसने 2007 में दो प्रशिक्षण शिविरों में भाग लिया था और इन शिविरों में अनेक कठिन प्रशिक्षण दिये गये जिनमें चाकू छूरी चलाने से लेकर पेट्रोल बम बनाने तक का प्रशिक्षण था। इस वेबसाइट ने एक किशोर का चित्र भी लगा रखा था जिसके हाथ में एक पट्टिका थी जिस पर लिखा था कुरान हमारा संविधान है और मैं उसका सिपाही परंतु कुछ समाचार पत्रों में इसके बारे में समाचार प्रकाशित होने के बाद फिलहाल इस चित्र को वहाँ से हटा दिया गया है।

 

पुलिस से पूछ्ताछ में जब सिमी और दर्सगाह के परस्पर सम्बन्धों की बात निकली तो दर्सगाह के अध्यक्ष शेख महबूब अली ने सिमी के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्धों से तो इंकार किया और कहा कि उनके संगठन के अन्य किसी संगठन से सम्बन्ध नहीं है परंतु यह माना कि देश भर में उनके 10-12 केन्द्र हैं और कौन कहाँ प्रशिक्षण प्राप्त करता है इसका रिकार्ड रखना सम्भव नहीं है। परवेज ने पूछ्ताछ में बताया कि प्रशिक्षण के दौरान शिविर के प्रभारी सफदर और कमरुद्दीन ने उसे बताया था कि यह आरम्भिक प्रशिक्षण है और इसके बाद जो लोग छांटे जायेंगे उन्हें पुनः प्रशिक्षित किया जायेगा।
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परवेज की पूछ्ताछ में सिमी के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस्लामी संगठनों से सम्पर्क की बात सामने आयी है 1997 में अलीगढ में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसकी अध्यक्षता सिमी के तत्कालीन अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही ने की थी और उस सम्मेलन में परवेज के साथ 20 वर्षीय फिलीस्तीनी मूल के हमास नामक फिलीस्तीनी आतंकवादी संगठन के सदस्य शेख सियाम ने भी भाग लिया था। परवेज ने पूछ्ताछ के दौरान यह भी स्पष्ट किया है कि 2001 में इस संगठन पर प्रतिबन्ध लग जाने के बाद भी किस प्रकार यह सक्रिय रहा और अपनी गतिविधियाँ चलाता रहा। परवेज के अनुसार काफी सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद सफदर नागौरी और नोमन बद्र ने इस संगठन को नये सिरे से खडा किया। परवेज के अनुसार नगौरी ने उससे कहा कि वह प्रतिबन्ध हटवाने का पूरा प्रयत्न करेगा और इस आन्दोलन को समाप्त नहीं होने देगा।

 

पिछ्ले महीने मध्य प्रदेश में इन्दौर में पकडे गये सिमी के सदस्यों ने देश के समक्ष अनेक प्रश्न खडे कर दिये हैं। 2001 में प्रतिबन्ध लगने के बाद भी यह संगठन कभी निष्क्रिय नहीं हुआ और पिछ्ले दो तीन वर्षों में देश में हुई बडी आतंकवादी घटनाओं में इसका हाथ रहा है या इसी संगठन ने उन्हें अंजाम दिया है। इस संगठन की सक्रियता के मूल कारण पर जब हम विचार करते हैं तो हमें कुछ तथ्य स्पष्ट रूप से दिखायी पडते हैं एक तो हमारे राजनीतिक दलों द्वारा इस्लामी आतंकवाद के मुद्दे को वोट बैंक की राजनीति से जोड्कर देखना और दूसरा इस्लामी धार्मिक नेतृत्व या बुध्दिजीवियों द्वारा आतंकवाद को हतोत्साहित करने के स्थान पर मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा को प्रोत्साहित कर सरकार, राज्य, प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों को कटघरे में खडा कर इस्लामी प्रतिरोध की शक्तियों को कुण्ठित करना।

 

2001 में जब तत्कालीन एन.डी.ए सरकार ने सिमी पर पहली बार प्रतिबन्ध लगाया तो उस समय विपक्ष की नेत्री श्रीमती सोनिया गाँधी ने इसकी आलोचना की और उनका साथ उनके ही दल की सदस्या अम्बिका सोनी ने दिया। फिर जब सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाली यू.पी.ए की सरकार केन्द्र में बनी तो इस सरकार ने भी सिमी पर प्रतिबन्ध को जारी रखा। यह उदाहरण संकेत करता है कि आतंकवाद जैसे मह्त्वपूर्ण मुद्दे पर भी राजनीतिक दलों में आम सहमति नहीं बन पायी है और इसे भी राजनीतिक मोल तोल के हिसाब से देखा जा रहा है। राजनीतिक दलों के इस रवैये का सीधा असर सुरक्षा एजेंसियों पर पड्ता है जो तमाम जानकारियों और प्रमाणों के बाद भी आरोपियों पर कार्रवायी करने में हिचकती हैं या उन्हें कार्रवायी धीरे धीरे करने का निर्देश दिया जाता है। दोनों ही दशाओं में इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करने वालों का मनोबल बढता है और वे अवसर पाकर अपनी ताकत और अपना नेटवर्क बढा लेते हैं।

 

प्रतिबन्ध के बाद भी सिमी का इस मात्रा में सक्रिय रहना और ताकतवर रहना एक और मह्त्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत करता है जिसका उल्लेख ऊपर भी किया गया है कि इस्लामी धर्मगुरूओं और बुद्धिजीविओं की भूमिका इस सम्बन्ध में सन्दिग्ध है। अभी कुछ महीने पहले जब उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में स्थित प्रमुख इस्लामी संस्थान दारूल- उलूम देवबन्द ने आतंकवाद के सम्बन्ध में एक बडा सम्मेलन आयोजित किया और उस सम्मेलन के द्वारा इस्लाम और आतंकवाद के मध्य किसी भी सम्बन्ध से इन्कार किया तो भी जैसे प्रस्ताव वहाँ पारित हुए उनमें राज्य, प्रशासन, पुलिस को ही निशाना बनाया गया और पूरे प्रस्ताव में सिमी जैसे संगठनों के बारे में एक भी शब्द नहीं बोला गया। पिछ्ले लेख में भी लोकमंच में इस बात को उठाया गया था कि एक ओर तो आतंकवाद के विरुद्ध फतवा जारी किया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर सिमी का नेटवर्क फैलता जा रहा है। यहाँ तक कि सरकार ने संसद में स्वीकार किया है कि सिमी का नेटवर्क दक्षिण भारत और पश्चिमी भारत के अनेक प्रांतों में फैल चुका है। इससे तो यही संकेत मिलता है कि ऐसे संगठनों को रोकने की इच्छा शक्ति का अभाव है। सरकार जिसका नेतृत्व राजनीतिक दल कर रहे है उनमें ऐसे तत्वों को रोकने की शक्ति नहीं है क्योंकि उनके लिये मुस्लिम वोट अधिक महत्व रखते हैं और इस्लामी धर्मगुरूओं या बुद्धिजीवियों में इस्लाम के नाम पर आतंक फैला रहे तत्वों को रोकने की इच्छा नहीं है क्योंकि यदि उनमें ऐसी इच्छा होती तो वे मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा को सशक्त बनाकर या खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को निशाने पर लेकर इस्लामी आतंकवादियों को बचने का रास्ता नहीं प्रदान करते।

 

देश भर में सिमी के फैलते जाल ने हमारे समक्ष अनेक प्रश्न खडे कर दिये हैं जिनके प्रकाश में इस्लामी आतंकवाद के सम्बन्ध में नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। यह समस्या एक विचारधारा से जुडी है और उस विचारधारा की तह तक जाना होगा। इस समस्या को बेरोजगारी या अल्पसंख्यकों के देश की मुख्यधारा से अलग थलग रहने जैसे सतही निष्कर्षों से बाहर निकल कर पूरी समग्रता में लेने की आवश्यकता है। उन तथ्यों का पता लगाने की आवश्यकता है कि इस्लामी धर्मगुरु और बुध्दिजीवी आखिर क्योंकर इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले संगठनों के विरुद्ध मुखर होकर उन्हें इस्लाम विरोधी घोषित नहीं करते।

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फतवा और आतंकवाद साथ- साथ

Posted by amitabhtri on अप्रैल 13, 2008

पिछ्ले दिनों जब उत्तर प्रदेश में सहारनपुर स्थित प्रमुख इस्लामी संस्था दारूल उलूम देवबन्द ने आतंकवाद की भर्त्सना करने जैसा दिखने वाला एक बडा सम्मेलन आयोजित किया और उसमें आतंकवाद और इस्लाम के मध्य परस्पर किसी भी सम्बन्ध से इंकार करते हुए भी अनेक ऐसी बातें कहीं जो इन मौलवियों या इस्लामी धर्मगुरुओं की नीयत पर प्रश्न खडा करने के लिये पर्याप्त था। इन बातों में सबसे प्रमुख बात यह थी कि आतंकवाद के नाम पर सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ निर्दोष मुसलमानों को निशाना बना रही हैं और उन्हें हिरासत में लिया जा रहा है। इसी क्रम में इस सम्मेलन में कहा गया कि मदरसों को भी नाहक परेशान किया जा रहा है। इस उलेमा सम्मेलन की काफी चर्चा हुई और अनेक लोगों ने इसे अत्यंत सकारात्मक पहल घोषित किया। भारतीय जनता पार्टी के नेता और एक प्रमुख हिन्दी दैनिक में वरिष्ठ स्तम्भकार ने तो इस सम्मेलन को नरमपंथी इस्लाम के विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम की सन्ज्ञा तक दे डाली तो वहीं कुछ अन्य लेखकों ने इस मामले पर काफी सधी टिप्पणी की।

 

इस विषय पर लोकमंच में प्रकाशित किये गये आलेख में उलेमा सम्मेलन को लेकर कुछ प्रश्न खडे किये गये थे और इस सम्मेलन के प्रस्तावों और इसमें हुई चर्चा के आधार पर आशंका प्रकट की गयी थी कि ऐसे प्रयास एक सोची समझी रणनीति का अंग हैं जिसका प्रमुख उद्देश्य समाज में इस्लामवाद के प्रतिरोध की शक्ति को कुन्द करना है और इस पूरी बहस में आतंकवाद की प्रेरणास्रोत विचारधारा पर चर्चा होने से रोकना है। यह विषय इस समय फिर से लाने के पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं।

 

मार्च महीने से लेकर इस अप्रैल महीने तक भारत में अनेक इस्लामी आतंकवादी नेटवर्क या आतंकवादी गिरफ्तार किये गये हैं।  इसमें सबसे उल्लेखनीय गिरफ्तारी सिमी के सदस्यों की है। मार्च के महीने में इन्दौर में सिमी के कुछ सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद एक के बाद एक राज खुलते गये और अंततोगत्वा मध्य प्रदेश के एक क्षेत्र चोरल में सिमी के आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर का भी पता चला और यह भी पता लगा कि यहाँ छोटे बच्चों को भी सशस्त्र प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था और उन बच्चों को शिविर में देखभाल के लिये महिलाओं का एक बल शाहीन बल के नाम से गठित गिया गया था। सिमी के पकडे गये सदस्यों में इस संगठन का मुखिया सफदर नागौरी  भी शामिल है जिसका 11 जुलाई को मुम्बई के ट्रेन धमाकों के सिलसिले में मुम्बई के सिमी को जेल से पत्र लिखने का मामला भी काफी चर्चा में आया और इससे इन धमाकों में सिमी के लिप्त होने की पुष्टि भी हो गयी। मध्य प्रदेश से ही पकडे गये सिमी के सद्स्यों से पता चला कि हैदराबाद में मक्का मस्जिद में हुए धमाकों के तार भी सिमी से जुडे हैं।

 

पिछ्ले वर्ष कर्नाटक में आतंकवादी प्रशिक्षण होने का समाचार एक चौंकाने वाली घटना थी और अब मध्य प्रदेश में ऐसे शिविर के मिलने से एक बात स्पष्ट हो गयी है कि भारत में आतंकवाद का आधारभूत ढाँचा अब निर्णायक स्थिति में पहुँच गया है और इस सम्स्या पर समग्रता से विचार करने की आवश्यकता है। समग्रता से तात्पर्य है कि इस समस्या के पीछे के विचारधारागत स्रोत को पहचानने की आवश्यकता है। क्या इस सम्बन्ध में सार्थक प्रयास हो रहे हैं। दुर्भाग्यवश इसका उत्तर नकारात्मक है। ऐसा इसलिये है कि भारत में बहुत कम संख्या में लोग ऐसे हैं जो इस समस्या को कानून व्यवस्था से परे कहीं अधिक व्यापक सन्दर्भ में देखना चाह्ते हैं। यह बात सत्य है कि इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद को पूरी तरह इस्लाम धर्म से नहीं जोडा जा सकता परंतु यह भी सत्य है कि इसके पीछे की प्रेरणास्रोत विचारधारा पूरी तरह इस्लाम से प्रेरणा ग्रहण करती है और इसका उद्देश्य भले ही विश्व में शक्ति के आधार पर इस्लाम की सर्वोच्चता स्थापित करना और विश्व का संचालन शरियत या इस्लामी कानून के आधार पर सुनिश्चित करना हो इस राजनीतिक इस्लाम की अवधारणा से इस्लामी धर्म के विद्वान और धर्मगुरु भी असहमत नहीं दिखते। यही विषय सर्वाधिक चिंता का कारण है और इसी कारण अंतर्धार्मिक बह्सों या आडम्बरी फतवों से इस समस्या का समाधान सम्भव नहीं है।

 

अभी कुछ दिनों पूर्व मुझे किसी मित्र ने मुम्बई स्थित इस्लामिक रिसर्च फाउण्डेशन और उसके प्रमुख डा. जाकिर नाइक के सम्बन्ध में बताया। उनके सम्बन्ध में अधिक जानने की जिज्ञासा से जब इण्टरनेट पर ढूँढा तो मुझे कुछ विषयों पर घोर आश्चर्य हुआ और उनके कुछ विचार इतने असहिण्णु दिखे कि उनमें और इस्लामवादी आतंकवादियों के एजेण्डे में विशेष अंतर नहीं दिखा। वीडियो की प्रसिद्ध साइट यू-ट्यूब पर डा. जाकिर नाइक का एक वीडियो है जो प्रसिद्ध इस्लामी चैनल Q TV के प्रश्नोत्तर पर आधारित है इस वीडियो में डा जाकिर नाइक स्पष्ट रूप से कहते हैं कि इस्लाम को छोडकर शेष सभी धर्म गलत हैं और वे गलत सीख देते हैं इसी कारण इस्लामी देशों में गैर मुस्लिम धर्मों का प्रचार या उनके उपासना स्थल बनाने की आज्ञा नहीं दी जा सकती। इस सम्बन्ध में तर्क के लिये उन्होंने एक उदाहरण दिया है जो अत्यंत रोचक है उनके अनुसार यदि किसी विद्यालय के प्रधानाचार्य के पास तीन व्यक्ति गणित का अध्यापक बनने आयें और प्रधानाचार्य उससे प्रश्न पूछे कि दो और दो कितने होते हैं और उनमें से एक का उत्तर हो चार, दूसरा कहे पाँच और तीसरा कहे छह तो प्रधानाचार्य उसी को अध्यापक नियुक्त करेगा जो उत्तर में दो और दो चार कहेगा न कि पाँच और छ्ह कहने वाले को। नाइक के अनुसार शेष दो को लगता है कि दो और दो पाँच और छह होता है पर प्रधानाचार्य को पता है कि यह गलत है इसलिये वह गलत शिक्षा अपने छात्रों को नहीं लेने देगा। जाकिर नाइक के अनुसार यही फार्मूला धर्म के मामले में भी है। गैर इस्लामी धर्मों को लगता है कि उनकी शिक्षायें ठीक हैं परंतु इस्लाम के अनुयायी जानते हैं कि वे गलत हैं और यदि किसी का दीन( धर्म) सही है तो वह सिर्फ इस्लाम है। यही कारण है कि इस्लामी देशों में अपने धर्म का प्रचार करने या उपासना स्थल बनाने की छूट गैर मुसलमानों को नहीं है।

 

 

डा. जाकिर नाइक को इन दिनों अंतरधार्मिक विमर्श के सम्बन्ध में और तुलनात्मक धार्मिक अध्ययन का विशेषज्ञ माना जाता है जो इसी विषय पर विश्व के अनेक देशों में व्याख्यान देते हैं। ऐसे व्यक्ति के विचार यदि इतने असहिण्णु हैं जो इस्लामी सर्वोच्चता के सिद्धांत से परिपूर्ण है उससे इस बात कि अपेक्षा भला कैसे की जा सकती है कि वह ऐसे प्रयासों से विश्व में सहिण्णुता की स्थिति निर्माण करने में सहायक हो सकेगा।

 

इन्हीं महोदय ने मुम्बई में ही एक हिन्दू और इस्लाम के मध्य समानताओं के विषय पर एक व्याख्यान का आयोजन किया जिसका पूरा वीडियो यू-ट्यूब पर उपलब्ध है। इस पूरे व्याख्यान में केवल एक बार कुछ मिनटों के लिये आर्य समाज के तीन विद्वानों को वैदिक ऋचाओं के पाठ के लिये मंच पर स्थान दिया गया और उसके उपरांत दोनों धर्मों की समानता पर डा जाकिर नाइक का एकपक्षीय भाषण होता रहा परंतु उनके भाषण का लब्बोलुआब यही रहा कि यदि हिन्दू इस्लाम की भाँति अल्लाह को सर्वोच्च ईश्वर स्वीकार करे तो ही दोनों धर्मों में सद्भाव सम्भव है। यह सन्दर्भ इसलिये मह्त्वपूर्ण है कि इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करने वाले भी यही तर्क देते हैं कि उनका उद्देश्य गलत दीन का पालन कर रहे लोगों को अल्लाह के सही रास्ते पर लाना है। यही तर्क यदि इस्लाम के जानकार और विद्वान भी देते हैं कि इस्लाम के अतिरिक्त शेष धर्म अन्धकारमय हैं तो चिंता होती है कि इन दोनों की सोच में अंतर नहीं है अंतर है तो केवल उद्देश्य प्राप्त करने के तरीके में। एक इतना असहिण्णु है कि उसकी बात न मानने वाले को मौत के घाट उतार देता है और दूसरा यह कह कर लानत भेजता है कि तुम गलत रास्ते पर हो और सही रास्ता हमारा है।

विश्व के अनेक देशों में और विशेषकर यूरोप में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस्लाम के तथाकथित प्रतीकों पर भी चर्चा का दौर आरम्भ हो गया है और इस विषय को लेकर इस्लाम में कुछ बेचैनी भी अनुभव की जा रही है तो भी भारत में यह विषय अब भी बह्स की परिधि से बाहर है और पिछ्ले महीने देश की राजधानी में बुद्धिजीवियों के मध्य एक घटना घटित हुई जिस पर विशेष संज्ञान नहीं लिया गया परंतु यह घटना हमारी लेख की इस विषयवस्तु को पुष्ट ही करती है कि जब भी आतंकवाद के नाम पर वामपंथियों या इस्लामवादियों द्वारा कोई बहस आयोजित की जाती है तो वह पूरे विषय के मूल स्रोत पर चर्चा करने के स्थान पर इस विषय पर केन्द्रित हो जाती है कि किस प्रकार मुसलमानों का उत्पीडन आतंकवाद को प्रेरित करता है। आज समस्त विश्व में मुस्लिम उत्पीडन की एक मिथ्या अवधारणा को सृजित किया गया है और इसके इर्द-गिर्द इस्लामी आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराया जा रहा है।

 

पिछ्ले महीने 2 मार्च को राष्ट्रीय राजधानी स्थित उर्दू प्रेस क्लब में आतंकवाद और फासिज्म: एक ही सिक्के के दो पहलू विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी और इसमें प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्त्री और लेखिका अरुन्धती राय, संसद पर आक्रमण के दोषी रहे और फिर साक्ष्यों के अभाव में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बरी किये गये गिलानी, प्रसिद्ध टी वी पत्रकार मनोज रघुवंशी सहित अनेक मुस्लिम वक्ता भी थे। उस कार्यक्रम में भाग लेने गये विश्व हिन्दू परिषद के एक नेता सुरेन्द्र जैन ने आँखो देखा हाल बताया कि अरुन्धती राय और गिलानी ने भारत सरकार को जमकर कोसा और निष्कर्ष निकाला कि भारत में कानून व्यवस्था जैसी कोई चीज नहीं है और घोर अराजकता का माहौल है।

 

पत्रकार मनोज रघुवंशी ने मुस्लिम उत्पीडन के नाम पर इस्लामी आतंकवाद तो न्यायसंगत ठहराने की प्रवृत्ति की आलोचना की तो पूरे सभाकक्ष में शोर मचने लगा। इसके बाद हसनैन नामक एक वक्ता बोलने के लिये उठे और उन्होंने श्री राम और सीता पर अभद्र टिप्पणियाँ की और श्री राम को युद्ध प्रेमी सिद्ध कर दिया। इनके बाद जब विश्व हिन्दू परिषद के नेता सुरेन्द्र जैन बोलने आये तो उन्होंने श्री राम पर की गयी टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यदि इसी प्रकार की टिप्पणियाँ आपके पैगम्बर पर की जायें तो आपको कैसा लगेगा। इसके बाद तो सभाकक्ष में जम कर बवाल हो गया और मंच पर तथा दर्शकों में से लोगों ने वक्ता को घेर लिया और हाथापाई की नौबत आ गयी। किसी ने वक्ता को धमकाते हुए कहा कि 6 दिसम्बर से अब तक 10 हिन्दुओं को मार चुका हूँ और 11वाँ नम्बर तेरा है। मंच पर 13 से 15 लोगों ने वक्ता को घेर लिया और काफी देर बाद पुलिस आयी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता को सुरक्षित निकाल ले जा पाई।

 

इस घटना के भी निहितार्थ हैं। इस्लाम के धर्मगुरु या विद्वान जब व्याख्यान देते हैं तो इस अजीब तर्क पर जोर देते हैं कि इस्लाम का आकलन उसके धर्मग्रंथों के आधार पर किया जाना चाहिये न कि उसके अनुयायियों के आधार पर क्योंकि अनुयायी प्रायः धर्म को सही नहीं समझते और उनका आचरण धर्म के विपरीत होता है। इस धारणा को अंग्रेजी में Apologetic कहते हैं इसके लिये हिन्दी में कोई समानान्तर शब्द नहीं है परंतु ये वही लोग हैं जो अपने तर्कों के आधार पर इस्लामी आतंकवाद को इस्लाम से अस्पृक्त भी करते हैं और आतंकवाद को मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा के आधार पर न्यायसंगत भी ठहराते हैं। यह प्रवृत्ति कितनी खतरनाक है इसका पता उपर्युक्त उदाहरण से बखूबी चलता है कि बुद्धिजीवी माने जाने वाले मुसलमान भी दूसरे धर्मों के महापुरुषों का सम्मान नहीं करते और उनपर टिप्पणी करना अपना लोकतांत्रिक अधिकार मानते हैं और वही अधिकार जब उनके शीर्ष पुरुषों के सम्बन्ध में प्रयोग किया जाता है तो इसे ईशनिन्दा मानकर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। यह अवधारणा किस ओर संकेत करती है और ऐसे लोग इस्लामी आतंकवाद की आग बुझाने में कितने सक्षम होंगे इसका निष्कर्ष पाठक ही निकालें तो श्रेयस्कर होगा।

 

आजकी सबसे बडी आवश्यकता इस्लामी आतंकवाद को व्यापक सन्दर्भ में समझने और उसके पीछे की मूल प्रेरणा को पहचानने की है। क्योंकि यह कानून और व्यवस्था का प्रश्न नहीं है इसके पीछे एक सोच है और जब तक उस सोच पर प्रहार नहीं होगा तब तक आतंकवाद से मुक्ति प्राप्त कर लेने से भी इस्लामी सर्वोच्चता और शरियत लागू करने की सोच से प्रेरित इस्लामवाद पर विजय नहीं प्राप्त की जा सकती क्योंकि इस्लामवादी केवल आतंकवादी नहीं हैं वे भी हैं जो इसी उद्देश्य को शांतिपूर्ण तरीके से प्राप्त करना चाह्ते हैं। ऐसे तत्वों से भी सावधान रहने की आवश्यकता है।    

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इस्लाम में बेचैनी ?

Posted by amitabhtri on अप्रैल 5, 2008

लोकमंच ने अपने पिछले कुछ लेखों में उल्लेख किया है कि किस प्रकार पश्चिम और इस्लाम आपस में टकराव की मुद्रा में आ गये हैं। इस्लामी और पश्चिम जगत में घट रही घटनायें इसी प्रवृत्ति की ओर बार बार संकेत कर रही हैं। पिछ्ले महीने दो विशेष घटनायें घटित हुईं जो इस्लाम और पश्चिम तथा कैथोलिक चर्च के मध्य सम्बन्धों में और तनाव उत्पन्न कर सकती हैं और इनमें से एक घटना तो निश्चय ही ऐसी है जो दीर्घगामी स्तर पर प्रभाव डाल सकती है।

 

22 मार्च को ईसाइयों के मह्त्वपूर्ण पर्व ईस्टर के दिन वेटिकन में रोमन कैथोलिक चर्च के सर्वश्रेष्ठ धर्मगुरु पोप बेनेडिक्ट ने मिस्र मूल के मुसलमान और पिछ्ले काफी वर्षों से इटली में निवास कर रहे मगदी आलम को पूरे विधिविधान से ईसाइत में दीक्षित कर लिया। मगदी आलम पिछ्ले काफी वर्षों से इटली में निवास कर रहे थे और इस विषय पर भी मतभेद था कि मगदी आलम क्या आस्थावान मुसलमान थे या नहीं। यह विषय सर्वप्रथम 2007 में चर्चा में आया था जब लन्दन के मेयर द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में मध्य पूर्व के प्रसिद्ध विद्वान और इस्लामी विषयों के जानकार डा. डैनियल पाइप्स ने इस्लामवाद से लडाई के लिये सभ्यतागत लोगों के मध्य सहयोग की आवश्यकता जताते हुए उन्होंने मगदी आलम को एक इस्लाम धर्मानुयायी बताया जो नरमपंथी हैं और उनका सहयोग लेने की बात कही। इस बात पर एक और इस्लामी विद्वान तारिक रमादान ने आपत्ति जताते हुए डा. डैनियल पाइप्स पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि मगदी आलम एक ईसाई हैं। डा. डैनियल पाइप्स ने इसका खण्डन किया और प्रमाणित किया कि मगदी आलम एक मुसलमान हैं। यह सन्दर्भ यहाँ इसलिये महत्वपूर्ण है कि इस्लामी विषयों पर नजर रखने वाले लोगों के मध्य यह खासी चर्चा का विषय बना था। यह भ्रम इसलिये भी बना क्योंकि मगदी आलम का मध्य का नाम क्रिस्टोफर है। परंतु जब 22 मार्च को पोप ने विधिवत ढंग से मगदी आलम का धर्मांतरण कराया तो इस विषय में कोई सन्देह नहीं रह गया कि मगदी आलम एक मुसलमान थे।

 

यह विषय अत्यंत मह्त्व का इसलिये है कि इतने बडे पैमाने पर एक वैश्विक मह्त्व वाले दिन एक महत्वपूर्ण मुसलमान का धर्मांतरण करा कर कैथोलिक चर्च ने क्या सन्देश देने का प्रयास किया है। विशेषकर इन समाचारों के मध्य कि विश्व में कैथोलिक जनसंख्या अब मुसलमानों के बाद दूसरे स्थान पर आ गयी है। यहाँ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि कुल ईसाई अब भी मुसलमानों से अधिक हैं केवल कैथोलिक सम्प्रदाय दूसरे स्थान पर आ गया है।

 

मगदी आलम ने धर्मांतरण के उपरांत तत्काल एक बयान दिया और अपने पुराने धर्म पर टिप्पणी करते हुए कहा कि समस्त विश्व में जो कुछ भी आतंकवाद इस्लाम के नाम पर चल रहा है उसके लिये इस्लाम धर्म भी उत्तरदायी है। इस घटना के अपने निहितार्थ हैं। अर्थात कैथोलिक सम्प्रदाय अपनी संख्या की पूर्ति के लिये उन मुसलमानों को अपने शिविर में लाने से परहेज नहीं करेगा जो इस्लाम धर्म बदलना चाहेंगे। इससे इस्लाम और कैथोलिक चर्च में टकराव सुनिश्चित है। क्योंकि अभी तक चर्च खुलेआम मुसलमानों का धर्मांतरण करने से परहेज करता था और अंतर्धार्मिक बह्स के लिये इस्लाम से बातचीत के लिये अधिक उत्सुक दिख रहा था। परंतु अब इस नये घटनाक्रम से स्पष्ट है कि चर्च इस्लाम के विषय पर अधिक आक्रामक रणनीति अपनाने की फिराक में है जिसमें धर्मांतरण का जवाब धर्मांतरण से देने की नीति अपनाई गयी है।

इस्लामी विश्व में किसी मुसलमान को अपना धर्म छोडने की आज्ञा नहीं है और ऐसा करने पर उसके लिये मृत्युदण्ड का विधान है। मगदी आलम के धर्मांतरण से भी ऐसे ही प्रश्न उठने वाले हैं क्योंकि मगदी आलम एक इस्लामी राज्य का मूलनिवासी है। तो क्या यह माना जाये कि यह धर्मांतरण एक विशेष राजनीतिक सन्देश है जो इस्लाम धर्म के उन तमाम अनुयायियों को एक सन्देश है जो इस्लाम में बेचैनी अनुभव कर रहे हैं परंतु धर्मांतरण के कडे नियमों के चलते धर्म बदलने के बारे में नहीं सोच पाते। यह इस्लाम की दृष्टि से एक ऐतिहासिक घटना है क्योंकि इससे पूर्व जितने भी मुसलमानों ने इस्लाम की आलोचना की थी उन्होंने धर्म परिवर्तन के विकल्प पर विचार नहीं किया था चाहे वह सलमान रश्दी हों, तस्लीमा नसरीन हों या फिर  सोमालिया मूल की अयान हिरसी अली हों। इन लोगों ने यूरोप के देशों में या अन्य देशों में शरण तो ले ली परंतु धर्म नहीं छोडा।

 

इसके पीछे मुख्य रूप से दो प्रमुख कारण थे एक तो ये लोग इस्लाम धर्म छोडने को लेकर इस्लाम में मृत्युदण्ड की व्यवस्था से चिंतित थे और अपने जीवन पर और अधिक संकट नहीं लाना चाह्ते थे और दूसरा कारण यह कि सामान्य रूप से पश्चिम और विशेष रूप से कैथोलिक चर्च इस्लाम के साथ प्रत्यक्ष रूप से टकराव मोल नहीं लेना चाह्ता था। तो प्रश्न यह उठता है कि अब परिस्थितियों में ऐसा क्या परिवर्तन आ गया  है कि चर्च इस्लाम के मह्त्वपूर्ण व्यक्ति का धर्मांतरण करने में कोई हिचक नहीं दिखा रहा है जबकि कैथोलिक चर्च के साथ इस्लाम की ओर से अंतर्धार्मिक बातचीत में लगे प्रतिनिधि भी मानते हैं कि मगदी आलम के ईसाई बनने से से दोनों के मध्य सद्भाव के प्रयास को झटका लगेगा और दोनों पक्षों के सम्बन्धों में तनाव आ सकता है।

 

कैथोलिक चर्च के दृष्टिकोण में यह परिवर्तन अचानक नहीं आया है। कैथोलिक चर्च पिछ्ले कुछ वर्षों से इस्लामी जगत के मध्य यह विषय उठाता रहा है कि यदि ईसाई बहुल देशों में इस्लाम धर्म के अनुयायियों को हर प्रकार की धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है और उन्हें प्रार्थना करने या मस्जिद बनाने की स्वतंत्रता है तो फिर मुस्लिम बहुल देशों में भी ईसाई धर्म के अनुयायियों को यही स्वतंत्रता मिलनी चाहिये और समानता के इस सिद्धांत पर जोर पोप जान पाल के समय से ही देना आरम्भ कर दिया गया था जब वैटिकन के विदेश मंत्री स्तर के जीन लुइस तौरोन ने पहली बार 2003 में स्पष्ट रूप से कहा था कि मुस्लिम बहुल देशों में ईसाइयों के साथ द्वितीय श्रेणी के नागरिकों जैसा व्यवहार हो रहा है।  पोप बेनेडिक्ट के समय में इस सिद्धांत पर अधिक आग्रह किया जाने लगा। इसी का परिणाम था कि अनेक अरब देशों में चर्च बनाने के प्रस्तावों पर चर्चा होने लगी यह बात और है कि इसका स्थानीय कट्टरपंथी मौलवियों ने कडा विरोध किया और ऐसे प्रस्तावों का प्रतिफल अभी तक सामने नहीं आया है परंतु ऐसे प्रस्तावों पर चर्चा कैथोलिक चर्च के कठोर रूख की ओर संकेत अवश्य देता है तो क्या माना जाये कि चर्च अब अधिक मुखर होकर इस्लाम और ईसाइत के मध्य समानता के सिद्धांत को अपनाना चाह्ता है।

इसके अतिरिक एक और घटनाक्रम है जो पश्चिम के कठोर रूख की ओर संकेत करता है वह है हालैण्ड के सांसद और नेशनल फ्रीडम पार्टी के नेता गीर्ट वाइल्डर्स द्वारा कुरान पर एक फिल्म का निर्माण और उसका प्रदर्शन। इस फिल्म के सम्बन्ध में पिछ्ले अनेक महीनों से चर्चा थी और इसके निर्माण से पूर्व ही इस पर काफी विवाद हो रहा था। हालाँकि इस फिल्म में सनसनीखेज या विवादित कुछ भी नहीं है फिर भी तमाम विवादों के बीच इस कानून निर्माता ने जिस प्रकार फिल्म के निर्माण फिर इसके प्रसारण में अपनी सक्रियता दिखाई है वह यूरोप की इस्लाम के प्रति बदलती मानसिकता का परिचय देता है।

 

मगदी आलम के धर्मांतरण और वाइल्डर्स की फिल्म के निर्माण और प्रसारण में जो अत्यंत उल्लेखनीय बात रही वह यह कि दोनों ही घटनाओं पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया नहीं हुई जिसकी आशंका जतायी जा रही थी। प्रतिक्रिया नहीं होने से ऐसी घटनाओं को करने या अपने धर्म और मूल्यों के प्रति अधिक आग्रह की प्रवृत्ति पश्चिम में और बढेगी और इससे इस्लाम में बेचैनी और अधिक बढेगी।

इस्लाम में बेचैनी की कुछ  मह्त्वपूर्ण घटनायें पिछ्ले दिनों घटित हुईं जिस पर विश्व की मीडिया का ध्यान बिल्कुल नहीं गया। इसी वर्ष यूरोप  के कुछ समाचार पत्रों में पैगम्बर मोहम्मद के कार्टून पुनः प्रकाशित होने पर इस्लामी विश्व में एक दूसरे प्रकार का चिंतन आरम्भ हुआ। फरवरी के अंत में एक कार्यक्रम में भाग लेते हुए यमन के प्रधानमंत्री अली मोहम्मद मुजावर ने प्रस्ताव किया कि विश्व स्तर पर ऐसे कानून का निर्माण होना चाहिये जो किसी भी धर्म के अपमान को आपराधिक कृत्य घोषित करे और धर्मों के समान सम्मान की भावना पर जोर दे। उन्होंने पश्चिम से अनुरोध किया कि वे इस्लाम की भावनाओं का सम्मान करें अन्यथा अस्थिरता ही बढेगी।

 

इसी प्रकार का प्रस्ताव सऊदी अरब सलाहकार समिति ने सऊदी सरकार को दिया तथा विदेश मंत्रालय से आग्रह किया कि वह अन्य अरब देशों, मुस्लिम देशों तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ मिलकर ऐसे प्रस्ताव पर विचार करें कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी सन्धि की जाये कि प्रत्येक धर्म के प्रतीकों, पैगम्बरों का सम्मान करते हुए सभी धर्मों के सम्मान को बल प्रदान किया जाये। सऊदी अरब सलाहकार समिति या मजलिसे अश शुरा की ओर से यह प्रस्ताव मोहम्मद अल कुवाहेश ने यूरोप और अमेरिका में पैगम्बर के कार्टूनों के प्रकाशन की प्रतिक्रिया में रखे थे। परंतु यह प्रस्ताव समिति ने 77 के मुकाबले 33 मतों से निरस्त कर दिया। इस प्रस्ताव को निरस्त करने के पीछे प्रमुख कारण यह बताया गया कि सभी धर्मों के प्रतीकों का सम्मान करने की अंतरराष्ट्रीय सन्धि का अर्थ होगा शेष धर्मों के प्रतीकों का सम्मान करना जो कि मुसलमानों के लिये सम्भव नहीं है। दूसरा कारण यह बताया गया कि इससे इस्लामी देशों में गैर मुसलमानों को अपने उपासना केन्द्र स्थापित करने की अनुमति मिल जायेगी।

 

इस घटनाक्रम के अपने निहितार्थ हैं। एक तो यह घटनाक्रम बताता है कि चतुर्दिक इस्लाम पर हो रहे हमलों से इस्लामी धार्मिक नेतृत्व और सामाजिक नेतृत्व बेचैन है और इसके लिये रास्ता निकालने का प्रयास कर रहा है और वहीं दूसरी ओर समस्त विश्व में इस्लाम की अनेक प्रवृत्तियों को लेकर मंथन आरम्भ हो गया है और इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद या फिर शरियत लागू करने की इस्लामी मतानुयायियों की इच्छा के आगे विश्व झुकने के स्थान पर अधिक आग्रह पूर्वक इसका प्रतिरोध करने की तैयारी कर रहा है। इस सम्बन्ध में यूरोप ने पहल की है और इस्लाम को कठोरतापूर्वक सन्देश देने का प्रयास किया है कि वह अपने इस्लामीकरण के लिये तैयार नहीं है इसके स्थान पर वह अपनी संस्कृति और मूल्यों के प्रति अधिक सजग हो रहा है।

जहाँ यूरोप और चर्च ने अपना आग्रह दिखाकर राजनीतिक और सांस्कृतिक सन्देश दिया है वहीं इस्लाम मतावलम्बी बेचैनी अनुभव कर रहे हैं और अनेक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं कि इस्लाम की छवि को सुधारा जा सके। इस क्रम में भारत में बडे बडे मुस्लिम सम्मेलन आयोजित  कर आतंकवाद की निन्दा की जा रही है परंतु ये प्रयास छवि सुधारने की कवायदें मात्र हैं क्योंकि आज तक इस्लामी धर्मगुरुओं ने उन मुद्दों को स्पर्श करने का प्रयास कभी नहीं किया जो वास्तव में समस्त विश्व के गैर मुसलमानों के लिये आशंका और चिंता के कारण हैं।

 

आज समस्त विश्व में जो वातावरण बन रहा है वह कतई उत्साहजनक नहीं है और संकेत यही मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में टकराव का यह वातावरण और भी तनावपूर्ण ही होने वाला है। विशेषकर कैथोलिक चर्च और यूरोप की भावभंगिमा से तो यही संकेत मिलता है कि इस्लाम और पश्चिम तथा कैथोलिक चर्च के मध्य सम्बन्ध सामान्य नहीं हैं और विश्व की शेष सभ्यतायें भी शीघ्र ही इसका अनुसरण करने लगें और इस्लाम के प्रति सशंकित हो जायें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।  

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तिब्बत और फिलीस्तीन

Posted by amitabhtri on मार्च 26, 2008

इन दिनों तिब्बत चर्चा में है। वैसे तो इसके पीछे जो कारण है उसे लेकर तो तिब्बती भी प्रसन्न नहीं होंगे पर दशकों उपरांत ऐसा अवसर जरूर आया है जब तिब्बत का विषय एकदम से वैश्विक मह्त्व का हो गया। हम यहाँ इस विषय पर चर्चा नहीं करना चाह्ते कि तिब्बत के इस विषय के मह्त्वपूर्ण होने के पीछे प्रमुख कारण क्या है वरन हम एक समानता की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाह्ते हैं जो न केवल रोचक है वरन उसके गम्भीर राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। साथ ही यह विषय कहीं न कहीं जाकर उन नारों से भी जुड्ता है जिसे विभिन्न संगठन या राजनीतिक दल समयसमय पर अपनी सुविधा के अनुसार गला फाड्फाड् कर लगाते हैं। ऐसा ही एक नारा मानवाधिकार का है जो विश्व भर  के वामपंथियों का सबसे प्रिय विषय है।

यह वामपंथियों के हाथ में वह छडी है जिससे वे जब चाहे जिसे चाहे मारते रह्ते हैं। इस नारे रूपी छडी का सर्वाधिक उपयोग इन वामपंथियों ने सबसे अधिक इजरायल या फिर हिन्दूवादी शक्तियों के लिये किया है। परंतु तिब्बत में जो कुछ भी हो रहा है उसे लेकर उनका जो भी रूख है वह उनके बौद्धिक आडम्बर को अनावृत करने के लिये पर्याप्त है।  तिब्बत में चीन का दमन इन छद्म बुद्धिजीवियों को मानवाधिकार का हनन नहीं चीन का आंतरिक मामला लगता है तो फिर यह सिद्धांत इजरायल पर लागू क्यों नहीं होता। या फिर गोधरा की प्रतिक्रिया में गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगों को लेकर जब विभिन्न वामपंथी संगठन गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को विश्व के विभिन्न मंचों पर बदनाम कर रहे थे और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से दखल देने की मांग कर रहे थे तो इनका आंतरिक मामले का सिद्धांत कहाँ चला गया था। यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर खोजने का प्रयास हम अपने लेख में कर रहे हैं। 

 तिब्बत और फिलीस्तीन में किस मामले में समानता है तो वो यह कि फिलीस्तीन भी दावा करता है कि वह अपनी स्वाधीनता की लडाई लड रहा है। लेकिन क्या तिब्बत को विश्व मंच पर वह स्थान कभी मिल सका या उसकी आवाज कभी सुनी गयी। आखिर क्यों नहीं। ऐसा क्यों हुआ जबकि तिब्बत वास्तव में 14,000 पुराना एक राष्ट्र है जिसकी अपनी संस्कृति और अपना धर्म है। जब कि इस मुकाबले फिलीस्तीन की तुलना करें तो वह इन सन्दर्भों में कभी राष्ट्र नहीं रहा। वह बीसवीं शताब्दी के लम्बे समय तक इजरायल का ही हिस्सा था और फिलीस्तीनियों को फिलीस्तीनी यहूदी कहा जाता था। फिलीस्तीनियों का इस्लाम से पृथक ऐसा कोई धर्म भी नहीं था जैसा कि तिब्बत के मामले में है। फिर भी समस्त विश्व में फिलीस्तीन की छवि एक ऐसे देश के निवासियों के रूप में है जिन्हें अपने देश से निकाल दिया गया है और उनके देश पर आक्रांता इजरायल ने कब्जा कर रखा है।

इस सहानुभुति का कारण क्या है। इसके कुछ कारण मोटे तौर पर ये नजर आते हैं फिलीस्तीन ने अपनी लडाई के लिये आतंकवाद का सहारा लिया जबकि तिब्बती शांति के उपासक हैं और सहिष्णु धर्म बौद्ध के अनुयायी हैं। फिलीस्तीन ने स्वयं को इजरायल से पीडित देश के रूप में प्रस्तुत किया जिसके आधार पर उसे विश्व में ध्रुवीकरण करने में सफलता मिली। फिलीस्तीन को विश्व के प्रायः सभी देशों का समर्थन प्राप्त हो गया क्योंकि यह विषय मुसलमानों से जुडा है और विश्व के सभी देश मुस्लिम तुष्टीकरण को अपनी विदेश नीति का अंग मानते हैं। इसके विपरीत तिब्बत मुस्लिम देश नहीं है इस कारण उसके प्रति सहानुभुति दिखाना किसी की मजबूरी या फैशन नहीं है। फिलीस्तीन को उन मुस्लिम देशों का समर्थन प्राप्त है जिनके पास तेल की दौलत है और इसके आधार पर वे विश्व् में धाक जमाते हैं और अपने प्रमुख सम्मेलनों में फिलीस्तीन के विषय को इस्लामी उम्मा के स्वाभिमान के साथ जोड्कर इस्लामी जनमानस की भावनाओं को उद्दीप्त करते हैं। जबकि इसके ठीक विपरीत तिब्बत का सहयोग करने को कोई तैयार नहीं है। ले देकर भारत ने तिब्बत की निर्वासित सरकार और उनके धर्मगुरु दलाई लामा को शरण दे रखी है तो वह भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस विषय को उठाने से कतराती है।

 फिलीस्तीन के विषय को अधिक प्रमुखता मिलने का एक बडा कारण विश्व बिरादरी की सबसे बडी कानून निर्माता संस्था सन्युक्त राष्ट्र संघ है। समस्त विश्व में इजरायल की अलोकप्रियता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानों कर्मकाण्ड ही बना लिया है कि प्रत्येक बैठक या सत्र में फिलीस्तीन के लिये इजरायल की निन्दा करता हुआ एक प्रस्ताव अवश्य होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ के इस रूख से फिलीस्तीन को वैश्विक मान्यता प्राप्त हो जाती है जबकि तिब्बत को पीडित करने वाला देश स्वयं संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य है इस कारण शायद ही कभी संयुक्त राष्ट्र संघ में तिब्बत में चीनी अत्याचार पर चर्चा हुई हो। फिलीस्तीन और तिब्बत की स्थिति में इस अंतर का एक प्रमुख कारण समाचार साधन हैं। विश्व भर के टी वी चैनलों पर ऐसे चित्र और समाचार आते हैं जो फिलीस्तीन को इजरायल द्वारा उत्पीडित देश के रूप में चित्रित करते हैं। फिलीस्तीन के अनेक हिस्सों से समाचार और टी वी छवि आती रह्ती है जिसके आधार पर लोग अपना दृष्टिकोण बनाते हैं। इसके विपरीत तिब्बत में जो कुछ भी हो रहा है उसके बारे में विश्व को उतना ही पता लग पाता है जितना चीन विश्व को बताना चाह्ता है। वैसे यह अजीब विडम्बना है कि जिस देश को वामपंथी रक्त पिपासु सिद्ध करना चाह्ते हैं उसके यहां कम से कम मीडिया पर सेंसर तो नहीं है। 

 फिलीस्तीन और तिब्बत की स्थिति में अंतर का एक प्रमुख कारण यह भी है कि तिब्बत पर अधिकार करने वाला देश स्वयं वामपंथी या कम्युनिस्ट है जबकि इसके विपरीत  फिलीस्तीन का मुद्दा विश्व के समस्त वामपंथियों के लिये प्रमुख विचारधारागत मुद्दा है जो उन्हें आपस में जोड्कर रखता है। विश्व के किसी भी कोने में कोई वामपंथी क्यों न हो उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता की पहचान इसी से होती है कि फिलीस्तीन और इजरायल मसले पर उसका रूख क्या है।आखिर वह कौन सा कारण है जो कम्युनिस्टों और वामपंथियों को फिलीस्तीन के निकट लाता है और इतना निकट लाता है कि वे यासर अराफात के इंतिफादा या आत्मघाती हमलों में भी कोई बुराई नहीं देखते। उन्हें तो इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करने वाले भी अपने सहयोगी लगते हैं। ऐसा क्यों?  इसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक कारण भी है।

द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत जब शीत युद्ध् आरम्भ हुआ तो साम्यवादियों या वामपंथियों को लगता था कि अब पूँजीवाद ध्वस्त हो जायेगा और पूँजीवाद के अंतर्गत पूँजी पर नियंत्रण की भावना के चलते कर्मचारी और मजदूर असंतुष्ट होंगे और समस्त विश्व में सर्वहारा संग़ठित होकर एक क्रांति को जन्म देगा और रूस का माडल एक स्थाई व्यवस्था बन जायेगा। परंतु ऐसा हुआ नहीं। पूँजीवाद की व्यवस्था के रह्ते हुए भी कर्मचारियों की जेबें भरती रहीं और मजदूर भी सर्वहारा क्रांति से दूर ही रहे। 1990 के दशक में सोवियत संघ के पतन के उपरांत साम्यवाद का आर्थिक दर्शन समाप्त हो गया और उसके अस्तित्व का एकमात्र दर्शन रह गया अमेरिका का विरोध। अपने दर्शन के बूते जब साम्यवादियों में अमेरिका को नष्ट करने की कूबत न रही तो उन्हें इस्लामवादियों में नया साथी दिखाई पडा। इसी कारण उन्होंने 2000 के उपरांत अपने सभी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में इजरायल फिलीस्तीन को अपना सबसे बडा मुद्दा बताते हुए फिलीस्तीन के प्रति अपनी सहानुभुति रखी।  यह कोई संयोग नहीं है कि विश्व के अनेक शीर्ष वामपंथियों ने 11 सितबर 2001 को अमेरिका पर हुए आक्रमण की प्रशंसा तक की है और उसे अमेरिका की नीतियों का परिणाम बताया है।

ऐसा नहीं है कि वामपंथी केवल अमेरिका की निन्दा करते है वही तत्व भारत में इस्लामवादी हिंसा का प्रकारांतर से समर्थन करते हैं और हिन्दूवादी संगठनों पर आरोप लगाते हैं। ये नक्सली हिंसा को प्रश्रय देते हैं और भारत के पडोस में नेपाल में नक्सल और इस्लामवादी गठजोड का एक बडा खतरा इन्होंने खडा ही कर दिया है।    इन समानताओं से यही निष्कर्ष निकलते हैं कि वामपथियों की मानवाधिकार को लेकर ईमानदार नीयत नहीं है और उनके लिये ये केवल नारे हैं जिनका उपयोग वे अवसरवादिता से करते हैं तथा साथ ही वे अब विश्व में अपना वर्चस्व हिंसावादियों के साथ मिलकर बढायेंगे। इस्लामवाद और वामपंथ का यह गठबन्धन आने वाले दिनों में विश्व के लिये नयी चुनौती बनने वाला है।

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राजनीतिक इस्लाम का बढता दायरा

Posted by amitabhtri on मार्च 20, 2008

इन दिनों समस्त विश्व में जिस इस्लामवादी खतरे का सामना सर्वत्र किया जा रहा है उसके पीछे मूल प्रेरणा इस्लाम की राजनीतिक इच्छा ही है। समस्त विश्व में मुसलमानों के मध्य इस बात को लेकर सहमति है कि उनके व्यक्तिगगत कानून में कोई दखल ना दिया जाये और विश्व के अधिकांश या सभी भाग पर शरियत का शासन हो। इस विषय में इस्लामवादी आतंकवादियों और विभिन्न इस्लामी राजनीतिक या सामाजिक संगठनों में विशेष अंतर नहीं है। इसी क्रम में पिछ्ले दिनों कुछ घटनायें घटित हुईं जो वैसे तो घटित अलगअलग हिस्सों में हुईं परंतु उनका सम्बन्ध राजनीतिक इस्लाम से ही था। सेनेगल की राजधानी डकार में इस्लामी देशों के सबसे बडे संगठन आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कन्ट्रीज की बैठक हुई और उसमें दो मह्त्वपूर्ण निर्णय लिये गये जिनका आने वाले दिनों में समस्त विश्व पर गहरा प्रभाव पडने वाला है।

इन दो निर्णयों के अनुसार  इस्लामी देशों के संगठन ने प्रस्ताव पारित किया कि समस्त विश्व में विशेषकर पश्चिम में इस्लामोफोब की बढती प्रव्रत्ति के विरुद्ध अभियान चलाया जायेगा और इस्लाम के प्रतीकों को अपमानित किये जाने पर उसके विरुद्ध कानूनी लडाई लडी जायेगी। इस प्रस्ताव में स्पष्ट कहा गया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस्लाम के प्रतीकों को अपमानित करने या पैगम्बर को अपमानित करने के किसी भी प्रयास का डट कर मुकाबला किया जायेगा और कानूनी विकल्पों को भी अपनाया जायेगा। दूसरे निर्णय के अनुसार मुस्लिम मतावलम्बियों को चेतावनी दी गयी कि वे शरियत के पालन के प्रति और जागरूक हों इस क्रम में सऊदी अरब के विदेशमंत्री ने अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हुए घोषणा की कि उनका देश आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कन्ट्रीज के गरीब देशों को एक अरब यू.एस. डालर की सहायता देगा परंतु बदले में उन्हें अपने यहाँ शरियत के अनुसार शासनप्रशासन सुनिश्चित करना होगा। ये दोनों ही निर्णय दूरगामी प्रभाव छोडने वाले हैं।

पिछ्ले कुछ वर्षों में पश्चिम ने अनेक सन्दर्भों में इस्लाम को चुनौती दी है और विशेष रूप से डेनमार्क की एक पत्रिका में पैगम्बर को लेकर कार्टून छपने के उपरांत पश्चिम में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इस्लाम के विशेषाधिकार को लेकर व्यापक बहस आरम्भ हो गयी। पिछ्ले वर्ष कैथोलिक चर्च के धार्मिक गुरु पोप द्वारा इस्लाम के सम्बन्ध में की गयी कथित टिप्पणी के बाद इस बहस ने फिर जोर पकडा। इस बार इस्लामी सम्मेलन में इस्लाम के प्रतीकों पर आक्रमण की बात को प्रमुख रूप से रेखांकित किये जाने के पीछे प्रमुख कारण यही माना जा रहा है कि इस्लाम पश्चिम की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांत को स्वीकार कर अपने अन्दर कोई परिवर्तन लाने को तैयार नहीं है। आने वाले दिनों में यह विषय इस्लाम और पश्चिम के मध्य टकराव का प्रमुख कारण बनने वाला है। पश्चिम को इस बात पर आपत्ति है कि जब उनके यहाँ सभी धर्मों पर मीमांसा और आलोचना की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आती है तो इस सिद्धांत की परिधि से इस्लाम बाहर क्यों है या उसे विशेषाधिकार क्यों प्राप्त है। इस्लामी देशों ने इस विषय पर अपना रूख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी विशेषाधिकार की स्थिति को कायम रखना चाह्ते हैं। उधर पश्चिम में इस्लाम के विशेषाधिकार को ध्वस्त करने के अनेक प्रयास हो रहे हैं। हालैण्ड की संसद के एक सदस्य और आप्रवास विरोधी राजनीतिक दल फ्रीडम पार्टी के प्रमुख गीर्ट वाइल्डर्स ने कुरान पर अपने विचारों को लेकर एक फिल्म तक बन डाली है जो 28 मार्च को प्रदर्शित होने वाली है।

पश्चिम की इस मानसिकता के बाद इस्लामी देशों के सबसे बडे संगठन द्वारा  जिस प्रकार का अडियल रवैया अपनाया गया है उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि इस्लामी मतावलम्बी  किसी भी नये परिवर्तन के किये तैयार नहीं हैं। इससे तो एक ही बात स्पष्ट होती है कि आने वाले दिनों में पश्चिम और इस्लाम का टकराव बढने ही वाला है।इस सम्मेलन के दूसरे प्रस्ताव से भी राजनीतिक इस्लाम को प्रश्रय ही प्रोत्साहन मिलने वाला है। इस प्रस्ताव के अनुसार इस्लामी संगठन के उन सदस्य देशों को आर्थिक सहायता देते समय जो गरीब हैं यह शर्त लगायी जायेगी वे अपने शासन और प्रशासन में शरियत का पालन सुनिश्चित करें। इस शर्त से उन मुस्लिम देशों में धार्मिक कट्टरता बढ सकती है जिनमें विकास का सूचकांक काफी नीचे है और राजनीतिक इस्लाम और कट्टरपंथी इस्लाम में अधिक अंतर नहीं है। इन देशों के पिछ्डेपन का लाभ उन संगठनों को मिल सकता है जिन्होंने शरियत का पालन सुनिश्चित करने के लिये आतंकवाद और हिंसा का सहारा ले रखा है। इस्लामी देशों के इस सम्मेलन में शरियत पर जोर देकर राजनीतिक इस्लाम को प्रश्रय दे कर इस्लामी कट्टरता को नया आयाम ही दिया गया है। इस निर्णय के उपरांत यह फैसला कर पाना कठिन हो गया है कि इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद और इस्लामी राजनीति के इस संकल्प में अंतर क्या है। विशेषकर तब जबकि दोनों का उद्देश्य शरियत के आधार पर ही विश्व का संचालन करना और उसे प्रोत्साहित करना ही है।

इस्लाम के विशेषाधिकार को कायम रखना और शरियत के अनुसार शासन और प्रशासन चलाने के लिये मुस्लिम देशों को प्रेरित करना मुस्लिम देशों की उस मानसिकता को दर्शाता है जहाँ वे परिवर्तन के लिये तैयार नहीं दिखते और इस्लामी सर्वोच्चता के सिद्धांत में विश्वास रखते हैं। 

इसके अतिरिक्त दो और घटनायें पिछ्ले दिनों घटित हुईं जो इस्लाम को लेकर चल रही पूरी बह्स को और तीखा बनाती हैं तथा इस्लामी बुद्धिजीवी और धार्मिक नेता इस्लामी आतंकवाद से असहमति रखते हुए भी उसके उद्देश्यों से सहमत प्रतीत होते दिखते हैं। इन दो घटनाओं में एक का केन्द्र उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ रहा जहाँ आतंकवाद विरोधी आन्दोलन के बैनर तले आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के कुछ प्रमुख सदस्यों ने निर्णय लिया कि वे प्रदेश के किसी भी जिले में बार काउंसिल के उस निर्णय का खुलकर विरोध करेंगे जिसमें वकील उन लोगों के मुकदमे लडने से इंकार कर देंगे जो किसी आतंकवादी घटना के आरोप में गिरफ्तार किये जाते हैं। मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के इस फैसले के बाद वकीलों के संगठन बार काउंसिल में धर्म के आधार पर विभाजन हो गया है और इसके पीछे तर्क यह दिया गया है कि आतंकवादी घटनाओं के नाम पर निर्दोष मुसलमान युवकों को पकडा जा रहा है और उन्हें कानूनी सहायता मुसलमान वकील दिलायेंगे। ज्ञातव्य हो कि पिछ्ले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में अनेक आतंकवादी घटनायें घटित हुईं जिनमे अयोध्या स्थित रामजन्मभूमि पर आक्रमण, वाराणसी स्थित संकटमोचन मन्दिर पर आक्रमण प्रमुख हैं। इन आतंकवादी घटनाओं में जो आतंकवादी गिरफ्तार हुए उनका मुकदमा लडने से स्थानीय बार काउंसिल ने इंकार कर दिया। इसी के विरोध में न्यायिक प्रक्रिया को आतंकित करने के लिये पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश में अनेक न्यायालयों में एक साथ बम विस्फोट हुए और आतंकवादी संगठनों ने इसके कारण के रूप में आतंकवादियों का मुकदमा लडने से वकीलों के इंकार को बताया। 

 अब जिस प्रकार मुस्लिम वकील आतंकवादियों को निर्दोष बताकर सरकार और पुलिस बल पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं उससे उनकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक है और यहाँ भी इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद और इस्लामी आन्दोलन के मध्य उद्देश्यों की समानता दिख रही है। इस निर्णय का व्यापक असर होने वाला है और विशेष रूप से तो यह कि जब समस्त विश्व इस्लामी बुद्धिजीवियों से आतंकवाद की इस लडाई में रचनात्मक सहयोग की आशा करता है तो उनका नयीनयी रणनीति अपनाकर प्रकारांतर से सही इस्लाम के नाम पर चल रहे अभियान को हतोत्साहित करने के स्थान उसे बल प्रदान करने के लिये तोथे तर्कों का सहारा लेना इस आशंका को पुष्ट करता है कि इस्लामी आतंकवाद कोई भटका हुआ अभियान नहीं है।इसी बीच एक और प्रव्रत्ति ने जोर पकडा है जिसकी आकस्मिक बढोत्तरी से देश की खुफिया एजेंसियों के माथे पर भी बल आ गया है। जिस प्रकार पिछ्ले दिनों उत्तर प्रदेश में सहारनपुर स्थित दारूलउलूम्देवबन्द ने देश भर के विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों और उलेमाओं को आमंत्रित कर इस्लाम के साथ आतंकवाद के सहयोग को नकारने का प्रयास किया उसने भी अनेक प्रश्न खडे किये। क्योंकि इस सम्मेलन में भी ऊपर से तो आतंकवाद के साथ इस्लाम को जोडने की प्रव्रत्ति की आलोचना की गयी परंतु जो विषय उठाये गये और मुस्लिम समाज की जिन चिंताओं को व्यक्त किया गया उनसे उन्हीं बिन्दुओं को समर्थन मिला जो इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद के हैं। दारूल उलूम देवबन्द के सम्मेलन के उपरांत इसी प्रकार के और सम्मेलन देश के अनेक हिस्सों में आयोजित करने की योजना बन रही है। आतंकवाद विरोध में मुस्लिम संगठनों की इस अचानक पहल की पहेली देश की खुफिया एजेंसियाँ सुलझाने में जुट गयी हैं। एजेंसियाँ केवल यह जानना चाहती हैं कि यह मुस्लिम संगठनों की स्वतःस्फूर्त प्रेरणा है या फिर इसके लिये बाहर से धन आ रहा है। यदि इसके लिये बाहर से धन आ रहा है या फिर यह कोई सोची समझी रणनीति है तो इससे पीछे के मंतव्य को समझना आवश्यक होगा। कहीं यह जन सम्पर्क का अच्छा प्रयास तो नहीं है ताकि इस्लाम के सम्बन्ध में बन रही धारणा को तो ठीक किया जाये परंतु आतंकवाद की पूरी बह्स और उसके स्वरूप पर सार्थक चर्चा न की जाये जैसा कि देवबन्द के सम्मेलन में हुआ भी।

तो क्या माना जाये कि खतरा और भी बडा है या सुनियोजित है। आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कंट्रीज ने जहाँ अपने प्रस्तावों से संकेत दिया है कि इस्लामिक उम्मा आने वाले दिनों में अधिक सक्रिय और कट्टर भूमिका के लिये तैयार हो रहा है तो ऐसे में भारत में घटित होने वाली कुछ घटनायें भी उसी संकेत की ओर जाती दिखती हैं। समस्त मुस्लिम विश्व में हो रहे घटनाक्रम एक ही संकेत दे रहे हैं कि इस्लाम में शेष विश्व के साथ चलने के बजाय उसे इस्लाम के रास्ते पर लाने का अभियान चलाया जा रहा है। वास्तव में इस्लामी राजनीति के अनेक जानकारों का मानना है कि इस्लामी आतंकवाद और कुछ नहीं बल्कि फासिस्ट और कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रेरित अधिनायकवादी आन्दोलन है जो अपने काल्पनिक विश्व को शेष विश्व पर थोपना चाह्ता है परंतु नये घटनाक्रम से तो ऐसा लगता है कि समस्त  इस्लामी जगत इस काल्पनिक दुनिया को स्थापित करना चाह्ता है और उनमें  यह भावना घर कर गयी है कि वर्तमान विश्व के सिद्धांतों को स्वीकार करने के स्थान पर कुरान और शरियत के आधार पर विश्व को नया स्वरूप दिया जाये। यही वह बिन्दु है जो राजनीतिक इस्लाम को इस्लामी आतंकवाद के साथ सहानुभूति रखने को विवश करता है क्योंकि दोनों  का एक ही उद्देश्य है और वह है खिलाफत की स्थापना और समस्त विश्व के शासन प्रशासन का संचालन शरियत के आधार पर करना।

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पश्चिम की इस्लाम को चुनौती

Posted by amitabhtri on मार्च 9, 2008

पिछ्ले कुछ दिनों से एक ऐसी घटना की भूमिका बन रही है जो आने वाले दिनों में बडा तूफान खडा कर सकती है। यह घटना पिछ्ले दो दशकों से पश्चिम और इस्लाम के मध्य चल रही उस अदावट को नया आयाम दे सकती है जिसका आरम्भ 1989 में उस समय हुआ था जब ब्रिटिश मूल के लेखक सलमान रश्दी ने सेटेनिक वर्सेज नामक पुस्तक लिखी थी और उसमें इस्लाम के तथाकथित पवित्र ग्रंथ कुरान की कुछ आयतों पर टिप्प्णी की थी जो सदियों से समस्त विश्व और गैर मुसलमानों के मध्य चर्चा का विषय रही हैं। इस पुस्तक के प्रकाशित होते ही पूरे इस्लामी जगत में मानों भूचाल आ गया और ईरान के सर्वोच्च धर्मगुरु अयातोला खोमेनी ने सलमान रश्दी के विरुद्ध फतवा जारी कर उनका सर कलम करने का आदेश इस्लाम धर्मावलम्बियों को दे दिया। इस फतवे के बाद सलमान रुश्दी को अपनी जान के लाले पड गये और यह पुस्तक प्रायः सभी देशों में प्रतिबन्धित हो गयी।

यह पहला अवसर था जब समस्त विश्व के सामने अभियक्ति की स्वतंत्रता और इस्लाम के विशेषाधिकार को लेकर बहस आरम्भ हुई। इसके बाद अगला वह अवसर 1997 में आया जब इस्लाम के अनुयायियों ने पश्चिम के किसी कदम को अपने धर्म के सिद्धांतों के प्रतिकूल माना और इसे लेकर आक्रामक प्रदर्शन तक हुए यह अवसर तब आया जब अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने परिसर में इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद की उस प्रतिमा को हटाने की अनुमति नहीं दी जिसमें उन्हें विश्व के कानून प्रदाताओं के साथ खडा किया गया था। 1930 की इस प्रतिमा के सम्बन्ध में मुसलमानों का तर्क था कि इस्लाम के अनुसार पैगम्बर की प्रतिमा नहीं हो सकती। अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के उपरांत अनेक स्थानों पर आक्रामक प्रदर्शन हुए।  2002 में एक अवसर फिर आया जब हमें पश्चिम की ओर से आये किसी वक्तव्य के कारण इस्लामी जगत में उसकी घोर प्रतिक्रिया देखने को मिली।

 2002 में एक ईसाई धर्मप्रचारक जेरी फाल्वेल ने पैगम्बर मोहम्मद को एक इंटरव्यू में पहला आतंकवादी कह दिया और इसके बाद सर्वत्र आक्रामक प्रदर्शन हुए। इस प्रदर्शन में अनेक लोग घायल भी हुए और कुछ लोगों को अपनी जान से भी हाथ धोना पडा। इस प्रदर्शन की लपट भारत तक भी आयी और देश के अनेक हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हुए। इसी प्रकार 2005 में प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रिका न्यूजवीक में एक अफवाह जैसा समाचार छपा कि अमेरिका द्वारा आतंकवादियों के लिये बनाई गयी जेल ग्वांटेनामो बे में किसी अमेरिकी जेल अधिकारी ने कैदियों के सामने कुरान की प्रति शौचालय में बहा दी है। इस समाचार के आने के बाद मानों हडकम्प मच गया और जैसी उम्मीद थी उसी अनुसार हिंसा और प्रदर्शन हुए।

पश्चिम और इस्लाम का यह संघर्ष फरवरी  2006 में  फिर  देखने को मिला जब डेनमार्क की एक प्रसिद्ध पत्रिका जायलेंड पोस्टेन ने इस्लामी पैगम्बर मोहम्मद के कुछ कार्टून प्रकाशित किये और यही कार्टून फिर यूरोप के अनेक देशों की पत्र पत्रिकाओं ने प्रकाशित किये। इस घटना ने समस्त इस्लामी विश्व को उद्वेलित कर दिया और विश्व के अनेक हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हुए और इस अभूतपूर्व हिंसा में समस्त विश्व के अनेक हिस्सों में 100 से अधिक लोग मारे गये और अनेक धार्मिक स्थलों को भी नुकसान हुआ। भारत में भी कश्मीर, लखनऊ, हैदराबाद में हिंसा हुई और अनेक लोग घायल हुए। इसके बाद सितम्बर 2006 में रोमन कैथोलिक चर्च के सर्वोच्च धर्म गुरू पोप बेनेडिक्ट ने अपने एक वक्तव्य में इस्लाम के सन्दर्भ में बायजेंटाइन सम्राट को उद्ध्रत करते हुए कहा कि इस्लाम के पास कुछ भी नया नहीं है और जो भी है वह बुरा और अमानवीय है। पोप की यह टिप्पणी अपनी नहीं थी परंतु इस्लामी विश्व में इस पर जमकर बवाल हुआ और पूरी दुनिया में अनेक दिनों तक हिंसक विरोध प्रदर्शन होते रहे। भारत में जामा मस्जिद के इमाम सैयद बुखारी ने पोप को जान से मारने की बात कही। आक्रोश का यही आलम विश्व के अनेक इस्लामी हिस्सों में रहा और इस विषय पर भी हिंसा हुई। 

पश्चिम और इस्लाम की इस अदावट की नवीनतम कडी में हालैण्ड की संसद के सदस्य और आप्रवास विरोधी राजनीतिक दल के नेता गीर्ट वाइल्डर्स ने कुरान पर एक फिल्म बनाने का निर्णय लिया है और यही नहीं तो वे फिल्म पूरी भी कर चुके हैं पहले यह फिल्म जनवरी में प्रस्तावित थी परंतु अब यह मार्च के महीने में कभी भी आ सकती है। इस को लेकर सारी दुनिया में चर्चा हो रही है। इस चर्चा के पीछे दो प्रमुख कारण हैं एक तो वाइल्डर्स हालैंड की संसद के सदस्य हैं, संसद की कुल 150 सदस्य संख्या में उनके 9 सदस्य है और इससे पूर्व भी वे कुरान को हिंसा का प्रेरणा स्रोत मानते हुए उस पर प्रतिबन्ध लगाने की बात कर चुके हैं। उन्होंने कुरान की तुलना हिटलर की आत्म कथा मीन कैम्फ से की है। अभी तक पश्चिम और इस्लाम के मध्य विवाद के जितने उदाहरण हमारे सामने आये थे उसमें पहल या तो धार्मिक व्यक्ति द्वारा या किसी लेखक द्वारा हुई थी और इन सभी विषयों पर कानून निर्माताओं की एक ही राय होती थी कि इस्लाम मतावलम्बियों की भावना को ठेस नहीं लगनी चाहिये। इससे पूर्व के सभी मामलों में पूरे मामले को शांत करने का प्रयास होता था।

पहली बार इस्लाम की आलोचना की पहल किसी कानून निर्माता द्वारा हुई है। इस फिल्म को लेकर हालैण्ड की सरकार ने जो रुख दिखाया है वह भी बडा रोचक है। सरकार ने इस पूरे विषय पर दो स्तर की रणनीति बनाई है जिसमें एक ओर जहाँ फिल्म को प्रदर्शित होने से रोकने के प्रयास करने की बात की गयी है वहीं दूसरी ओर इस फिल्म के प्रदर्शन पर होने वाली मुस्लिम प्रतिक्रिया से अपने  देश में और विदेश में निपटने के विकल्पों पर भी चर्चा हो रही है। वाइल्डर्स के आसपास पुलिस निगरानी बढा दी गयी है और उनके शेष सांसदों की भी निगरानी हो रही है। हालांकि हालैण्ड के टी वी चैनलों ने वाइल्डर्स की फिल्म फितना को प्रदर्शित करने से मना कर दिया है परंतु वाइल्डर्स ने इसके लिये अलग वेबसाइट बनायी है और यू ट्यूब पर भी फिल्म दिखाने की बात कही है। हालैण्ड की सरकार के प्रबन्धों पर वाइल्डर्स का  मानना है कि सरकार के रूख से लगता है कि वह भी फिल्म के प्रदर्शन के लिये तैयार है। यही वह बिन्दु है जिसे टर्निंग प्वांइट कहा जा सकता है। 

 हालैण्ड वह पहला यूरोपिय देश है जहाँ इस्लाम के विशेषाधिकार को सबसे पहले चुनौती दी गयी। इस देश के  राजनीतिक नेता पिम फार्च्यून ने सबसे पहले हालैण्ड में मुस्लिम आप्रवास पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की बाद में वे एक पशु कार्यकर्ता द्वारा मार दिये गये। इसके बाद प्रसिद्ध कलाकार थिओ वान गाग ने सोमालिया मूल की इस्लामी महिला अयान हिरसी अली के साथ मिलकर इस्लाम में महिलाओं की दयनीय स्थिति पर एक फिल्म सबमिसन अर्थात समर्पण जो कि इस्लाम का अर्थ होता है निर्मित की। इस फिल्म को लेकर काफी प्रतिक्रिया हुई और इस फिल्म को इस्लाम और अल्लाह का अपमान बताया गया और 2004 में एक अफ्रीकी मुसलमान ने दिनदहाडे वान गाग की हत्या कर दी। वान गाग के ह्त्यारे मोहम्मद बायेरी ने इसे जेहाद बताया और मुकदमे के दौरान गर्व से स्वीकार किया कि उसने अपने धर्म के अपमान का बदला लिया है।  2004 में इस घटना के बाद हालैण्ड में अभिवयक्ति की स्वतंत्रता और इस्लाम के विशेषाधिकार पर चर्चा आरम्भ हुई।

2006 में पैगम्बर मोहम्मद के कार्टून को लेकर पूरे पश्चिम में जो बह्स आरम्भ हुई तो उसका सर्वाधिक मुखर बिन्दु यह था कि इस्लाम को पश्चिमी समाज की लोकतांत्रिक परम्पराओं के दायरे में लाने के लिये इस बात के लिये बाध्य किया जाये कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धर्मों तथा पैगम्बरों की आलोचना के सामान्य सिद्धांतों को स्वीकार करे। हालैण्ड की फ्रीडम पार्टी के नेता गीर्ट वाइल्डर्स ने अब कुरान पर न केवल वक्तव्य दिया है वरन उसे पुष्ट करने के लिये उसे चित्र में भी लाने का प्रयास किया है। वे स्वयं भी कह्ते हैं कि इस फिल्म में वे वह प्रदर्शित करेंगे जिस पर वे विश्वास करते हैं। इस फिल्म को लेकर हालैण्ड की सरकार तथा अन्य राजनीतिक दलों का जो रवैया है वह निश्चय ही इस बात का संकेत है कि वे इस फिल्म का प्रदर्शन चाह्ते हैं। इसके पीछे असली कारण यही है कि हालैण्ड वह यूरोपिय देश बन रहा है जो इस्लाम को बहस के दायरे में लाकर उसके विशेषाधिकार पर चोट करने जा रहा है।  निश्चय ही यह घटना आने वाले दिनों में समस्त विश्व में चर्चा का विषय बनने वाली है और यह घटना पश्चिम और इस्लाम की अदावट को नया आयाम प्रदान कर सकती है। इस घटना के विकास और परिपक्व रूप लेने के बीच के घटनाक्रम से एक बात स्पष्ट हो रही है कि पश्चिम में इस्लाम को लेकर चिंतन नये सिरे से आरम्भ हो गया है और पश्चिम इस्लाम को अपने अनुरूप ढालने की कवायद में जुट गया है। फिर वह मुस्लिम आप्रवास हो, मुसलमानों का व्यक्तिगत कानून हो , जेहाद हो या फिर समस्त विश्व को शरियत के आधार पर चलाने की उनकी मंशा।

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चुनाव के बाद पाकिस्तान

Posted by amitabhtri on फ़रवरी 27, 2008

पाकिस्तान में चुनाव समाप्त हो चुके हैं और मिली जुली सरकार के गठन की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है। पाकिस्तान के चुनावों के उपरांत जो चित्र उभरा है उसके अनुसार पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज गुट को क्रमशः 87 और 66 सीटें प्राप्त हुई हैं इसी के साथ पश्तून बहुल इलाके की पार्टी अवामी नेशनल पार्टी को 10 सीटें प्राप्त हुई हैं जिसके पास 2002 में एक भी सीट नहीं थी। इसी प्रकार 2002 के चुनाव में नवाज की पार्टी के पास केवल 18 सीटें थी जो कि अब  66 पहुँच गयी है। इस प्रकार इस चुनाव में यदि किसी पार्टी को सर्वाधिक लाभ हुआ है तो वह नवाज शरीफ की पार्टी को। पाकिस्तान के चुनाव में आये इस विशेष रुझान की ओर हमें ध्यान देने की आवश्यकता है। नवाज शरीफ की पार्टी जहाँ नवाज के ग्रहनगर पँजाब में बहुत अच्छा प्रदर्शन करने में सफल रही तो वहीं पकिस्तान पीपुल्स पार्टी को बेनजीर भुट्टो के सिन्ध में उतनी सफलता नहीं मिली और उन्हें सहानुभुति का भी विशेष लाभ नहीं मिला। आखिर इस रुझान का कारण क्या हो सकता है। एक तो असिफ अली जरदारी की छवि के चलते पीपीपी को नुकसान हुआ है और उन्हें पँजाब में मुँह की खानी पडी.और दूसरा एक बडा कारण जिसकी ओर लोकमंच के पिछ्ले आलेख में संकेत किया गया था जब नवाज शरीफ पकिस्तान लौटे थे कि बेनजीर भुट्टो का मुशर्रफ से हाथ मिलाना और आतंकवाद तथा धर्मिक कट्टरता के सम्बन्ध में अमेरिका की भाषा बोलना नवाज शरीफ के लिये अधिक सम्भावनाओं का द्वार खोलेगा।

पाकिस्तान के चुनावों पर यदि बारीक निगाह डाली जाये तो पकिस्तान की जनता का मतदान की मतदान की एक विशेष परिपाटी रही है। उनके लिये आम जीवन के मुद्दों पर पर परवेज मुशर्रफ की सरकार के झूठे दावे और बिजली, पानी और रोजगार की बढती समस्या एक प्रमुख मुद्दा था तो दूसरी ओर देश में बढती आतंकवादी घटनाओं के लिये मुशर्रफ की नीतियों को दोषी ठहराया जाना था। पकिस्तान की जनता आतंकवाद से त्रस्त तो है परंतु इस विषय में अपने अनुसार नीतियों का संचालन चाह्ती है न कि अमेरिका के निर्देषों पर। पकिस्तान के मतदाताओं की इसी अभिरुचि का लाभ नवाज शरीफ की पार्टी को विशेष रूप से मिला। पाकिस्तान में अजीब जनादेश या यूँ कहें कि खण्डित जनादेश का प्रमुख कारण पीपीपी का पूरा विश्वास अर्जित न कर पाना और पकिस्तान पीपुल्स पार्टी नवाज गुट क़ा अधिक सशक्त विकल्प बनकर उभरना रहा। इसी प्रकार पश्तून इलाके में विशेष प्रभाव रखने वाली अवामी नेशनल पार्टी भी 2002 में कट्टरपथियों के हाथों पूरी तरह पराजित होने के बाद 10 गुना लाभ अर्जित कर 10 सीटें प्राप्त करने में सफल रही । यह रूझान भी इस तथ्य को प्रतिबिम्बित करता है कि पश्तून इलाके में अभी उदारवादी और वामपंथी रूझान वाली इस पार्टी का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ है। इस बार इस पार्टी ने विशेष रूप से कबायली इलाके के लिये नया नाम पश्तूनिस्तान या ऐसे ही मिलता जुलता नाम और इस पूरे प्रांत के लिये स्वायत्त्ता की मांग को अपना चुनावी एजेंडा बनाया था। यह अपील पूरी तरह काम कर गयी और इस पार्टी को लोगों ने काफी जनादेश दिया।

अब जबकि जनादेश आ चुका है और नयी सरकार के गठन की तैयारी हो रही है तो यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि साथ आने वाले घटक दलों के एजेन्डे क्या रहे हैं और वे आपस में किस आधार पर गठबन्धन सरकार को चला सकते हैं। पकिस्तान पीपुल्स पार्टी की दिवंगत नेत्री बेनजीर भुट्टो ने अमेरिका के इशारे पर राष्ट्र्पति परवेज मुशर्रफ के साथ एक समझौता कर लिया था और उसके अनुसार उन्हें प्रधानमंत्री और मुशर्रफ को राष्ट्र्पति बने रहना था। चुनाव के दौरान बेनजीर की हत्या से अमेरिका की इस नीति को कुछ धक्का लगा क्योंकि अब पकिस्तान की राजनीति में नवाज शरीफ का प्रभाव बढ. गया जो अमेरिका कभी नहीं चाह्ता था। क्योंकि अमेरिका का मानना है कि नवाज शरीफ धार्मिक पार्टियों के साथ अत्यंत सहज हैं और इस्लामी सिद्धांतों में विश्वास रखते हुए सेकुलर राजनीति के लिये उपयुक्त नहीं हैं या दूसरे शब्दों में उन्हे राजनीति के इस्लामीकरण से विशेष परहेज नहीं है। सरकार गठन के उपरांत जो विषय सबकी उत्सुकता का होगा वह यह कि आखिर नये प्रधानमंत्री फहीम मक्दूम सभी सहयोगी दलों के निहित स्वार्थों के मध्य संतुलन कैसे बैठाते हैं।

एक ओर प्रमुख घटक दल पीपीपी को जहाँ अमेरिका से कोई एतराज नहीं है तो वहीं नवाज शरीफ की पार्टी आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध को अपनी शर्तों पर लड.ना चाह्ती है और आतंकवादी गुटों के सफाये में तो अमेरिका का सहयोग चाह्ती है परंतु पकिस्तान के इजराइल के साथ सम्बन्धों को लेकर भी नवाज शरीफ की पार्टी का रूख साफ है कि इस यहूदी देश के साथ पकिस्तान के सम्बन्ध नहीं होने चहिये। इसके अतिरिक्त नवाज की पार्टी की एक और मांग प्रधानमंत्री फहीम को धर्मसंकट में डाल सकती है और वो यह कि राष्ट्रपति मुशर्रफ द्वारा पिछ्ले वर्ष लागू किये गये आपातकाल के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को हटाने के उनके निर्णय को बदल कर उन्हें फिर से अपने पद पर स्थापित करने की मांग भी नवाज की पार्टी की है। आगे चलकर इस मांग पर भी फहीम को निर्णय लेना होगा जो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति संस्था के मध्य टकराव का कारण बन सकता है। पीपीपी तो कम से कम यह टकराव नहीं ही चाहेगी।

सरकार के लिये एक और विषय जो धर्मसंकट का हो सकता है वह एक और सहयोगी अवामी नेशनल पार्टी की मांग को स्वीकार करना कि पश्तून इलाके का नया नामकरण हो और उसे स्वायत्त्ता प्रदान की जाये। इस मांग का विरोध न केवल पँजाबी बहुल लोग करेंगे वरन इससे सेना के पँजाबी प्रभुत्व को भी दीर्घगामी स्तर पर नुकसान हो सकता है इस कारण ऐसे किसी भी प्रस्ताव का सेना भी विरोध कर सकती है जिससे भविष्य में बलोचिस्तान और सिन्ध की स्वायत्त्ता की मांग भी उठ सकती है।

सरकार के गठन से पूर्व इन विरोधाभासों के बाद एक और बात जो अत्यंत महत्वपूर्ण होगी वह यह कि राष्ट्रपति मुशर्रफ इस परिवर्तन को किस प्रकार लेते हैं और नयी सरकार के प्रति क्या रवैया अपनाते हैं। यदि वे सरकार के साथ सहयोग कर चलते हैं तो भी नवाज शरीफ की पार्टी उन्हें किनारे लगाने का प्रयास करेगी क्योंकि नवाज शरीफ का राजनीतिक भविष्य राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के पाकिस्तान की राजनीति में प्रभाव कम होने पर ही निर्भर है जिस मात्रा में मुशर्रफ कमजोर होंगे उसी मात्रा में नवाज शरीफ का राजनीतिक भविष्य उज्ज्वल होगा। पाकिस्तान की नयी सरकार के लिये सबसे बडा काम नवाज शरीफ की राजनीतिक योजना को समझना और उसके साथ संतुलन स्थापित करना होगा। पाकिस्तान की नयी सरकार को तीन राजनीतिक व्यक्तित्वों के साथ सांमजस्य बिठाना है। नवाज शरीफ, असिफ अली जरदारी और फहीम मकदूम। तीनों ही व्यक्तित्व सरकार बनने के उपरांत अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास करेंगें। ऐसे में पीपीपी में जरदारी और फहीम दो शक्ति केन्द्र बनकर उभरने की सम्भावना है जो पार्टी के दीर्घकालिक हितों के लिये ठीक नहीं होगा।

कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पकिस्तान की जनता ने अपने नेताओं को एक अवसर प्रदान किया है जहाँ से वे पकिस्तान को लोकतंत्र की ओर ले जा सकते हैं और आशा का सूरज दिखा सकते हैं। अब यह देखने की बात होगी कि ये नेता इस अवसर का लाभ उठा पाते हैं या फिर पकिस्तान के लोकतंत्र का वही पुराना हश्र होता है। क्योंकि जिस प्रकार के बयान पुरानी सरकार के मंत्रियों के आ रहे हैं उससे लगता है कि वे इस गठबन्धन के अंतर्विरोधों से इस सरकार के शीघ्र गिरने के स्वप्न अभी से देखने लगे हैं।

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उलेमा सम्मेलन के निहितार्थ

Posted by amitabhtri on फ़रवरी 27, 2008

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर स्थित प्रसिद्ध इस्लामी संस्थान दारूल उलूम देवबन्द ने एक अनोखी पहल करते हुए देश भर के विभिन्न इस्लामी संगठनों को एक मंच पर आमंत्रित कर आतंकवाद के सम्बन्ध में अत्यंत मह्त्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किये। वैसे तो यह सम्मेलन देश के प्रमुख इस्लामी संगठनों का था परंतु अंत में यह पूरा अभियान और कार्यक्रम देवबन्द और जमाएत उलेमा हिन्द का बनकर रह गया। इस पूरे अभियान की चतुर्दिक चर्चा हुई और इस अभियान को एक अनोखी पहल करार दिया गया। इस सम्मेलन में मीडया को भी आमंत्रित किया गया और मीडिया प्रतिनिधियों के सामने प्रस्ताव पढ.कर सुनाये गये और पारदर्शिता का पूरा ध्यान रखा गया परंतु जो प्रश्न सर्वाधिक मह्त्व का है वह यह कि इस सम्मेलन के निहितार्थ क्या थे और इस सम्मेलन का दूरगामी प्रभाव क्या होने वाला है।

 इस सम्मेलन के प्रस्तावों के अनुसार आतंकवाद की हर प्रकार से निन्दा की गयी और मीडिया और सरकारी एजेसियों की इस बात के लिये आलोचना की गयी कि आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है। इस सम्मेलन में आतंकवाद को लेकर आग्रह किया कि आतंकवादी घटनाओं को भी अन्य आतंकवादी घटनाओं के क्रम ही लिया जाये और नक्सली आतंकवाद की भांति इसे भी लिया जाये। सम्मेलन में मदरसों को क्लीन चिट दिया गया और सरकार और पुलिस बल को इस मामले में कटघरे में खडा किया गया कि मदरसों को नाहक परेशान किया जाता है और किसी भी आतंकी घटना के बाद मदरसों में अध्ययनरत विद्यार्थियों को सन्दिग्ध मानकर उन्हें परेशान किया जाता है। सम्मेलन में मदरसों से आग्रह किया गया कि वे अपनी व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी बनाने का प्रयास करें विशेष रूप से आर्थिक सम्बन्ध में।

 

ऊपर से देखने में तो यह पहल अत्यंत सकारात्मक लगती है परंतु इस सम्मेलन में पारित प्रस्तावों से परे और भी अनेक प्रश्न हैं जिनका उत्तर इस सम्मेलन से भी नही मिला है। सम्मेलन में जहाँ अत्यंत जोर शोर से आतंकवाद की निन्दा की गयी वहीं आतंकवादियों के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहा गया। आखिर सम्मेलन में इस विषय पर चर्चा तो होनी ही चहिये थी कि जो आतंकवादी इस्लाम का नाम लेकर आत्मघाती हमले कर रहे हैं या विश्व के अनेक हिस्सों में आतंकवादी घटनाओं में लिप्त हैं उनके प्रति इन संगठनों का नजरिया क्या हैं। यदि आतंकवादी इस्लाम की गलत व्याख्या कर रहे हैं या भटके हुए मुसलमान हैं तो उनके प्रति इस्लामी धर्मगुरूओं का रुख क्या है यह तो स्पष्ट होना ही चहिये परंतु इस विषय पर कोई स्पष्ट नीति की घोषणा करने के स्थान पर इस सम्मेलन पर इस सम्बन्ध में कोई चर्चा ही नहीं हुई कि इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वालों के सम्बन्ध में इस्लाम का क्या रूख हो इसके स्थान पर इस्लामी धर्मगुरूओं ने एकदम नया कदम उठाते हुए घोषणा की वे हर प्रकार के आतंकवाद की निन्दा करते हैं और आतंकवाद फैलाने वालों को आपराधिक तत्व भर माना जाये। अब प्रमुख सवाल यह उठता है कि अन्य सामान्य अपराध और इस्लाम के नाम पर फैलाये जा रहे आतंकवाद को एक ही श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है। सामान्य अपराध के पीछे प्रेरणा कुछ और होती है और इस्लाम के नाम पर की जाने वाली आतंकवादी घटनाओं के पीछे की प्रेरणा कुछ और ही होती है। इसलिये यह आवश्यक था कि इस सम्मेलन में पूरे देश से जुटे मौलाना और मौलवी आतंकवादियों के सम्बन्ध में भी अपनी स्थिति स्पष्ट करते।

 

क्योंकि यह अत्यंत आवश्यक है कि इस्लामी आतंकवाद के सम्बन्ध में खुलकर बहस हो तथा इस्लामी धर्मगुरू इस सम्बन्ध में अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। समस्त विश्व में आज एक वर्ग इस्लाम की दुहाई देकर खून खराबा फैला रहा है और स्वयं को इस्लाम का मसीहा बनाकर प्रस्तुत कर रहा है। आये दिन हमें विभिन्न आतंकवादी संगठनों के आडियो या वीडियो टेप सुनने को मिलते हैं जब उनमें इस्लाम और पैगम्बर की दुहाई देकर जेहाद की बातें की जाती हैं। इसलिये अच्छा होता कि इस सम्मेलन में इन मुद्दों पर भी इस्लामी धर्मगुरू अपनी राय स्पष्ट करते।

 

इस सम्मेलन का इस कारण भी अत्यंत महत्व है कि दारूल उलूम देवबन्द इस्लाम की ऐसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है जिससे प्रेरणा प्राप्त कर तालिबान और जैशमोहम्मद ने इस्लामी आन्दोलन को नयी दिशा दी। ऐसे में क्या इस संस्थान का दायित्व नहीं बनता कि वह इस सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट करे। तालिबान ने अफगानिस्तान में जिस प्रकार का शासन चलाया था और जैश जो भी भारत में कर रहा है यदि उससे देवबन्द की असहमति है तो इन संगठनों के सम्बन्ध में भी इन इस्लामी संगठनों का कोई न कोई विचार होना चाहिये।

 

इन विषयों पर चर्चा इस लिये भी आवश्यक है कि दारूल उलूम देवबन्द ने अपनी वेबसाइट www.darooluloom-deoband.com पर आतंकवाद के सम्बन्ध में विस्तार से चर्चा की है और आतंकवाद के सम्बन्ध में अपना रूख स्पष्ट करते हुए कहा है कि आतंकवाद की एक परिभाषा निर्धारित होनी चहिये जिसमें राज्य प्रायोजित आतंकवाद और सामान्य ,हिस्सों में वमबर्षा, इजराइल का फिलीस्तीन का दमन रूस और चीन के कुछ हिस्सों में आतंकवाद के नाम पर दमनकारी गतिविधियों की प्रतिक्रिया स्वरूप जो कुछ भी हो रहा है उसे इस इस्लामी धार्मिक संगठन ने आतंकवाद की श्रेणी में मानने से इंकार कर दिया है। अब प्रश्न उठता है कि यह परिभाषा उन इस्लामवादी आतंकवादी संगठनों के अनुकूल बैठती है जो आतंकवादी घटनाओं को मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार की प्रतिक्रिया के सन्दर्भ में सही ठहराते हैं । यह वह बिन्दु है जो इस इस्लामी संगठन और इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वालों की विचारधारा में साम्य स्थापित करता है।

 

समस्त विश्व में इस्लाम के नाम पर चलाये जा रहे आतंकवाद को सामान्य आपराधिक घटनायॆं मानना भारी भूल होगी क्योंकि यदि गौर से देखा जाये तो इन गतिविधियों में गरीब, अनपढ.मुसलमान ही शामिल नहीं हो रहा है और इस गतिविधि में पढ. लिखे बडी जगहों पर नौकरी करने वाले भी शामिल हो रहे हैं और इन सभी को विश्व के मुसलानों पर हो रहे अत्याचार की धारणा विशेष रूप से आकर्षित कर रही है और यह वर्ग इस्लाम को आधुनिक समस्याओं के विकल्प के रूप में देखता है। उसकी नजर में वर्तमान विश्व की सभी समस्याओं का निदान इस्लाम में निहित है। एक बार पूरी दुनिया इस्लाम की नसीहतों पर अमल करने लगे तो सर्वत्र उजाला ही उजाला होगा। इस्लाम के नाम पर चल रहा आतंकवाद इस्लाम की इसी विचारधारा का एक आक्रामक स्वरूप मात्र है। इसी कारण इस समस्या को समग्रता में देखने की आवश्यकता है। यही कारण ह कि दारूल उलूम देवबन्द की इस कसरत पर भरोसा करना इतना सरल नहीं है। वैसे यह कोई पहला अवसर नहीं है जब मुस्लिम संगठनों ने आतंकवाद के सम्बन्ध में सम्मेलन आयोजित कर उसकी भर्त्सना करने का प्रयास किया है। इससे पूर्व 2006 में जुलाई के महीने में जब मुम्बई में लोकल ट्रेन को निशाना बनाया गया था और 200 से भी अधिक लोग आतंकवाद की भेंट चढे थे तो भी जमाएत उलेमा हिन्द ने संसद एनेक्सी में इसी प्रकार का एक सम्मेलन अगस्त 2006 में आयोजित किया था और उस सम्मेलन में सरकार और मीडिया से अनुरोध किया गया था कि वे आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों को घेरने की आदत से बाज आयें। न केवल इतना वरन मीडिया को इजराइल और अमेरिका का पिट्ठू तक घोषित कर दिया गया।

दारूल उलूम देवबन्द ने भी अपनी वेबसाइट पर मीडिया को इजराइलवादी और अमेरिकापरस्त बताया है जो आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों और इस्लाम को घेर रहे हैं। निश्चित रूप से इसे समस्या का समाधान करने की दिशा में ईमानदार प्रयास मानने के स्थान पर प्रोपेगेण्डा ही अधिक माना जा सकता है। आज आवश्यकता ईमानदार पहल की है जहाँ इस्लाम के नाम पर चल रही आतंकवादी घटनाओं के मूल में जाकर उसका समाधान किया जा सके और वह समधान तभी निकल सकता है जब इस्लामी धर्मगुरू इस विषय को लेकर ईमानदार हों। इस प्रकार अधिवेशन कर सरकार के माध्यम से पुलिस बल और खुफिया एजेसियों का मनोबल कम करने का प्रयास करना उसी इस्लामी सोच का परिचायक है जहाँ मुस्लिम नेता स्वयं को देश के कानून और संविधान में पूरी आस्था वाला बताते नहीं थकते परंतु जब मुस्लिम पर्सनल ला के मुकाबले देश के कानून या संविधान ने पालन की बात आती है तो सडकों पर उतरकर उसे बदलवाने को विवश करते हैं। यही मानसिकता समस्त विश्व में मुसलमानों को अलग थलग करती है और इसी से उनके गोपनीय और छिपे हुए एजेण्डे का शक भी होता है। इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद की समस्या को तब तक हल नहीं किया जा सकता जब तक इन विषयों पर इस्लामी धर्मगुरू आधुनिक और लोकतांत्रिक रूख नहीं अपनाते।

 ऐसे सम्मेलनों की सार्थकता और नीयति पर प्रश्न तब तक उठ्ते रहेंगे जब तक इस्लामी धर्मगुरू आतंकवाद की मूल भावना या उसकी प्रेरणा पर खुलकर चर्चा नहीं करते। आखिर उन तत्वों का क्या जो पैगम्बर के नाम पर आतंकवादी संगठन बनाते हैं और अपनी प्रेरणा का स्रोत कुरान और पैगम्बर को बताते हैं। या तो उन्हें काफिर घोषित कर उन्हें इस्लाम से बहिष्करित किया जाये या फिर जिहाद या अन्य शब्दावलियों को सही सन्दर्भ में व्याखायित किया जाये। जो कि इस सम्मेलन में नहीं हुआ। सम्मेलन से तो यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह इस्लाम धर्म की छवि सुधारने का एक प्रयान भर है जिसके पीछे असली उद्देश्य इस्लामी आतंकवाद की इस पूरी बहस को और भ्रमित करना है।

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