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क्या हिन्दुओं का धैर्य जबाब दे रहा है?

Posted by amitabhtri on अगस्त 22, 2008

अपने विद्यालय के दिनों में मैने एक कहानी पढी थी जिसकी शिक्षा यह थी कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक है जहाँ से दूसरे की नाक आरम्भ होती है। अचानक यह कहानी पिछले दिनों तब याद आ गयी जब एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में कश्मीर को लेकर एक विशेष परिचर्चा आयोजित की गयी और उसका विषय था कि क्या अब कश्मीर आजादी के लिये तैयार है? इस कार्यक्रम की महिला प्रस्तोता ने देश के तीन तथाकथित उदारवादी लेखकों को इस सम्बन्ध में उद्धृत किया और वे लेखक है देश के अग्रणी अंग्रेजी समाचार पत्र के सम्पादक वीर सांघवी, एक और प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक में साप्ताहिक स्तम्भ लिखने वाले स्वामीनाथन अय्यर और प्रसिद्ध लेखिका अरुन्धती राय। इन तीनों ने एकस्वर से कहा कि अब समय आ गया है कि कश्मीर को आजाद कर दिया जाये क्योंकि बन्दूक के बल पर भारत सरकार इस राज्य को अपने पास नहीं रख सकती। टीवी पर कार्यक्रम देखकर और इन तीन तथाकथित बुद्धिजीवियों के विचार देखकर मन में एक ही प्रश्न उठ रहा था कि जम्मू में जो कुछ हो रहा है कहीं उस ओर से ध्यान हटाकर पूरे आन्दोलन पर एक दबाव बनाने के किसी बडे प्रयास का हिस्सा तो नहीं हैं ऐसे बयान। ऐसा सोचने के पीछे कुछ कारण हैं। जम्मू का विषय पूरी तरह भिन्न है और यह आन्दोलन किसी भी प्रकार मुस्लिम विरोधी या कश्मीर विरोधी नहीं है। इस आन्दोलन को धार्मिक आधार पर और पाकिस्तान के समर्थन में ध्रुवीक्रत करने का प्रयास कुछ देश विरोधी तत्व और पाकिस्तान परस्त तत्व कर रहे हैं और इस कार्य में उनका सहयोग लोकतंत्र और उदारवाद के नाम पर वे बुद्धिजीवी कर रहे हैं जिनका पिछला रिकार्ड भी किसी भी प्रकार देश में राष्ट्रवाद का विरोध करना रहा है। इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के सन्दर्भ में ही मुझे अपने बचपन में पढी कहानी की शिक्षा याद आ गयी। कश्मीर भारत की नाक है जो न केवल भारत का अभिन्न अंग है वरन वह एक बिन्दु है जो भारत के विभाजन के उपरांत भी देश में सही मायनों में पंथ निरपेक्षता की गारण्टी देता है और भारत की उस इच्छाशक्ति को प्रदर्शित करता है जो कश्मीर के निर्माण के बाद से ही उस पर धार्मिक आधार पर दावा करने वाली पाकिस्तानी मानसिकता को कुचलती रही है। आज उसी कश्मीर पर फिर सवाल उठाये जा रहे हैं तो क्या वास्तव में कश्मीर में कोई संकट है। निश्चित रूप से संकट है और आज जम्मू में जो भी आन्दोलन चल रहा है वह उसी समस्या की भयावहता की ओर संकेत करता है।

दुर्भाग्य का विषय है कि हमारे राजनेता और तथाकथित उदारवादी बुद्धिजीवी इस पूरी समस्या के मूल में झाँकने का प्रयास नहीं करते। जम्मू के आन्दोलन को भूमि का विवाद बताया जा रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है यह अस्तित्व की लडाई और अपने ही देश में बहुसंख्यक होकर भी असुरक्षा के भाव में जी रहे हिन्दुओं की हुँकार है। जम्मू में पूरा आन्दोलन देखने में तो एक भूमि विवाद लगता है पर यह जम्मू और कश्मीर के बीच पिछले साठ वर्षों से हो रहे विभेद और कश्मीरियत के नाम पर पूरे क्षेत्र के इस्लामीकरण के विरोध में मुखर आवाज है।

जम्मू में अमरनाथ की तीर्थ यात्रा को सुचारू रूप से संचालित करने के लिये जब अमरनाथ श्राइन बोर्ड को कुछ एकड की भूमि अस्थाई निर्माण के लिये पूरी सरकारी खानापूरी के बाद दी गयी तो इसे लेकर कश्मीर में देश विरोधी और पाकिस्तान परस्त तत्वों ने गलत प्रचार किया कि यह कश्मीर की भूजनाँकिकी बिगाड्ने का प्रयास है ताकि बाहर से लाकर लोगों को यहाँ बसाया जा सके। अस्थाई निर्माण के लिये दी जाने वाली भूमि के लिये इन तत्वों ने कहा कि यह धारा 370 का उल्लंघन है। इस झूठ के आधार पर कश्मीर के लोग सड्कों पर उतरे और पूरे राज्य में हिन्दुओं को 1989 का वह समय याद आ गया जब कुछ ही दिनों के नोटिस पर पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के उकसाने पर घाटी में जेहाद के स्वर गुंजायमान हुए थे और अपना सब कुछ छोड्कर 3 लाख से भी अधिक हिन्दुओं को अपने ही देश में शरणार्थी होने को विवश होना पडा। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने के मामले में कश्मीर में जिस प्रकार कट्टरपंथियों के आह्वान पर लोग सड्कों पर उतरे उससे एक बार फिर जम्मू के जिहादीकरण का भी खतरा उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था।

जम्मू के इस पूरे आन्दोलन को दो सन्दर्भों में समझने की आवश्यकता है। एक तो यह आन्दोलन स्थानीय विषय को लेकर जम्मू के लोगों में जमीन अमरनाथ श्राइन बोर्ड से जमीन वापस लेने के कारण इस अन्याय को लेकर उत्पन्न विक्षोभ का परिणाम था परंतु इस विषय से समस्त देश के हिन्दुओं का भाव जुड गया और पूरे देश में तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हो रहे मुस्लिम तुष्टीकरण के नग्न प्रदर्शन और एक प्रकार से इसके राजनीतिक शिष्टाचार बन जाने की हिन्दुओं की पीडा ने इस विषय के साथ पूरे देश को जोड दिया।

आधुनिक भारत के इतिहास में यह पहला अवसर है जब किसी स्वतःस्फूर्त आन्दोलन ने इतने लम्बे समय तक निरंतरता का प्रदर्शन किया है और हर बीतते हुए दिन में उसमें और भी प्रखरता आती गयी है। जो लोग इस आन्दोलन को भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रेरित मानकर चल रहे हैं उनके आकलन में भूल है और वे एक बार फिर देश में हो रहे परिवर्तन को या तो भाँप नहीं पा रहे हैं या फिर उन्हें हिन्दुओं के स्वभाव को लेकर कुछ गफलत है। जम्मू के आन्दोलन को जो भी सामयिक सन्दर्भ में इसकी व्यापकता के साथ अनुभव नहीं कर रहा है वह बडी भूल कर रहा है और दुर्भाग्य से यह भूल हर ओर से हो रही है। जम्मू का आन्दोलन कश्मीरियित के नाम पर हिन्दू विहीन घाटी और इस्लामीकरण के लिये मार्ग प्रशस्त करती जिहादी मानसिकता के विरुद्ध आन्दोलन है। आज जम्मू अपने अस्तित्व की लडाई लिये सड्कों पर उतरा है जो अपने भाग्य में 1989 का कश्मीर नहीं लिखना चाहता। जम्मू उन घटनाओं की पुनराव्रत्ति नहीं चाहता जो कश्मीर में हुई जब हिन्दुओं के मानबिन्दुओं का एक एक कर नाम बदला जाता रहा, धर्म स्थल बदले जाते रहे और अंत में हिन्दुओं को घाटी छोड्ने पर विवश कर दिया गया। जम्मू में जिस प्रकार अमरनाथ श्राइन बोर्ड को अस्थाई निर्माण के लिये दी जाने वाले जमीन को कश्मीर में अलगाववादियों ने इस्लाम से जोड्कर देखा और इस राज्य से सांसदों ने संसद में घोषणा कर दी कि वे जान दे देंगे पर जमीन नहीं देंगे वह स्पष्ट संकेत था कि अब जम्मू कश्मीर राज्य पर अलगाववादियों और जेहादियों का शासन चलता है जो पाकिस्तान के साथ मिलने का ख्वाब देखते हैं क्योंकि यह उनका अधूरा सपना है जो पाकिस्तान के निर्माण के बाद भी पूरा नहीं हो सका था।

जम्मू का आन्दोलन किसी भी प्रकार साम्प्रदायिक या घाटी विरोधी नहीं था पर जिस प्रकार कश्मीर के अलगाववादी नेता खुलेआम इस्लाम और पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाने लगे और पाकिस्तान का झंडा लहरा कर भारत का राष्ट्रीय ध्वज जलाने लगे वह इन तत्वों को बेनकाब करने के लिये पर्याप्त था। कश्मीर के अलगववादी तत्वों ने एक और झूठ बोला कि जम्मू के लोगों ने नाकेबन्दी कर दी है और कश्मीर के लोगों को अलग थलग किया जा रहा है जबकि सर्वदलीय बैठक में हिस्सा लेने गयी महबूबा मुफ्ती ने भी पाया था कि जम्मू कश्मीर हाईवे पर परिवहन संचालन सामान्य था। फिर ऐसे झूठ क्यों? इस पूरे मामले पर समझौतावादी रूख अपनाने के स्थान पर पूरे मामले को कश्मीर की आजादी से क्यों जोडा जाने लगा? ये कुछ प्रश्न हैं जो जम्मू के आन्दोलन के निहितार्थ की ओर संकेत करते हैं।

जम्मू के आन्दोलन को यदि व्यापक सन्दर्भ में समझने से परहेज किया गया तो पूरे भारत में इस प्रकार के आन्दोलन आरम्भ हो जायेंगे। क्योंकि जम्मू का आन्दोलन एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत करता है कि अब हिन्दुओं का धैर्य जबाब दे रहा है और अपने धार्मिक संस्कारों के चलते उनकी सहजता को उनकी कायरता माना जाने लगा है और जिहादी शक्तियाँ तथा उनकी सहायक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियाँ हिन्दुओं को अपने ही देश में अस्तित्व की लडाई लड्ने को विवश कर रही हैं। संतोष का विषय है कि जम्मू का आन्दोलन अभी तक शांतिपूर्ण है परंतु जिस प्रकार अहमदाबाद और बंगलोर में हुए विस्फ़ोटों के बाद सिमी का रहस्य सामने आया है और भारत के ही मुसलमानों को अपने राज्य और हिन्दुओं का खून बहाते लोग देख रहे हैं ऐसे में इस बात की कल्पना करना मूर्खता ही होगी कि हिन्दुओं का धैर्य असीम है और यह जबाब नहीं दे सकता। अच्छा हो कि हमारे नेता और बुद्धिजीवी जम्मू के आन्दोलन में छुपे रहस्यों और तेजी से समस्त देश में फैल रहे इस आन्दोलन के पीछे छुपी हिन्दुओं की अतीन्द्रिय मानसिकता का समझने का प्रयास करें।

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