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क्या हिन्दुओं का धैर्य जबाब दे रहा है?

Posted by amitabhtri on अगस्त 22, 2008

अपने विद्यालय के दिनों में मैने एक कहानी पढी थी जिसकी शिक्षा यह थी कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक है जहाँ से दूसरे की नाक आरम्भ होती है। अचानक यह कहानी पिछले दिनों तब याद आ गयी जब एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में कश्मीर को लेकर एक विशेष परिचर्चा आयोजित की गयी और उसका विषय था कि क्या अब कश्मीर आजादी के लिये तैयार है? इस कार्यक्रम की महिला प्रस्तोता ने देश के तीन तथाकथित उदारवादी लेखकों को इस सम्बन्ध में उद्धृत किया और वे लेखक है देश के अग्रणी अंग्रेजी समाचार पत्र के सम्पादक वीर सांघवी, एक और प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक में साप्ताहिक स्तम्भ लिखने वाले स्वामीनाथन अय्यर और प्रसिद्ध लेखिका अरुन्धती राय। इन तीनों ने एकस्वर से कहा कि अब समय आ गया है कि कश्मीर को आजाद कर दिया जाये क्योंकि बन्दूक के बल पर भारत सरकार इस राज्य को अपने पास नहीं रख सकती। टीवी पर कार्यक्रम देखकर और इन तीन तथाकथित बुद्धिजीवियों के विचार देखकर मन में एक ही प्रश्न उठ रहा था कि जम्मू में जो कुछ हो रहा है कहीं उस ओर से ध्यान हटाकर पूरे आन्दोलन पर एक दबाव बनाने के किसी बडे प्रयास का हिस्सा तो नहीं हैं ऐसे बयान। ऐसा सोचने के पीछे कुछ कारण हैं। जम्मू का विषय पूरी तरह भिन्न है और यह आन्दोलन किसी भी प्रकार मुस्लिम विरोधी या कश्मीर विरोधी नहीं है। इस आन्दोलन को धार्मिक आधार पर और पाकिस्तान के समर्थन में ध्रुवीक्रत करने का प्रयास कुछ देश विरोधी तत्व और पाकिस्तान परस्त तत्व कर रहे हैं और इस कार्य में उनका सहयोग लोकतंत्र और उदारवाद के नाम पर वे बुद्धिजीवी कर रहे हैं जिनका पिछला रिकार्ड भी किसी भी प्रकार देश में राष्ट्रवाद का विरोध करना रहा है। इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के सन्दर्भ में ही मुझे अपने बचपन में पढी कहानी की शिक्षा याद आ गयी। कश्मीर भारत की नाक है जो न केवल भारत का अभिन्न अंग है वरन वह एक बिन्दु है जो भारत के विभाजन के उपरांत भी देश में सही मायनों में पंथ निरपेक्षता की गारण्टी देता है और भारत की उस इच्छाशक्ति को प्रदर्शित करता है जो कश्मीर के निर्माण के बाद से ही उस पर धार्मिक आधार पर दावा करने वाली पाकिस्तानी मानसिकता को कुचलती रही है। आज उसी कश्मीर पर फिर सवाल उठाये जा रहे हैं तो क्या वास्तव में कश्मीर में कोई संकट है। निश्चित रूप से संकट है और आज जम्मू में जो भी आन्दोलन चल रहा है वह उसी समस्या की भयावहता की ओर संकेत करता है।

दुर्भाग्य का विषय है कि हमारे राजनेता और तथाकथित उदारवादी बुद्धिजीवी इस पूरी समस्या के मूल में झाँकने का प्रयास नहीं करते। जम्मू के आन्दोलन को भूमि का विवाद बताया जा रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है यह अस्तित्व की लडाई और अपने ही देश में बहुसंख्यक होकर भी असुरक्षा के भाव में जी रहे हिन्दुओं की हुँकार है। जम्मू में पूरा आन्दोलन देखने में तो एक भूमि विवाद लगता है पर यह जम्मू और कश्मीर के बीच पिछले साठ वर्षों से हो रहे विभेद और कश्मीरियत के नाम पर पूरे क्षेत्र के इस्लामीकरण के विरोध में मुखर आवाज है।

जम्मू में अमरनाथ की तीर्थ यात्रा को सुचारू रूप से संचालित करने के लिये जब अमरनाथ श्राइन बोर्ड को कुछ एकड की भूमि अस्थाई निर्माण के लिये पूरी सरकारी खानापूरी के बाद दी गयी तो इसे लेकर कश्मीर में देश विरोधी और पाकिस्तान परस्त तत्वों ने गलत प्रचार किया कि यह कश्मीर की भूजनाँकिकी बिगाड्ने का प्रयास है ताकि बाहर से लाकर लोगों को यहाँ बसाया जा सके। अस्थाई निर्माण के लिये दी जाने वाली भूमि के लिये इन तत्वों ने कहा कि यह धारा 370 का उल्लंघन है। इस झूठ के आधार पर कश्मीर के लोग सड्कों पर उतरे और पूरे राज्य में हिन्दुओं को 1989 का वह समय याद आ गया जब कुछ ही दिनों के नोटिस पर पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के उकसाने पर घाटी में जेहाद के स्वर गुंजायमान हुए थे और अपना सब कुछ छोड्कर 3 लाख से भी अधिक हिन्दुओं को अपने ही देश में शरणार्थी होने को विवश होना पडा। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने के मामले में कश्मीर में जिस प्रकार कट्टरपंथियों के आह्वान पर लोग सड्कों पर उतरे उससे एक बार फिर जम्मू के जिहादीकरण का भी खतरा उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था।

जम्मू के इस पूरे आन्दोलन को दो सन्दर्भों में समझने की आवश्यकता है। एक तो यह आन्दोलन स्थानीय विषय को लेकर जम्मू के लोगों में जमीन अमरनाथ श्राइन बोर्ड से जमीन वापस लेने के कारण इस अन्याय को लेकर उत्पन्न विक्षोभ का परिणाम था परंतु इस विषय से समस्त देश के हिन्दुओं का भाव जुड गया और पूरे देश में तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हो रहे मुस्लिम तुष्टीकरण के नग्न प्रदर्शन और एक प्रकार से इसके राजनीतिक शिष्टाचार बन जाने की हिन्दुओं की पीडा ने इस विषय के साथ पूरे देश को जोड दिया।

आधुनिक भारत के इतिहास में यह पहला अवसर है जब किसी स्वतःस्फूर्त आन्दोलन ने इतने लम्बे समय तक निरंतरता का प्रदर्शन किया है और हर बीतते हुए दिन में उसमें और भी प्रखरता आती गयी है। जो लोग इस आन्दोलन को भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रेरित मानकर चल रहे हैं उनके आकलन में भूल है और वे एक बार फिर देश में हो रहे परिवर्तन को या तो भाँप नहीं पा रहे हैं या फिर उन्हें हिन्दुओं के स्वभाव को लेकर कुछ गफलत है। जम्मू के आन्दोलन को जो भी सामयिक सन्दर्भ में इसकी व्यापकता के साथ अनुभव नहीं कर रहा है वह बडी भूल कर रहा है और दुर्भाग्य से यह भूल हर ओर से हो रही है। जम्मू का आन्दोलन कश्मीरियित के नाम पर हिन्दू विहीन घाटी और इस्लामीकरण के लिये मार्ग प्रशस्त करती जिहादी मानसिकता के विरुद्ध आन्दोलन है। आज जम्मू अपने अस्तित्व की लडाई लिये सड्कों पर उतरा है जो अपने भाग्य में 1989 का कश्मीर नहीं लिखना चाहता। जम्मू उन घटनाओं की पुनराव्रत्ति नहीं चाहता जो कश्मीर में हुई जब हिन्दुओं के मानबिन्दुओं का एक एक कर नाम बदला जाता रहा, धर्म स्थल बदले जाते रहे और अंत में हिन्दुओं को घाटी छोड्ने पर विवश कर दिया गया। जम्मू में जिस प्रकार अमरनाथ श्राइन बोर्ड को अस्थाई निर्माण के लिये दी जाने वाले जमीन को कश्मीर में अलगाववादियों ने इस्लाम से जोड्कर देखा और इस राज्य से सांसदों ने संसद में घोषणा कर दी कि वे जान दे देंगे पर जमीन नहीं देंगे वह स्पष्ट संकेत था कि अब जम्मू कश्मीर राज्य पर अलगाववादियों और जेहादियों का शासन चलता है जो पाकिस्तान के साथ मिलने का ख्वाब देखते हैं क्योंकि यह उनका अधूरा सपना है जो पाकिस्तान के निर्माण के बाद भी पूरा नहीं हो सका था।

जम्मू का आन्दोलन किसी भी प्रकार साम्प्रदायिक या घाटी विरोधी नहीं था पर जिस प्रकार कश्मीर के अलगाववादी नेता खुलेआम इस्लाम और पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाने लगे और पाकिस्तान का झंडा लहरा कर भारत का राष्ट्रीय ध्वज जलाने लगे वह इन तत्वों को बेनकाब करने के लिये पर्याप्त था। कश्मीर के अलगववादी तत्वों ने एक और झूठ बोला कि जम्मू के लोगों ने नाकेबन्दी कर दी है और कश्मीर के लोगों को अलग थलग किया जा रहा है जबकि सर्वदलीय बैठक में हिस्सा लेने गयी महबूबा मुफ्ती ने भी पाया था कि जम्मू कश्मीर हाईवे पर परिवहन संचालन सामान्य था। फिर ऐसे झूठ क्यों? इस पूरे मामले पर समझौतावादी रूख अपनाने के स्थान पर पूरे मामले को कश्मीर की आजादी से क्यों जोडा जाने लगा? ये कुछ प्रश्न हैं जो जम्मू के आन्दोलन के निहितार्थ की ओर संकेत करते हैं।

जम्मू के आन्दोलन को यदि व्यापक सन्दर्भ में समझने से परहेज किया गया तो पूरे भारत में इस प्रकार के आन्दोलन आरम्भ हो जायेंगे। क्योंकि जम्मू का आन्दोलन एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत करता है कि अब हिन्दुओं का धैर्य जबाब दे रहा है और अपने धार्मिक संस्कारों के चलते उनकी सहजता को उनकी कायरता माना जाने लगा है और जिहादी शक्तियाँ तथा उनकी सहायक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियाँ हिन्दुओं को अपने ही देश में अस्तित्व की लडाई लड्ने को विवश कर रही हैं। संतोष का विषय है कि जम्मू का आन्दोलन अभी तक शांतिपूर्ण है परंतु जिस प्रकार अहमदाबाद और बंगलोर में हुए विस्फ़ोटों के बाद सिमी का रहस्य सामने आया है और भारत के ही मुसलमानों को अपने राज्य और हिन्दुओं का खून बहाते लोग देख रहे हैं ऐसे में इस बात की कल्पना करना मूर्खता ही होगी कि हिन्दुओं का धैर्य असीम है और यह जबाब नहीं दे सकता। अच्छा हो कि हमारे नेता और बुद्धिजीवी जम्मू के आन्दोलन में छुपे रहस्यों और तेजी से समस्त देश में फैल रहे इस आन्दोलन के पीछे छुपी हिन्दुओं की अतीन्द्रिय मानसिकता का समझने का प्रयास करें।

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भारत के जिहादीकरण का खतरा

Posted by amitabhtri on जुलाई 27, 2008

भारत में पिछले 20 वर्षों के इस्लामी आतंकवाद के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब चौबीस घण्टे के भीतर दो प्रमुख शहरों में विस्फोट हुए। पहले 25 जुलाई को बंगलोर में कम क्षमता वाले सात श्रृखलाबद्ध विस्फोट हुए और फिर एक दिन बाद गुजरात की राजधानी अहमदाबाद को निशाना बनाया गया। बंगलोर के विस्फोट में जहाँ केवल एक महिला की मृत्यु हुई और कोई एक दर्जन लोग घायल हुए तो वहीं अहमदाबाद में कम क्षमता वाले विस्फोटों के बाद भी 39 लोगों के मारे जाने और 100 से अधिक लोगों के घायल होने का समाचार है।

बंगलोर में हुए विस्फोट को लेकर अधिक चिंतित सरकारें दिखी नहीं और कुछ समाचार पत्रों ने तो इसे आपराधिक गतिविधि तक की संज्ञा दे डाली। बंगलोर में हुए विस्फोट की गुत्थी सुलझ पाती इससे पहले अहमदाबाद में विस्फोट कर आतंकवादियों ने अपनी मंशा प्रकट कर दी। बंगलोर और फिर अहमदाबाद में हुए विस्फोट कुछ समानतायें दर्शाते हैं। ये विस्फोट नवम्बर 2007 में उत्तर प्रदेश में कुछ न्यायालय परिसर में हुए विस्फोट के समान ही हैं। पिछ्ले वर्ष उत्तर प्रदेश में हुए विस्फोट के बाद 13 मई को जयपुर में हुए विस्फोट और अब बंगलोर और अहमदाबाद में विस्फोटों में बडी समानता है। इन सभी विस्फोटों में साइकिल का प्रयोग हुआ, बम रखने के लिये टिफिन या प्रेशर कुकर का प्रयोग हुआ और इन सभी विस्फोटों में अमोनियम नाइट्रेट, नुकीले पदार्थो और जिलेटिन छडों का प्रयोग किया गया है। यह समानता कुछ संकेत देती है। एक तो यह कि अब अधिकतर विस्फोटों को अंजाम भारत में स्थानीय मुसलमान दे रहा है और बम की सामग्री या विस्फोटकों के निर्माण के लिये उसे पाकिस्तान की आई.एस.आई पर निर्भर नहीं होना पड रहा है अर्थात अब इन विस्फोटों को करने के लिये आर.डी.एक्स का आयात आवश्यक नहीं है। यह रूझान कुछ खतरनाक संकेत देता है। एक तो यह कि भारत सरकार का यह दावा बेमानी सिद्ध होता है कि सभी आतंकवादी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई या लश्कर और जैश का हाथ है और यह दावा कि भारत में मुसलमान वैश्विक जिहादी नेटवर्क से न तो जुडा है और न ही उस भाव से प्रभावित है।

बंगलोर में हुए विस्फोट की जिम्मेदारी तो किसी संगठन ने नहीं ली है परंतु अहमदाबाद में हुए विस्फोट की जिम्मेदारी उस इण्डियन मुजाहिदीन नामक अप्रचलित आतंकवादी संगठन ने ली है जो पहली बार चर्चा में तब आया था जब पिछले वर्ष नवम्बर में उत्तर प्रदेश में हुए विस्फोटों की जिम्मेदारी लेते हुए ईमेल मीडिया के लोगों को भेजा था। इसी संगठन ने जयपुर विस्फोटों की जिम्मेदारी लेते हुए जिहाद का एक घोषणा पत्र ही मीडिया को जारी किया। एक बार फिर जब इस संगठन ने अहमदाबाद में हुए विस्फोटों की जिम्मेदारी ली है और इसे गुजरात में हुए दंगों का प्रतिशोध बताया है तो पूरी स्थिति पर पुनर्विचार करने का अवसर आ गया है।

पिछले वर्ष नवम्बर में जब इण्डियन मुजाहिदीन ने उत्तर प्रदेश के अनेक न्यायालयों में श्रृखलाबद्ध विस्फोट किये थे तो इसका कारण घटना के कुछ दिन पूर्व जैश-ए-मोहम्मद के कुछ आतंकवादियों की लखनऊ में हुई गिरफ्तारी तथा मुम्बई बम काण्ड के आरोपियों के रूप में मुसलमानों को अधिक मात्रा में सजा देना साथ ही पिछ्ले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में हुए आतंकवादी आक्रमणों के आरोपी आतंकवादियों के पक्ष में पैरवी करने से वकीलों के इंकार करना माना गया था। यह एक ऐसा आतंकवादी आक्रमण था जो रणनीतिक दृष्टि से एक दम नया प्रयोग था और सीधे-सीधे न्यायपालिका को निशाना बनाया गया था। इसी प्रकार जयपुर में 13 मई को हुए विस्फोट के बाद इण्डियन मुजाहिदीन ने एक बार फिर विस्फोटों की जिम्मेदारी लेते हुए जिहाद का घोषणा पत्र मीडिया को भेजा और पहली बार हिन्दुओं की पूजा पद्धति के चलते उनको निशाना बनाने और इस्लामी उम्मा के साथ ही विदेश नीति और मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा की बातें की। एक बार फिर इस संगठन ने गुजरात के दंगों का प्रतिशोध लेने की बात कर भारत के मुसलमानों की सहानुभूति लेने का प्रयास किया है और जिहाद को चर्चा में लाने में सफलता प्राप्त की है। समाचारों के अनुसार इण्डियन मुजाहिदीन ने जिस प्रकार राजस्थान और मध्य प्रदेश सरकार को चेतावनी दी है कि वह सिमी के कार्यकर्ताओं को छोड दे अन्यथा अपने राज्यों मे आतंकवादी आक्रमणों के लिये तैयार रहे वह भी एक खतरनाक संकेत है और यह राज्य और प्रशासन पर दबाव डालने और अपनी माँगें मनवाने के साथ ही मुस्लिम जिहादी तत्वों की सहानुभूति प्राप्त कर अधिक भर्ती के लिये नये मुसलमानों को प्रेरित करने का प्रया भी है।

इण्डियन मुजाहिदीन ने जो सदेश मीडिया को भेजा है उसमें बाम्बे स्टाक एक्स्चेंज को निशाना बनाने और अग्रणी उद्योगपति मुकेश अम्बानी को भी निशाने पर लेने की बात की है। बंगलोर में जिस प्रकार विस्फोट हुए और मुम्बई में स्टाक एक्सचेंज सहित मुकेश अम्बानी पर भी आक्रमण करने की बात इस्लामी आतंकवादी संगठनों ने की है उसके अपने निहितार्थ हैं। जयपुर में हुए विस्फोट के बाद इस संगठन ने जो सन्देश मीडिया को भेजा था उसमें यह भी कहा था कि मुस्लिम विरोधी सरकारों और राजनीतिक दलों को धन और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का परिणाम उद्योगपतियों और आम जनता को ऐसे विस्फोटो के रूप में भुगतना पडेगा।

जयपुर में भयानक विस्फोटों के बाद जिस प्रकार दो माह से कम समय में इस्लामी आतंकवादियों ने चौबीस घण्टे के भीतर देश के दो आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न शहरों को निशाना बनाया है उससे स्पष्ट है कि खतरा अब पडोसी देश से नहीं वरन भारत के भीतर ही एक मुस्लिम वर्ग से है जो वैश्विक जिहाद से जुड गया है और कभी भी कहीं भी आक्रमण या विस्फोट करने की क्षमता रखता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इस समस्या को सही सन्दर्भ में देखा जाये और इसे देश पर आक्रमण मान कर अपने शत्रुओं की पहचान कर ली जाये।

देश में इस्लामी आतंकवाद की परम्परा रही है और इसके प्रति सरकारों और बुद्धिजीवियों के शुतुरमुर्गी रवैये की परम्परा भी रही है। आज भी जब यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है कि पिछले चार वर्षों में भारत में जितने भी विस्फोट हुए हैं उसमें सिमी और स्थानीय मुस्लिम समुदाय का सक्रिय योगदान रहा है फिर भी हमारी सरकार बिना कोई प्रमाण लाये लश्कर, जैश और आई.एस.आई के मत्थे दोष मढ देती है। यह बात किसी को भी आश्चर्यजनक लग सकती है कि भारत में आतंकवादी गतिविधियों में पाकिस्तान को दोषी कैसे न माना जाये पर अब भारत के जिहादीकरण का खतरा उत्पन्न हो गया है और हमने 13 दिसम्बर 2001 को संसद पर हुए आक्रमण के बाद पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कार्रवाई न करके एक बडा अवसर खो दिया था अब भारत में आतंकवाद का व्याकरण बदल गया है और भारत में विस्फोटों के लिये पाकिस्तान को हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है अब भारत में मुसलमानों का एक बडा वर्ग जिहाद से प्रेरित है और वह स्वयं भारत के विरुद्ध जिहाद में लिप्त है। यह जिहाद पूरी तरह वैश्विक जिहादवाद से प्रेरित है और मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा, अमेरिका और इजरायल के साथ भारत की बढ्ती निकटता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुरान और शरियत के आधार पर एक काल्पनिक विश्व व्यवस्था के निर्माण का संकल्प इस जिहादवाद को प्रेरित कर रहा है और इस विचार से प्रभावित होने वाले मुसलमानों की संख्या निरंतर बढ रही है।

एक अजीब विडम्बना है कि देश में कुछ प्रमुख इस्लामी संगठनों ने पिछ्ले कुछ महीनों में इस्लामी आतंकवाद की निन्दा और इसे इस्लाम से पूरी तरह असम्पृक्त करने के प्रयास किये हैं। इस क्रम में देश के प्रमुख इस्लामी संगठनों ने अलग-अलग प्रयासों के द्वारा कई बार आतंकवाद विरोधी सम्मेलन तक आयोजित किये परंतु इन सम्मेलनों के बाद से इस्लामी आतंकवादी घटनाओं में तीव्रता आ गयी है। आखिर ऐसे प्रयासों का क्या लाभ जो आतंकवादी घटनायें रोकने में असफल है। ऐसे प्रयासों को गम्भीरता पूर्वक आतंकवाद रोकने के प्रयास के बजाय इस्लाम की छवि को ठीक करने और मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा को न्यायसंगत ठहराने के प्रयासों के रूप में अधिक लेने की आवश्यकता है।

इस्लामी आतंकवाद की इस परिपाटी का नया आयाम हमारे समक्ष सामने आ रहा है जब आतंकवाद का नया गुरुत्व केन्द्र दक्षिण एशिया बनता जा रहा है। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुए विनाशकारी आक्रमण के पश्चात अमेरिका ने बौद्धिक और प्रशासनिक तौर पर इस समस्या को नये सन्दर्भ में लिया और इसे एक युद्ध माना यही तथ्य यूरोप के विषय में भी सत्य है और यही कारण है कि मैड्रिड और लन्दन में हुए विस्फोटों के बाद ये देश भी आतंकवादी घटनाओं में अपने निर्दोष लोगों की जान बचाने में सफल रहे हैं। इसके विपरीत हमारा देश प्रत्येक तीन महीने में सैकडों लोगों की जान दाँव पर लगाता है पर इस समस्या को एक आपातकालीन स्थिति मानकर उस प्रकार की नीतियाँ नहीं बनाता। आश्चर्य तो तब होता है जब आतंकवाद प्रतिरोध के विशेषज्ञ बी रमन जैसे लोग भी मान लेते हैं कि भारत की सरकार को मुसलमानों को विश्वास दिलाना चाहिये कि न्याय व्यवस्था में उनके साथ न्याय होगा। साथ ही वे यह ही स्वीकार करते हैं कि भारत इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिका जैसा जवाब नहीं दे सकता क्योंकि भारत मुस्लिम पडोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से घिरा है और भारत में मुसलमान 15 प्रतिशत से अधिक है और कुलमिलाकर इन देशों में मुस्लिम जनसंख्या 57 प्रतिशत होती है। बी रमन के विश्लेषण से यही निष्कर्ष निकलता है कि वह भी मानते हैं कि इस्लामी आतंकवाद एक विचारधारागत विषय है जिसके साथ इस दक्षिण एशिया का मुसलमान बडी मात्रा में जुडा है। आज आवश्यकता है कि इस समस्या से मुँह चुराने के स्थान पर इस पर बहस हो और आतंकवाद के इस्लामी स्वरूप और इस्लामी प्रेरणा के कारणों को जानने के साथ ही इसकी महत्वाकाँक्षा को दबाया जाये।

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आरुषि के बहाने

Posted by amitabhtri on मई 22, 2008

पिछले चार पाँच दिन से समाचार माध्यमों में नोएडा की रहने वाली आरुषि की रहस्यमय हत्या का मामला छाया है। मीडिया द्वारा इस विषय को महत्व देना कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है, इससे पूर्व भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हुई हत्याओं को काफी महत्व मिलता रहा है। परंतु इस घटना के समय को लेकर एक प्रश्न मन में अवश्य उठता है कि जब इसी समय अभी कोई दस दिन पहले राजस्थान की राजधानी जयपुर में आतंकवादी आक्रमण हुआ है और उस सम्बन्ध में भी जाँच चल रही है तो हमारे समाचार माध्यमों का ध्यान उस ओर क्यों नहीं जा रहा है या फिर यूँ कहें कि उनका ध्यान उस ओर से पूरी तरह हट गया है। यह एक ऐसा विषय है जिस पर गम्भीरतापूर्वक सोचने की आवश्यकता है।

आरुषि हत्याकाण्ड में जिस प्रकार समाचार माध्यमों ने रुचि दिखाई और पुलिस प्रशासन को दबाव में लिया कि नोएडा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को बकायदा प्रेस कांफ्रेस करनी पडी और इस मामले में जाँच में हो रही प्रगति के सम्बन्ध में मीडिया को बताना पडा। यह मीडिया की शक्ति की ओर संकेत करता है पर वहीं एक प्रश्न यह भी उठता है कि आरुषि के मामले को इतना तूल देकर कहीं मीडिया ने जयपुर मामले में बहस से लोगों का ध्यान हटाने का शुभ कार्य तो नहीं किया है। निश्चय ही मीडिया के इस कार्य से सरकार काफी राहत मिली है और उसी राहत का अनुभव करते हुए भारत के गृहमंत्री ने बयान दे डाला कि मोहम्मद अफजल को फांसी की पैरवी नहीं करनी चाहिये।

आरुषि मामले को मीडिया द्वारा तूल देने के पीछे कोई षडयंत्रकारी पक्ष देखना तो उचित तो नहीं होगा पर इससे कुछ प्रश्न अवश्य उठते है। क्या मीडिया जयपुर जैसी घटनाओं को नजरअन्दाज करने की रणनीति अपना रहा है। इस बात के संकेत मिलते भी हैं। पिछले तीन वर्षों में यदि इस्लामी आतंकवाद के सम्बन्ध में मीडिया की रिपोर्टिंग पर नजर डाली जाये तो कुछ स्थिति स्पष्ट होती है। 11 जुलाई 2006 को देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई में लोकल रेल व्यवस्था पर आक्रमण हुआ और उस समय की रिपोर्टिंग और अब जयपुर में हुए आक्रमण की प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया की रिपोर्टिंग में कुछ गुणात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। यह गुणात्मक परिवर्तन इस सन्दर्भ में है कि ऐसी घटनाओं की क्षति, लोगों पर इसके प्रभाव और इस आतंकवाद में लिप्त लोगों पर चर्चा को उतना ही रखा जाये जितना पत्रकारिता धर्म के विरुद्ध नहीं है। इस नजरिये से घटना की रिपोर्टिंग तो होती है परंतु घटना के बाद इस विषय से बचने का प्रयास किया जाता है। यह बात 2006 से आज तक हुए प्रत्येक आतंकवादी आक्रमण के सम्बन्ध में क्रमशः होती रही है। यदि जयपुर आक्रमण के बाद विभिन्न समाचार पत्रों में सम्पादकीय या उससे सम्बन्धित लेखों की संख्या देखी जाये तो ऐसा लगता है कि इस सम्बन्ध में खाना पूरी की जा रही है और जोर इस बात पर अधिक है कि यह घटना लोगों के स्मरण से कितनी जल्दी दूर हो जाये या इसे लोग भूल जायें।

मीडिया के इस व्यवहार की समीक्षा इस पृष्टभूमि में भी की जा सकती है कि कहीं आतंकवादी घटनाओं की अधिक रिपोर्टिंग और उस पर अधिक चर्चा नहीं करने को भी इस आतंकवाद से निपटने का एक तरीका माना जा रहा है जैसा कि प्रसिद्ध आतंकवाद प्रतिरोध विशेषज्ञ बी रमन ने हाल के अपने एक लेख में सुझाव दिया है। उनका मानना है कि आतंकवादी आक्रमणों के बाद ऐसा प्रदर्शन नहीं करना चाहिये कि हमारे जीवन पर इसका कोई प्रभाव हो रहा है क्योंकि इससे आतंकवादियों को लगता है कि वे अपने उद्देश्य में सफल हैं। बी रमन मानते हैं कि आतंकवादी न तो साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड पाये हैं और न ही पर्यटन स्थलों पर आक्रमण कर लोगों को ऐसे स्थलों पर जाने से रोक सके हैं।

इसी प्रकार का सुझाव जुलाई 2006 में मुम्बई में स्थानीय रेल व्यवस्था पर हुए आक्रमण के पश्चात संसद एनेक्सी में कुछ मुस्लिम संगठनों द्वारा बुलाए गये आतंकवाद विरोधी सम्मेलन में प्रधानमंत्री और सूचना प्रसारण मंत्री की उपस्थिति में दिया गया था और मीडिया को अमेरिका और यहूदियों का एजेंट बताकर उनपर आरोप लगाया गया था कि वे आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों और इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे सुझाव अब असर करने लगे हैं और इस्लामी आतंकवाद को लेकर मीडिया ने अपने ऊपर एक सेंसरशिप थोप ली है और इस सम्बन्ध में क्षमाप्रार्थना का भाव व्याप्त कर लिया है। अब प्रश्न यह उठता है कि इस रूख से किसे लाभ होने जा रहा है और क्या इस रूख से आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के इस युग में हम आतंकवाद पर विजय प्राप्त कर सकेंगे? निश्चित रूप से इससे आतंकवाद के युद्ध में आतंकवादियों को ही लाभ होने जा रहा है और उन राजनीतिक दलों को लाभ होने जा रहा जो इस्लामी आतंकवाद से मुस्लिम समुदाय के जुडाव के कारण इस विषय में न कोई चर्चा करना चाहते हैं और न ही कोई कार्रवाई।

जयपुर पर हुए आक्रमण के बाद जिस प्रकार आक्रमण में घायल हुए लोगों, जाँच की प्रगति और आतंकवाद के मोर्चे पर पूरी तरह असफल केन्द्र सरकार की कोई खबर मीडिया ने नहीं ली उससे एक बात स्पष्ट है कि आज लोकतंत्र के सभी स्तम्भ यहाँ तक कि पाँचवा स्तम्भ माना जाने वाला मीडिया भी शुतुरमुर्गी रवैया अपना रहा है और इन सबकी स्थिति उस कबूतर की भाँति है जो बिल्ली के सामने अपनी आंखें बन्द कर सोचता है कि बिल्ली भाग जायेगी। लोकतंत्र में मीडिया की अपनी भूमिका होती है लेकिन जिस प्रकार मीडिया बहस से भाग रहा है उससे इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वालों को यही सन्देश जा रहा है कि हमारे अन्दर इच्छाशक्ति नहीं है और मुकाबले के स्थान पर पलायन का रूख अपना रहे हैं।

आखिर यह अंतर क्यों आया है। जयपुर के सम्बन्ध में अंतर यह आया है कि अब यह स्पष्ट हो गया है कि भारत में स्थानीय मुसलमानों का एक वर्ग इस्लाम के नाम पर पूरे विश्व में चल रहे जिहाद के साथ जुड चुका है और वह देश में आतंकवादियों के लिये हर प्रकार का वातावरण निर्माण कर रहा है। इसी कारण इस मामले से हर कोई बचना चाहता है।

इस प्रकार का रवैया अपना कर हम पहले दो बार जिहादवाद के विस्तार को रोकने का अवसर खो चुके हैं और तीसरी बार वही भूल करने जा रहे हैं। पहली बार जब 1989 में जम्मू कश्मीर में आतंकवाद ने प्रवेश किया तो हमारे नेताओं, पत्रकारो और बुद्धिजीवियों ने उसे कुछ गुमराह और बेरोजगार युवकों का काम बताया और बाद में इन्हीं गुमराह युवकों ने हिन्दुओं को घाटी से निकाल दिया और डंके की चोट पर घोषित किया कि यह जिहाद है। इसी प्रकार जब भारत में कश्मीर से बाहर पहली जिहादी घटना 1993 में मुम्बई में श्रृखलाबद्ध बम विस्फोटों के रूप में हुई तो भी इसे जिहाद के स्थान पर बाबरी ढाँचे के 1992 में ध्वस्त होने की प्रतिक्रिया माना गया। वह अवसर था जब जिहादवाद भारत में विस्तार कर रहा था पर उस ओर ध्यान नहीं दिया गया। आज हम तीसरा अवसर खो रहे हैं जब हमें पता चल चुका है कि भारत में मुस्लिम जनसंख्या का एक बडा वर्ग वैश्विक जिहाद के उद्देश्य से सहानुभूति रखता है तो उस वर्ग का विस्तार रोकने के लिये कठोर कानूनी और विचारधारागत कदम उठाने के स्थान पर हम इस पर बहस ही नहीं करने को इसका समाधान मानकर चल रहे हैं।

जयपुर में हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद जिस प्रकार इस मामले को मीडिया ने ठण्डे बस्ते में डाला है वह सराहनीय नहीं है। इस सम्बन्ध में लोगों की सहनशीलता को असीमित मानकर चलने की यह भावना खतरनाक है। ऐसे आक्रमणों का सामना इनकी अवहेलना कर नहीं इस पर बहस कर किया जा सकता है। क्योंकि बहस न होने से यह पता लगा पाना कदापि सम्भव नहीं होगा इस विषय पर देश में क्या भाव है और लोग इसके मूलभूत कारणों के बारे में क्या सोचते हैं। कहीं ऐसा न हो कि इस विषय में संवादहीनता का परिणाम आगे चलकर भयावह हो जाये जैसा कि पहले कई अवसरों पर हम देख भी चुके हैं।

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