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दक्षिण एशिया पर अल कायदा का साया

Posted by amitabhtri on अक्टूबर 15, 2008

पाकिस्तान की सूचना मंत्री शेरी रहमान ने जब अपने देश की संसद में इस बात की आशंका व्यक्त की कि अल कायदा, तालिबान के साथ मिलकर अफगानिस्तान और कश्मीर में सक्रिय जेहादी तत्व पाकिस्तान को अस्थिर कर उसका शासन अपने हाथ में लेने का षडयन्त्र रच रहे हैं तो इस सनसनीखेज बयान को भारत में विश्लेषकों द्वारा अधिक महत्व नहीं दिया गया। परंतु यह बात अतयंत महत्व की है और यह बयान उस कठोर वास्तविकता की ओर संकेत करता है जिस ओर पाकिस्तान ही नहीं अफगानिस्तान और भारत सहित सम्पूर्ण दक्षिण एशिया बढ रहा है।

पाकिस्तान की सरकार के एक महत्वपूर्ण मंत्री की ओर से ऐसे बयान आने के पीछे दो तात्कालिक कारण हैं एक तो पिछले माह जिस प्रकार पाकिस्तान की राजधानी के अति सुरक्षा क्षेत्र में प्रधानमंत्री निवास और संसद भवन तक तालिबान और अल कायदा के संयुक्त प्रयासों से एक महत्वपूर्ण होटल को निशाना बना कर उसे पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया और इस प्रयास में लगभग एक टन विस्फोटक का प्रयोग किया गया। यह एक ऐसी घटना थी जो संकेत करती है कि पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन किस प्रकार संसाधन सम्पन्न और संस्थात्मक हो चुके हैं।

इसी के साथ एक और पृष्ठभूमि शेरी रहमान के बयान के पीछे है। अल कायदा का मीडिया प्रकोष्ठ काफी दिनों से चुप था और आतंकवाद और अल कायदा पर पैनी नजर रखने वाले अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ भी इस बात से आश्चर्यचकित थे कि 11 सितम्बर को प्रति वर्ष कर्मकाण्ड के तौर पर वीडियो या आडियो टेप जारी करने वाला अल कायदा इस बार चुप क्यों रहा? इसके पीछे एक प्रमुख कारण यह माना जा रहा था कि अल कायदा का मीडिया प्रकोष्ठ जिसे अल सहाब कहते हैं उसका प्रमुख और अमेरिका का धर्मांतरित नागरिक गदाहन उर्फ अज्जाम अल अमेरिकी इस वर्ष के आरम्भ में पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान में हुए एक बम हमले में मारा गया था जो अमेरिका नीत गठबन्धन सेना ने किया था। उस हमले के बाद अल कायदा के अल सहाब की निष्क्रियता से मान लिया गया कि अल कायदा का प्रचार तंत्र टूट चुका है। परंतु इन आशंकाओं के विपरीत गदाहन ने अल कायदा के सन्देश प्रकाशित करने वाली वेबसाइट पर 4 अक्टूबर को एक सन्देश प्रकाशित किया और इस सन्देश में अफगानिस्तान और पाकिस्तान सहित भारत को भी शामिल करते हुए पूरे दक्षिण एशिया के मुजाहिदीनों का आह्वान करते हुए कहा कि इस पूरे क्षेत्र में जेहाद की गति को तीव्र करें।

इस सन्देश में भारत और कश्मीर का भी उल्लेख किया गया है और क्रूसेडर, यहूदी शत्रुओं के साथ उनके सहयोगियों का उल्लेख करते हुए पाकिस्तान की सरकार और खुफिया एजेंसी पर आरोप लगाया गया है कि वह अमेरिका और उसके सहयोगियों के कहने पर कश्मीर में जेहाद को कमजोर कर रही है। इसके साथ ही काबुल में भी जेहाद को असफल करने का आरोप क्रूसेडर और हिन्दू भारत पर लगाया है। इस पूरे सन्देश में भारत का उल्लेख विशेष रूप से कश्मीर में जेहाद के सन्दर्भ में किया गया है पर कश्मीर के साथ इस बार भारत का अलग से उल्लेख कर हिन्दू भारत पर विजय का यह पहला कदम बताया गया है। सन्देश में पाकिस्तान की कश्मीर सम्बन्धी नीतियों का उल्लेख करते हुए पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन तहरीके तालिबान को सतर्क किया गया है कि पाकिस्तान की सरकार उसे बरगलाकर उसके साथ युद्ध विराम करना चाहती है और इस सम्बन्ध में सरकार का तर्क है कि उत्तर पश्चिमी प्रांत में विद्रोहियों और आतंकवादियों से निपटने में सेना को लगाने से कश्मीर से सेना हटानी पड रही है जिससे कश्मीर का जेहाद प्रभावित हो रहा है। इसलिये तहरीके तालिबान को पाकिस्तान सरकार के साथ किसी भी प्रकार का भी समझौता करने से सावधान किया गया है।

अल कायदा के इस नवीनतम सन्देश में अमेरिका में आई आर्थिक मन्दी का भी उल्लेख किया गया है और इसे जेहाद की बडी विजय मानते हुए मुजाहिदीनों का आह्ववान किया गया है कि यह जेहाद का उचित अवसर है कि जब झूठे देवताओं की पूजा करने वालों से विश्व को मुक्ति दिलायी जा सकेगी और नयी विश्व व्यवस्था के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा।

इस सन्देश में पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ का त्यागपत्र और नये राष्ट्रपति असिफ अली जरदारी का भी उल्लेख है और नये सेनाध्यक्ष परवेज कियानी का भी नाम लिया गया है। परंतु इस सन्देश का जो सबसे मह्त्वपूर्ण पक्ष है वह है पूरे दक्षिण एशिया के लिये जेहाद की बात करना।

वास्तव में यह बात सुन कर आश्चर्य हो सकता है कि शायद अल कायदा ने अपनी प्राथमिकतायें बदल दी हैं और अब मध्य पूर्व, अरब देशों और अमेरिका और यूरोप के स्थान पर उसका निशाना दक्षिण एशिया बन गया है। परंतु ऐसा नहीं है। अल कायदा के मुख्य सरगना ओसामा बिन लादेन ने जब 1998 में इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट की स्थापना की थी और ईसाइयों तथा यहूदियों के विरुद्ध विश्वस्तर पर जेहाद के लिये मुसलमानों का आह्वान किया था तभी से यह संगठन एक सोची समझी केन्द्रित योजना के साथ चल रहा है। अल कायदा ने अपने अंतिम लक्ष्य खिलाफत की स्थापना के लिये और विश्व स्तर पर मध्यकालीन इस्लामिक साम्राज्य प्राप्त करने के लिये सर्वप्रथम अफगानिस्तान में अपना राज्य स्थापित किया फिर संस्थात्मक ढंग से शरियत के शासन को चर्चा का विषय बनाया। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर आक्रमण कर जेहाद का वैश्वीकरण किया और फिर योजनाबद्ध ढंग से समस्त विश्व में स्थानीय स्तर पर इस्लामी राज्य प्राप्त करने के लिये चल रहे आन्दोलनों को एक नेटवर्क के अधीन लाने का प्रयास किया और इस प्रयास में उसे यूरोप अरब और उत्तरी अफ्रीका के अनेक देशों में सफलता भी मिली जहाँ अनेक इस्लामी उग्रवादी संगठन इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट का हिस्सा बन गये।

अफगानिस्तान से भगाये जाने के बाद अल कायदा के शीर्ष नेतृत्व ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर कबाइली क्षेत्रों में शरण ली और दो विशेष योजनाओं पर कार्य आरम्भ किया। एक तो अगले दशक के लिये अल कायदा का नेतृत्व विकसित करना और अफगानिस्तान के बाद दूसरे किसी राज्य की तलाश करना जिस पर नियंत्रण स्थापित कर अपने इस्लामीकरण के एजेण्डे के साथ विचारधारा को भी आगे बढाया जा सके। इस दिशा में काम करते हुए अल कायदा और तालिबान ने पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी प्रांत और अफगानिस्तान के कुछ क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढाना आरम्भ किया और इस दौरान उसकी ओर से आतंकवादी घटनाओं को भी अंजाम दिया जाता रहा। 2005 में स्पेन की राजधानी मैड्रिड में धमाका और फिर 2006 में लन्दन में धमाका करने में यह नेटवर्क सफल रहा। इसके अतिरिक्त अनेक बडे षडयंत्र असफल भी किये जाते रहे। अफगानिस्तान से पाकिस्तान में छुपने के बाद अल कायदा का जेहाद स्पष्ट रूप ले रहा है और अब यह उन अरब देशों के शासकों को भी निशाना बना रहा है जो उसकी नजर में इस्लामी आधार पर शासन नहीं चला रहे हैं।

वास्तव में अल कायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन और अयमान अल जवाहिरी जिस मुस्लिम ब्रदरहुड के संस्थापक सैयद कुत्ब, उसके भाई मोहम्मद कुत्ब और फिलीस्तीनी इस्लामी चिंतक अब्दुल्ला अज्जाम से प्रेरणा लेते हैं उनके जेहाद की व्याख्या पूरी तरह इस्लाम के शुद्धीकरण और शरियत आधारित शासन के लिये युद्धात्मक जेहाद की आज्ञा देता है और इसके लिये उन मुसलमानों के साथ भी जेहाद जायज है जो विशुद्ध इस्लाम के आदेश का पालन नहीं करते। इसी प्रयास का परिणाम है कि पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत में अपना नियंत्रण स्थापित करने के बाद अल कायदा और तालिबान ने पाकिस्तान की सरकार के विरुद्ध जेहाद तीव्र कर दिया है।

अल कायदा ने अपने एजेण्डे के आधार पर जो योजना बनाई है उसके आधार पर वह सफल हो रहा है। अल कायदा न केवल जेहाद के नाम पर विश्व भर के एक बडे वर्ग के मुसलमानों को ईराक, अफगानिस्तान और लड्ने के लिये प्रेरित कर सका है वरन सूचना क्रांति का भरपूर उपयोग कर विश्व स्तर पर मुस्लिम उत्पीडन की एक काल्पनिक अवधारणा का सृजन कर उसे भरपूर प्रचारित भी किया है और इस प्रचार के चलते अल कायदा ने विश्व भर में मुसलमान बुद्धिजीवियो, वामपंथी विचारकों और युवा मुसलमानों के मन में एक वैश्विक चिंतन का बीजारोपण किया है जो स्थानीय समस्याओं को वैश्विक सन्दर्भ से जोड कर मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा का समर्थन करता है।

पाकिस्तान की सरकार की वरिष्ठ मंत्री ने जब जेहादी तत्वों से पाकिस्तान की स्थिरता को खतरा बताया तो इसके पीछे यही भाव छुपा था।

पाकिस्तान में स्थित अल कायदा नेतृत्व के प्रचार का प्रभाव समस्त दक्षिण एशिया पर पड्ने लगा है। भारत में इंडियन मुजाहिदीन ने जिस प्रकार विस्फोटों से पहले ईमेल भेजकर प्रचार का नया हथकण्डा अपनाया था उसकी समानता अल कायदा की इसी रणनीति से की जा सकती है। भारत में पुलिस ने जिस प्रकार साफ़्टवेयर इंजीनियर को इस प्रचार अभियान के सदस्यों के रूप में चिन्हित किया है उससे तो इस बात में सन्देह ही नहीं रह जाता कि पढे लिखे मुस्लिम युवक अल कायदा के विचारों से प्रभावित हो रहे हैं। अपने नवीनतम सन्देश में जिस प्रकार अल कायदा ने दक्षिण एशिया में मुजाहिदीनों को जेहाद के लिये प्रेरित किया है उससे स्पष्ट है कि अल कायदा के निशाने पर अब पूरा दक्षिण एशिया है।
यह पहला अवसर नहीं है जब अल कायदा ने खुलकर जेहाद के सन्दर्भ में भारत, हिन्दू और कश्मीर का उल्लेख किया है। इससे पूर्व ओसामा बिन लादेन और अयमान अल जवाहिरी अनेक बार हिन्दू, भारत और कश्मीर का उल्लेख कर चुके हैं।

समस्त विश्व में जेहाद के आधार पर खिलाफत साम्राज्य का स्वप्न देख रहे अल कायदा की योजनाओं के बारे में कभी समग्र स्तर पर चिंतन नहीं किया गया। विशेष कर भारत में इस विषय पर कभी चिंतन ही नहीं हुआ और पहले 11 सितम्बर 2001 के अमेरिका पर हुए आक्रमण को अल कायदा बनाम अमेरिका का संघर्ष माना गया और इस बात पर अभिमान किया जाता रहा कि भारत का एक भी मुसलमान जेहाद के लिये कभी लड्ने नहीं गया परंतु अल कायदा के प्रयासों से मुस्लिम चिंतन में, उग्रवादी संगठनों की कार्यशैली में और स्थानीय मुस्लिम उग्रवाद के व्यापक जेहादी स्वप्न के साथ जुड कर वैश्विक स्तर पर एजेंडे को लेकर आ रही समानता की अवहेलना की गयी।

पाकिस्तान की सरकार की महत्वपूर्ण मंत्री शेरी रहमान का यह आकलन इस सन्दर्भ में भी ध्यान देने योग्य है कि भारत के प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह के साथ बातचीत में अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज डब्लू बुश ने कहा था कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति असिफ अली जरदारी के ऊपर आतंकवाद के सम्बन्ध में अधिक विश्वास न करें क्योंकि वह अत्यंत कमजोर हैं और आतंकवाद को रोक पाना उनके वश में नहीं है। यह बात पूरी तरह सत्य है और इसका उदाहरण हमारे समक्ष है कि किस प्रकार कश्मीर के मामले पर अमेरिका के दबाव में उन्होंने कुछ और बयान दिया और कश्मीर और पाकिस्तान के दबाव के चलते फिर उस बयान से मुकर गये।

पाकिस्तान की स्थितियाँ इस प्रकार की हैं कि वहाँ कश्मीर में जेहाद का मुद्दा अब हुक्मरानों के हाथ से फिसलकर पूरी तरह जेहादियों के हाथ में आ गया है वह फिर इस्लामी आतंकवादी संगठन हों, पाकिस्तान की सेना के जेहाद परस्त तत्व हों या फिर आईएसआई के जेहादी तत्व सब मिल कर पाकिस्तान में समानांतर शक्ति बन गये हैं। इन तत्वों की अल कायदा और तालिबान से सहानुभूति है और यही कारण है कि पाकिस्तान सरकार आतंकवाद से आधे अधूरे मन से लड रही है।

दक्षिण एशिया में जेहादी तत्वों के मंसूबों को देखते हुए इस पूरे अभियान के लिये नये सिरे से रणनीति बनाने की आवश्यकता है। कुछ लोग इस बात को लेकर अत्यंत उत्साहित हैं कि अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव में यदि बराक ओबामा कि विजय होती है तो वे पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अल कायदा और तालिबान के सफाये के लिये विशेष प्रयास करेंगे परंतु हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिये कि अमेरिका के राष्ट्रपति का प्रयास अपने देश पर पाकिस्तान या अफगानिस्तान की धरती से होने वाले किसी बडे आक्रमण को रोकना होगा न कि दक्षिण एशिया में जेहाद की विचारधारा को पनपने से रोकना होगा। इस कार्य के लिये हमें अब कोई दीर्घगामी रणनीति अपनानी होगी। यदि अल कायदा के प्रचार अभियान को नहीं रोका जा सका तो भारत में मुसलमानों के एक बडे वर्ग को जेहाद में लिप्त होने से नहीं रोका जा सकेगा।

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