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गंगासागर की घटना से उभरे कुछ प्रश्न

Posted by amitabhtri on जून 21, 2008

दिनाँक 12 जून को पश्चिम बंगाल के सुदूर क्षेत्र में एक ऐसी घटना घटी जो सामान्य लोगों के लिये सामान्य नहीं थी पर उस राज्य के लिये सामान्य से भी सामान्य थी। हिन्दू संहति नामक एक हिन्दू संगठन द्वारा “वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिवेश” विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया और उस कार्यशाला पर कोई 6,000 की मुस्लिम भीड ने आक्रमण कर दिया और इस कार्यशाला में शामिल सभी 180 लोगों पर पत्थर और गैस सिलिंडर फेंके। इस घटना में अनेक लोग घायल भी हुए और यहाँ तक कि जो 10 पुलिसवाले कार्यशाला में फँसे लोगों को बचाने आये उनकी जान के भी लाले पड गये। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार यह भीड प्रायोजित थी और कुछ स्थानीय कम्युनिष्ट कैडर द्वारा संचालित थी। लोगों का कहना है कि एक स्थानीय कम्युनिष्ट नेता जो अभी हाल में सम्पन्न हुए पंचायत चुनावों में पराजित हो गये हैं उन्होंने इस पूरे मामले को साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास किया और स्थानीय मुसलमानों को भडकाने और एकत्र करने में सक्रिय भूमिका निभाई।

आसपास के लोगों का कहना है कि मामला ऐसे आरम्भ हुआ कि कार्यशाला में भाग लेने आये प्रतिभागी गंगासागर से स्नान करके कार्यशाला आटो से लौट रहे थे और उत्साह में नारे लगा रहे थे। आटो चलाने वाला मुस्लिम समुदाय से था और उसे भारतमाता की जय, वन्देमातरम जैसे नारों पर आपत्ति हुई और उसने आटो में बैठे लोगों से नारा लगाने को मना किया साथ ही यह भी धमकी दी कि, “ तुम लोग ऐसे नहीं मानोगे तुम्हारा कुछ करना पडेगा” इतना कहकर वह स्थानीय मस्जिद में गया और कोई दस लोगों की फौज लेकर कार्यशाला स्थल वस्त्र व्यापारी समिति धर्मशाला में ले आया। इन लोगों ने कार्यशाला में जबरन प्रवेश करने का प्रयास किया तो दोनों पक्षों में टकराव हुआ और यह हूजूम चला गया। कुछ ही समय के उपरांत हजारों की संख्या में मुस्लिम समुदाय और कम्युनिष्ट कैडर मिलाकर एकत्र हो गया और कार्यशाला को घेर लिया तथा पत्थर और जलता गैस सिलिंडर कार्यशाला के अन्दर फेंकना आरम्भ कर दिया।

कार्यशाला और भीड के बीच कुछ घण्टों तक युद्ध का सा वातावरण रहा और कार्यशाला में अन्धकार था जबकि भीड प्रकाश में थी। भीड अल्लाहो अकबर का नारा माइक से लगा रही थी। कार्यशाला के प्रतिरोध के चलते भीड को कई बार पीछे की ओर भागना पडा। इस संघर्ष के कुछ देर चलते रहने के बाद दस पुलिसकर्मी आये और उनके भी जान के लाले पड गये। पुलिस टीम का प्रमुख तो प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बंगाली में कह रहा था कि, “ बचेंगे भी कि नहीं” ।

घटनाक्रम किस प्रकार समाप्त हुआ किसी को पता नहीं। पुलिस के हस्तक्षेप से या स्वतः भीड संघर्ष से थक गयी यह स्पष्ट नहीं है। परंतु बाद में पुलिस से एकतरफा कार्रवाई की और भीड को साक्षी बनाकर हिन्दू संहति के प्रमुख तपन घोष पर अनेक धाराओं के अंतर्गत मुकदमा लगा दिया और गैर जमानती धाराओं में जेल भेज दिया। जिस प्रकार पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई की उससे इस पूरे मामले के पीछे राजनीतिक मंशा और नीयत स्पष्ट है।

इस पूरे घटनाक्रम से कुछ मूलभूत प्रश्न उभरते हैं। जिनका उत्तर हमें स्वयं ढूँढना होगा। एक तो यह घटना मीडिया पर बडा प्रश्न खडा करती है और दूसरा देश में हिन्दुत्व के विरोध में संगठित हो रही शक्तियों पर। गंगासागर जैसे हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थस्थल पर इतना विशाल साम्प्रदायिक आक्रमण हुआ और तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया संवेदनशून्य बना रहा है। आखिर क्यों? इसके पीछे दो कारण लगते हैं।

एक तो पश्चिम बंगाल में कम्युनिष्टों के खूनी इतिहास को देखते हुए यह कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं थी क्योंकि इसमें कोई मृत्यु नहीं हुई थी। दूसरा इस विषय को उठाने का अर्थ था कि किसी न किसी स्तर पर इस पूरे मामले की समीक्षा भी करनी पड्ती और इस समीक्षा में पश्चिम बंगाल में उभर रहे हिन्दुत्व का संज्ञान भी लेना पडता जिसके लिये भारत का मीडिया तैयार नहीं है।

तो क्या माना जाये कि मीडिया अब यथास्थितिवादी हो गया है और वामपंथ का सैद्धांतिक विरोध करने को तैयार नहीं है। या फिर यह माना जाये कि देश में अब उस स्तर की पत्रकारिता नहीं रही जो किसी परिवर्तन की आहट को पहचान सके। यही भूल भारत की पत्रकारिता ने 2002 में गोधरा के मामले को लेकर भी की थी और सेकुलरिज्म के चक्कर में जनता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति को भाँप न सकी थी। देश में हिन्दू- मुस्लिम समस्या बहुत बडा सच है और इससे मुँह फेरकर इसका समाधान नहीं हो सकता। शुतुरमुर्ग के रेत में सिर धँसाने से रेत का तूफान नहीं रूकता और न ही कबूतर के आंख बन्द कर लेने से बिल्ली भाग जाती है। आज भारत का मीडिया अनेक जटिल राष्ट्रीय मुद्दों पर पलायनवादी रूख अपना रहा है। इसका सीधा प्रभाव हमें मीडिया के वैकल्पिक स्रोतों के विकास के रूप में देखने को मिल रहा है।

गंगासागर में हुई इस घटना का उल्लेख किसी भी समाचारपत्र ने नहीं किया परंतु अनेक व्यक्तिगत ब्लाग और आपसी ईमेल के आदान प्रदान से यह सूचना समस्त विश्व में फैल गयी और लोगों ने पश्चिम बंगाल में स्थानीय प्रशासन को हिन्दू संहति के नेता तपन घोष की कुशल क्षेम के लिये सम्पर्क करना आरम्भ कर दिया। परंतु यह विषय भी अंग्रेजी ब्लागिंग तक ही सीमित रहा और इस भाषा में जहाँ यह विषय छाया रहा वहीं हिन्दी ब्लागिंग में इसके विषय में कुछ भी नहीं लिखा गया। हिन्दी ब्लागिंग में अब भी काफी प्रयास किये जाने की आवश्यकता और मीडिया का विकल्प बनने के लिये तो और भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है। लेकिन जिस प्रकार अंग्रेजी ब्लागिंग जगत ने तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया की उपेक्षा के बाद भी गंगासागर में आक्रमण के विषय को अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया उससे यह बात तो साफ है कि मुख्यधारा के मीडिया अनुत्तरदायित्व और पलायनवादी रूख से उत्पन्न हो रही शून्यता को भरने के लिये ब्लागिंग पत्रकारिता की विधा के रूप में विकसित हो सकती है और इसके सम्भावनायें भी हैं।

गंगासागर में हिन्दू मुस्लिम संघर्ष या जिहादी आक्रमण से एक और गम्भीर प्रश्न उभर कर सामने आया है और वह है इस्लामवादी-वामपंथी मिलन का। गंगासागर की घटना के आसपास ही समाचारपत्रों में समाचार आया था कि केरल राज्य में माओवादियों और इस्लामवादियों ने बैठक कर यह निर्णय लिया है कि वे तथाकथित “ राज्य आतंकवाद”, “ साम्राज्यवाद” और हिन्दूवादी शक्तियो” के विरुद्ध एकजुट होकर लडेंगे। गंगासागर में हिन्दू कार्यशाला पर हुआ मुस्लिम- कम्युनिष्ट आक्रमण इस गठजोड का नवीनतम उदाहरण है। गंगासागर पर आक्रमण के अपने निहितार्थ हैं। यह तो निश्चित है कि इतनी बडी भीड बिना योजना के एकत्र नहीं की जा सकती और यदि यह स्वतः स्फूर्त भीड थी तो और भी खतरनाक संकेत है कि हिन्दू तीर्थ पर आयोजित किसी हिन्दू कार्यशाला पर आक्रमण की खुन्नस काफी समय से रही होगी। जो भी हो दोनों ही स्थितियों में यह एक खतरे की ओर संकेत कर रहा है।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है किसी भी समुदाय या संगठन को देश की वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर विचार विमर्श का अधिकार है और यदि इस अधिकार को आतंकित कर दबाने का प्रयास होगा और राजसत्ता उसका समर्थन करेगी तो स्थिति कितनी भयावह होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। गोधरा के सम्बन्ध में ऐसी स्थिति का सामना हम पहले कर भी चुके हैं फिर भी कुछ सीखना नहीं चाहते।

आज देश के सामने इस्लामी आतंकवाद अपने भयावह स्वरूप में हमारे समक्ष है अब यदि उसका रणनीतिक सहयोग देश के एक और खतरे माओवाद और कम्युनिज्म के नवीनतम संस्करण से हो जाता है तो उसका प्रतिकार तो करना ही होगा। यदि प्रशासन और सरकार या देश का बुद्धिजीवी समाज या फिर मीडिया जगत इस रणनीतिक सम्बन्ध की गम्भीरता को समझता नहीं तो इसकी प्रतिरोधक शक्तियों का सहयोग सभी को मिलकर करना चाहिये। अच्छा हो कि गंगासागर से उभरे प्रश्नों का ईमानदार समाधान करने का प्रयास हम करें।

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माओवादियों की राह आसान नहीं

Posted by amitabhtri on अप्रैल 29, 2008

अपने पिछ्ले लेख वामपंथी इस्लामवादी गठजोड में मैने आशंका व्यक्त की थी कि जिस प्रकार भारत में कुछ प्रमुख समाचार पत्र नेपाल में माओवादियों की विजय को लेकर भारत में एक बौद्धिक वातावरण बनाकर लोगों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं उससे यह आभास होता है कि यह एक सुनियोजित प्रयास है। इस आशंका को बल तब और मिला जब अंग्रेजी के एक अग्रणी समाचार पत्र ने नेपाल में माओवादियों के नेता प्रचण्ड  का एक लम्बा साक्षात्कार दो दिनों की श्रृखला में प्रकाशित हुआ। इसी समाचार पत्र ने अपने सम्पादकीय और लेखों द्वारा देश के बौद्धिक और राजनेता वर्ग को समझाने का प्रयास किया था कि नेपाल में माओवादियों की विजय से भारत में नक्सलवादियों और माओवादियों को भी लोकतंत्र के मार्ग पर लाना सरल होगा और इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए नेपाल में माओवादियों की नयी सरकार का हरसम्भव सहयोग भारत को करना चाहिये। जिस प्रकार इस समाचार पत्र के संवाददाता ने प्रचण्ड के साथ पूरे साक्षात्कार में समस्त स्थितियों को स्पष्ट करने का प्रयास किया है उससे तो यह साक्षात्कार कम प्रचण्ड के लिये अपनी ओर से किया गया जनसम्पर्क का प्रयास अधिक लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस समाचार पत्र को या इसके कुछ लोगों को माओवादियों की छवि भारत में ठीक करने की बहुत शीघ्रता है। वैसे इस समाचार पत्र के प्रचण्ड से अच्छे सम्बन्ध काफी पहले से दिखते हैं क्योंकि इसी समाचार पत्र के इसी संवाददाता ने नेपाल में माओवादियों के आन्दोलन के समय भी 2006 में प्रचण्ड का साक्षात्कार लिया था जिसकी काफी चर्चा हुई थी।

 

 

यह तथ्य इस कारण महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी आन्दोलनकारी या भूमिगत उग्रवादी का साक्षात्कार लेने का अर्थ उससे सहानुभूति रखना होता है परंतु भारत में एक ऐसी विचारधारा अवश्य है जो माओवाद और नक्सलवाद के प्रति सहानुभूति रखती है और उसे कानून व्यवस्था के स्तर से हल करने के स्थान पर आन्दोलन के रूप में देखने का आग्रह करती है। प्रचण्ड का साक्षात्कार लेने वाले समाचारपत्र ने अपनी सम्पादकीय और लेखों द्वारा छ्त्तीसगढ में सल्वा जुदूम अभियान को जमकर कोसा और अपने तर्क की पुष्टि में रा के एक पूर्व अधिकारी को भी उतार दिया। इन घटनाक्रमों को आपस में जोड्ने से ऐसा लगता है कि निश्चय ही यह पत्रकारिता से अधिक विचारधारा के प्रति निष्ठा है। क्योंकि यह तथ्य नहीं भूला जा सकता कि भारत में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय अब भी चरमपंथी वामपंथियों का गढ है और प्रचण्ड ने भी अपनी शिक्षा यहीं पूरी की थी तो निश्चय ही उस समय के कामरेड आज भी समाज में तो होंगे ही।

 

माओवादियों का विषय उठाने के पीछे एक प्रमुख कारण यह भी है कि भारत के तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया में जहाँ नेपाल में माओवादियों की विजय का उल्लास मनाया जा रहा है या उसके पक्ष में देश में अनुकूल वातावरण बनाने का प्रयास किया जा रहा है तो वहीं माओवादियों के विरुद्ध नेपाल और भारत के हिन्दू संगठनों द्वारा नेपाल में राजा की शक्तियों को क्षीण न होने देने और माओवादियों के उत्पात को रोकने के संकल्प को स्थान ही नहीं दिया जा रहा है। समाचारों के प्रति यह चयनित रवैया हमारी इस धारणा को पुष्ट करता है कि भारत के मीडिया में भी अब भी वामपंथियों का वर्चस्व है जो नेपाल में माओवादियों की विजय में वामपंथ का उत्थान देख रहे हैं और ऐसा प्रदर्शित करना चाहते हैं कि मानों नेपाल में माओवादियों की विजय नेपाल की जनता का जनादेश है। नेपाल में माओवादियों की विजय को लेकर भारत में मीडिया ने पूरे तथ्य सामने नहीं आने दिये कि माओवादियों की विजय का एक बडा कारण यंग कम्युनिष्ट मूवमेंट नामक माओवदियों की व्यक्तिगत सेना के आतंक का भी रहा। इसके आतंक की स्वीकारोक्ति प्रचण्ड ने अपने साक्षात्कार में भी की है।

 

अभी पिछ्ले रविवार को उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जनपद में देवीपाटन नामक स्थान पर विश्व हिन्दू महासंघ नामक संगठन का तीन दिवसीय अधिवेशन समाप्त हुआ। इस सम्मेलन में विश्व हिन्दू महासंघ के नेपाल के प्रतिनिधि और भारत में विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं ने भाग लिया। विश्व हिन्दू महासंघ की स्थापना 1981 में नेपाल के दिवंगत राजा बीरेन्द्र ने की थी और यह संगठन तब से भारत और नेपाल के मध्य हिन्दुत्व के विषय पर परस्पर सहमति से कार्यरत है। इस अधिवेशन की समाप्ति पर प्रस्ताव पारित किया गया कि नेपाल में माओवादियों की विजय के उपरांत भी यह संगठन राजा को किनारे लगाकर माओवादियों के देश पर शासन के किसी भी प्रयास को सफल नहीं होने देगा। इस अधिवेशन में विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंहल ने कहा कि यदि माओवादियों को ऐसा करने की छूट दी गयी तो वे और शक्ति एकत्र कर लेंगे और फिर भारत में प्रवेश कर हिन्दू संस्कृति को सदा सर्वदा के लिये नष्ट कर देंगे। सिंहल ने कहा कि तराई क्षेत्र में सशस्त्र गुट बनाने वाले मधेशियों ने बडे पैमाने पर विश्व हिन्दू महासंघ और विश्व हिन्दू परिषद को समर्थन दिया है। यह अधिवेशन गोरखपुर के गोरक्षनाथ मन्दिर में आयिजित हुआ था जिसमें भारत और नेपाल के 200 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। नेपाल में राजशाही के पतन के बाद से विश्व हिन्दू महासंघ के अध्यक्ष भारत केशर सिम्हा ने भारत और काठमाण्डू के मध्य अनेक दौरे कर राजा के पक्ष में समर्थन जुटाने का प्रयास किया।

 

इस अधिवेशन में राजा ज्ञानेन्द्र के विश्वासपात्र रायल नेपाल आर्मी के सेवानिवृत्त अधिकारी 72 वर्षीय हेम बहादुर कार्की को विश्व हिन्दू महासंघ का नया अध्यक्ष बनाया गया। कार्की ने कहा कि अब भी रायल आर्मी के सदस्य बडी मात्रा में राजा के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि इन अधिनायकवादियों और हिन्दू विरोधी शक्तियों के विरुद्ध युद्ध कर सकें। इस अधिवेशन में राजा ज्ञानेन्द्र को भी आना था परंतु नेपाल की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए वे नहीं आये परंतु इस अधिवेशन के लिये उन्होंने अपना सन्देश भेजा और कहा कि वे अधिवेशन के प्रस्तावों का पालन करेंगे। अधिवेशन में पूर्व अध्यक्ष सिम्हा ने नेपाल में माओवादियों की सहायता के लिये भारत सरकार की आलोचना की और कहा कि सात दलों का गठ्बन्धन भारत सरकार के सहयोग से ही सम्भव हो सका। इस अवसर पर विश्व हिन्दू महासंघ के भारत के अध्यक्ष योगी आदित्यनाथ ने कहा कि वे सदैव से माओवादियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की बात करते रहे हैं।

 

 

इस अधिवेशन के सम्बन्ध में भारत में मीडिया में कोई बात न तो प्रकाशित हुई और न ही इसका कोई उल्लेख हुआ जबकि अधिवेशन की उपस्थिति और इसके प्रस्तावों के अपने निहितार्थ हैं। अधिवेशन में हुई चर्चा स्पष्ट रूप से संकेत देती है कि नेपाल में राजा के प्रति ऐसा वातावरण नहीं है जैसा माओवादी समस्त विश्व को प्रदर्शित कर रहे हैं। यदि माओवादी अब भी राजा को अपमानित करने या उन्हें देश से बाहर निकालने का यत्न करते हैं तो इसका उल्टा परिणाम होगा। यह बात माओवादियों को भी पता लग चुकी है और यही कारण है कि चुनाव से पहले बढ चढ कर बातें करने वाले माओवादी अब राजा के साथ किसी फार्मूले की तलाश में जुट गये हैं।

 

 

 

भारत में मीडिया में बैठे वामपंथी विचारों के चिंतक और लेखक नेपाल में माओवादियों की विजय को भले ही स्थायी मानकर चल रहे हों परंतु भारत सरकार को अपने देश की सुरक्षा की दृष्टि से नेपाल में माओवादी उग्रवाद की समाप्ति और नेपाल में राजा की शक्ति के विकल्प पर विचार करना चाहिये।

 

 

वैसे नेपाल में संवैधानिक सभा के पूरे परिणाम आने के बाद पूरी संविधान सभा में माओवादियों को बहुमत नहीं मिला है और उन्हें नेपाली कांग्रेस, यूएमएल और उपेन्द्र यादव की मधेशी जनाधिकार मोर्चा पर भी निर्भर होना पडेगा। उधर विश्व बाजार में तेल की बढ्ती कीमतों, मंहगाई के चलते भी माओवादी सरकार के सामने चुनौती है जिसके चलते उनका तेवर नरम पडा है पर उनकी बात पर भरोसा करना मुश्किल है विशेषकर तब जबकि अपने साक्षात्कार में प्रचण्ड ने भारत और ब्रिटेन जैसे लोकतंत्र को औपचारिक लोकतंत्र बताया है जो सभी वर्गों के लिये प्रतिनिधित्वकारी नहीं है और इस कारण माओवादी नेपाल में बहुदलीय व्यवस्था रखते हुए भी किसी अन्य विकल्प पर विचार करेंगे अर्थात पिछ्ले दरवाजे से अपना एजेण्डा लागू करने की सम्भावना दिखती है। दूसरा खतरनाक पक्ष है कि नेपाल की सेना में माओवादी लडाकों को समायोजित किया जायेगा और इसका आधार केवल प्रचण्ड का केवल यह आश्वासन होगा कि इन लडाकों को पेशेवर बना दिया जायेगा। यह कितना अस्पष्ट आधार है और इसका परिणाम कितना घातक है। जब नेपाल की सेना माओवादी विचार की होगी तो अपने पडोसी पर भारत कितना भरोसा कर सकता है कि वह कब चीन के हाथ का खिलोना न बन जाये। प्रचण्ड यह भी कह्ते हैं कि नेपाल की सेना का आकार भी कम किया जायेगा अर्थात नेपाल के सुरक्षा पूरी तरह माओवादियों के हाथ में होगी।

 

पहले लोकतंत्र के बने स्वरूप में परिवर्तन फिर सेना में माओवादी लडाकों के भर्ती फिर सेना का स्वरूप छोटा किया जाना अर्थात अधिनायकवादी शासन की पूरी तैयारी। इसके अतिरिक्त प्रचण्ड ने इस बात की गारण्टी भी नहीं दी है कि वे भारत के माओवादियों या नक्सलियों को उनका रास्ता अपनाने की सलाह देंगे उनके अनुसार भारत में नक्सलियों और माओवादियों के लक्ष्य अलग है इसलिये यदि वे उनसे प्रेरित होकर बुलेट छोड्कर बैलेट के रास्ते पर आते हैं तो अच्छा है। इससे साफ जाहिर है कि नेपाल में माओवादियों को समर्थन का असर भारत में नक्सलियों या माओवादियों पर नहीं पड्ने वाला है लेकिन इस बात के पैरवी करने वालों को यह बात समझ में क्यों नहीं आती। कुलमिलाकर नेपाल में स्थिति अब भी साफ नहीं है और माओवादियों को भी अनेक चुनौतियों का सामना करना बाकी है ऐसे में भारत के पास अब भी अवसर है कि वह नेपाल में अपने हित पहचान ले और जो भूल पिछ्ले तीन चार वर्षों में की है उसे सुधार कर नेपाल में माओवादियों की शक्ति कम करने का प्रयास करे। भारत के सहयोग के बिना माओवादियों का नेपाल में शासन करना सम्भव नहीं है इसी कारण प्रचण्ड भारत सरकार को सन्देश दे रहे है कि वह अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों का उपयोग कर नेपाल माओवादियों को आतंकवादी सूची से हटवा दे। लेकिन भारत सरकार को ऐसा कोई कदम उठाने से पहले इसके हानि लाभ पर विचार कर लेना चाहिये।

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सोनिया के निशाने पर हिन्दू नेता

Posted by amitabhtri on अप्रैल 28, 2008

न्यूयार्क। न्यूयार्क स्थित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विदेश ने न्यूयार्क राज्य के सर्वोच्च न्यायालय में तीन प्रमुख हिन्दू कार्यकर्ताओं नारायण कटारिया, अरीश साहनी और भरत बराई के विरुद्ध 100मिलियन डालर का मानहानि का दावा दायर किया है। इन कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाया है कि इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गान्धी द्वारा पिछ्ले वर्ष अक्टूबर में अमेरिका की यात्रा के समय अमेरिका के प्रमुख समाचार पत्र न्यूयार्क टाइम्स में पूरे एक पेज का विज्ञापन प्रकाशित कराया था और उसमें श्रीमती सोनिया गान्धी और उनके पुत्र राहुल गान्धी का कथित अपमान किया गया था।

 

इस मामले के वादी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विदेश के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी डा. सुरेन्द्र मल्होत्रा ने अपनी शिकायत में न्यायालय के समक्ष कहा है कि पिछ्ले वर्ष 6 अक्टूबर को न्यूयार्क टाइम्स में श्रीमती सोनिया गान्धी और उनके पुत्र राहुल गान्धी के सम्बन्ध में विज्ञापन में गलत सूचनायें प्रकाशित की गयी थीं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने मुकदमे की पैरवी के लिये उसी कानूनी फर्म की सेवायें ली हैं जिसने टाइम पत्रिका  के विरुद्ध इजरायल के एरियल शेरोन का प्रतिनिधित्व किया था।

 

दूसरी ओर अपने मुकदमे की पैरवी के लिये नारायण कटारिया और अरीश साहनी ने कोर्नस्टॆन वीज वेक्स्लर एण्ड पोलार्ड को नियुक्त किया है जो कि अपनी कुशलता के लिये जानी जाती है। उधर इस मुकदमे में प्रतिवादी बनाये गये एक अन्य सदस्य भरत बराय ने दावा किया है कि वह किसी भी प्रकार से विज्ञापन का हिस्सा नहीं थे और स्वतंत्र रूप से इस मुकदमे के विरुद्ध पैरवी कर रहे हैं।  

 

डा. भरत बराय ने इस मुकदमे में अपना नाम घसीटने के लिये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विदेश के विरुद्ध जवाब में मान हानि का दावा करने का निश्चय किया है। डा. भरत का कहना है कि उनका विज्ञापन से कुछ भी लेना देना नहीं है न तो उन्होंने इसका डिजाइन बनाया और न हि उन्होंने इसके लिये धन दिया और विज्ञापन में सम्पर्क के लिये जिनका नाम था उस सूची में भी उनका नाम नहीं था।

 

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विदेश के इस फैसले के बाद अमेरिका में इस विषय पर ध्रुवीकरण तेज हो गया है। इन तीनों का समर्थन करने वाले हिन्दू नेता इस निर्णय पर सवाल उठा रहे है और उनका आरोप है कि जब यह विज्ञापन सार्वजनिक रूप से प्रकाशित हुआ था और लोगों के सामने यह काफी लम्बे समय तक आता रहा और विभिन्न मीडिया माध्यमों में बार बार प्रकाशित होता रहा तो फिर यह मुकदमा दायर करने के पीछे प्रमुख उद्देश्य क्या है। इन नेताओं का मानना है कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सोनिया गान्धी और सुरेन्द्र मल्होत्रा इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता प्रथम संविधान संशोधन के द्वारा प्रत्येक अमेरिकी नागरिक का अधिकार  है। कटारिया और साहनी भारतीय जनता पार्टी के ओवरसीज फ्रेण्ड्स के नेता भी हैं और इसके अतिरिक्त वे इण्डियन अमेरिकन इंटेलेक्चुअल फोरम भी चलाते हैं। इन लोगों ने पिछ्ले वर्ष गान्धी हेरिटेज फाउण्डेशन की स्थापना भी की थी जिसने सोनिया गान्धी के संयुक्त राष्ट्र संघ में सोनिया गान्धी के आगमन का विरोध किया था।

 

 

न्यूयार्क के एक प्रभावी हिन्दू नेता का मानना है कि यह मुकदमा केवल कुछ व्यक्तियों को निशाना बनाकर दायर नहीं किया गया है वरन इसके निशाने पर समस्त अनिवासी भारतीय हैं। उनके अनुसार इस मुकदमे के पीछे प्रमुख उद्देश्य अमेरिका में हिन्दू नेताओं की उत्साह भंग करना, उन्हें जबरन चुप कराना, आर्थिक दृष्टि से उन्हें दीवालिया बनाना, प्रताडित कर उन्हें झुकने के लिये विवश कर देना। इसके अतिरिक्त एक और प्रमुख उद्देश्य यह है कि भारत से बाहर सोनिया खानदान के विरुद्ध उठने वाली हर आवाज को सख्ती से कुचल देना यहाँ तक कि उन देशों में भी जहाँ के संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारण्टी दी गयी है’’|

 

 

अमेरिका के अधिकतर हिन्दू मानते हैं कि नारायण कटारिया और अरीश साहनी दशकों से हिन्दू हितों के लिये संघर्ष कर रहे हैं और वे ऐसे दबावों के आगे झुकने वाले नहीं हैं। नारायण कटारिया 78 वर्षीय एक सेवानिवृत्त व्यक्ति हैं और इस बात के लिये संकल्पबद्ध हैं कि वे इस मुकदमे को अंत तक लडेंगे भले ही इसके लिये उन्हें अपनी पेंशन के फण्ड से धन खर्च करना पडे।

 

ऐसा प्रतीत होता है कि यह मुकदमा कटारिया सहित उन लोगों को नीचा दिखाने की योजना है हिन्दुओं के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं। पिछ्ले कुछ वर्षों मे नारायण कटारिया उत्तरी अमेरिका में एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिसने जिहाद जैसे विषय पर मुखर होकर हिन्दुओं की चिंतायें लोगों के समक्ष रखीं तथा  संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष सोनिया गान्धी के विरुद्ध प्रदर्शन करवाया और हिन्दू देवी देवताओं की नग्न चित्र बनाने वाले पेंटर मकबूल फिदा हुसैन की अनेक प्रदर्शनियों को रूकवाया। कटारिया और साहनी को ब्रिटेन, यूरोप, मध्य पूर्व और अफ्रीका के अनेक देशों से सहायता प्राप्त हो रही है। इन हिन्दू नेताओं के मित्रों ने इनके मुकदमे के लिये आर्थिक सहायता एकत्र करने हेतु एक समिति गठित की है तथा मुकदमा लडने के लिये भी एक समिति बनाई है।

 

 

आप भी इस कार्य में अपना योगदान कर सकते हैं। इसके लिये अपना चेक इस पते पर Narain Kataria, 41-67 Judge Street, Apt-5P, Elmhurst, New York 11373 ‘Hindu support fund’ के नाम पर भेजें। प्राप्त धन का प्रबन्धन समुदाय के नेताओं द्वारा किया जायेगा और इसका अंकेक्षण भी स्वतत्र रूप से होगा।

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