हिंदू जागरण

हिंदू चेतना का स्वर

मोदी की विजय के निहितार्थ

Posted by amitabhtri on दिसम्बर 26, 2007

नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमन्त्री की शपथ ग्रहण करने के साथ ही तीसरी बार मुख्यमन्त्री होने का सौभाग्य प्राप्त कर लिया है। नरेन्द्र मोदी की शानदार विजय की व्याख्या का दौर भी चल निकला है और अनेक कारण इस विजय के बताये जा रहे हैं। नरेन्द्र मोदी की विजय के कारण कुछ भी रहे हों परन्तु यह भी समीक्षा का विषय है कि यह विजय किस प्रकार भारतीय राजनीति को प्रभावित करने जा रही है या फिर इस विजय के निहितार्थ क्या हैं ? 

गुजरात चुनाव के परिणामों के पश्चात् कांग्रेस सहित तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने जिस प्रकार मोदी की विजय को साम्प्रदायिकता की विजय बताया है उसके पश्चात यह समझना आवश्यक हो गया है कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की स्थितियाँ न होने के पश्चात भी यह चुनाव साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता का चुनाव क्यों था ?  इसके लिये हमें भारत में चल रही सेकुलर बनाम सूडो सेकुलर की पृष्ठभूमि को समझना होगा।  सूडो सेकुलर दल मानते हैं कि भारत का हिन्दू धार्मिक तो है परन्तु वह राजनीति में धर्म के प्रवेश को उचित नहीं मानता और हिन्दूवादी संगठनों की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति की आलोचना के कारण राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत नहीं होता। इसी धारणा के वशीभूत होकर कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी ने मौत का सौदागर और प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिह ने गुजरात दंगों के मामलों की नये सिरे से जाँच की बात की थी। वास्तव में ये दोनों बयान मुसलमानों को रिझाने से ज्यादा इस विश्वास पर आधारित थे कि गुजरात की जनता की सेकुलरिज्म में आस्था है और यहाँ का हिन्दू मोदी को 2002 के दंगों में उनकी भूमिका के लिये उन्हें दण्डित करना चाहता है। इस विश्वास का कारण पिछले पाँच वर्षों में मोदी के विरूद्ध चलाया गया प्रचार अभियान था। इस बात की पुष्टि कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी के चुनाव परिणामों के तत्काल बाद आये बयानों से भी होती है कि साम्प्रदायिक शक्तियों के विरूद्ध अभियान चुनाव तक ही सीमित नहीं रहना चाहिये वरन् इसे लगातार चलाते रहने की आवश्यकता है। यह बयान प्रमाणित करता है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल गुजरात के चुनावों को विचारधारागत आधार पर भी देख रहे थे। गुजरात के चुनाव परिणामों ने भारत में चल रही सेकुलरिज्म की बहस को प्रभावित किया है। इन चुनाव परिणामों से हिन्दुओं ने दिखाया है कि वे सेकुलर और सूडो सेकुलर के मध्य विभाजन रेखा को पहचानते हैं तथा सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति को सिरे से नकारते हैं। 

यह प्रयोग यदि देश के अन्य भागों में भी सफल होता है या सेकुलरिज्म की बहस को नया मोड़ देता है तो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों को अपनी रणनीति पर नये सिरे से विचार करना होगा और इन चुनाव परिणामों ने इसी कारण इन दलों को चिन्तित कर दिया है।  

इन चुनाव परिणामों का भाजपा पर भी प्रभाव पड़ने वाला है। 2004 में लोकसभा में पराजय के पश्चात से ही भाजपा अपनी दिशा और दशा दोनों को लेकर चिन्तित थी। उसके पास ऐसा कोई रास्ता नहीं दिख रहा था जहाँ से वह अपना लक्ष्य निर्धारित कर सके। भाजपा को एक ब्राण्ड बनाकर प्रस्तुत करने की 2004 की नीति असफल रही थी और भाजपा को नये माडल की तलाश थी। यह कुछ ऐसा ही जब 1990 के आसपास तत्कालीन महासचिव गोविन्दाचार्य ने भाजपा को समाजवादी हिन्दुत्व का फार्मूला दिया था जहाँ हिन्दुत्व की चासनी में पिछड़ा वर्ग के कार्ड को ढालकर कल्याण सिंह के रूप में एक फार्मूला सामने आया था जब अल्पसंख्यकों के मतों के बिना भी पूर्ण बहुमत की सरकार बनना सम्भव हो सका था। नरेन्द्र मोदी ने भाजपा को हिन्दुत्व और उदार अर्थव्यवस्था को मिलाकर एक ऐसा फार्मूला दिया है जो मध्यवर्ग के मध्य भाजपा का आधार बढ़ाने में एक नया मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। उदार अर्थव्यवस्था का परिपालन करते हुये सबको सन्तुष्ट कर मध्यम वर्ग को आक्रामक ढंग से अपने से जोड़कर नरेन्द्र मोदी ने उन्हें घरों से निकलकर मतदान केन्द्र पर जाकर पंक्तिबद्ध होकर मतदान करने की अन्त:प्रेरणा दी जो कि विशेष सफलता है।   

वैसे यह देखना रोचक होगा कि भाजपा अन्य राज्यों में यह प्रयोग कैसे दुहरा पाती है जबकि उसके अन्य राज्यों में मोदी जैसा करिश्माई नेतृत्व नहीं है।  

गुजरात चुनाव के परिणाम संघ परिवार के साथ भाजपा के सम्बन्धों पर भी असर डालेंगें। संघ परिवार के विभिन्न घटकों ने मोदी का खुलकर विरोध किया और इसी कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इन चुनावों में तटस्थ रहना पड़ा और संगठित तौर पर न तो मोदी का समर्थन किया और न विरोध। परन्तु रोचक तथ्य यह रहा कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में जहाँ संघ ने घोषित तौर पर अपने पूर्णकालिकों को भाजपा की सहायता में लगा रखा था वहाँ तमाम प्रयासों के बाद भी परिणाम भाजपा के लिये निराशाजनक रहे तो वहीं गुजरात में संघ के संगठन के तौर पर न लगने के बाद भी भाजपा को लगभग दो तिहाई बहुमत मिला। यह बात क्या संकेत देती है यही कि चुनावों में संगठन की भूमिका होती है परन्तु प्राथमिक तौर पर सरकार का कामकाज, नेतृत्व की स्वीकार्यता और सख्त प्रशासक की छवि जनता के मत देने का आधार बनता है।   मोदी की विजय के पश्चात भाजपा के कामकाज में संघ का दखल कम होगा तथा सत्ता प्राप्ति के पश्चात संघ की उपेक्षा करने का भाव अधिक विकसित होगा। वैसे संघ को भी आभास हो गया है कि भाजपा में अध्यक्ष या उसके कामकाज का निर्धारण करते-करते वह राजनीति में लिप्त होता जा रहा है और व्यक्ति निर्माण का उसका मूल कार्य प्रभावित हो रहा है।   

गुजरात चुनाव परिणामों के पश्चात एक बात और कही गई कि नरेन्द्र मोदी का कद पार्टी से बड़ा हो गया है और वे भविष्य के प्रधानमन्त्री हैं। जिस प्रकार विधायक दल की बैठक में मोदी ने नाटकीय ढंग से इन आशंकाओं का खण्डन किया उससे स्पष्ट है कि वे किसी जल्दी में नहीं हैं और अपनी स्वेच्छारिता और पार्टी से बड़े होने के आरोपों को पहले धुलकर अधिक स्वीकार्य बनना चाहते हैं। इन चुनाव परिणामों के बाद भी 2008 या 2009 के आम चुनावों में फिलहाल लालकृष्ण आडवाणी की उम्मीदवारी को कोई खतरा नहीं है।

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