हिंदू जागरण

हिंदू चेतना का स्वर

अपने भानू जी

Posted by amitabhtri on सितम्बर 5, 2006

कभी-कभी कुछ लोग हमारे मध्य रहते हैं तो हम उनसे इतने अधिक आत्मसात् हो जाते हैं कि उनके बिछुड़ने मात्र की कल्पना से हम सिहर उठते हैं और यदि ऐसा बिछोह हो भी जाता है तो मन को मनाते हैं कि वे हमारे मध्य पुन: किसी न किसी स्वरूप में वापस आयेंगे. ऐसा ही हिन्दी के ख्यातिलब्ध पत्रकार स्व. भानुप्रताप शुक्ल के पाठकों, प्रशंसकों और आत्मीयजनों के साथ हुआ. पिछले 17 अगस्त को लम्बी बीमारी के बाद अन्तिम श्वांस लेने वाले श्री भानु जी अपने पीछे कितनी समृद्ध विरासत छोड़ गये हैं इसका आभास कल उनकी श्रद्धाजलि सभा को देखकर हुआ. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लगभग हजार लोगों की क्षमता वाले साईं आडीटोरियम का खचाखच भरा सभाकक्ष इस बात की पुष्टि कर रहा था कि अपने पाठकों, प्रशंसकों और आत्मीय जनों के मध्य भानू जी के नाम से लोकप्रिय स्व. भानुप्रताप शुक्ल ने अपनी वैचारिक साधना और तपस्वी जीवन से लोगों के ह्रदय में कितनी गहरी पैठ बना रखी थी.        जीवन के आरम्भिक वर्षों में माँ और पिता के स्नेह से वंचित रहे भानू जी ने अपने जीवन की इस रिक्तता को अपने जीवन का एक मिशन भी बनाया और जैसा कि वात्सल्य ग्राम की संचालिका साध्वी ऋतम्भरा जी ने कहा कि वे इस प्रकल्प के मानस शिल्पी थे और ऋतम्भरा जी में उन्होंने अपनी माँ के दर्शन किये और उन्हें दीदी माँ नाम दिया. भानू जी के व्यक्तित्व के इस पक्ष से स्पष्ट होता है कि उन्होंने कितनी संवेदनशीलता से अपने जीवन को पढ़ा था और जीवन को समष्टि में और समष्टि को अपने जीवन में एकाकार किया था.     जीवन के आरम्भिक दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ सम्पर्क में आये भानू जी को श्रीगुरूजी और पं.दीन दयाल उपाध्याय को निकट से देखने और उनका सान्निध्य प्राप्त करने का अवसर मिला था. उन दोनों ही महापुरूषों के व्यक्तित्व का प्रभाव उनके जीवन पर था. इसी कारण हिन्दुत्व की विचारधारा के प्रति अटूट निष्ठा और आग्रह होने के बाद भी वैचारिक मत भिन्नता वाले व्यक्तियों के साथ भी उनके व्यक्तिगत सम्बन्ध थे और इसका प्रमाण उनकी श्रद्धांजलि सभा में भी देखने को मिला जब श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के शिल्पियों के साथ इस आन्दोलन के खलनायक मुलायम सिंह यादव भी मंचासीन रहे. भानू जी की यह विशेषता हिन्दुत्व की उसी भावना के अनुरूप थी जिसमें समस्त जड़ चेतन में एक ही परमात्मा की अनुभूति की जाती है जो विविध स्वरूपों में स्वयं को प्रकट करता है.       हिन्दू संस्कृति की बिशेषता के अनुरूप उनका ह्रदय विशाल था परन्तु विचारधारा और संस्कृति के प्रति उनका आग्रह इतना आस्थावान था कि उसमें समझौता करने के बारे में वे सोच भी नहीं सकते थे. अपनी लेखनी के माध्यम से उन्होंने जिन युवाओं को हिन्दुत्व विचारधारा के प्रति प्रवृत्त किया उनमें मैं भी एक था. हालांकि साहित्यकार और घोर हिन्दूवादी पिता की सन्तान होने के  कारण लेखन और विचारधारा मुझे विरासत में मिली परन्तु अपनी विचारधारा का सशक्त प्रकटीकरण और छवि की चिन्ता किये बिना सत्य को स्थापित करने का साहस मुझे भानू जी से ही मिला.     श्रीराम मन्दिर आन्दोलन के पूर्व जब देश का बौद्धिक वर्ग स्वयं को सेकुलर खेमे में रखने के लिये अपनी संस्कृति, परम्परा, गौरव और इतिहास को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ता था, तब भानू जी ने हिन्दुत्व को बौद्धिक आन्दोलन बनाया और उसे वृहद आयाम प्रदान किया.        आज भी हमारे देश का बौद्धिक वर्ग छवि निर्माण के रोग से ग्रस्त है. इस रोग के कारण सत्य का अनुभव करते हुये भी उसे न बोलने की बौद्धिक बेईमानी हमारे अन्दर घर कर गई है. हम हिन्दुत्व की बात तो करना चाहते हैं परन्तु जाने-अनजाने मुस्लिम विरोधी होने की छवि से भयाक्रान्त हो जाते हैं. इसी भय का निवारण कर लेखन धर्म को सर्वोपरि रखा भानू जी ने.              उनका तर्क था बौद्धिक विपन्नता और कायरता राष्ट्र को नष्ट कर देती है. इसका शिकार हम हजारों वर्षों से होते आये हैं फिर भी हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई के भुलावे में जी रहे है.           श्रद्धाजलि सभा में बैठकर मुझे अपने चिट्ठों पर आई कुछ टिप्पणियाँ स्मरण  हो रही थीं जिनमें मुझे सलाह दी गई थी कि हिन्दू चेतना का प्रसार तो करूँ पर मुस्लिम विरोधी न बन जाऊँ. यह बात कुछ हजम होने लायक नहीं है. हमारे देश में ऐसे बहुत से उदारवादी हैं जो मुसलमानों को खुश करने के लिये संस्कृति, परम्परा, इतिहास, अतीत सब कुछ छोड़कर केवल भाई चारे की बात करना चाहते हैं पर भाई चारा कैसे सम्भव है जब हम एक को भाई मानते हैं और अगला हमें चारा समझता हो. आखिर संस्कृति की बात होगी तो इतिहास का उल्लेख होगा, इतिहास का उल्लेख होगा तो हिन्दुओं पर हुये मुस्लिम अत्याचारी शासकों की बात आयेगी. बात शिवाजी और महाराणा प्रताप की आयेगी. इतिहास के आधार पर कल के मुसलमानों और आज के मुसलमानों और आज के मुसलमानों की तुलना होगी. तुलना तो ऐतिहासिक अनुभव और परिप्रेक्ष्य में होगी. जिन प्रश्नों और विषयों पर इतिहास में हिन्दू मुस्लिम संघर्ष हुये यदि वे आज भी उसी स्वरूप में हैं तो इसका अर्थ है कि सांस्कृतिक संघर्ष अपनी पुरानी स्थिति पर टिका है. ऐसे में यदि हिन्दुओं से आग्रह होता है कि वे पुरानी बात छोड़कर विकास की बात करें, भाईचारे की बात करें तो साफ अर्थ है कि हिन्दू अपना सब कुछ त्याग दें और भाई चारा कायम करें.        आज विदेशी आक्रान्ता बाबर के ढाँचे से मुसलमानों को अगाध श्रद्धा है उनके लिये इसका ढहना उनके धर्म पर आघात है. एक विदेशी आक्रान्ता किसी राष्ट्र की जनता का श्रद्धापात्र कैसे बन सकता है. आज यदि ओसामा बिन लादेन अमेरिका पर हमला कर स्टेच्यू आफ लिबर्टी को ध्वस्त कर वहाँ अपने नाम की मस्जिद बना ले तो अमेरिकी जनता उसे स्वीकार करेगी नहीं सदियों तक उसके लिये संघर्ष करेगी और अवसर मिलने पर ओसामा मस्जिद गिरा देगी, अब यदि अमेरिका का मुसलमान चिल्लाये कि हमारे मजहब का प्रतीक गिरा दिया गया तो साथी अमेरिकी इन मुसलमानों के बारे में क्या सोचेंगे. यही बात भारत के मुसलमानों पर लागू होती है.      1937 में वन्देमातरम् का विरोध हुआ और 10 साल बाद पाकिस्तान बन गया कितने मुसलमान आगे आये जिन्ना की जिद रोकने. गाँधी जी ने क्या नहीं किया मुसलमानों को साथ रखने के लिये हिन्दुओं से हँसते-हँसते मर जाने तक कहा लेकिन क्या गाँधी मुस्लिम हठधर्मिता को रोक पाये. इसलिये देश के समक्ष उत्पन्न खतरों का उल्लेख जो नफा-नुकसान या छवि बचाकर करते हैं वे सत्य बोलने का या तो साहस नहीं रखते या फिर खतरों की गम्भीरता और उसके वास्तविक कारणों से अनभिज्ञ रहते हैं.      इस देश का भला हिन्दुओं के जाग्रत होने से ही होगा और इस जागरण के क्रम में यदि मुस्लिम विरोध होता है तो उसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये , क्योंकि यह समस्या हमारी नहीं है. हिन्दुओं ने सदैव मुसलमानों से मित्रता ही चाही है उन्होंने ही मानवता को काफिर और मोमिन में बाँटा है.

6 Responses to “अपने भानू जी”

  1. silkboard said

    hindi blog dekh kar achha lagaa. likhna main bhee chaahta hoon. magar hindi type karne mein mehnat aur samaya, dono jara jyaada lagte hain. isliye, hindi mein sochta aur angrezi mein likhta hoon.

  2. ratna said

    कृपया फोन्ट साइज़ बढ़ा दें।

  3. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह said

    भानु प्रताप शुक्‍ल जी को भावभीनी श्रद्धाजंली। भानुप्रताप जी के लेख को हमेशा दैनिक जागरण मे पढा है तथा एक प्रखर राष्‍ट्रवादी चिन्‍तक के रूप मे काम करते रहे। मैने निधन के समय मे कुछ लेखन का प्रयास किया किन्‍तु सफलता नही मिली। आपने प्रयास किया आप बधाई के पात्र है।

  4. रत्ना जी वर्ड प्रेस पर फोन्ट बढाने की सुविधा सम्भवत:नहीं है, वैसे तकनीकी विषय में मुझे अधिक जानकारी भी नहीं है. आपकी असुविधा के लिये मुझे खेद है.

  5. भानु जी को श्रद्धाजंली।

  6. हिन्‍दुत्‍व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्षको परम लक्ष्‍य मानकर व्‍यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसि‍क, एवं आध्‍यात्मिक उन्‍नति के अवसर प्रदान करता है।आज हम जिस संस्‍कृति को हिन्‍दू संस्‍कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्‍वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्‍त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं।

    अधिक के लिये देखियेः http://vishwahindusamaj.com

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